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भारतेंदु हरिश्चंद्र
Bharatendu Harishchandra
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Savaiye Bharatendu Harishchandra

सवैये/सवैय्ये भारतेंदु हरिश्चंद्र

अब और प्रेम के फंद परे
हम चाहत हैं तुमको जिउ से
जा मुख देखन को नितही रुख
रैन में ज्यौहीं लगी झपकी त्रिजटे
सदा चार चवाइन के डर सों
ताजि कै सब काम को तेरे
आइयो मो घर प्रान पिया
कोऊ कलंकिनि भाखत है कहि
मन लागत जाको जबै जिहिसों
देखत पीठि तिहारी रहैंगे न
पीवै सदा अधरामृत स्याम को
लै बदनामी कलंकिनि होइ चवाइन
लखिकै अपने घर को निज सेवक
अब प्रीति करी तौ निबाह करौ
यह काल कराल अहै कलि को
 
 
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