अधूरी मुलाकातें (काव्य) : किरण विश्नोई

Adhuri Mulakatein (Kavya) : Kiran Vishnoi

समर्पण

यह पुस्तक
मेरे पिता
स्वर्गीय श्री लक्ष्मणदास
को समर्पित है

आभार

इस पुस्तक के प्रत्येक शब्द के पीछे अपनों का स्नेह और विश्वास निहित है। मैं अपने परिवारजनों के धैर्यपूर्ण साथ, स्टाफ साथियों के सहयोग और मित्रों तथा आत्मियों के निरंतर प्रोत्साहन के लिए हृदय से कृतज्ञ हूँ l

भूमिका

कुछ मुलाक़ातें पूरी होकर भी अधूरी रह जाती हैं और कुछ अधूरी होकर भी जीवन भर साथ चलती हैं। “अधूरी मुलाक़ातें” ऐसी ही अनुभूतियों का सजीव दस्तावेज़ है, जहाँ शब्द स्मृतियों से संवाद करते हैं और भावनाएँ मौन में अपना अर्थ खोजती हैं।

किरण विश्नोई की यह कृति कविता और कहानी—दोनों विद्याओं में मानवीय संवेदनाओं के सूक्ष्म रंगों को उकेरती है। प्रेम, प्रतीक्षा, विरह, स्मृति और आत्मसंवाद—इन सबका यहाँ सहज और ईमानदार चित्रण मिलता है। लेखिका का कथ्य कहीं शोर नहीं करता; वह धीरे-धीरे पाठक के भीतर उतरता है और वहीं ठहर जाता है।

इन रचनाओं में भाषा की सादगी और भावों की गहराई एक-दूसरे का हाथ थामे चलती हैं। हर कविता अधूरेपन की कसक के साथ पूर्ण अनुभूति देती है, तो हर कहानी जीवन की किसी अनकही सच्चाई से रू-ब-रू कराती है। यह संग्रह उन पलों का स्मरण है जिन्हें हम जी तो लेते हैं, पर शब्दों में कह नहीं पाते।

“अधूरी मुलाक़ातें” केवल पढ़ी जाने वाली पुस्तक नहीं, बल्कि महसूस की जाने वाली यात्रा है—जहाँ पाठक अपनी ही किसी अधूरी मुलाक़ात से अचानक आँख मिला बैठता है। यही इस कृति की सबसे बड़ी सफलता और सार्थकता है।

आचार्य नरेन्द्र शास्त्री
लेखक यदुराज उपन्यास

लेखिका की कलम से

कुछ मुलाक़ातें कभी पूरी नहीं होतीं। वे समय के किसी मोड़ पर ठहर जाती हैं—अधूरे वाक्यों, अनकहे भावों और छूटते हाथों के बीच। परन्तु वही अधूरी मुलाक़ातें मन में सबसे गहरी छाप छोड़ जाती हैं। शायद इसी कारण इस पुस्तक का नाम “अधूरी मुलाक़ातें” रखा गया है।

यह संग्रह उन क्षणों का दस्तावेज़ है, जहाँ शब्द कहे जाने से पहले ही रुक जाते हैं, जहाँ प्रेम अपनी परिभाषा खोजता है, जहाँ पीड़ा मौन बन जाती है और स्मृतियाँ कविता का रूप ले लेती हैं। जीवन में हम कई लोगों से मिलते हैं, पर हर मिलन पूर्ण नहीं होता। कुछ रिश्ते, कुछ संवाद, कुछ एहसास— समय की सीमाओं में बँधकर अधूरे रह जाते हैं, किंतु उनका असर जीवन भर बना रहता है।

इस पुस्तक की कविताएँ और कहानियाँ उन्हीं अधूरे पलों की अभिव्यक्ति हैं। ये रचनाएँ किसी एक व्यक्ति या अनुभव तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हर उस पाठक से संवाद करती हैं, जिसने कभी कुछ कहना चाहा और कह नहीं पाया; जिसने किसी का इंतज़ार किया; जिसने एक मुलाक़ात को मन में सहेजकर जीवन जीया।

