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भक्त सूरदास
Bhakt Surdas
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Udhav Gopi Samvad-Udhav Sandesh Bhakt Surdas Ji

उद्धव-गोपी संवाद-उद्धव संदेश

उद्धव-गोपी संवाद

सुनौ गोपी हरि कौ संदेस
करि समाधि अंतर गति ध्यावहु, यह उनकौ उपदेस ॥
वै अविगत अविनासी पूरन, सब-घट रहे समाइ ।
तत्व ज्ञान बिनु मुक्ति नहीं है, बेद पुराननि गाइ ॥
सगुन रूप तजि निरगुन ध्यावहु, इस चित इक मन लाइ ।
वह उपाइ करि बिरह तरौ तुम, मिलै ब्रह्म तब आइ ॥
दुसह सँदेस सुनत माधौ को, गोपी जन बिलखानी ।
सूर बिरह की कौन चलावै, बुड़तिं मनु बिनु पानी ॥1॥

परी पुकार द्वार गृह-गृह तैं, सुनी सखी इक जोगी आयौ ।
पवन सधावन, भवन छुड़वन, रवन-रसाल, गोपाल पठायौ ॥
आसन बाँधि, परम ऊरध चित, बनत न तिनहिं कहा हित ल्यायौ ।
कनक बेलि , कामिनि ब्रजबाला, जोग अगिनि दहिबे कौं धायौ ॥
भव-भय हरन, असुर मारन हित, कारन कान्ह मधुपुरी छायौ ।
ब्रज मै जादव एकौ नाहीं, काहैं उलटौ जस बिथरायौ ॥
सुथल जु स्याम धाम मैं बैठौ, अबलनि प्रति अधिकार जनायौ ॥
सूर बिसारी प्रीति साँवरै, भली चतुरता जगत हँसायौ ॥2॥

देन आए ऊधौ मत नीकौ ।
आवहु री मिलि सुनहु सयानी, लेहु सुजस कौ टीकौ ॥
तजन कहत अंबर आभूषन, गेह नेह सुत ही कौ ।
अंग भस्म करि सीस जटा धरि,सिखवत निरगुन फीकौ ॥
मेरे जान यहै जुवतिनि कौ, देत फिरत दुख पी कौ ।
ता सराप तें भयौ स्याम तन, तउ न गहत डर जी कौ ॥
जाकी प्रकृति परी जिय जेसी, सोच न भली बुरी कौ ।
जैसैं सूर ब्याल रस चाखैं, मुख नहिं होत अमी कौ ॥3॥

प्रकृति जो जाकैं अंग परी ।
स्वान पूँछ कोउ कोटिक लागै, सूधी कहुँ न करी ॥
जैसें काग भच्छ नहिं छाँड़ै, जनमत जौन घरी ।
धौए रंग जात नहिं कैसेहुँ, ज्यौं कारी कमरी ॥
ज्यौं अहि डसत उदर नहिं पूरत, ऐसी धरनि धरी ।
सूर होइ सो होइ सोच नहिं, तैसेइ एऊ री ॥4॥

समुझि न परति तिहारो ऊधौ ।
ज्यौं त्रिदोष उपजैं जक लागत, बोलत बचन न सूधौ ॥
आपुन कौ उपचार करो अति, तब औरनि सिख देहु ।
बड़ौ रोग उपयौ है तुमकौं भवन सबारैं लेहु ।
ह्वाँ भेषज नाना बाँतिन के, अरु मधु-रिपु से बैद ।
हम कातर डरपतिं अपनै सिर, यह कलंक है खेद ॥
साँची बात छाँड़ि अलि तेरी, झूठी को अब सुनिहै ।
सूरदास मुक्ताहल भोगी, हंस ज्वारि क्यौं चुनिहै ॥5॥

ऊधौ हम आजु भईं बड़ भागी ।
जिन अँखियन तुम स्याम बिलोके, ते अँखियाँ हम लागीं ॥
जैसे सुमन बास लै आवत, पवन मधुप अनुरागी ।
अति आनंद होत है तैसें, अंग-अंग सुख रागी ॥
ज्यौं दरपन मैं दरस देखियत, दृष्टि परम रुचि लागी ।
तैसैं सूर मिले हरि हमकौं, बिरह-बिथा तन त्यागी ॥6॥

(अलि हौं) कैसैं कहौं हरि के रूप रसहिं ।
अपने तन मैं भेद बहुत बिधि, रसना जानै न नैन दसहिं ॥
जिन देखे ते आहिं बचन बिनु, जिनहिं बचन दरसन न तिसहिं ।
बिनु बानी ये उमँगि प्रेम जल, सुमिरि-सुमिरि वा रूप जसहिं ॥
बार-बार पछितात यहै कहि, कहा करौं जो बिधि न बसहिं ।
सूर सकल अँगनि की गति, क्यौं समुझावैं छपद पसुहिं ॥7॥

हम तौ सब बातनि सचु पायौ ।
गोद खिलाइ पिवाइ देह पय, पुनि पालनै झुलायौ ॥
देखति रही फनिग की मनि ज्यौं, गुरुजन ज्यौं न भुलायौ ।
अब नहिं समुजति कौन पाप तै, बिधना सो उलटायौ ॥
बिनु देखैं पल-पल नहिं छन-छन, ये ही चित ही चायौ ।
अबहिं कठोर भए ब्रजपति-सुत, रोवत मुँह न धुवायौ ॥
तब हम दूध दही के कारन, घर घर बहुत खिझायौ ।
सो सब सूर प्रगट ही लाग्यौ , योगऽरु ज्ञान पठायौ ॥8॥

मधुकर कहिऐ काहि सुनाइ ।
हरि बिछुरत हम जिते सहे दुख, जिते बिरह के धाइ ॥
बरु माधौ मधुबन ही रहते, कत जसुदा कैं आए ।
कत प्रभु गोप-बेष ब्रज धरि कै, कत ये सुख उपजाए ॥
कत गिरि धर्‌यौ, इन्द्र मद मेट्यौ, कत बन रास बनाए ।
अब कहा निठुर भए अबलनि कौं, लिखि लिखि जोग पठाए ॥
तुम परबीन सबे जानत हौ, तातैं यह कहि आई ।
अपनी को चालै सुनि सूरज, पिता जननि बिसराई ॥9॥
जानि करि बावरी जनि होहु ।
तत्व भजै वैसी ह्वै जैहौ, पारस परसैं लोहु ॥
मेरौ बचन सत्य करि मानौ, छाँड़ौ सबकौ मोहु ।
तौ लगि सब पानी की चुपरी, जौ लगि अस्थित दोहु ॥
अरे मधुप ! बातैं ये ऐसी, क्यौं कहि आवतिं तोह ।
सूर सुबस्ती छाड़ि परम सुख, हमैं बतावत खौह ॥10॥

ऊधौ हरि गुन हम चकडोर ।
गुन सौं ज्यौं भावै त्यौं फेरौ, यहे बात कौ ओर ॥
पैड़ पैंड़ चलियै तो चलियै, ऊबट रपटै पाइँ ।
चकडोरी की रीति यहै फिरि, गुन हीं सौं लपटाइ ॥
सूर सहज गुन ग्रंथि हमारैं, दई स्याम उर माहीं ।
हरि के हाथ परै तौ छूटै, और जतन कछु नाहिं ॥11॥

