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अल्लाह यार ख़ां जोगी
Allah Yar Khan Jogi
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Shaheedan-e-Wafa Allah Yar Khan Jogi

शहीदान-ए-वफ़ा अल्लाह यार ख़ां जोगी

1

जिस दम अनन्दपुर में सतिगुर मुकीम थे ।
हमगाह घर के लोग थे और कुछ नदीम थे ।
चारों तरफ़ से किले को घेरे ग़नीम थे ।
टोटे से रिज़क के दिल-ए-सिंघां दो-नीम थे ।
प्यासे थे और भूख की शिद्दत कमाल थी ।
थी मुख़्तसर सी फ़ौज सो वुह भी निढाल थी ।

(नदीम=साथी, ग़नीम=दुश्मन, दो-नीम=दो टुकड़े)

2

आदा की फ़ौज के न शुमार-ओ-हसाब थे ।
सरदार-ए-फ़ौज एक नहीं दो नवाब थे ।
राजे कई पहाड़ के भी हमरकाब थे ।
सिंघों से बिसत-चन्द येह सब शैख़-ओ-शाब थे ।
सिक्खों की आरज़ू थी कि लड़ कर शहीद हों ।
सतगुर येह सोचते थे न ज़ायय मुरीद हों ।

(बिसत-चंद=बीस गुणा, शैख़-ओ-शाब=
बुढ्ढे और जवान)

3

बोले कि अपनी फ़ौज नेहायत है मुख़्तसर ।
घेरे हुए हैं हम को हज़ारों ही अहल-ए-शर ।
छोड़ेंगे अपने आप को दुश्मन के रहम पर ।
उस में भी अपनी इज़्ज़त-ओ-अज़मत का है ख़तर ।
चिड़ियों को आज भी मैं लड़ा दूंगा बाज़ से ।
कुछ फ़ायदा नहीं है मगर तरक-ओ-ताज़ से ।

(शर=शरारती, असमत=बढ़ाई)

4

दुनिया के लोग होते हैं पागल जुनून से ।
हम मुसलेहे-जहां हैं, ग़रज़ हम को दून से ।
क्या फ़ायदा है हिन्दू-ओ-मुसलिम के ख़ून से ।
बेहतर है इजतिनाब ही कार-ए-ज़बून से ।
इतने में इतलाय हुई, कासिद इक आया है ।
सरहन्द के नवाब का पैग़ाम लाया है ।

(मुसलेहे-जहाँ=संसार-सुधारक, दून=नीच
इजतिनाब=बचना, कार-ऐ-ज़बून=नीच काम)

5

फ़रमाए सतगुरू, इसे लायो हमारे पास ।
येह पा के हुक्म तुरत गया उठ के एक दास ।
लाया सफ़ीर जिस पि था छाया हुआ हिरास ।
दीवान खालसों का जो देखा गया हवास ।
सतगुर ने दे के हौसला पूछा येह प्यार से ।
पैग़ाम क्या तू लाया है फ़ौज-ए-शरार से ।

(सफ़ीर=राजदूत, हिरास=डर)

6

कहने लगा हुज़ूर का रुतबा बुलन्द हो ।
नानक की शान दसवें गुरू में दुचन्द हो ।
हादी हो इक ज़माने के तुम दरदमन्द हो ।
कीजे मुआफ़ बात अगर न पसन्द हो ।
भेजा है मुझ को नाज़िम-ए-सरहन्द ने यहां ।
फरमान-ए-शाह-ए-दिल्ली के पाबन्द ने यहां ।

(दुचन्द=दोगुनी)

7

इस ने कहा कि हम को नहीं बैर आप से ।
रखते नहीं हैं कद हरम-ओ-दैर आप से ।
पाते हैं सब बशर सबक ख़ैर आप से ।
अपने बवजह तमय हुए ग़ैर आप से ।
दीन-ओ-धरम छोड़ के अंधे हुए हैं कुछ ।
नाज़िल पहाड़ पर से दरिन्दे हुए हैं कुछ ।

(कद=दुश्मनी, हरम-ओ-दैर=मन्दिर
मस्जिद, बशर=मानव, अंधे=लोभ,
नाज़िल=उभरना, दरिन्दे=खूँखार जानवर)

8

छोड़ो अनन्दपुर येह शाही मकाम है ।
मख़दूस इस जगह पि तुम्हारा क्याम है ।
फ़ौजों से और कलयों से क्या तुम को काम है ।
लड़ना ही जब नहीं तो येह क्यों धूम धाम है ।
है ख़ैर इसी में अपने कहे पर अमल करो ।
बेसूद हमदमों को न नज़र-ए-अजल करो ।

(मख़दूस=खतरे वाला, बेसूद=बेकार,हमदम=
साथी, नज़र-ए-अजल=मौत की भेट)

9

दुनिया के हम तो, दीन के तुम पातशाह हो ।
आता नहीं यकीं तुम्हें दुनिया की चाह हो ।
सतिगुर के पास किस लिये फ़ौज-ओ-सिपाह हो ।
नानक के जानशीन को क्यों हुब्ब-ए-जाह हो ।
सिंघों को साथ ले के यहां से सिधारिए ।
वाहगुरू की फ़तह का नाअरा पुकारिए ।

(हुब्ब-ए-जाह=रुतबो का प्यार)

10

पैग़ाम सुन के सतिगुरू ख़ामोश हो गए ।
पैदा तबियतों में मगर जोश हो गए ।
दर-पए निकालने के सितम-कोश हो गए ।
जाते हैं हम तो बोलेंगे रूपोश हो गए ।
ललकारे फ़ौज से कि किले से निकल चलो ।
दुश्मन से होशयार रहो और संभल चलो ।

(सितम-कोष=ज़ालिम, छिपा हुआ=छिपना)

11

बेवजह हम तो ख़ुद नहीं चाहते कि जंग हो ।
उस से लड़ेंगे, लड़ने की जिस को उमंग हो ।
ठोकर से फेंक देंगे जो रसते में संग हो ।
सर इस का काट लेंगे, कहा जिस ने तंग हो ।
ख़ूंरेज़ी वरना ख़लक की कब हम को भाती है ।
शेरों की फ़ौज कह दे तू कासिद कि जाती है ।

12

मशहूर है कि पाए गदा लंग भी नहीं ।
अपने लिये ख़ुदा की ज़मीं तंग भी नहीं ।
लोगों से हम को आरज़ू-ए-जंग भी नहीं ।
वरना कोई दलेरी में पासंग भी नहीं ।
मजबूर हो गए तो लड़ाई दिखाएंगे ।
फिर तेग़-ए-ख़ालसा की सफ़ाई दिखाएंगे ।

(गदा=फ़कीरी, लंग=लंगड़ा, पासंग=पासंग)

13

देखा अद्दू ने किला मिलेगा न ज़ोर से ।
बिफरेंगे शेर और शगालों के शोर से ।
बींका ना बाल होगा सुलेमां का मोर से ।
वाकिफ़ थे सतिगुरू दिल-ए-आदा के चोर से ।
मिल कर दुआ करेंगे येह वअदे के रंग में ।
समझेंगे हम भी क्या हुआ मैदान-ए-जंग में ।

(शगालों=गीदड़, मोर=चींटी)