प्रिय पाठक,

यदि इस पुस्तक के पन्नों में आपको अपना कोई अधूरा संवाद, कोई अनकही बात, कोई रुकी हुई मुलाक़ात मिल जाए—तो समझिए कि यह पुस्तक अपने उद्देश्य में सफल हुई। यह संग्रह पूर्ण उत्तर देने का दावा नहीं करता, बल्कि प्रश्नों के साथ चलने का साहस करता है।

“अधूरी मुलाक़ातें” आपको अपने भीतर झाँकने, ठहरने और महसूस करने का एक छोटा-सा निमंत्रण है।

अधूरी मुलाकातें आपके हाथों में है क्योंकि इसको पूर्ण पाठक करेंगे l

किरण विश्नोई


1. गुरु जम्भेश्वर

विष्णु भक्ति की जिसने धारा बहाई, दुनिया को पर्यावरण रक्षा का संदेश बताया है, समराथल में रखी नींव धर्म की, गुरु जम्भेश्वर नाम कहाया है l चौबीस वर्ष तक कुछ न बोले, माँ हंसा के लिए बच्चे थे, नाम था लहना, उन्नतीस नियम बनाकर पर्यावरण रक्षा के, विश्व मानवता के बन गए गहना l खेजड़ी, साथरी नित्य पूजो, नित्य करो हवन और दान, अमृता देवी ने गौरव बढ़ाया, रखा निज गुरु का मान l विष्णु भक्ति की जिसने धारा बहाई, दुनिया को पर्यावरण रक्षा का संदेश बताया है, गुरु जम्भेश्वर के इस पर्यावरण रक्षा के संदेश को, आज सम्पूर्ण मानवता ने अपनाया है l

2. वो नारी है

मैं क्या हूँ अभी तुमने जाना ही कितना है ? तुम्हारी सोच जहाँ तक ना पहुँचे सब्र उतना है , जहर घोलने वाले की जिंदगी में भी मिठास देती है , वो नारी है नव जीवन की नव सृजन की आस देती है l मेरी हस्तियाँ मिटाते रहे है कई , आँधियों से तिनके लड़ाते रहे है कई , इतिहास उठाकर देख लो नारी का , नारी का अपमान करने वाले नज़र नहीं आते कहीं l कभी बहन , कभी माँ , कभी पुत्री बनकर जिया है , खुद गरल पीकर हमने अमृत दूसरो को दिया है , नारी बनना इतना आसान नहीं होता , सृजन का यह पल्लव हर जगह पुष्पित नहीं होता l कभी दुर्गा , कभी काली कभी रणचंडी भवानी है , कभी गार्गी , कभी मैत्रेयी कभी झांसी वाली रानी है , एक नारी तेरो अनेकों बार रूप हजार है , हे सृष्टि की सृजना तुझे बारंबार प्रणाम है l

3. तेरे शहर में

तेरे शहर में फिर से आना चाहती हूँ मैं तेरी हर यादों को दफनाकर जाना चाहती हूँ मैं दिल पर मेरे तेरा नाम लिखा है , उस नाम को मिटाना चाहती हूँ मैं , तेरी यादें मुझे आज भी सोने नहीं देती , उन्ही यादों को दफनाना चाहती हूँ मैं , मेरी किताबों में तेरे दिए गुलाब के फूल रखे है , उन फूलो को नदियां में बहाना चाहती हूँ मैं , कैसे जिया जाता है अपनो से दूर होकर के , ये तुमसे दूर होकर बताना चाहती हूँ मैं ,

4. जिंदगी

जैसा मिला है जीवन इसे तुम स्वीकार करो l जिंदगी से तुम प्यार करो _ जिंदगी से तुम प्यार करो l l जिंदगी में कभी धूप तो कभी छाँव आती है l कभी किसी से होता लगाव तो कभी घाव दे जाती है l l कभी मिलती है जिंदगी के सफर में जीत , तो कभी हार मिल जाती है l पल _पल होता इम्तिहान यहाँ , जिंदगी कदम _ कदम पर नए सफर पे ले जाती है l l जिंदगी कभी पल _ पल आँसू बहाती है , कभी हँसाती है तो कभी रुलाती है कभी छीन लेती है खुशियों को तो कभी खुशियों की बहारे लौटाती है l लगाया है अगर किसी ने उपवन तो प्रसून भी आयेंगे l रख हौसला खुद पर जिंदगी के ये बुरे दिन भी कट जायेंगे l