उलटी रीति तिहारी ऊधौ, सुनै सो ऐसी को है ।
अलप बयस अबला अहीरि सठ, तिनहीं जोग कत सोहे ॥
बूचि खुभी, आँधरी काजर, नकटी पहिरै बेसरि ।
मुड़ली पटिया पारौ चाहै, कोढ़ी लावै केसरि ॥
बहिरी पति सौ मतौ करै तौ, तैसोइ उत्तर पावै ।
सो गति होइ सबै ताकी जो ,ग्वारिनि जोग सिखावै ॥
सिखई कहत स्याम की बतियाँ, तुमकौं नाहीं दोष ।
राज काज तुम तैं न सरैगो, काया अपनी पोष ॥
जाते भूलि सबै मारग मैं, इहाँ आनि का कहते ।
भली भई सुधि रही सूर, नतु मोह धार मैं बहते ॥12॥

अँखियाँ हरि दरसन की प्यासी ।
देख्यौ चाहतिं कमलनैन कौं, निसि-दिन रहतिं उदासी ॥
आए ऊधौ फिरि गए आँगन, डारि गए गर फाँसी ।
केसरि तिलक मोतिनि की माला, बृंदावन के बासी ॥
काहु के मन की कोउ जानत, लोगनि के मन हाँसी ।
सूरदास-प्रभु तुम्हरे दरस कौं, करवट लेहौं कासी ॥13॥

जब तैं सुंदर बदन निहार्‌यौ ।
ता दिनतैं मधुकर मन अटक्यौ, बहुत करी निकरै न निकार्‌यौ ॥
मातु, पिता, पति, बंधु, सुजन नहिं, तिनहूँ कौ कहिबौ सिर धार्‌यो ।
रही न लोक लाज निरखत, दुसह क्रोध फीकौ करि डार्‌यौ ॥
ह्वैबौ होइ सु होइ सु होइ कर्मबस, अब जी कौ सब सोच निवार्‌यौ ।
दासी भई जु सूरदास प्रभु, भलौ पोच अपनौ न विचार्‌यौ ॥14॥

और सकल अँगनि तैं ऊधौ, अँखियाँ अधिक दुखारी ।
अतिहिं पिरातिं सिरातिं, न कबहूँ, बहुत जतन करि हारी ॥
मग जोवत पलकी नहिं लावतिं, बिरह बिकल भइँ भारी ।
भरि गइ बिरह बयारि दरस बिनु, निसि दिन रहतिं उघारी ॥
ते अलि अब ये ज्ञान सलाकैं, क्यौं सहि सकतिं तिहारी ।
सूर सु अंजन आँजि रूप रस, आरति हरहु हमारी ॥15॥

उपमा नैन न एक रही ।
कवि जन कहत कहत सब आए, सुधि कर नाहिं कही ॥
कहि चकोर बिधु मुख बिनु जीवत , भ्रमर नहीं उड़ि जात ।
हरि-मुख कमल कोष बिछुरे तैं, ठाले कत ठहरात ॥
ऊधौ बधिक ब्याध ह्वै आए, मृग सम क्यौं न पलात ।
भागि जाहिं बन सघन स्याम मैं , जहाँ न कोऊ घात ॥
खंजन मन-रंजन न होहिं ये, कबहुँ नहीं अकुलात ।
पंख पसारि न होत चपल गति, हरि समीप मुकुलात ॥
प्रेम न होइ कौन बिधि कहियै, झूठैं हीं तन आड़त ।
सूरदास मीनता कछू इक, जल भरि कबहुँ न छाँड़त ॥16॥

ऊधौ अँखियाँ अति अनुरागी ।
इकटक मग जोवतिं अरु रोवतिं, भूलेहुँ पलक न लागी ॥
बिनु पावस पावस करि राखी, देखत हौ बिदमान ।
अब धौं कहा कियौ चाहत हौ, छाँड़ौ निरगुगन ज्ञान ॥
तुम हौ सखा स्याम सुंदर के, जानत सकल सुभाइ ।
जैसैं मिलै सूर के स्वामी, सोई करहु उपाइ ॥17॥

सब खौटे मधुबन के लोग ।
जिनके संग स्याम सुंदर सखि, सीखे हैं अपजोग ॥
आए हैं ब्रज के हित ऊधौ, जुवतिनि कौ लै जोग ।
आसन, ध्यान नैन मूँदे सखि, कैसैं कढ़ै वियोग ॥
हम अहीरि इतनी का जानैं, कुबिजा सौं संजोग ।
सूर सुवैद कहा लै कीजै, कहैं न जानै रोग ॥18॥

मधुबन लोगनि को पतियाइ ।
मुख औरे अंतरगत औरे, पतियाँ लिखि पठवत जु बनाइ ॥
ज्यौं कोइल सुत-काग जिवावै, भाव भगति जु खवाइ ।
कुहुकि कुहुकि आऐं बसंत रितु, अंत मिलै अपने कुल जाइ ॥
ज्यौं मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ, बहुरि न बूझे बातैं आइ ।
सूर जहाँ लगि स्याम गात हैं, तिनसौं कीजै कहा सगाइ ॥19॥

आए जोग सिखावन पाँड़े ।
परमारथी पुराननि लादे, ज्यौं बनजारे टाँड़े ॥
हमरे गति-पति कमल-नयन की, जोग सिखें ते राँड़े ।
कहौ मधुप कैसे समाहिंगे, एक म्यान दो खाँडे ॥
कहु षट्पद कैसें खैयतु है, हाथिनि कैं सँग गाँड़े ॥
काकी भूख गई बयारि भषि, बिना दूध घृत माँड़े ।
काहे कौं झाला लै मिलवत, कौन चोर तुम डाँड़े ॥
सूरदास तीनौ तहिं उपजत, धनिया, धान कुम्हाड़े ॥20॥

ज्ञान बिना कहुँवै सुख नाहीं ।
घट घट व्यापक दारु अगिनि ज्यौं, सदा बसै उर माहीं ॥
निरगुन छाँड़ी सगुन कौं दौरतिं, सुधौं कहौ किहिं पाहीं ।
तत्व भजौ जो निकट न छूटै, ज्यौं तनु तैं परछाहीं ॥
तिहि तें कहौ कौन सुख पायौ, जिहिं अब लौं अवगाहीं ।
सूरदास ऐसैं करि लागत, ज्यौं कृषि कीन्हें पाही ॥21॥

ऊधो कही सु फेरि न कहिऐ ।
जौ तुम हमैं जिवायौ चाहत, अनबोले ह्वै रहिए ॥
प्रान हमारे घात होत है, तुम्हारे भाऐं हाँसी ।
या जीवन तैं मरन भलौ है, करवट लैहैं कासी ॥
पूरब प्रीति सँभारि हमारी, तुमकौं कहन पठायौ ।
हम तौ जरि बरि भस्म भईं तुम आनि मसान जगायौ ॥
कै हरि हमकौं आनि मिलावहु, कै लै चलिये साथै ।
सूर स्याम बिनु प्रान तजति हैं, दोष तुम्हारे माथैं ॥22॥

घर ही के बाढ़े रावरे ।
नाहिन मीत-वियोग बस परे, अनब्यौगे अलि बावरे ॥
बरु मरि जाइ चरैं नाहिं तिनुका, सिंह को यहै स्वभाव रे ।
स्रवन सुधा-मुरली के पोषे, जोग जहर न खवाब रे ॥
ऊधौ हमहिं सीख कह दैहौ, हरि बिनु अनत न ठाँव रे ।
सूरदास कहा लै कीजै, थाही नदिया नाव रे ॥23॥