14

तारों की छायों किले से सतिगुरू रवां हुए ।
कस के कमर सवार थे सारे जवां हुए ।
आगे लिए निशां कई शेर-ए-य्यां हुए ।
कुछ पीछे जां-निसार गुरू दरमियां हुए ।
चारों पिसर हुज़ूर के हमरह सवार थे ।
ज़ोरावर और फ़तह, अजीत और जुझार थे ।

(शेर-ऐ-य्यें=गुस्से वाले शेर, पिसर=पुत्र)

15

सतिगुर की माएं साथ थीं सतिगुर की मां के साथ ।
थी हमरकाब शेरनी शेर-ए-य्यां के साथ ।
ग़रज़े कि कूच कर दिया कुल ख़ानदां के साथ ।
क्या बावफ़ा मुरीद थे पीर-ए-ज़मां के साथ ।
सतिगुर जहां पि अपना पसीना गिराते थे ।
सिंघ उस जगह पि अपना लहू तक बहाते थे ।

16

देखा फ़रस पि जिस घड़ी आली-जनाब को ।
पाबोसीयों की पड़ गई हर शैख़-ओ-शाब को ।
कदमों को चूमता था कोई सिख रकाब को ।
घेरा हुआ सितारों ने था माहताब को ।
जलवा जो था फ़लक पि वही था जहान पर ।
पहुंची हुई थी रन की ज़मीं आसमान पर ।

(फ़रस=घोड़ा, पाबोसीयों=पैर चूमना, शैख़=
बुढ्ढा, शाब=जवान, माहताब=चाँद, आसमान=असमान)

17

होने को अनकरीब सहर का ज़ुहूर था ।
सब मिट चुके थे, सुबह के तारे पि नूर था ।
पाताल कर चुका शह-ए-मशरिक अबूर था ।
थोड़ा मकाम उफ़क से ख़ुरशेद दूर था ।
फीका फ़लक का चांद था नानक के चांद से ।
चेहरे उड़े हुए थे सितारे थे मांद से ।

(ज़ुहूर=प्रकटा, शह-ए-मशरीक=पूरब
का बादशाह, अबूर=पार, उफ़क=जंक्शन,खुर्शेद=सूरज)

18

मशरिक की सिमत इतने में पौ फूटने लगी ।
महताबी रुख़ पि चांद के फिर छूटने लगी ।
जौज़ा के साथ कोस-ए-फ़लक टूटने लगी ।
लुतफ़-ए-नसीम ख़लक-ए-ख़ुदा लूटने लगी ।
उतरा हुआ अरूस-ए-फ़लक का सिंघार था ।
गुम कहकशां के सीने से नौ-लक्खा हार था ।

(सिमत=तरफ़, जौज़ा=आसमान का तीसरा बुर्ज,
कोस-ए-फ़लक=आकाश की कमान,
लुत्फ़-ए-नसीम=सुबह की हवा का आनंद,
अरूस=दुल्हन, कहकशां=आकाश-गंगा)

19

ज़ुहरा की तांक झांक थी बन्द आसमान से ।
ग़ायब था मुशतरी भी फ़लक की दुकान से ।
झूमर भी उड़ चुका था सुरय्या के कान से ।
बढ़ने लगी सहर की सपेदी भी शान से ।
लेकर किरन का ताज था सूरज निकलने को ।
मशरिक से चशमा नूर का था उबलने को ।

(ज़ुहरा, मुशतरी=ग्रहों या तारों के नाम,
सुरय्या=आसमान के छह मिले हुए तारे,
झुमका, सपेदी=सफेदी, मशरिक=पूर्व)

20

सतिगुर अब आन पहुंचे थे सिरसा नदी के पास ।
थे चाहते बुझाएं बारह पहर की प्यास ।
इशनान करके और बदल के नया लिबास ।
वाहगुरू का नाम जपें और करें सपास ।
जपुजी का जाप इस घड़ी करना ज़ुरूर था ।
पढ़ के गरंथ और बढ़ाना सुरूर था ।

(सपास=शुकरिया)

21

था सर पि वकत आ गया आसा की वार का ।
साज़ों की ज़ेर-ओ-बुम का, चढ़ायो उतार का ।
मनशा था कलग़ीधर के दिल-ए-बेकरार का ।
मौका मिले तो कर लें भजन किरदगार का ।
जब महव-ए-बन्दगी हुए नानक के जानशीन ।
आ टूटे ख़ालसा पि अचानक कई लईन ।

(ज़ेर-ओ-बुम=उतार-चढाव, किरदगार=
सिरजनहार, महव=लीन,लईन=अभागा)

22

बदबख़तों ने जो वअदा किया था बिसर गए ।
नामरद कौल करके ज़बां से मुकर गए ।
गोबिन्द सिंघ के शेर भी फ़ौरन बिफर गए ।
तलवारें सूत सूत के रन में उतर गए ।
मैदां को एक आन में चौरंग कर दिया ।
रुसतम भी आया सामने तो दंग कर दिया ।

23

सतिगुर के गिरद सीनें की दीवार खेंच ली ।
सौ बार गिर गई तो सौ बार खेंच ली ।
ख़ंजर उदू का देख के तलवार खेंच ली ।
ज़ख़मी हुए तो लज़्ज़त-ए-सोफ़ार खेंच ली ।
याद-ए-अकाल पुरख में गुर भी जमे रहे ।
चरके हज़ार खा के अकाली थमे रहे ।

(उदू=शत्रु, सोफ़ार=तीर का मुँह)

24

हरचन्द टूट टूट के गिरते रहे लईं ।
सिंघों ने एक इंच भी छोड़ी नहीं ज़मीं ।
लंगर किसी से शेरों का मिलता भी है कहीं ।
बेशक नहीं नहीं, कभी हां हां, नहीं नहीं ।
मशरूफ़ याद-ए-हक में गुरू बेदरेग़ थे ।
क्यों मौत से लरज़ते वुह फ़रज़न्द-ए-तेग़ थे ।

(लेना=अभागा, मशरूफ=लीन, बेदरेग़=
बिना संकोच, फ़र्ज़ंद=पुत्र)

25

बेमिसल-ओ-बेनज़ीर तू सतिगुर हमारा है ।
वाहगुरू के बाद तिरा ही सहारा है ।
हो काश सब को तुझ को ख़ुदा जितना प्यारा है ।
तेग़ों के साये में कहां दाता बिसारा है ।
तौहीद पर फ़िदा था तू आली-मकाम था ।
तीरों के मींह में याद-ए-ख़ुदा तेरा काम था ।

(बेनज़ीर=जिस का उदाहरण न हो, तौहीद=
अद्वैत, फ़िदा=कुर्बान, आलि-मकाम=ऊँची जगह)

26

याद-ए-अकाल पुरख का सब को सबक दिया ।
ख़ंजर की धार पर भी वरक दर वरक दिया ।
करके अमल सिखाया जो मज़मूं अदक दिया ।
फिर ज़ालिमों से छीन के सिंघों को हक दिया ।
रुतबे से मारफ़त के हम आज गिर गए ।
सुहबत से बुत-प्रसतों की तकदीर फिर गए ।

(अदक=कठिन, मारफ़त=ज्ञान)

27

फ़ारिग़ इबादतों से ग़रज़ कि हुए गुरू ।
पूछा येह शहज़ादों से क्यों ग़ुल है चार-सू ।
फ़रमाए हाथ बांध के चारों ही नेक-ख़ू ।
सब वाकिया बयां किया सतिगुर के रूबरू ।
सुनते ही जिस को आप के तेवर बदल गए ।
गद्दी से उतरे, तेग़ उठाई, संभल गए ।