5. रिश्तों में हार

मैं हार जाती हूँ रिश्तो में तब , जब तुमसे करनी होती है कोई भी बात l सिमटे होते है शब्द मेरे , लेकिन तब बिखर जाते है जज़्बात l l अकेलेपन में मैं तुम्हारी तस्वीर से बाते कर लेती हूँ , कोई गलती करने से खुद को रोक लेती हूँ l कभी _ कभी तुम्हारी तरह खुद को डाॅंट लेटी हूँ , खुद से ही खुद की गलती मान लेती हूॅं ll दूर होते हुए भी तुम मुझे किस कदर सम्हाल लेते हो , मेरी छोटी बड़ी हर बात को मान लेते हो l रिश्ते बचाने का एक तरीका मैने ये भी दिखाया हैं , बहस हो जब अपनो से तो खुद को खुद ही चुप कराया है l l अपनो से हारोगे तो हारकर भी जीत जाओगे , वरना अकड़ में हर रिश्ता यूँ ही गवा जाओगे ll

6. वृक्ष

खेतो के बीच में खड़ा है एक वृक्ष , धरती माँ का ऑंचल ही है उसकी गोद , गहरे जमीन तक फैली है जड़े, देखकर उसे होता मन मोद l पवन के झोंको संग चलता है , फलों और फूलो से लदता है , भास्कर की सुनहरी किरणे जब उस पर पड़ती , सोने सी पतियाँ है चमकती l गिलहरी , कीट और चिड़ियों ने बसाया है उस पर बसेरा , गुजरता हुआ हर पथिक उसकी छाँव में ठहरा , सब कुछ लुटा देना उसको आता है , पर पेड़ अपने फल स्वयं कभी नहीं खाता है l

7. रिश्ते वहीं निभाते है

रिश्ते वही निभाते है , जिसमे इंसानियत जिंदा है , हर रिश्ते को रखते सहेजकर , जिसकी हस्ती जिंदा है l अहसास नहीं होता जिन्हे रिश्तों का , दौलत और ओहदे के नशे में चूर जो रहते है , लानत है उन लोगो पर , अपने आप में मगरुर जो रहते है l रिश्ते निभाने में एक बड़प्पन चाहिए , कभी _ कभी रिश्तों में खुद भी लूट जाइए , काँच से सहेजकर रखने पड़ते है रिश्ते , लूट जाए तो फिर इंसानियत शर्मिंदा है l रिश्ते वही निभाते है , जिसमे इंसानियत जिंदा है ,

8. नौकरी

नौकरी डिग्री दे सकती है , और नहीं भी दे सकती है , मगर नौकरी गुलामी है जरूर , तिजारत अपनी मर्जी का उसमे है सुरूर l नौकरी में सुकूं मिले या न मिले , मगर आदमी सदा उलझन में जरूर रहता है , ईमानदार सहता जहाँ जुल्मों सितम , वहीं बेईमान मलाई चखता है l नौकरी कोई जरूरी भी नहीं , बस कुछ सपनो के पीछे मजबूरी है , सपने और इस पेट की भूख का क्या करे, बस इसलिए नौकरी जरूरी है l

9. अधूरे ख्वाब

अधूरे ख़्वाब टूटते नहीं, वे बस इंतज़ार में ठहरे रहते हैं। वे याद दिलाते हैं कि सफ़र अभी पूरा नहीं हुआ। कुछ सपने हमें छोड़ जाते हैं, और कुछ सपने हमें छोड़ने ही नहीं देते। अधूरापन दर्द देता है, लेकिन वही अधूरापन दिल में हौसले की सबसे गहरी चिंगारी बन जाता है।