हमकौं हरि कौ कथा सुनाउ ।
ये आपनी ज्ञान गाथा अलि, मथुरा ही लै जाउ ॥
नागरि नारि भलैं समझैंगी, तेरौ बचन बनाउ ।
पा लागौं ऐसी इन बातनि, उनही जाइ रिझाउ ॥
जौ सुचि सखा स्याम सुंदर कौ, अरु जिय मैं सति भाउ ।
तौ बारक आतुर इन नैननि, हरि मुख आनि दैखाउ ॥
जौ कोउ कोटि करै, कैसिहूँ बिधि, बल विद्या व्यवसाउ ।
तउ सुनि सूर मीन कौं जल बिनु, नाहिं न और उपाउ ॥24॥

ऊधौ बानी कौन ढरैगौ, तोसैं उत्तर कौन करेगौ ।
या पाती के देखत हीं अब, जल सावन कौ नैन ढरैगौ ।
बिरह-अगिनि तन जरत निसा-दिन, करहिं छुवत तुव जोग जरैगौ ।
नैन हमारे सजल हैं तारे, निखत ही तेरौ ज्ञान गरैगौ ॥
हमहिं वियोगऽरु सोग स्याम कौ, जोग रोग सौं कौन अरैगौ ।
दिन दस रहौ जु गोकुल महियाँ, तब तेरौ सब ज्ञान मरैगौ ॥
सिंगी सेल्ही भसमऽरु कंथा, कहि अलि काके गरैं परैगौ ।
जे ये लट हरि सुमननि गूँधीं, सीस जटा अब कौन धरैगौ ॥
जोग सगुन लै जाहु मधुपुरी, ऐसे निरगुन कौन तरैगो ।
हमहिं ध्यान पल छिन मोहन कौं, बिन दरसन कछुवै न सरैगौ ॥
निसि दिन सुमिरन रहत स्याम कौ, जोग अगिनि मैं कौन जरैगौ ।
कैसैंहु प्रेम नेम मोहन कौं, हित चित तैं हमरैं न टरैगौ ।
नित उठि आवत जोग सिखावन, ऐसी बातनि कौन भरैगौ ।
कथा तुम्हारी सुनत न कोऊ, ठाढ़े ही अब आप ररैगौ ॥
बादिहिं रटत उठत अपने जिय, को तोसौं बेकाज लरैगौ ।
हम अँग अँग स्याम रँग भीनी, को इन बातनि सूर डरैगौ ॥25॥

ऊधौ तुम ब्रज की दसा बिचारौ
ता पाछैं यह सिद्ध आपनी, जोग कथा बिस्तारौ ॥
जा कारन तुम पठए माधौ सो सोचौ जिय माहीं ।
केतिक बीच बिरह परमारथ, जानत हौ किधौं नाहीं ॥
तुम परवीन चतुर कहियत हौ, संतत निकट रहत हौ ।
जल बूड़त अवलंब फेन कौ, फिरि फिरि कहा सकत हौ ॥
वह मुसकान मनोहर चितवनि, कैसैं उर तैं टारौं ।
जोग जुक्ति अरु मुक्ति परम निधि, वा मुरली पर वारौं ॥
जिहिं उर कमल-नयन जु बसत हैं, तिहिं निरगुन क्यौं आवै ।
सूरदास सो भजन बहाऊँ, जाहि दूसरौ भावै ॥26॥

ऊधौ हरि काहे के अंतरजामी ।
अजहुँ न आइ मिलत इहँ अवसर, अवधि बतावत लामी ॥
अपनी चोप आइ उड़ि बैठत, अलि ज्यौं रस के कामी ।
तिनकौ कौन परेखौ कीजौ, जे हैं गरुड़ के गामी ॥
आई उघरि प्रीति कलई सी, जैसी खाटी आमी ।
सूर इते पर अनखनि मरियत, ऊधौ पीवत मामी ॥27॥

निरगुन कौन देस कौ बासी ?
मधुकर कहि समुझाइ सौंह दै, बूझतिं साँचि न हाँसी ॥
कौ है जनक कौन है जननी, कौन नारि को दासी ?
कैसे बरन, भेष है कैसौ, किहिं रस मैं अभिलाषी ?
पावैगौ पुनि कियौ आपनौ, जो रे करैगौ गाँसी ।
सुनत मौन ह्वै रह्यौ बावरौ, सूर सबै मति नासी ॥28॥

कहियौ ठकुराइति हम जानी ।
अब दिन चारि चलहु गोकुल मैं, सेवहु आइ बहुरि रजधानी ॥
हमकौं हौंस बहुत देखन की, संग लियैं कुबिजा पटरानी ।
पहुनाई ब्रज कौ दधि माखन, बड़ौ पलँग, अरु तातौ पानी ॥
तुम जनि डरौ उखल तौ तोर्‌यौ, दाँवरिहू अब भई पुरानी ।
वह बल कहाँ जसोमति कैं कर , देह रावरैं सोच बुढ़ानी ॥
सुरभी बाँटि दई ग्वालनि कौं, मोर-चंद्रका सबै उड़ानी ।
सूर नंद जू के पालागौं, देखहु आइ राधिका स्यानी ॥29॥

सुनि सुनि ऊधौ आवति हाँसी ।
कहँ वै ब्रह्मादिक के ठाकुर, कहाँ कंस की दासी ॥
इंद्रादिक की कौन चलावै; संकर करत खवासी ।
निगम आदि बंदीजन जाके, सेष सीस के बासी ॥
जाकैं रमा रहति चरननि तर, कौन गनै कुविजा सी ।
सूरदास-प्रभु दृढ़ करि बाँधे, प्रेम-पुंज की पासी ॥30॥

काहे कौं गोपिनाथ कहावत ।
जौ मधुकर वै स्याम हमारे, क्यौं न इहाँ लौं आवत ॥
सपने की पहिचानि मानि जिय, हमहिं कलंक लगावत ।
जो पै कृष्न कूबरी रीझे, सोइ किन बिरद बुलावत ।
ज्यौं गजराज काज के औरै, औरे दसन दिखावत ।
ऐसैं हम कहिबे सुनिबे कौं , सूर अनत बिरमावत ॥31॥

साँवरौ साँवरी रैनि कौ जायौ ।
आधी राति कंस के त्रासनि, बसुद्यौ गोकुल ल्यायौ ॥
नंद पिता अरु मातु जसोदा, माखन मही खवायौ ।
हाथ लकुट कामरि काँधे पर,बछरुन साथ डुलायौ ॥
कहा भयौ मधुपुरी अवतरे, गोपीनाथ कहायौ ।
ब्रज बधुअनि मिलि साँट कटीली, कपि ज्यौं नाच नचायौ ॥
अब लौं कहाँ रहे हो ऊधौ, लिखि-लिख जोग पठायौ ।
सूरदास हम यहै परेखौ, कुबरी हाथ बिकायौ ॥32॥

जोग ठगौरी ब्रज न बिकैहै ।
मूरी के पातनि के बदलैं, कौ मुक्ताहल देहै ॥
यह व्यौपार तुम्हारो ऊधौ, ऐसैं ही धर्‌यौ रैहै ।
जिन पै तैं लै आए ऊधौ, तिनहिं के पेट समैहै ॥
दाख छाँड़ि के कटुक निबौरी, को अपने मुख खैहै ।
गुन करि मोही सूर सावरैं, को निरगुन निरबैहै ॥33॥