(चार-तरप=चारों तरफ़, नेक-आदत=अच्छे स्वभाव वाले)

28

असलेह सजाए, कलग़ी लगाई, तबर लिया ।
तीरों से ख़ूब ठोंस के तरकश को भर लिया ।
घोड़ा मंगा, रकाब में जब पाउं धर लिया ।
काबू अनां को थाम के इक देव कर लिया ।
सिंघों में जब रवां हुआ गुर का समन्द था ।
वाहगुरू की फ़तह का नारा बलन्द था ।

(तबर=कुलहाड़े जैसा हथियार, अनां=
लगाम, समन्द=घोड़ा)

29

हां साकिया किधर है, शराब-ए-कुहन पिला ।
कहता है तुझ से जोगी शीरीं-सुख़न पिला ।
शे'रों को शे'री पिला, शमपीयन पिला ।
पाउ आध पाउ हेच है दो वार मन पिला ।
सतिगुर की ताकि रन में लड़ाई दिखा सकूं ।
मैं भी रकाब थाम के मैदां में जा सकूं ।

(कुहन=पुरानी, शमपीयन=शराब
का नाम, हेच=तुच्छ, मन=मुझे)

30

वुह देखो रन में तेग़ बहादुर का लाल है ।
वुह देखो रन में सरवर-ए-फ़ौज-ए-अकाल है ।
तलवार दसत-ए-रासत में है, चप में ढाल है ।
सूरज के सर पि बदर भी है और हिलाल है ।
शमशीर जब हिलाई तो बिजली चमक गई ।
दहशत से सारी फ़ौज उदू की दबक गई ।

(सरवर=सरदार, दस्त-ऐ-रास्त=दाहिना हाथ,
चप=बांया, बदर=पूरा चाँद, हिलाल=नया चाँद)

31

सतिगुर को देख कर पड़ गई दुश्मन में खलबली ।
नाज़िम को इज़तिराब था, राजों को बेकली ।
कहते थे इन की जब कभी तलवार है चली ।
सर ले के फिर हज़ारों के ही है बला टली ।
जानों की ख़ैर चाहते हो, मिल के घेर लो ।
किस्मत चली है साथ से फिर इस को फेर लो ।

(इज़तिराब=परेशानी, बेकली=बेचैनी)

32

सुन कर येह बात टूट पड़े अहल-ए-कीं ।
हमला किया वुह सख़त कि थर्रा गई ज़मीं ।
हो जाता ज़ेर इस घड़ी रुस्तम भी बिलयकीं ।
नरग़ा में आ के सतिगुरू घबराए तक नहीं ।
इक ढाल पि हज़ारों के रोके हज़ार वार ।
तलवार जब उठाई तो भागे कतारवार ।

(अहल-ए-कीं=जलन के साथ भरे लोग,
बिलयकीं=निश्चित रूप से, नरगा=झाँसा)

33

कहने लगे गुरू तो ज्याले बला के हैं ।
सब दायो घात याद इन्हें फ़न-ए-दग़ा के हैं ।
गद्दी पि सुलुह-कुल हैं तो रन में लड़ाके हैं ।
बढ़ चढ़ के बादशाहों से बन्दे ख़ुदा के हैं ।
हम तो समझ रहे थे, पकड़ लेंगे आन में ।
साबित हुए येह शेर मगर इमतेहान में ।

34

सतिगुरू ने राजपूतों के छक्के छुड़ा दिए ।
मुग़लों के वलवले भी जो थे सब मिटा दिए ।
दुश्मन को अपनी तेग़ के जौहर दिखा दिए ।
कुशतों के एक आन में पुशते लगा दिए ।
राजा जो चढ़ के आये थे बाहर पहाड़ से ।
पछता रहे थे जी में गुरू की लताड़ से ।

(कुशतों के पुश्ते=लाशों के ढेर)

35

देखा जूंही हुज़ूर ने दुश्मन सिमट गए ।
बढ़ने की जगह ख़ौफ़ से नामरद हट गए ।
घोड़े को एड़ दे के गुरू रन में डट गए ।
फ़रमाए बुज़दिलों से कि तुम क्यों पलट गए ।
अब आओ रन में जंग के अरमां निकाल लो ।
तुम कर चुके हो, वार हमारा संभाल लो ।

36

आये हो तुम पहाड़ से मैदान-ए-जंग में ।
बट्टा लगा के जाते हो क्यों नाम-ओ-नंग में ।
सुनते हैं तुम को नाज़ है तीर-ओ-तुफ़ंग में ।
हुशयार शहसवार हो माहर ख़दंग में ।
दस बारह तुम में राजे हैं दो इक नवाब हैं ।
फिर हम से जंग करने में क्यों इजतिनाब हैं ।

(नाम-ओ-नंग=इज्जत, ख़दंग=तीर,इजतिनाब=
परहेज)

37

देखें तो आज हम भी तुम्हारी बहादरी ।
वुह खुक्करी की काट पटे की हुनरवरी ।
हम ने तुम्हारे हमले को रोका था सरसरी ।
अब अपना वार रोकना सब मिल के लशकरी ।
हम को बफ़ज़ल-ए-ईज़दी तनहा न जानना ।
कसरत पि ऐंठ ऐंठ के सीना न तानना ।

(बफ़ज़ल-ऐ-ईज़दी=ईश्वर की मेहर के साथ,
तन्हा=अकेला)

38

येह कहके उन पे टूट पड़े दसवें पातशाह ।
इस सफ़ को काटते कभी उस परे को काह ।
जमती न थी हुज़ूर की तलवार पर निगाह ।
तेग़-ए-गुरू पि होता था बिजली का शायबाह ।
इक हमले में था फ़ौज का तख़ता उलट गया ।
गुर की हवा-ए-तेग़ से बादल था छट गया ।

(सफ़,परे=कतार, काह=घास, शायबाह=शक्क)

39

जो बच गए वुह भाग गए मूंह को मोड़ कर ।
रसता घरों का ले लिया मैदां को छोड़ कर ।
सिंघों ने भुस निकाल दिया था झंझोड़ कर ।
पछताए आख़िरश को बहुत कौल तोड़ कर ।
लाशों से और सरों से था मैदान पट गया ।
आधे से बेश लशकर-ए-आदा था कट गया ।

(बेश=अधिक, लश्कर-ऐ-आदा=शत्रु की फ़ौज)

40

सरहन्द के नवाब का फ़क रंग हो गया ।
लशकर का हाल देख के वुह दंग हो गया ।
सतिगुर की तेग़-ए-तेज़ से जब तंग हो गया ।
ज़ालिम का दिल जो सख़त था अब संग हो गया ।
ठहराई दिल में सिंघों से मैं इंतकाम लूं ।
धोके फ़रेब से मैं सहर लूं या शाम लूं ।

41

तारीख़ में लिखा है कि दर-जोश-ए-कारज़ार ।
सतिगुर बढ़ाते ही गए आगे को राहवार ।
हमराह रह गए थे ग़रज़ चन्द जां-निसार ।
फ़रज़न्दों में थे साथ अजीत और थे जुझार ।
ज़ोरावर और फ़तह जो दादी के साथ थे ।
दायें की जगह चल दिये वुह बायें हाथ थे ।