10. आदमी नहीं हो तुम

अगर किसी के अहित में उठते है तुम्हारे हाथ , अगर किसी का मुसीबत में नहीं देते तुम साथ , अगर किसी की जीवन भर की कमाई को लूट ले जाते हो तुम , फिर आदमी नहीं हो तुम l अगर धार्मिक भावनाओं से भड़क जाते हो , दंगे फसाद करने वाले नारे चिल्लाते हो , जानते नहीं किसी के मन के सरलपन को तुम , फिर आदमी नहीं हो तुम l जब तुम पशु _पक्षियों की चोट से भी दुःखी हो जाओगे , अगर किसी के हँसने की वजह बन जाओगे , जब तुम किसी दूसरे के काम आओगे , उस दिन तुम आदमी बन जाओगे l

11. तेरे खत

ना तेरे खत जलाए मैने , ना तेरी तस्वीर फाड़ डाली , ऐसा कोई वक्त नही जनाब , जब तेरी सूरत दिल में नजर नहीं आती l कितनी मोहब्बत है तुमसे , तेरी यादें कभी दिल से नहीं जाती , तेरा नाम न आए जब लबों पर , ऐसी कोई घड़ी नहीं आती l तुमने तो पा लिया खुशियों का कारवां, मैं तुम्हारे बिना कुछ कदम भी नहीं चल पाती , सोचती थी तुमसे दूर होकर जी लूंगी जिंदगी , मगर तेरे बिना कोई खुशी , खुशी नजर नहीं आती l

12. मेरा भारत महान

पक्षी कलरव करते जहाँ , नदियाँ धाराओं में बह जाती है , धरती निस्तब्ध होकर सुनती है , गगन मधुर स्वर में गुनगुनाता है , घूम कर देख लो चाहे सारा जहां , कोई नहीं है भारत से महान l कितने सितम इसने झेले है , कितने आक्रांताओं ने इसे लूटा है , मगर सभ्यता और संस्कृति का दामन , कभी न भारत से छूटा है l कोई श्लोक सुनाता है गीता के , कोई आयत कुरान की गाता है , होती है पूजा सबकी यहाँ , कंकर_ कंकर , पत्थर _ पत्थर भी पूजा जाता है l रहीम , नानक , राम और कृष्ण की , शिक्षाएं यहां दी जाती है अहिंसा तत्र परमोधर्म की गूंज , मिट्टी के कण से भी आती है , घूम कर देख लो चाहे सारा जहां , कोई नहीं है मेरे भारत से महान l

13. घर लौटने की जल्दी

दफ्तर से जल्दी लौटने की उन्हें रहती , जो जाते नित्य घर और परिवारों में , दफ्तर से लौटने की जल्दी उन्हें नहीं रहती , जो किराए के मकानों में रहते गाँव , शहर या बाजारों में l घर लौटने से पहले बतियाते है , रिक्शेवाला , सब्जीवाला और दुकानवाले से , क्योंकि उन्हें मालूम है घर लौटने पर कुछ न मिलेगा कमरे में , सूनापन और खाली दीवारों के l किचन का खालीपन और कमरा , वक्त का हाथो से यूं ही घिसटना , अपनी रुचि अनुसार पढ़ाना और पढ़ना , साल भर की छुट्टियों को गिनना l दफ्तर से जल्दी लौटने की उन्हें रहती , जो जाते नित्य घर और परिवारों में , दफ्तर से लौटने की जल्दी उन्हें नहीं रहती , जो किराए के मकानों में रहते गाँव , शहर या बाजारों में l

14. सांझ ढलने से पहले

सांझ ढलने से पहले वो सुबह आ जाए l मुझे मेरे हिस्से की रोशनी आ जाए ll आँखे धुंधली सही मगर नजर में नूर आ जाए l अब हौसला मुझमें भरपूर आ जाए ll रास्ते उलझे सही मगर सफर जारी रहे l ऐसा मुझमें एक सुरूर आ जाए ll सपने अधूरे है अरमान बाकी है , जंग जीतने का मुझमें एक ऐसा जुनून आ जाए ll तूफानों से भी टकरा लेंगे , लहरों से भी लड़ लेंगे , मेरे मुकद्दर में बस साहिल का किनारा आ जाए ll सांझ ढलने से पहले वो सुबह आ जाए l मुझे मेरे हिस्से की रोशनी आ जाए ll