मीठी बातनि मैं कहा लीजै ।
जौ पै वै हरि होहिं हमारे, करन कहैं सोइ कीजै ॥
जिन मोहन अपनैं कर काननि, करनफूल पहिराए ।
तिन मोहन माटी के मुद्रा, मधुकर हाथ पठाए ॥
एक दिवस बेनी बृंदावन, रचि पचि बिबिध बनाइ ।
ते अब कहत जटा माथे पर, बदलौ नाम कन्हाइ ॥
लाइ सुगंध बनाइ अभूषन, अरु कीन्ही अरधंग ।
सो वै अब कहि-कहि पठवत हैं, भसम चढ़ावन अंग ॥
हम कहा करैं दूरि नँद-नंदन, तुम जु मधुप मधुपाती ।
सूर न होहिं स्याम के मुख को, जाहु न जारहु छाती ॥34॥

ऊधौ तुम हौ निकट के बासी ।
यह निरगुन लै तिनहिं सुनावहु, जे मुड़िया बसैं कासी ॥
मुरलीधरन सकल अँग सुंदर, रूप सिंधु की रासी ।
जोग बटोरे लिए फिरत हौ, ब्रजवासिन की फाँसी ॥
राजकुमार भलैं हम जाने, घर मैं कंस की दासी ।
सूरदास जदुकुलहिं लजावत, ब्रज मैं होति है हाँसी ॥35॥

जा दिन तैं गोपाल चले ।
ता दिन तैं ऊधौ या ब्रज के,सब स्वभाव बदले ॥
घटे अहार विहार हरष हित, सुख सोभा गुन गान ।
ओज तेज सब रहित सकल बिधि, आरति असम समान ॥
बाढ़ी निसा, बलय आभूषन, उन-कंचुकी उसास ।
नैननि जल अंजन अंचल प्रति,आवन अवधि की आस ॥
अब यह दसा प्रगट या तन की, कहियौ जाइ सुनाइ ।
सूरदास प्रभु सो कीजौ जिहिं, बेगि मिलहिं अब आइ ॥36॥

हम तौ कान्ह केलि की भूखी ।
कहा करैं लै निर्गुन तुम्हरौ, बिरहिन विरह बिदूषी ॥
कहियै कहा यहै नहिं जानत, कहौ जोग किहि जोग ।
पालागौं तुमहीं से वा पुर, बसत बावरे लोग ॥
चंदन अभरन, चीर चारू बर, नेकु आपु तन कीजै ।
दंड, कमंडल, भसम, अधारी, तब जुवतिनि कौं दीजै ॥
सूर देखि दृढ़ता गोपिन की, ऊधौ दृढ़ ब्रत पायौ ।
करी कृपा जदुनाथ मधुप कौं, प्रेमहिं पढ़न पठायौ ॥37॥

गोपी सुनहु हरि संदेस ।
कह्यौ पूरन ब्रह्म ध्यावहु, त्रिगुन मिथ्या भेष ॥
मैं कहौं सो सत्य मानहु, सगुन डारहु नाखि ।
पंच त्रय-गुन सकल देही, जगत ऐसौ भाषि ॥
ज्ञान बिनु नर-मुक्ति नाहीं, यह विषय संसार ।
रूप-रेख, न नाम जल थल, बरन अबरन सार ॥
मातु पितु कोउ नाहिं नारी, जगत मिथ्या लाइ ।
सूर सुख-दुख नहीं जाकैं, भजौ ताकौं जाइ ॥38॥

ऐसी बात कहौ जनि ऊधौ ।
कमलनैन की कानि करति हैं, आवत बचन न सूधौ ॥
बातनि ही उड़ि जाहिं और ज्यौं, त्यौं नाहीं हम काँची ।
मन, बच, कर्म सोधि एकै मत, नंद-नंदन रँग राँची ॥
सो कछु जतन करौ पालागौ, मिटै हियै की सूल ।
मुरलीधरहिं आनि दिखरावहु, ओढ़े पीत दुकूल ॥
इनहीं बातनि भए स्याम तनु , मिलवत हौ गढ़ि छोलि ।
सूर बचन सुनि रह्यौ ठगौसौ, बहुरि न आयौ बोलि ॥39॥

फिरि फिरि कहा बनावत बात ।
प्रात काल उठि खेलत ऊधौ, घर घर माखन खात ॥
जिनकी बात कहत तुम हमसौं, सो है हमसौं दूरि ।
ह्याँ हैं निकट जसोदा-नंदन, प्रान सजीवन मूरि ॥
बालक संग लिऐँ दधि चोरत, खात खवावत डोलत ।
सूर सीस नीचौ कत नावत, अब काहैं नहिं बोलत ॥40॥

फिरि-फिरि कहा सिखावत मौन ॥
बचन दुसह लागत अलि तेरे, ज्यौं पजरे पर लौन ॥
सृंगी, मुद्रा, भस्म, त्वचा-मृग, अरु अवराधन पौन ।
हम अबला अहीरि सठ मधुकर,धरि जानहिं कहि कौन ॥
यह मत जाइ तिनहिं तुम सिखवहु, जिनहिं आजु सब सोहत ।
सूरदास कहुँ सुनी न देखी, पोत सूतरी पोहत ॥41॥

ऊधौ हमहिं न जोग सिखैयै ।
जिहि उपदेश मिलै हरि हमकौं, सो ब्रत नेम बतैयै ॥
मुक्ति रहौ घर बैठि आपने,,निर्गुन सुनि दुख पैयै ।
जिहिं सिर केस कुसुम भरि गूँदे, कैसैं भस्म चढ़ैयै ॥
जानि जानि सब मगन भई हैं, आपुन आपु लखैयै ।
सूरदास-प्रभु सनहु नवौ निधि, बहुरि कि इहिं ब्रज अइयै ॥42॥

मधुकर स्याम हमारे ईस ।
तिनकौ ध्यान धरैं निसि बासर, औरहिं नवै न सीस ॥
जोगिनि जाइ जोग उपदेसहु, जिनके मन दस-बीस ।
एकै चित एकै वह मूरति, तिन चितवतिं दिन तीस ॥
काहें निरगुन ग्यान आपनौ, जित कित डारत खीस ।
सूरदास प्रभु नंदनंदन बिनु, हमरे को जगदीश ॥43॥

सतगुरु चरन भजे बिनु विद्या, कहु, कैसैं कोउ पावै ।
उपदेसक हरि दूरि रहे तैं, क्यौं हमरे मन आवै ॥
जो हित कियौ तौ अधिक करहि किन, आपुन आनि सिखावैं ।
जोग बोझ तैं चलि न सकैं तौ, हमहीं क्यौं न बुलावैं ॥
जोग ज्ञान मुनि नगर तजे बरु, सघन गहन बन धावैं ।
आसन मौन नेम मन संजम, बिपिन मध्य बनि आवैं ॥
आपुन कहैं करैं कछु औरै, हम सबहिनि डहकावैं ।
सूरदास ऊधौ सौं स्यामा, अति संकेत जनावैं ॥44॥

ऊधौ मन नहिं हाथ हमारैं ।
रथ चढ़इ हरि संग गए लै, मथुरा जबहिं सिधारे ॥
नातरु कहा जोग हम छाँड़हि, अति रुचि कै तुम ल्याए ।
हम तौ झँखतिं स्याम की करनी मन लै जोग पठाए ॥
अजहूँ मन अपनौ हम पावैं, तुम तैं होइ तौ होइ ।
सूर सपथ हमैं कोटि तिहारी, कही करैंगी सोइ ॥45॥

ऊधौ मन न भए दस बीस ।
एक हुतौ सो गयौ स्याम सँग, को आराधै ईस ॥
इन्द्री सिथिल भई केसव बिनु, ज्यौं देही बिनु सीस ।
आसा लागि रहति तन स्वासा, जीवहिं कोटि बरीस ॥
तुम तौ सखा स्याम सुंदर के, सकल जोग के ईस ।
सूर हमारै नंद-नंदन बिनु, और नहीं जगदीस ॥46॥

