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रहीम
Rahim
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Sortha Rahim

सोरठा रहीम

सोरठा

ओछे को सतसंग, रहिमन तजहु अँगार ज्‍यों।
तातो जारै अंग, सीरो पै करो लगै॥

रहिमन कीन्‍हीं प्रीति, साहब को भावै नहीं।
जिनके अगनित मीत, हमैं गीरबन को गनै॥

रहिमन जग की रीति, मैं देख्‍यो रस ऊख में।
ताहू में परतीति, जहाँ गाँठ तहँ रस नहीं॥

जाके सिर अस भार, सो कस झोंकत भार अस।
रहिमन उतरे पार, भार झोंकि सब भार में॥

रहिमन नीर पखान, बूड़ै पै सीझै नहीं।
तैसे मूरख ज्ञान, बूझै पै सूझै नहीं॥

रहिमन बहरी बाज, गगन चढ़ै फिर क्‍यों तिरै।
पेट अधम के काज, फेरि आय बंधन परै॥

रहिमन मोहि न सुहाय, अमी पिआवै मान बिनु।
बरु विष देय, बुलाय, मान सहित मरिबो भलो॥

बिंदु मों सिंधु समान को अचरज कासों कहै।
हेरनहार हेरान, रहिमन अपुने आप तें॥

चूल्‍हा दीन्‍हो बार, नात रह्यो सो जरि गयो।
रहिमन उतरे पार, भर झोंकि सब भार में॥

देनहार कोउ और है, भेजत सो दिन रैन।
लोग भरम हम पै धरैं, याते नीचे नैन॥

 
 
 
 
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