15. तुमसे मिलने के बाद

बहक गया मेरा दिल तुमसे मिलने के बाद l तेरे घर का पता पूछ लिया तुमसे मिलने के बाद ll मयखाने का पता पूछने की जरूरत किसको है l जाम आँखों से ही पी लिया तुमसे मिलने के बाद ll खुद को तराशु आईने में या खुदा को देखूं l तेरी सूरत ही नजर आती है तुमसे मिलने के बाद l चलना था , चलता रहा मंजिल से अनजान l अब तो मंजिल ही मिल गई तुमसे मिलने के बाद ll

16. माँ

खुद काँटो की सेज पर लेटकर , बच्चो के लिए सेज फूलो की सजा देती है , वो सिर्फ माँ होती है , जो तकलीफ देने वालो को भी दुआ देती है l खुद अंगारों पर चलकर , धूप में जलकर , अपने ऑंचल की छाव देती है , देख उदासी अपनी संतान के चेहरे की , अपनी खुशियों को उस पर कुर्बान कर देती है l अपनी संतान के करीब बैठकर , लोरी गाया करती है , घंटो भर चेहरे को रोज निहारा करती है , कभी माँ कभी पापा बनकर कभी दोहरी भूमिका को निभाया करती है , अपनी ख्वाहिश चाहे मन मसोस कर रह जाए , अपनी संतान की हर ख्वाहिश को पूरा करती है l

17. मेरे जाने के बाद

चले जायेंगे हम एक दिन , तुम बस फिक्र मत करना , मेरे जाने के बाद मेरी बेरुखी का, तुम किसी से जिक्र मत करना l मेरे जाने के बाद तुम्हारे पास , कभी खत्म न होने वाली शिकायत रह जाएगी, उदास मत होना अपनी इस व्यस्त जिंदगी में , पन्ने पलटते जब कभी मेरी कविताओं पर तुम्हारी उॅंगलिया छू जाएगी l तुम बरबस ही भीग जाओगे भीतर तक , मेरी कविता तुम्हारे अंतस तक को छू जाएगी , उस दिन मैं बहुत याद आऊंगी तुम्हे , बस दिल के किसी कोने में तुम्हे मेरी तस्वीर नजर आएगी l

18. मेरी पाठशाला

मेरे घर से कुछ दूरी पर मेरी पाठशाला थी , ज्ञानार्जन करने हेतु वह मेरी कर्मशाला थी l रास्ते भयावह थे और सुनसान थे , मगर सफर की मुश्किलों से हम अनजान थे ll गर्मियों में कड़क धूप और सर्दियों में कोहरा आ जाता था , मगर हर हालत में विद्यालय तो जाना था l, रास्ते में न कहीं रेस्ट घर और न कहीं ठाँव थी , बस कुल मिलाकर एक नीम के पेड़ की छाँव थी ll सर्दी हो , गर्मी हो या फिर चाहे हो बरसात , हँसकर झेलते थे हम हर संताप l पीछे की सीट और बैठने के लिए चटाई हुआ करती थी , गणित वाले माड़साब से हमारी कुटाई हुआ करती थी ll मन में जज्बा और ललक लिए कुछ करने की आशा थी , ज्ञान संचित करने की मन में प्रत्याशा थी l मेरे घर से कुछ दूरी पर मेरी पाठशाला थी , ज्ञानार्जन करने हेतु वह मेरी कर्मशाला थी l

19. जिंदगी नाम चलते रहने का

रुकने का नाम नहीं है जिंदगी , जिंदगी नाम है चलते रहने का , कोई सहारा दे या न दे , बिना किसी के सहारे के कटते रहने का l बेशक कोई छोड़कर चला जाए , या किसी की यादें सताएं, जिंदगी किसी के लिए रुकती कहा है , तामीर भला किसी की बदलती कहा है l सुख भी आते है , दुःख भी आते है , कुछ अपने भी रंग दिखाते है चलते रहने का नाम है जिंदगी , जिंदगी भला रुकती कहा है l