इहिं उर माखन चोर गड़े ।
अब कैसैं निकसत सुनि ऊधौ, तिरछे ह्वै जु अड़े ॥
जदपि अहीर जसोदा-नंदन, कैसैं जात छँड़े ।
ह्वाँ जादौपति प्रभु कहियत हैं, हमैं न लगत बड़े ॥
को बसुदेव देवकी नंदन, को जानै को बूझै ।
सूर नंदनंदन के देखत, और न कोऊ सूझै ॥47॥

मन मैं रह्यौ नाहिं न ठौर ।
नंदनंदन अछत कैसैं, आनियै उर और ॥
चलत चितवत दिवस जागत, स्वप्न सोवत राति ।
हृदय तैं वह मदन मूरति, छिन न इत उत जाति ॥
कहत कथा अनेक ऊधौ, लोग लौभ दिखाइ ।
कह करौं मन प्रेम पूरन, घट न सिंधु समाइ ॥
स्याम गात सरोज आनन, ललित मदु मुख हास ।
सूर इनकैं दरस कारन, मरत लोचन प्यास ॥48॥

मधुकर स्याम हमारे चोर ।
मन हरि लियौ तनक चितवनि मैं, चपल नैन की कोर ॥
पकरे हुते हृदय उर अंतर, प्रेम प्रीति कैं जोर ।
गए छँड़ाइ तोरि सब बंधन , दै गए हँसनि अँकोर ॥
चौकि परीं जागत निसि बीती, दूर मिल्यौ इक भौंर ।
दूरदास प्रभु सरबस लूट्यौ, नागर नवल-किसोर ॥49॥

सब दिन एकहिं से नहिं होते ।
तब अलि ससि सीरौ अब तातौ, बयौ बिरह जरि मो तैं ।
तब षट मास रास-रस-अंतर, एकहु निमिष न जाने ।
अब औरै गति भई कान्ह बिनु पल पूरन जुग माने ।
कहा मति जोग ज्ञान साखा स्रुति, ते किन कहे घनेरे ।
अब कछु और सुहाइ सूर नहिं, सुमिरि स्याम गुनि केरे ॥50॥

सखी री स्याम सबै इक सार ।
मीठे बचन सुहाए बोलत, अंतर जारनहार ।
भंवर कुरंग काक अरु कोकिल, कपटनि की चटसार ।
कमलनैन मधुपुरी सिधारे, मिटि गयो मंगलचार ।
सुनहु सखी री दोष न काहू, जो बिधि लिख्यौ लिलार ।
यह करतूति उनहिं की नाहीं, पूरब बिबिध बिचार ॥
कारी घटा देखि बादर की, सोभा देति अपार ।
सूरदास सरिता सर पोषत, चातक करत पुकार ॥51॥

बिलग जनि मानौ ऊधौ कारे ।
वह मथुरा काजर की ओबरी, जे आवैं ते कारे ॥
तुम कारे सुफलक सुत कारे, कारे कुटिल सँवारे ॥
कमलनैन की कौन चलावै, सबहिनि मैं मनियारे ॥
मानौ नील माट तैं काढ़े, जमुना आइ पखारे ।
तातैं स्याम भई कालिंदी, सूर स्याम गुन न्यारे ॥52॥

ऊधौ भली भई ब्रज आए ।
बिधि कुलाल कीन्हे काँचे घट, ते तुम आनि पकाए ॥
रंग दीन्हौं हो कान्ह साँवरैं, अँग-अँग चित्र बनाए ।
यातैं गरे न नैन नेह तैं, अवधि अटा पर छाए ॥
ब्रज करि अँवा जोग ईंधन करि, सुरति आनि सुलगाए ।
फूँक उसास बिरह प्रजरनि सँग, ध्यान दरस सियराए ॥
भरे सँपूरन सकल प्रेम-जल, छुवन न काहू पाए ।
राज-काज तैं गए सूर प्रभु , नँद-नंदन कर लाए ॥53॥

जौ पै हिरदै माँझ हरी ।
तौ कहि इती अवज्ञा उनपै, कैसैं सही परी ॥
तब दावानल दहन न पायौ, अब इहिं बिरह जरी ।
उर तैं निकसि नंद नंदन हम, सीतल क्यौं न करी ॥
दिन प्रति नैन इंद्र जल बरषत, घटत न एक घरी ।
अति ही सीत भीत तन भींजत, गिरि अंचल न धरी ॥
कर-कंकन दरपन लै देखौ, इहिं अति अनख मरी ।
क्यौं अब जियहिं जोग सुनि सूरज, बिरहनि बिरह भरी ॥54॥

ऐसौ जोग न हम पै होइ ।
आँखि मूँदि कह पावैं ढूँढ़े, अँधरे ज्यौं टकराइ ॥
भसम लगावन कहत जु हमकौ, अंग कुंकमा घोइ ।
सुनि कै बचन तुम्हारे ऊधौ, नैना रावत रोइ ॥
कुंतल कुटिल मुकुट कुंडल छबि, रही जु चित मैं पोइ ।
सूरज प्रभु बिनु प्रान रहै नहिं, कोटि करौ किन कोइ ॥55॥

हमसौं उनसौं कौन सगाई ।
हम अहीर अबला ब्रजवासी , वै जदुपति जदुराई ॥
कहा भयौ जु भए जदुनंनदन, अब यह पदवी पाई ।
कुच न आवत घोष बसत की, तजि ब्रज गए पराई ॥
ऐसे भए उहाँ जादौपति, गए गोप बिसराई ।
सूरदास यह ब्रज कौ नातौ, भूलि गए बलभाई ॥56॥

तौ हम मानै बात तुम्हारी ।
अपनौ ब्रह्म दिखावहु ऊधौ, मुकुट पितांबर धारी ॥
भनिहैं तब ताकौ सब गोपी, सहि रहिहैं बरु गारी ।
भूत समान बतावत हमकैं, डारहु स्याम बिसारी ॥
जे मुख सदा सुधा अँचवत हैं, ते विष क्यौं अधिकारी ।
सूरदास -प्रभु एक अँग पर, रीझि रहीं ब्रजनारी ॥57॥

ऊधौ जोग बिसरि जनि जाहु ।
बाँधौ गाँठि छूटि परिहै कहुँ, फिरि पाछैं पछिताहु ॥
ऐसौ बहुत अनूपम मधुकर, मरम न जानै और ।
ब्रज बनितनि के नहीं काम की, तुम्हरेई ठौर ॥
जो हित करि पठयौ मनमोहन, सो हम तुमकौ दीनौं ॥58॥

ऊधौ काहे कौ भक्त कहावत ।
जु पै जोग लिखि पठ्यौ हमकौ, तुमहुँ भस्म चढ़ावत ॥
श्रृंगी मुद्रा भस्म अधारी, हमहीं कहा सिखावत ।
कुबिजा अधिक स्याम की प्यारी, ताहिं नहीं पहिरावत ॥
यह तौ हमकौं तबहिं न सिखयौ, जब तैं गाइ चरावत ।
सूरदास प्रभु कौं कहियौ अब, लिखि-लिखि पठावत ॥59॥