(दर-जोश-ए-कारज़ार=लड़ाई के जोश में,
राहवार=घोड़ा)

42

हरचन्द की तलाश न पाया निशां कहीं ।
छोड़ा था जिस जगह पि नहीं थे वहां कहीं ।
पा जाएं फ़िकर था ना उन्हें दुश्मनां कहीं ।
माता के साथ चल दिये शाहज़ादगां कहीं ।
लख़त-ए-जिगर हुज़ूर के जिस दम बिछड़ गए ।
पायों वहीं वफखर-ए-मुहब्बत से गड़ गए ।

(लख़त-ऐ-जिगर=जिगर के टुकड़े, वफखर=
बहुतात)

43

फ़ौरन मराकबे में गए पीर-ए-ख़ुश-ख़साल ।
चौदह तबक का कर लिया मालूम पल में हाल ।
फ़रमाए जां-निसारों से क्यों होते हो निढाल ।
माता के साथ चल दिये कुरबान होने लाल ।
बुनियाद में धरम की चुनेंगे उदू उन्हें ।
करतार चाहता है करे सुरख़रू उन्हें ।

(मराकबे=माथा टेकना, पीर-ऐ-ख़ुश-
ख़साल=अच्छे स्वभाव वाला गुरू)

44

हम ने भी इस मकाम पि जाना है जलद तर ।
जिस जगह तुम को अपने कटाने पड़ेंगे सर ।
होंगे शहीद लड़के येह बाकी के दो पिसर ।
रह जाऊंगा अकेला मैं कल तक लुटा के घर ।
पहले पिता कटाया अब बेटे कटाऊंगा ।
नानक का बाग़ ख़ून-ए-जिगर से खिलाऊंगा ।

45

येह कहके फिर हुज़ूर तो चमकौर चल दिए ।
हालत पि अपनी कुछ न किया ग़ौर चल दिए ।
करतार के धयान में फ़िलफ़ौर चल दिए ।
राज़ी हुए रज़ा पि बहर-तौर चल दिए ।
जो कुछ वहां पे गुज़री येह लिखना मुहाल है ।
येह मरसीया सुनाना तुम्हें अगले साल है ।

(फ़िलफ़ौर=फ़ौरन, बहर-तौर=फिर भी)

46

है ज़िन्दगी तो अगले बरस लिख के लाऊंगा ।
अरशद से बढ़ के मरसीया सब को सुनाऊंगा ।
सतिगुर के ग़म में रोऊंगा तुमको रुलाऊंगा ।
दरबार-ए-नानकी से सिला इस का पाऊंगा ।
ज़ोरावर और फ़तह का इस दम बयां सुनो ।
पहुंचे बिछड़ के हाए कहां से कहां सुनो ।

(अरशद=नेक आदमी, यहाँ कोई ख़ास
आदमी हो सकता है,सिला=बदला)

47

बहर-ए-दवात ख़ून-ए-शहीदां बहम करूं ।
सीने को अपने चाक मिसाल-ए-कलम करूं ।
बिछड़े हुयों की अब मैं मुसीबत रकम करूं ।
रो दो अगर बयां मैं ख़ुदा की कसम करूं ।
रसते से जब भटक गए नन्हे सवार थे ।
तकते पिता को चारों तरफ़ बार बार थे ।

(बहर-ऐ-दवात=दवात के लिए, बहम=इकट्ठा,
चाक=चीरना, रकम=लिखना)

48

दादी से बोले अपने सिपाही किधर गए ।
दरिया पि हम को छोड़ के राही किधर गए ।
तड़पा के हाय सूरत-ए-माही किधर गए ।
अब्बा भगा के लशकर-ए-शाही किधर गए ।
भाई भी हम को भूल गए शौक-ए-जंग में ।
अपना ख़याल तक नहीं ज़ौक-ए-तुफ़ंग में ।

(सूरत-ऐ-माही=मछली की तरह)

49

जब रन अजीत जीत के तशरीफ़ लाएंगे ।
अब्बा के साथ जिस घड़ी जुझार आएंगे ।
करके गिला हर एक से हम रूठ जाएंगे ।
माता कभी, पिता कभी भाई मनाएंगे ।
हमे गले लगा के कहेंगे वुह बार बार ।
मान जायो लेकिन हम नहीं मानेंगे ज़िनहार ।

(ज़िनहार=बिल्कुल)

50

इकरार लेंगे सब से भुलाना ना फिर कभी ।
बार-ए-दिगर बिछड़ के सताना ना फिर कभी ।
हम को अकेले छोड़ के जाना ना फिर कभी ।
कह देते हैं यों हम को रुलाना ना फिर कभी ।
बच्चों की गुफ़तगू जो सुनी दादी जान ने ।
बेइख़तियार रो दिया इस वाला-शान ने ।

(बार-ए-दिगर=दूसरी बार, वाला-शान=
उच्चि शान वाले)

51

कहती थीं जी में ले के इन्हें किस तरफ़ को जाऊं ।
बेटे कौ और बहूयों को यारब मैं कैसे पाऊं ।
लख़त-ए-जिगर के लाल येह दोनों कहां छुपाऊं ।
तुरकों से, राजपूतों से क्युं कर इन्हें बचाऊं ।
बिपता ज़ियफ़ीयों में येह क्या मुझ पि पड़ गई ।
थी कौन सी घड़ी में पिसर से बिछड़ गई ।

(ज़ियफ़ीयों=बुढ़ापा)

52

बच्चों का साथ राह कठन सर पि शाम है ।
सुनसान दसत चारसू हू का मकाम है ।
होता कहां पि देखीए शब को क्याम है ।
ख़ादिम है और कोई ना हमरह ग़ुलाम है ।
गंगू रसोईया है फ़कत साथ रह गया ।
ले दे के रहबरी को येह हैयात रह गया ।

(दस्त=जंगल, चारसू=चारों तरफ़, हू=डर,
रहबरी=रास्ता दिखाना, हैयात=अफ़सोस)

53

आते थे शेर सामने गरदन को डाल के ।
तकते हिरन भी आज हैं आंखें निकाल के ।
नौरंग हैं तमाम ज़माने की चाल के ।
तेवर हैं बन में बदले हुए हर शगाल के ।
दरपेश अनकरीब कोई इमतेहान है ।
ख़तरे में दिख रही मुझे बच्चों की जान है ।

(नौरंग=छल,जादूगरी, शगाल=गीदड़,
दरपेश=सामने)

54

पूरा ज़रूर होगा इरादह हुज़ूर का ।
करता पुरुख का, वाहगुरू का, गुफ़ूर का ।
है सख़त इमतेहां येह किसी बेकुसूर का ।
हाफ़िज़ तो आप ही है दिल-ए-नासबूर का ।
प्यारे पती को पहले ही मैं हूं कटा चुकी ।
कुदरत तिरी है सबर मिरा आज़मा चुकी ।

(गुफ़ूर=क्षमावान, हाफिज=रक्षक,
नासबूर=बेचैन)

55

लेकिन येह दो समर हैं मिरे नौ-निहाल के ।
बेटे हैं दोनों सरवर-ए-फ़ौज-ए-अकाल के ।
रख कर उन्हें कलेजे में आंखों में डाल के ।
बेटे की ले के जाऊं अमानत संभाल के ।
बेटे का माल है येह बहू की कमाई है ।
है मेरी लाख फिर भी येह दौलत पराई है ।