20. भोर की लालिमा

भोर की लालिमा धरा पर आ रही है , कण_ कण, धरती _अम्बर हर जगह छा रही है , सूरजमुखी में आई चेतना , यह दृश्य मन को भा गई है l उपवन में पुष्प पलवित पुष्पित होते , मुक्त गगन में पंछी उड़ते , सोने सा आलोकित होने लगा घाम , उषा रूप बदल कर आ गई है l विदा लेकर निशा चली गई , भुवन भास्कर की रश्मिया आ गई है , भोर की लालिमा धरा पर आ रही है , कण_ कण, धरती _अम्बर हर जगह छा रही है ,

21. अपना अनूपगढ़

रेतीली धरा, गंग का संग, अनूपगढ़ का अद्भुत रंग। सीमांत पर शौर्य का द्वार, राजस्थान का अनुपम हार। कभी हुआ था किला महान, बीकानेर के राज का मान। राजा अनूप सिंह का नाम, जिससे मिला नगर को नाम। हरियाली यहाँ की नयन सुखाए, इंदिरा नहर जीवन लाए। धान, कपास, गेहूँ की बौछार, किसानों का यह गढ़ अपार। सरहद से सटा ये गाँव, सीमाओं का रखवाला ठाँव। सैनिकों की गूँज यहाँ, देशभक्ति की धड़कन यहाँ। मेले, त्योहारों की शान, लोकगीतों में राजस्थान। मूली की खुशबू, बाजरे का स्वाद, मेहमाननवाजी यहाँ की फ़रियाद। गर्मी में तपता सूरज राज, सर्दी में लिपटी ऊन की लाज। रेत में भी रचता इतिहास, अनूपगढ़ – मरुभूमि का विश्वास। गंग की गोद में बसे सपने, हर दिल में हैं इसके अपने। अनूपगढ़ की वाणी पुकार, "हम हैं राजस्थान के श्रृंगार!" लैला मजनू की यहाँ मजार अंतिम समय मजनू ने जहाँ त्यागे प्राण, कभी आओ हमारे अनूपगढ़ , कभी तो आओ राजस्थान l

22. मायका

सचमुच मायका बेटियो के लिए स्वर्ग होता है जहाॅं मिलता है उन्हे माॅं का स्नेहिल आँचल , पापा का दुलार , और एक ऐसा वातावरण जहाॅं उन्हे अपने खुद के नाम से जाना जाता है |

23. डाकिया

ट्रिंग ट्रिंग की घंटी बजते ही , पुरा मोहल्ला इकट्ठा हो जाता था | आज भी मुझे याद है , डाकिया जब चिठ्ठी बाँटने आता था | अपने थैले से निकालकर चिट्ठीयों को वह , सबको अपनी अपनी चिठ्ठी सम्हलाता था | थैले से निकालकर मुँहर को , वापिस भेजने वाली चिठ्ठीयो पर मुहर लगाता था | सर्दी , गर्मी , धुप _ छाँव में , वह घर तक चिठ्ठी पहुंचाता था | जब तक हो ना जाये चिठ्ठीयो से उसका बस्ता खाली , तब तक वह आराम नहीं फरमाता था | अब ना कोई किसी को चिठ्ठी लिखता है , ना साइकिल की घंटी बजाते हुए डाकिया आता है | डाक से पहुंचने वाला संदेश अब टेक्नॉलोजी से कुछ पलो में पहुंच जाता है | मेरे पड़ोस में डाकघर का लाल बॉक्स , अब उस पर धूल_ मिट्टी की परत छाई है | अब कोई आकर नही. पूछता डाकिये से की मेरी कोई चिठ्ठी आई है |

24. एक मित्र

मुझे एक ऐसा मित्र चाहिए, जो शब्दों से पहले मन समझे, दुःख–सुख में पहाड़ बन खड़ा रहे, और जिसकी मौजूदगी अकेलेपन को हार मानने पर मजबूर कर दे।

25. अशांत मन

जब मन अशांत होता है, तो नीरवता भी भारी लगने लगती है। सन्नाटे को चीरती हर छोटी आवाज मन के अस्तर में चुभ जाती है। तब चाह होती है— असीम शांति की, ऐसे एकांत की जो तन नहीं, मन को सुकून दे।

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