(ऊधौ) ना हम बिरहिनि ना तुम दास
कहत सुनत घट प्रान रहत हैं, हरि तजि भजहु अकास ॥
बिरही मीन मरै जल बिछुरैं , छाँड़ि जियन की आस ।
दास भाव नहिं तजत पपीहा, बरषत मरत पियास ॥
पंकज परम कमल मैं बिहरत, बिधि कियौ नीर निरास ।
राजिव रवि कौ दोष न मानत, ससि सौ सहज उदास ॥
प्रगट प्रीति दसरथ प्रतिपाली, प्रीतम कैं बनवास ।
सूर स्याम सौं दृढ़ ब्रत राख्यौ, मेटि जगत उपहास ॥60॥

ऊधौ लै चल लै चल ।
जहँ वै सुंदर स्याम बिहारी, हमकौ तहँ लै चल ॥
आवन-आवन कहि गए ऊधौ, करि गए हमसौं छल ।
हृदय की प्रीति स्याम जू जानत ,कितिक दूरि गोकुल ॥
आपुन जाइ मधुपुरी छाए, उहाँ रहे हिलि मिल ।
सूरदास स्वामी के बिछुरैं , नैनि नीर प्रबल ॥61॥

गुप्त मते की बात कहौं, जो कहौ न काहू आगैं।
कै हम जानै कै हरि तुमहूँ, इतनी पावहिं माँगें ॥
एक बेर खेलत बृंदावन, कंटक चुभि गयौ पाइँ ।
कंटक सौं कंटक लै काढ़्यौ, अपनें हाथ सुभाइ ॥
एक दिवस बिहरत बन भीतर, मैं जु सुनाई भूख ।
पाके फल वै देखि मनोहर, चढ़े कृपा करि रूख ॥
ऐसी प्रीति हमारी उनकी, बसतें गोकुल बास ।
सूरदास प्रभु सब बिसराई, मधुबन कियौ निवास ॥62॥

ऊधौ जौ हरि हितू तुम्हारे ।
तौ तुम कहियौ जाइ कृपा करि, ए दुख सबै हमारे ॥
तन तरिवर उर स्वास पवन मैं, बिरग दवा अति जारे ।
नहिं सिरात नहिं जात छार ह्वै, सुलगि-सुलगि भए कारे ॥
जद्यपि प्रेम उमँगि जल सींचे, बरषि-बरषि घन हारे ।
जो सींचे इहिं भाँति जतन करि, तौ एतैं प्रतिपारे ॥
कीर कपोत कोकिला चातक, बधिक बियोग बिडारे ।
क्यौ जीवैं इहिं भाँति सूर-प्रभु, ब्रज के लोग बिचारे ॥63॥

बिलग हम मानैं ऊधौ काकौ ।
तरसत रहे बसुदेव देवकी, नहिं हित मातु पिता कौ ॥
काके मातु पिता कौ काकौ, दूध पियौ हरि जाकौ ।
नंद जसोदा लाड़ लड़ायौ, नाहिं भयौ हरि ताकौ ॥
कहियौ जाइ बनाइ बात यह, को हित है अबला कौ ।
सूरदास प्रभु प्रीति है कासौं, कुटिल मीत कुबिजा कौ ॥64॥
जीवन मुख देखे कौ नीकौ ।
दरस, परस दिन राति पाइयत, स्याम पियारे पी कौ ॥
सूनौ जोग कहा लै कीजै, जहाँ ज्यान है जी कौ ।
नैननि मूँदि मूँदि कह देखौ, बँधौ ज्ञान पोथी कौ ॥
आछे सुंदर स्याम हमारे, और जगत सब फीकौ ।
खाटी मही कहा रुचि मानै, सूर खवैया घी कौ ॥65॥

अपने सगुन गोपालहिं माई, इहिं बिधि काहैं देति ।
ऊधौ की इन मीठी बातनि, निर्गुन कैसें लेति ॥
धर्म, अर्थ कामना सुनावत, सब सुख मुक्ति समेति ।
काकी भूख गई मन लाड़ू, सो देखहु चित चेति ॥
जाकौ मोक्ष बिचारत बरनत, निगम कहत हैं नेति ।
सूर स्याम तजि को भुस फटकै, मधुप तुम्हारे हेति ॥66॥

वे हरि सकल ठौर के बासी ।
पूरन ब्रह्म अखंडित मंडित, पंडित मुनिनि बिलासी ॥
सप्त पताल ऊरध अध पृथ्वी, तल नभ बरुन बयारी ।
अभ्यंतर दृष्टी देखन कौ, कारन रूप मुरारी ॥
मन बुधि चित्त अहंकार दसेंद्रिय, प्रेरक थंभनकारी ।
ताकैं काज वियोग बिचारत, ये अबला-ब्रजनारी ॥
जाकौ जैसो रूप मन रुचै, सौ अपबस करि लीजै ।
आसन बेसन ध्यान धारना, मन आरोहन कीजै ॥
षट दल अठ द्वादस दल निरमल, अजपा जाप जपाली ।
त्रिकुटी संगम ब्रह्म द्वार भिदि, यौं मिलिहैं बनमाली ॥
एकादस गीता श्रुति साखी, जिहि बिधि मुनि समुझाए ॥
ते सँदेस श्रीमुख गोपिनि कौ, सूर सु मधुप सुनाए ॥67॥

ऊधौ हमरी सौं तुम जाहु ।
यह गोकुल पूनौ कौ चंदा, तुम ह्वै आए राहु ॥
ग्रह के ग्रसे गुसा परगास्यौ, अब लौं करि निरबाहु ।
सब रस लै नँदलाल सिधारे , तुम पठए बड़ साहु ॥
जोग बेचि कै तंदुल लीजै, बीच बसेरे खाहु ।
सूरदास जबहीं उठी जैहौ, मिटिहै मन कौ दाहू ॥68॥

ऊधौ मौन साधि रहे ।
जोग कहि पछितात मन-मन, बहुरि कछु न कहे ॥
स्याम कौं यह नहीं बूझै, अतिहि रहे खिसाइ ।
कहा मैं कहि-कहि लजानी, नार रह्यौ नवाइ ॥
प्रथम ही कहि बचन एकै, रह्यौ गुरु करि मानि ।
सूर प्रभु मोकौ पठायौ, यहै कारन जानि ॥69॥

मधुकर भली करी तुम आए ।
वै बातैं कहि कहि या दुख मैं, ब्रज के लोग हँसाए ।
मोर मुकुट मुरली पीतांबर, पठवहु सौंज हमारी ।
आपुन जटाजूट, मुद्रा धरि, लीजै भस्म अधारी ॥
कौन काज बृंदावन कौ, सुख दही भात की छाक ।
अब वै स्याम कूबरी दोऊ, बने एक ही ताक ॥
वै प्रभु बड़े सखा तुम उनके, जिनकै सुगम अनीति।
या जमुना जल कौ सुभाव यह, सूर बिरह की प्रीति ॥70॥

काहे कौं रोकत मारग सूधौ ।
सुनहु मधुप निरगुन कंटक तैं, राजपंथ क्यौं रूधौं ॥
कै तुम सिखि पठए हौ कुबिजा, कह्यौ स्यामघनहूँ धौं ।
वेद पुरान सुमृति सब ढूँढ़ौ, जुवतिनि जोग कहूँ धौं ॥
ताकौ कहा परेखौ कीजै, जानै छाँछ न दूधौ।
सूर सूर अक्रूर गयौ लै ब्याज निबेरत ऊधौ ॥71॥

ऊधौ कोउ नाहिं न अधिकारी ।
लै न जाहु यह जोग आपनौ, कत तुम होत दुखारी ॥
यह तौ बेद उपनिषद मत है, महा पुरुष ब्रतधारी ।
कम अबला अहीरि ब्रज-बासिनि, नाहीं परत सँभारी ॥
को है सुनत कहत हौ कासौं, कौन कथा बिस्तारी ।
सूर स्याम कैं संग गयौ मन, अहि काँचुली उतारी ॥72॥