(समर=फल, सरवर=सरदार)

56

मनज़ूर इस घड़ी जो तुझे इमतेहान है ।
हाज़िर बजाय पोतों के दादी की जान है ।
हूं सुरख़रू बहू से यही दिल में धयान है ।
बींका न इन का बाल हो डर येह हर आन है ।
वरना जवाब दूंगी मैं क्या इन के बाप को ।
सदके करूं मैं इन के सरों पर से आप को ।

57

गंगू रसोईये ने जो देखा येह इज़तिराब ।
माता से सतिगुरू की किया इस ने येह ख़िताब ।
गाँव मिरा करीब है चलिए वहां जनाब ।
बागें उठा के आईए पीछे मिरे शिताब ।
खेड़ी में जा बिराजे येह अल-किस्सा शाम को ।
कोठा ब्राहमन ने दिया इक क्याम को ।

(इज़तिराब=परेशानी, शिताब=जल्दी,
अल-किस्सा=संक्षिप्त किस्सा,क्याम=रहने को)

58

दिन भर की दौड़ धूप से सब को थकान था ।
महफ़ूज़ हर तरह से बज़ाहर मकान था ।
बरसों से जिसे खिलाया था वुह मेज़बान था ।
ख़तरे का इस वजह नहीं वहम-ओ-गुमान था ।
नौकर का घर समझ के वुह बेफ़िकर हो गए ।
लग कर गले से दादी के शहज़ादे सो गए ।

(महफ़ूज़=सुरक्षित, बज़ाहर=देखने को)

59

माता के साथ डब्बा था इक ज़ेवरात का ।
ललचा जिसे था देख के जी बद-सिफ़ात का ।
कहते हैं जब कि वकत हुआ आधी रात का ।
जी में किया न ख़ौफ़ कुछ आका की मात का ।
मुहरों का बदरा और वुह डब्बा उड़ा गया ।
धोखे से बरहमन वुह ख़ज़ाना चुरा गया ।

(बद-सिफात=औगुण भरा, आका=मालिक,
बदरा=रुपए रखने वाला थैला)

60

बदज़ात बद-सिफ़ात वुह गंगू नमक-हराम ।
टुकड़ों के सतिगुरू के जो पलता रहा मुदाम ।
घर ले के शहज़ादों को आया जो बदलगाम ।
था ज़र के लूटने को किया सब येह इंतिजाम ।
दुनिया में अपने नाम को बदनाम कर गया ।
दुश्मन भी जो न करता वुह येह काम कर गया ।

(मुदाम=सदा, बदलगाम=आप हुदरा)

61

अलकिस्सा जब सवेर को जागीं गुरू की मां ।
रक्खे हुए ख़ज़ाने का पाया ना कुछ निशां ।
गंगू से बोलीं लेता है क्यों सबर-ए-बेकसां ।
ज़र ले गया उठा के तू ऐ ज़िशत-रू कहां ।
बेहतर था मांग लेता तू हम से तमाम माल ।
लेकिन हुआ चुराने से तुझ पर हराम माल ।

(बेकसां=बेसहारा, ज़िशत-रू=बुरे मुँह वाला)

62

जिस घर का तू ग़ुलाम था उस से दग़ा किया ।
ला कर के घर में काम येह क्या बेवफ़ा किया ।
ज़र के लिए सवाल ना क्यों बरमला किया ।
हम से तो जिस ने जो भी है मांगा अता किया ।
माता हूं कलग़ीधर की तुझे क्या ख़बर ना थी ।
तेरी तरह तो मुझको ज़रा हिरस-ए-ज़र ना थी ।

(बरमला=साफ़ साफ़, अता=क्षमा करना, हिरस-ए
-सोना चांदी=धन का लोभ)

63

वाहगुरू के नाम पि कुल माल-ओ-ज़र भी दूं ।
ख़िलकत के फ़ायदे को लुटा अपना घर भी दूं ।
गरदन पती की दे ही चुकी अपना सर भी दूं ।
ख़ुशनूदी-ए-अकाल को लख़त-ए-जिगर भी दूं ।
इकरार कर ले अपनी ख़ता तू अगर अभी ।
हम बख़श देंगे शौक से माल-ओ-ज़र अभी ।

(ख़िलकत=लोग, खुशनूदी=ख़ुशी)

64

उपदेश मात गुज़री का सुनकर वुह बे-हया ।
शरमिन्दा होने की जगह चिल्लाने लग गया ।
बकता था ज़ोर ज़ोर से देखो ग़ज़ब है क्या ।
तुम को पनाह देने की क्या थी यही जज़ा ।
फ़िरते हो जां छुपाए हुए ख़ुद नवाब से ।
कहते हो मुझ को चोर येह फ़िर किस हिसाब से ।

(जज़ा=बदला)

65

चुप चाप घर से चल दिया फ़िर वुह नमक हराम ।
पहुंचा वुह इस जगह पि मोरिंडा था जिस का नाम ।
मुख़बिर वहां नवाब के रखते थे कुछ क्याम ।
ख़ुफ़िया कुछ उन से करने लगा बदसयर कलाम ।
मतलब था जिस का, घर मिरे सतिगुर के लाल हैं ।
जिन के पकड़ने के सभी ख़ाहां कमाल है ।

(मुखबिर=जासूस, बदसयर=बुरी नीयत वाला,
ख़ाहें=इच्छुक, कमाल=बहुत ज़्यादा)

66

राजों से और नवाब से दिलवायो गर इनआम ।
आका की मां को, बेटों को पकड़ाऊं लाकलाम ।
पा के सिला बजीद से तुम भी हो शाद-काम ।
मुझ को भी ख़िलअतों से करे फ़ायज़ुलमराम ।
अलकिस्सा ले के साथ वुह जासूस आ गया ।
पकड़ाने शाहज़ादों को मनहूस आ गया ।

(लाकलाम=बेशक, शाद-काम=मुराद पा कर
ख़ुश होना, फ़ायज़ुलमराम=मुराद पा कर
फ़ायदा होना)

67

बच्चे जिन्हों ने आ के गरिफ़तार कर लिए ।
काबू बजबर बेकस-ओ-बेयार कर लिए ।
कबज़े में अपने दो दुर-ए-शहवार कर लिए ।
सरहन्द साथ चलने को तैयार कर लिए ।
पीनस थी, पालकी थी ना होदा अमारी थी ।
बदबख़त लाए बैल की गाड़ी सवारी थी ।

(बजबर=ज़बरदस्ती, बेकस-ओ-बेयार=
बेसहारा और बिना दोस्त, दूर-ए-शहवार=
बादशाहों के योग्य मोती, पीनस=पालकी,
होदा हमारी=उठ का हौदा)

68

सरहन्द जा के पहुंचे हज़ार इज़तिराब से ।
दो-चार, हाय ! जब हुए ज़ालिम नवाब से ।
कमबख़त देखते ही येह बोला इताब से ।
फ़िलहाल इन को कैद में रखो अज़ाब से ।
गुम्बद था जिस मकां में मुक्य्यद हुज़ूर थे ।
दो चांद इक बुरज में रखते ज़हूर थे ।

(इज़तिराब=परेशानी, दो-चार होना=मिलना,
इताब=गुस्सा, मुक्य्यद=कैदी, ज़हूर=
प्रगटा)