वै बातैं जमुना-तीर की ।
कबहुँक सुरति करत हैं मधुकर, हरन हमारे चीर की ॥
लीन्हे बसन देखि ऊँचे द्रुम, रबकि चढँन बलबीर की ।
देखि-देखि सब सखी पुकारतिं, अधिक जुड़ाई नीर की ॥
दोउ हाथ जोरि करि माँगैं, ध्वाई नंद अहीर की ।
सूरदास प्रभु सब सुखदाता, जानत हैं पर पीर की ॥73॥

प्रेम न रुकत हमारे बूतैं ।
किहिं गयंद बाँध्यौ सुनि मधुकर, पदुम नाल के काँचे सूतैं ?
सोवत मनसिज आनि जगायौ, पठै सँदेस स्याम के दूतैं ।
बिरह-समुद्र सुखाइ कौन बिधि, रंचक जोग अगिनि के लूतैं ॥
सुफलक सुत अरु तुम दोऊ मिलि, लीजै मुकुति हमारे हूतैं ।
चाहतिं मिलन सूर के प्रभु कौं, क्यौं पतियाहिं तुम्हारे धूतैं ॥74॥

ऊधौ सुनहु नैकु जो बात ।
अबलनि कौं तुम जोग सिखावत, कहत नहीं पछितात ॥
ज्यौं ससि बिना मलीन कुमुदनी, रबि बिनुहीं जलजात ।
त्यौं हम कमलनैंन बिनु देखे, तलफि-तलफि मुरझात ॥
जिन स्रवननि मुरली सुर अँचयौं, मुद्रा सुनत डरात ।
जिन अधरनि अमृत फल चाख्यौ, ते क्यौं कटु फल खात ॥
कुंकुम चंदन घसि तन लावतं, तिहिं न बिभूति सुहात ।
सूरदास प्रभु बिनु हम यों हैं, ज्यौं तरु जीरन पात ॥75॥

ऊधौ जोग हम नाहीं ।
अबला सार-ज्ञान कह जानैं, कैसैं ध्यान धराहीं ॥
तेई मूँदन नैन कहत हौ, हरि मूरति जिन माहीं ।
ऐसी कथा कपट की मधुकर, हमतैं सुनी न जाहीं ॥
स्रवन चीरि सिर जटा बँधाबहु, ये दुख कौन समाहीं ।
चंदन तजि अंग भस्म बतावत, बिरह-अनल अति दाहीं ॥
जोगी भ्रमत जाहि लगि भूले, सो तो है अप माहीं ।
सूरस्याम तैं न्यारी न पल-छिन , ज्यौं घट तै परछाहीं ॥76॥

हम तौ नंद-घोष के बासी ।
नाम गुपाल जाति कुल गोपक, गोप गुपाल उपासी ॥
गिरवर धारी गोधन चारी, बृंदावन अभिलाषी ।
राजा नंद जसोदा रानी, सजल नदी जमुना सी ॥
मीत हमारे परम मनोहर, कमलनैन सुख रासी ।
सूरदास-प्रभु कहौं कहाँ लौं, अष्ट महा-सिधि दासी ॥77॥

यह गोकुल गोपाल उपासी ।
जे गाहक निर्गुन के ऊधौ, ते सब बसत ईस-पुर कासी ॥
जद्यपि हरि हम तजी अनाथ करि , तदपि रहतिं चरननि रस रासी ।
अपनी सीतलता नहिं छाँड़त, जद्यपि बिधु भयौ राहु-गरासी ॥
किहिं अपराध जोग लिखि पठवत, प्रेम भगति तैं करत उदासी ।
सूरदास ऐसी को बिरहनि, माँगि मुक्ति छाँड़ै गुन रासी ॥78॥

ऐसौ सुनियत द्वै बैसाख ।
देखति नहीं ब्यौंत जीवे कौ, जतन करौ कोउ लाख ॥
मृगमद मलय कपूर कुमकुमा, केसर मलियै साख ।
जरत अगिनि मैं ज्यौं घृत नायौ, तन जरि ह्वै है राख ॥
ता ऊपर लिखि जोग पठावत, खाहु नीम तजि दाख ।
सूरदास ऊधौ की बतियाँ, सब उड़ि बैठीं ताख ॥79॥

इहिं बिधि पावस सदा हमारैं ।
पूरब पवन स्वास उर ऊरध, आनि मिले इकठारैं ॥
बादर स्याम सेत नैननि मैं, बरसि आँसु जल ढ़ारैं ।
अरुन प्रकास पलक दुति दामिनि, गरजनि नाम पियारैं ॥
जातक दादुर मोर प्रगट ब्रज, बसत निरंतर धारैं ।
ऊधव ये तब तैं अटके ब्रज, स्याम रहे हित टारैं ॥
कहिऐ काहि सुनै कत कोऊ, या ब्रज के ब्यौहारैं ।
तुमही सौं कहि-कहि पछितानी, सूर बिरह के धारैं ॥80॥

ऊधौ कोकिल कूजत कानन ।
तुम हमकौं उपदेस करत हौ, भस्म लगावन आनन ॥
औरौ सिखी सखा सँग लै लै, टेरत चढ़े पखानन ।
बहुरौ आइ पपीहा कैं मिस, मदन हनत निज बानन ॥
हमतौ निपट अहीरि बावरी, जोग दीजिऐ जानन ।
कहा कथत मासी के आगैं, जानत नानी नानन ॥
तुम तौ हमैं सिखावन आए, जोग होइ निरवानन ।
सूर मुक्ति कैसैं पूजति है, वा मुरली के तानन ॥81॥

हमतैं हरि कबहूँ न उदास ।
रास खिलाइ पिलाइ अधर रस, क्यौं बिसरत ब्रज बास ॥
तुमसौं प्रेम कथा कौ कहिबौ, मनौ काटिबौ घास ।
बहिरौ तान-स्वाद कह जानै, गूँगौ बात मिठास ॥
सुनि री सखी बहुरि हरि ऐहैं, वह सुख वहै बिलास ।
सूरदास ऊधौ अब हमकौं, भाए तेरहौं मास ॥82॥

आयौ घोष बड़ौ ब्यौपारी ।
खेप लादि गुरु ज्ञान जोग की, ब्रज मैं आनि उतारी ॥
फाटक दै कै हाटक माँगत, भोरौ निपट सुधारी ।
धुरही तैं खौटौ खायौ है, लिये फिरत सिर भारी ॥
इनकैं कहे कौन डहकावे, ऐसी कौन अनारी ।
अपनौं दूध छाँड़ि को पीवै, खारे कूप कौ बारी ॥
ऊधौ जाहु सबारैं ह्याँ तै, बेगि गहरु जनि लावहु ।
मुख मागौ पैहौ सूरज प्रभु, साहुहिं आनि दिखावहु ॥83॥

ऊधौ जोग कहा है कीजतु ।
ओढ़ियत है कि बिछैयत है, किधौं खैयत है किधौं पीजतु ॥
कीधौं कछू खिलौना सुंदर, की कछु भूषन नीकौ ।
हमरे नंद-नंदन जो चहियतु, मोहन जीवन जी कौ ॥
तुम जु कहत हरि निगुन निरंतर, निगम नेति है रीति ।
प्रगट रूप की रासि मनोहर, क्यौं छाँड़े परतीति ॥
गाइ चरावन गए घोष तैं, अबहीं हैं फिरि आवत ।
सोई सूर सहाइ हमारे, बेनु रसाल बजावत ॥84॥