69

कैद-ए-बला में तीसरा दिन था जनाब को ।
बेआब कर चुकी थी अतश हर गुलाब को ।
तरसे हुए थे रिज़क को जी और ख़ाब को ।
इस रोज़ सुच्चानन्द येह बोला नवाब को ।
मंगवा के कलग़ीधर के पिसर इंतिकाम लो ।
मासूम इन्हें समझ के दया से ना काम लो ।

(अतश=प्यास, स्वप्न=नींद, पिसर=पुत्र,
इंतिकाम=बदला)

70

बोला वुह सुच्चानन्द से लो आ इन्हें शिताब ।
चरकों से सतिगुरू के जिगर है मिरा कबाब ।
गोबिन्द ने गंवा दिया सब मेरा रुअब दाब ।
राजे के साथ मेरी भी मट्टी हुई ख़राब ।
दुश्मन के बच्चे कतल करूंगा ज़रूर मैं ।
कहने पि तेरे आज चलूंगा ज़रूर मैं ।

(शिताब=जल्दी, चटक=झाँसा)

71

बच्चों को लेने आए ग़रज चन्द बेहया ।
सरदार इन का कहते हैं कि सुच्चानन्द था ।
माता ने देख कर कहा, "है है गजब हुआ ।
बस आन पहुंचा सर पि है मौका जुदाई का ।
देखूंगी उमर भर को ना येह प्यारी सूरतें ।
मट्टी में मिलने वाली हैं मैं वारी सूरतें ।

72

"जाने से पहले आओ गले से लगा तो लूं ।
केसों को कंघी कर दूं ज़रा मूंह धुला तो लूं ।
प्यारे सरों पे नन्ही सी कलग़ी सजा तो लूं ।
मरने से पहले तुम को मैं दूल्हा बना तो लूं ।"
रो रो के मात गुजरी ने आरासता किया ।
तीर-ओ-कमां से, तेग़ से पैरासता किया ।

(आरासता,पैरासता=सजाया)

73

"बेटे से पहले बिछड़ी थी तुम भी बिछड़ चले ।
बिगड़े हुए नसीब ज़्यादा बिगड़ चले ।
बेरहम दुश्मनों के तुम हाथों में पड़ चले ।
ज़ंजीर-ए-ग़म में मुझ को यहां पर जकड़ चले ।
बेहतर था तुम से पहले मैं देती परान को ।
दुख से तुम्हारे दुख है सिवा मेरी जान को ।"

74

कह कह के रोती थीं ज़ारोकतार मात ।
ज़ोरावर और फ़तह पि होती निसार मात ।
इस दरजा रंज-ओ-ग़म से हुईं बेकरार मात ।
ग़म खा के गिरने वाली थीं बे इख़तियार मात ।
शहज़ादग़ां ने बढ़ के संभाला हुज़ूर को ।
ढारस बंधाई कह के दिल-ए-नासबूर को ।

(ज़ारोकतार=जार जार, बहुत ज़्यादा)

75

फ़रमाए दसत बसता वुह दोनों गुरू के लाल ।
जी क्यों मुकद्दस का है अपने लिये निढाल ।
कुर्बानियों की पंथ को हाजत भी हो कमाल ।
जां सी हकीर चीज़ का फ़िर हम को हो ख़याल ।
वाहगुरू से जान प्यारी नहीं हमें ।
भाती येह आह-ओ-ज़ारी तुम्हारी नहीं हमें ।

(दस्त बस्ता=हाथ बाँध कर, मुकद्दस=पवित्र,
हाजत=ज़रूरत, कमाल=ज़्यादा, हकीर=तुच्छ,
आह-ओ-जारी=रोना धोना)

76

रुख़सत दो अब ख़ुशी से कि जानें फ़िदा करें ।
दुनिया से जब-ओ-ज़ोर का हम ख़ातमा करें ।
हासिल सिरों को दे के ख़ुदा की रज़ा करें ।
नाम अपने बाप दादे का मर कर सिवा करें ।
गिरया को ज़बत कर के बहुत आली-शान ने ।
"वारी गई लो जायो" कहा दादी जान ने ।

(फ़िदा=कुर्बान, जब-ओ-ज़ोर=ज़ोर ज़ुल्म,
गिरया=रोना)

77

लेने जो लोग आए जलूम-ओ-जहुल थे ।
इनसां का जाम पहने हुए वुह फ़ज़ूल थे ।
चलने में देर करने से होते मलूल थे ।
इस दम घिरे हुए गोया कांटों में फूल थे ।
तसलीम कर के दादी से बच्चे जुदा हुए ।
दरबार में नवाब के दाख़िल वुह आ हुए ।

(जलूम-ओ-जहुल=जालिम और जाहल)

78

थी प्यारी सूरतों से सुज़ाअत बरस रही ।
नन्ही सी सूरतों से थी ज़ुरअत बरस रही ।
रुख़ पर नवाब के थी शकावत बरस रही ।
राजों के मूंह पि साफ़ थी लानत बरस रही ।
बच्चों का रुअब छा गया हर इक मुशीर पर ।
लरज़ा सा पड़ गया था अमीर-ओ-वज़ीर पर ।

(सुज़ाअत=वीरता, शकावत=बदबख़ती, मुशीर=
दरबारी, थरथराहट=कपकपी)

79

नाज़िम की बात बात पे रुकने लगी ज़बां ।
ख़ुद को संभाल कर के वुह कहने लगा कि हां ।
ख़ाहां हो मौत कि या तुम्हें चाहिये अमां ।
बतलायो साफ़ साफ़ अब ऐ आली-ख़ानदां ।
इस दम करो कबूल अगर शाह के दीन को ।
फ़िर आसमां बना दूं तुम्हारी ज़मीन को ।

(नाज़िम=सूबा, ख़ाहां=इच्छुक, अमां=शरन)

80

सतिगुर के लाडलों ने दिया रुअब से जवाब ।
आती नहीं शरम है ज़रा तुझ को ऐ नवाब ।
दुनिया के पीछे करता है क्यों दीन को ख़राब ।
किस जा लिखा है ज़ुलम, दिखा तो हमें किताब ।
तालीम ज़ोर की कहीं कुरआन में नहीं ।
ख़ूबी तुम्हारे शाह के ईमान में नहीं ।

81

औरंगज़ेब डरता नहीं है गुनाह से ।
बेकस के इज़तिराब से दुखियों की आह से ।
मज़हब बदल रहा है वुह ज़ोर-ए-सिपाह से ।
फ़ैलाना दीन पाप है जबर-ओ-कराह से ।
लिखा है साफ़ साफ़ तुम्हारी किताब में ।
फ़ैलायो दीं बजबर ना तुम शैख़-ओ-शाब में ।

(जबर-ओ-कराह=जबर के साथ बिना मर्ज़ी के,
शैख़-ओ-शाब=बूढ़े और जवान)

82

पढ़के कुरान बाप को करता जो कैद हो ।
मरना पिता का जिस को ख़ुशी की नवैद हो ।
कतल-ए-बरादरा जिसे मामूली सैद हो ।
नेकी की इस से ख़लक को फ़िर क्या उमैद हो ।
ग़ैरों पि फ़िर वुह ज़ोर करे या ज़फा करे ।
हम क्या कहें किसी को हिदायत ख़ुदा करे ।

(नवैद=ख़बर, सैद=शिकार, जफ़ा=ज़ुल्म,
हदायत=सुमत्त)

83

हद से बढ़ा हुआ ही जो ज़ालिम बशर हुआ ।
मौला का ख़ौफ़ जिस को ना हादी का डर हुआ ।
मुस्लिम कहां के हाए जो कोताह नज़र हुआ ।
सरमद के कतल से भी ना जिस को हज़र हुआ ।
बुलवा के दिल्ली तेग़ बहादर की जान ली ।
मरने की हम ने भी है जभी आन ठान ली ।

(बशर=मानव, गुरू=हज़रत मुहम्मद साहब,
कोताह=तंग, आन=तत्काल)

84

ज़ालिम का दीन किस लिए करने लगा कबूल ।
तबदीलिए मज़हब से नहीं कुछ भी है हसूल ।
तौहीद के सिवा हैं येह बातें ही सब फ़ज़ूल ।
मनवाने वाहगुरू को ही आए थे सब रसूल ।
कुछ बुत-प्रसत भी नहीं हैं, बुत-शिकन हैं हम ।
अंमृत छका है जब से नेहायत मग़न हैं हम ।

(हसूल=लाभ, तौहीद=ईश्वर एक है, पैगंबर=
अवतार, शिकन=तोड़ना)

85

कर ले मुकाबला तू ज़रा अपने शाह से ।
पापी है वुह तो हम हैं बरी हर गुनाह से ।
उस ने फ़रेब खेला था पुशत-ए-पनाह से ।
मरने पिता के वासते हम आए चाह से ।
काम इस ने भाईयों से किया था यज़ीद का ।
दारा का है, मुराद का है रुतबा शहीद का ।

(पुश्त-ऐ-पनाह=हिमायती)

86

हम साथ चाहते हैं अजल के दहन में जाएं ।
मर जाएं भी तो कबर में एक साथ ही कफ़न में जाएं ।
हाथों में हाथ डाल के बाग़-ए-अदन में जाएं ।
मासूमों के लिए जो बना उस चमन में जाएं ।
मज़हब को पातशाह ने बट्टा लगा दिया ।
हम ने अमल से पंथ को अच्छा बना दिया ।

(मृत्यु=मौत, दहन=मुँह, बाग़-ऐ-अदन=
जहां ख़ुदा ने बाबा आदम को रखा था)

87

मालूम अब हुई तुझे वजह-ए-फ़साद है।
सतिगुर का शाह-ए-दिल्ली से येह क्यों अनाद है ।
मोमिन ही क्या नहीं जिसे करतार याद है ।
नाज़िम ने सर झुका के कहा मेरा साद है ।
नानक सुना है मैंने कि बाबर के यार थे ।
बाबा फ़रीद से भी बहुत इन को प्यार थे ।

(अनाद=वैर, साद=पसंद,ख़ुशी)

88

मालूम शाह से हुई वजह-ए-मुख़ालिफ़त ।
राजाउं से नहीं है भला क्यों यगानगत ।
नानक के बाप दादे भी हिन्दू थे रखते मत ।
सतिगुर बनाते रहते हैं क्यों कोह्यों की गत ।
बच्चों ने फ़िर जवाब दिया बायज़ीद को ।
हो पाक जो पसन्द करे क्यों पलीद को ।

(यगानगत=अपनत्व,एका, कोह्यों=पहाड़िए,
पलीद=पलीत,गंदा)

89

आलायशों से कुफ़्र की जो लोग पाक हैं ।
हैबत से ज़ुल:जलाल की जो ख़ौफ़नाक हैं ।
नेकी से जिन को उनस बुराई से बाक हैं ।
अपने वुह रिशत:दार वुही संग साक हैं ।
भाई बुतों को पूजे तो सर इस का तोड़ दें ।
सयद हो, बरहमन हो, कोई भी हो, छोड़ दें ।

(आलायशों=पाप, कुफ़र=नास्तिकता,
हैबत=डर, जुल:जलाल=जलाल वाला,ईश्वर,
उनस=प्यार, बाक=डर)

90

वाहगुरू का लाल हर इक हम को प्यारा है ।
मुनकिर है जो ख़ुदा से वुह दुश्मन हमारा है ।
भगती अकाल पुरख की जो भी पसारा है ।
राजा है शाह है हमें इस से किनारा है ।
करतार को रिझाएगा जो पास है वुही ।
पूजेगा बुतों को जो बशर नास है वुही ।

91

दावा ख़ुदा की बन्दगी का है तुम्हें कमाल ।
लेकिन है मुसलिमों का बहुत आज ग़ैर हाल ।
कब्रें जो पूजते ना हों मोमिन हैं ख़ाल ख़ाल ।
लाया ज़वाल तुम पि भी जभी सति स्री अकाल ।
कायल फ़कत ज़बां से हो तुम या करीम के ।
बन बन के ज़ुलम ढाते हो बन्दे रहीम के ।

(ग़ैर=बुरा, गड्ढा गड्ढा=बहुत कम बहुत कम, फ़क्त=
केवल, रहीम=रहम कर दिया,ईश्वर)

92

सारे अमीर तम में रऊनत-पसन्द हैं ।
मज़हब से गिर गए वुह जितने बलन्द हैं ।
रसते भी मारफ़त के जभी इन पि बन्द हैं ।
बेसूद तुम को अपनी नसाएह पि पन्द हैं ।
सुनता है कौन हिरस-ओ-हवायों के शोर में ।
इसलाम दर किताब मुसलमां हैं गोर में ।

(रऊनत-पसंद=अहंकारी, मार्फत=ज्ञान,
नसाएह=नसीहतों)

93

रोका जो ज़ुलम से तो मुसलमां बिगड़ गए ।
बुत को बुरा कहा तो येह हिन्दू बिछड़ गए ।
तेग़ा निकाला हम ने तो सब जोश झड़ गए ।
चिड़्यों से बाज़ रन में नदामत से गड़ गए ।
फ़ौजों पि निज़ इन्हें, उन्हें देवी कमान है ।
आशिक हैं हम ख़ुदा के हथेली पि जान है ।

(नदामत=शर्मिंदगी)

94

माना कि हम कलील मुख़ालिफ़ कसीर हैं ।
तुम पातशाह हो राजे हो और हम फ़कीर हैं ।
तुम से हज़ारों बढ़ के हैं हम बे-नज़ीर हैं ।
अपनी नज़र में माल तुम्हारे हकीर हैं ।
परवाह नहीं है बेसर-ओ-सामां लड़ेंगे ।
ज़ालिम से बुत-प्रसत से हां हां लड़ेंगे ।

(कलील=कम, मुख़ालिफ़=दुश्मन, कसीर=
बहुत, हकीर=घटिया, बेसर-ओ-सामां=
खाली हाथ)

95

तौबा करो तो तख़त तुम्हारे बने रहें ।
अफ़सर येह शाही रख़त तुम्हारे बने रहें ।
बिगड़ो ना हम से बख़त तुम्हारे बने रहें ।
ए वाए दिल जो सख़त तुम्हारे बने रहें ।
सरकश से बर करना है आदत ग़फ़ूर की ।
समझो तुम्हें सुझाते हैं हम बात दूर की ।

(वाए=अफ़सोस, दयालु=
बख़शण-हारा)