अपने स्वारथ के सब कोऊ ।
चुप करि रहौ मधुप रस-लंपट, तुम देखे अरु ओऊ ॥
जो कछु कह्यौ कह्यौ चाहत हौ, कहि निरवारौ सोऊ ।
अब मेरैं मन ऐसियै, षटपद, होनी होउ सु होऊ ॥
तब कत रास रच्यौ वृंदावन, जौ पै ज्ञान हुतोऊ ।
लीन्हे जोग फिरत जुवतिनि मैं, बड़े सुपत तुम दोऊ ॥
छुटि गयौ मान परेखौ रे अलि, हृदै हुतौ वह जोऊ ।
सूरदास प्रभु गोकुल बिसर्‌यौ, चित चिंतामनि खौऊ ॥85॥

मधुकर प्रीति किये पछितानी ।
हम जानी ऐसैंहि निबहैगी, उन कछु औरे ठानी ॥
वा मोहन कौं कौन पतीजै, बोलत मधुरी बानी ।
हमकौं लिखि जोग पठावत, आपु करत रजधानी ॥
सूनी सेज सुहाइ न हरि बिनु, जागति रैनि बिहानी ।
जब तैं गवन कियौ मधुबन कौं, नैननि बरषत पानी ॥
कहियौ जाइ स्याम सुंदर कौं, अंतरगत की जानी ।
सूरदास प्रभु मिलि कै बिछुरे, तातें भई दिवानी ॥86॥

हमारैं हरि हारिल की लकरी ।
मनक्रम वचन नंद-नंदन उर, यह दृड़ करि पकरी ॥
जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जक री ।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी ।
सुतौ व्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी ।
यह तौ सूर नितहिं ले सौंपौ, जिनके मन चकरी ॥87॥

कहा होत जो हरि हित चित धरि, एक बार ब्रज आवते ।
तरसत ब्रज के लोग दरस कौं, निरखि निरखि सुख पावते ॥
मुरली सब्द सुनावत सबहिनि, हरते तन की पीर ।
मधुरे बचन बोलि अमृत मुख, बिरहिनिं देते धीर ॥
सब मिलि जग गावत उनकौ, हरष मानि उर आनत ।
नासत चिन्ता ब्रज बनितनि की, जनम सुफल करि जानत ।
दुरी दुरा कौ खेल न कोऊ, खेलत है ब्रज महियाँ ।
बाल दसा लपटाइ गहत हे, हँस-हँसि हमरी बहिंयाँ ॥
हम दासी बिनु मोल की उनकी, हमहिं जु चित्त बिसारी ।
इत तें उन हरि रहे अब तौ, कुबिजा भई पियारी ॥
हिय मैं बातैं समुझि-समुझि कै, लोचन भरि-भरि आए ।
सूर सनेही स्याम प्रीति के, ते अब भए पराए ॥88॥

मधुकर आपुन होहिं बिराने ।
बाहर हेत हितू कहवावत, भीतर काज सयाने ॥
ज्यौं सुक पिंजर माहिं उचारत, ज्यौं ज्यौं कहत बखाने ।
छुटत हीं उड़ि मिलै अपुन कुल, प्रीति न पल ठहराने ॥
जद्यपि मन नहिं तजत मनोहर, तद्यपि कपटी जाने ।
सूरदास प्रभु कौन काज कौं, माखी मधु लपटाने ॥89॥

हरि तैं भलौ सुपति सीता कौ ।
जाकै बिरह जतन ए कीन्हे, सिंधु कियौ बीता कौ ॥
जाकै बिरह जतन ए कीन्हे, सिंधु कियौ बीता कौ ॥
लंका जारि सकल रिपु मारे, देख्यौ मुख पुनि ताकौ ।
दूत हाथ उन लिखि जु पठायौ, ज्ञान कह्यौ गीता कौ ॥
तिनकौ कहा परेखौ कीजै, कुबिजा के मीता कौ ।
चढ़ै सेज सातौं सुधि बिसरी, ज्यौं पीता चीता कौ ॥
करि अति कृपा जोग लिखि पठयौ, देखि डराईँ ताकौ ।
सूरजदास प्रीति कह जानैं, लोभी नवनीता कौ ॥90॥

ऊधौ क्यौं बिसरत वह नेह ।
हमरैं हृदय आनि नँदनंदन, रचि-रचि कीन्हे गेह ॥
एक दिवस गई गाइ दुहावन, वहाँ जु बरष्यौ मेह ।
लिए उढ़ाइ कामरी मोहन, निज करि मानी देह ॥
अब हमकौं लिखि-लिखि पठवत हैं जोग जुगुति तुम लेह ।
सूरदास बिरहिनि क्यौं जीवैं कौन सयानप एहु ॥91॥
ऊधौ मन माने की बात ।
दाख छुहारा छाँड़ि अमृत-फल, विषकीरा विष खात ॥
ज्यौं चकोर कौं देइ कपूर कोउ, तजि अंगार अघात ।
मधुप करत घर कोरि काठ मैं, बँधत कमल के पात ॥
ज्यौं पतंग हित जानि आपनौ, दीपक सौं लपटात ।
सूरदास जाकौ मन जासौं, सोई ताहि सुहात ॥92॥

इहिं डर बहुरि न गोकुल आए ।
सुनि री सखी हमारी करनी, समुझि मधुपुरी छाए ॥
अधरातक तैं उठि सब बालक, मोहिं टेरैंगे आइ ।
मातु पिता मौकौं पठवैंगे, बनहिं चरावन गाइ ॥
सूने भवन आइ रौकेंगी, दधि-चोरत नवनीत ।
पकरि जसोदा पै लै जैहैं, नाचहु गावहु गीत ॥
ग्वारिनि मोहिं बहुरि बाँधैगी, कैतव बचन सुनाइ ।
वै दुख सूर सुमिरि मन ही मन, बहुरि सहै को जाइ ॥93॥

जौ कोउ बिरहिनि कौ दुख जानै ।
तौ तजि सगुन साँवरी मूरति, कत उपदेसै ज्ञानै ॥
कुमुद चकोर मुदित बिधु निरखत, कहा करै लै भानै ।
चातक सदा स्वाति कौ सेवक, दुखित होत बिनु पानै ॥
भौंर, कुरंग काग कोइल कौं, कविजन कपट बखानैं ।
सूरदास जौ सरबस दीजै, कारै कृतहि न मानैं ॥94॥

ऊधौ सुधि नाहीं या तन की ।
जाइ कहौ तुम कित हौ भूले, हमऽब भईं बन-बन की ॥
इन बन ढ़ूँढ़ि सकल बन ढूँढ़े, बन बेली मधुबन की ।
हारी परीं बृंदावन ढूँढ़त, सुधि न मिली मोहन की ॥
किए बिचार उपचार न लागत, कठिन बिथा भइ मन की ।
सूरदास कोउ कहै स्याम सौं, सुरति करैं गोपिनि की ॥95॥

लरिकाई की प्रेम कहौ अलि कैसैं छूटत ।
कहा कहौं ब्रजनाथ चरित, अंतरगति लूटत ॥
वह चितवनि वह चाल मनोहर वह मुसकानि मंद-धुनि गावनि ।
नटवर-भेष नंद-नंदन कौ वह विनोद, वह बन तैं आवनि ॥
चरन कमल की सौंह करति हौं, यह संदेस मोहिं विष लागत ।
सूरदास पल मोहिं न बिसरति, मोहन मूरति सोवत जागत ॥96॥

 
 
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