96

सच को मिटाओगे तो मिटोगे जहान से ।
डरता नहीं अकाल शहनशह की शान से ।
उपदेश हमारा सुन लो ज़रा दिल के कान से ।
हम कह रहे हैं तुम को ख़ुदा की ज़बान से ।
बाज़ आउ शर से हिन्दू-ओ-मुसलिम हो कोई हो ।
पंडित हो, मौलवी हो या आलिम हो कोई हो ।

(शर=बुराई, आलिम=विद्वान)

97

अंमृत बज़ोर तुम को छकाना नहीं हमें ।
हां सिक्ख बाजब्र तुम को बनाना नहीं हमें ।
भाता किसी के दिल को दुखाना नहीं हमें ।
लड़ भिड़ के जम्हा करना ख़ज़ाना नहीं हमें ।
शाही हैं अपने ठाठ मगर यों फ़कीर हैं ।
नानक की तरह हिन्दू-ओ-मुसलिम के पीर हैं ।

98

तकरीर-ए-दिल-पज़ीर से गुम सब के होश थे ।
नीची नज़र हर इक की थी इसतादा गोश थे ।
बच्चों के सामने सभी दाना ख़ामोश थे ।
नाज़िम के जी में बुगज़ ही था अब ना जोश थे ।
इतने में सुच्चा नन्द वुह दीवान-ए-नाबकार ।
झुंझला के बोला हाय वुह शैतान-ए-नाबकार ।

(दिल-पज़ीर=दिल को लुभाने वाली,
इसतादा=ठहरे, कान=कान, नाबकार=नालायक)

99

क्या ख़ूब है नवाब भी बातों में आ गए ।
उस बुत-शिकन के बच्चों की घातों में आ गए ।
सरदार हो के आप भी लातों में आ गए ।
संभलो कहीं ज़वाल के हाथों में आ गए ।
कहते हैं येह बुरा शह-ए-हिन्दोसतान को ।
तुम देखते हो रहम से क्यों इन की जान को ।

(ज़वाल=पतन)

100

खेंचो ज़बानें बर-सर-ए-बरबार ऐसों की ।
मेरा जो बस चले है सज़ा दार ऐसों की ।
दिल्ली में जो रपट सुने सरकार ऐसों की ।
नाहक को हम पि आ पड़े फिटकार ऐसों की ।
तकदीर फिर गई है तो कुछ अपना बस नहीं ।
इन पर दुहाई राम की खाना तरस नहीं ।

(बर-सर-ऐ-बरबार=भरे दरबार में,
दार=फांसी, नाहक=फ़िज़ूल)

101

ऐसा ना हो कि तख़त से तख़ता नसीब हो ।
दुश्मन तुम्हारी जान का हर इक हबीब हो ।
तुम आली-ख़ानदां हो, शरीफ़-ओ-नजीब हो ।
देखो बचा रहा हूं गड़े के करीब हो ।
क्यों रहम करके लेते हो दोज़ख़ जहान में ।
जोड़े हुए है तीर मुकद्दर कमान में ।

(हबीब=दोस्त, नजीब=अच्छे परिवार का)

102

मनज़ूर जब कि सांप का सर भी है तोड़ना ।
बेजा है फिर तो बच्चा-ए-अफई को छोड़ना ।
दसवें गुरू का है जो ख़ज़ाना बटोरना ।
बच्चे की पहले बाप से गरदन मरोड़ना ।
नाज़िम था इस लईन की बातों में आ गया ।
बेमेहर बेधरम की था घातों में आ गया ।

(अफई=साँप, लईन=अभागा)

103

दो भाई शेर ख़ान-ओ-ख़िज़र ख़ां पठान थे ।
मलेर-कोटला के जो मशहूर ख़ान थे ।
इक रोज़ आ के रन में लड़े कुछ जवान थे ।
गोबिन्द इन के बाप की ले बैठे जान थे ।
नाज़िम ने, सुच्चा नन्द ने उन से कहा कि लो ।
बदला पिदर का इन के लहू को बहा के लो ।

104

कहने लगे वुह तुम तो नेहायत ज़लील हो ।
नामरदी की बताते जरी को सबील हो ।
मुख़तार तुम हमारे हो या तुम वकील हो ?
नाहक बयान करते जो बोदी दलील हो ।
बदला ही लेना होगा तो हम लेंगे बाप से ।
महफ़ूस रक्खे हम को ख़ुदा ऐसे पाप से ।

(नेहायत ज़लील=बहुत ही कमीना,सही=
बहादर, योजना=विधि)

105

झाड़ू सा खा के दोनों शरमसार हो गए ।
जल्लाद सारे कतल से बेज़ार हो गए ।
ज़यादा दलेर फिर सितम-आज़ार हो गए ।
दीवार में चुनने को तैयार हो गए ।
ईंटें मंगाई चूना भी फ़ौरन बहम किया ।
यारा नहीं बयान का फिर जो सितम किया ।

(बेज़ार=अनिच्छुक, बहम=
इकट्ठा, यार=ताकत)

106

लपके लईन दोनों वुह शहशादगान पर ।
हमला किया ज़लीलों ने हर आलीशान पर ।
था इन का किस्सा ले के चलें अब मचान पर ।
बुनयाद थी धरम की खुदी जिस मकान पर ।
सतिगुर के लाल बोले, "ना छूना हमारे हाथ ।
गड़ने हम आज ज़िन्दा चलेंगे ख़ुशी के साथ ।"

107

हाथों में हाथ डाल के दोनों वह नौनेहाल ।
कहते हुए ज़बां से बढ़े सति स्री अकाल ।
चेहरों पि ग़म का नाम ना था और ना था मलाल ।
जा ठहरे सर पि मौत के फिर भी ना था ख़याल ।
जिस दम गले गले थे वुह मासूम गड़ गए ।
दिन छुपने भी ना पाया कि कातिल उजड़ गए ।

108

दीवार के दबायो से जब हबस-ए-दम हुआ ।
दौरान-ए-ख़ून रुकने लगा, सांस कम हुआ ।
फ़रमाए दोनों हम पि बज़ाहर सितम हुआ ।
बातिन में पंथ पर है ख़ुदा का करम हुआ ।
सद साल और जी के भी मरना ज़रूर था ।
सर कौम से बचाना येह ग़ैरत से दूर था ।

(हबस-ए-दम=दम घुटना, बातिन=अन्दरूनी
तौर ते, सद=सौ)

109

हम जान दे के औरौं की जानें बचा चले ।
सिक्खी की नींव हम हैं सरों पर उठा चले ।
गुर्याई का हैं किस्सा जहां में बना चले ।
सिंघों की सलतनत का हैं पौदा लगा चले ।
गद्दी से ताज-ओ-तख़त बस अब कौम पाएगी ।
दुनिया से ज़ालिमों का निशां तक मिटाएगी ।

110

ठोडी तक ईंटें चुन दी गईं मूंह तक आ गईं ।
बीनी को ढांपते ही वुह आंखों पि छा गईं ।
हर चांद सी जबीन को घन सा लगा गईं ।
लख़त-ए-जिगर गुरू के वुह दोनों छुपा गईं ।
जोगी जी इस के बाद हुई थोड़ी देर थी ।
बसती सरहिन्द शहर की ईंटों का ढेर थी ।

(जबीन=माथा, घन=ग्रहण, लख़त-ऐ-जिगर=
जिगर के टुकड़े)

 
 
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