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गोपालदास नीरज
Gopal Das Neeraj
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Pran Geet Gopal Das Neeraj

प्राण-गीत गोपालदास नीरज

1. क्या करेगा प्यार वह

क्या करेगा प्यार वह भगवान को?
क्या करेगा प्यार वह ईमान को ?
जन्म लेकर गोद में इन्सान की
प्यार कर पाया न जो इन्सान को ।

2. गीत-तुम झूम झूम गाओ

तुम झूम-झूम गाओ, रोते नयन हंसाओ,
मैं हर नगर डगर के कांटे बुहार दूंगा।

भटकी हुई पवन है,
सहमी हुई किरन है,
न पता नहीं सुबह का,
हर ओर तम गहन है,
तुम द्वार द्वार जाओ, परदे उघार आओ,
मैं सूर्य-चांद सारे भू पर उतार दूंगा।
तुम झूम झूम गाओ।

गीला हरेक आंचल,
टूटी हरेक पायल,
व्याकुल हरेक चितवन,
घायल हरेक काजल,
तुम सेज-सेज जाओ, सपने नए सजाओ,
मैं हर कली अली के पी को पुकार दूंगा।
तुम झूम-झूम गाओ।

विधवा हरेक डाली,
हर एक नीड़ खाली,
गाती न कहीं कोयल,
दिखता न कहीं माली,
तुम बाग जाओ, हर फूल को जगाओ,
मैं धूल को उड़ाकर सबको बहार दूंगा।
तुम झूम-झूम गाओ।

मिट्टी उजल रही है,
धरती संभल रही है,
इन्सान जग रहा है,
दुनिया बदल रही है,
तुम खेत खेत जाओ, दो बीज डाल आओ,
इतिहास से हुई मैं गलती सुधार दूंगा।
तुम झूम-झूम गाओ।

3. कोई नहीं पराया

कोई नहीं पराया, मेरा घर संसार है।
मैं ना बँधा हूँ देश काल की जंग लगी जंजीर में
मैं ना खड़ा हूँ जाति−पाति की ऊँची−नीची भीड़ में
मेरा धर्म ना कुछ स्याही−शब्दों का सिर्फ गुलाम है
मैं बस कहता हूँ कि प्यार है तो घट−घट में राम है
मुझ से तुम ना कहो कि मंदिर−मस्जिद पर मैं सर टेक दूँ
मेरा तो आराध्य आदमी− देवालय हर द्वार है
कोई नहीं पराया मेरा घर सारा संसार है ।।

कहीं रहे कैसे भी मुझको प्यारा यह इन्सान है,
मुझको अपनी मानवता पर बहुत-बहुत अभिमान है,
अरे नहीं देवत्व मुझे तो भाता है मनुजत्व ही,
और छोड़कर प्यार नहीं स्वीकार सकल अमरत्व भी,
मुझे सुनाओ तुम न स्वर्ग-सुख की सुकुमार कहानियाँ,
मेरी धरती सौ-सौ स्वर्गों से ज्यादा सुकुमार है।
कोई नहीं पराया मेरा घर सारा संसार है ।।

मुझे मिली है प्यास विषमता का विष पीने के लिए,
मैं जन्मा हूँ नहीं स्वयँ-हित, जग-हित जीने के लिए,
मुझे दी गई आग कि इस तम को मैं आग लगा सकूँ,
गीत मिले इसलिए कि घायल जग की पीड़ा गा सकूँ,
मेरे दर्दीले गीतों को मत पहनाओ हथकड़ी,
मेरा दर्द नहीं मेरा है, सबका हाहाकार है ।
कोई नहीं पराया मेरा घर सारा संसार है ।।

मैं सिखलाता हूँ कि जिओ औ' जीने दो संसार को,
जितना ज्यादा बाँट सको तुम बाँटो अपने प्यार को,
हँसी इस तरह, हँसे तुम्हारे साथ दलित यह धूल भी,
चलो इस तरह कुचल न जाये पग से कोई शूल भी,
सुख न तुम्हारा सुख केवल जग का भी उसमें भाग है,
फूल डाल का पीछे, पहले उपवन का श्रृंगार है।
कोई नहीं पराया मेरा घर सारा संसार है ।।

4. प्रेम-पथ हो न सूना

प्रेम-पथ हो न सूना कभी इसलिए
जिस जगह मैं थकूँ, उस जगह तुम चलो।

क़ब्र-सी मौन धरती पड़ी पाँव परल
शीश पर है कफ़न-सा घिरा आसमाँ,
मौत की राह में, मौत की छाँह में
चल रहा रात-दिन साँस का कारवाँ,

जा रहा हूँ चला, जा रहा हूँ बढ़ा,
पर नहीं ज्ञात है किस जगह हो?
किस जगह पग रुके, किस जगह मगर छुटे
किस जगह शीत हो, किस जगह घाम हो,

मुस्कराए सदा पर धरा इसलिए
जिस जगह मैं झरूँ उस जगह तुम खिलो।
प्रेम-पथ हो न सूना कभी इसलिए,
जिस जगह मैं थकूँ, उस जगह तुम चलो।

प्रेम का पंथ सूना अगर हो गया,
रह सकेगी बसी कौन-सी फिर गली?
यदि खिला प्रेम का ही नहीं फूल तो,
कौन है जो हँसे फिर चमन में कली?

प्रेम को ही न जग में मिला मान तो
यह धरा, यह भुवन सिर्फ़ श्मशान है,
आदमी एक चलती हुई लाश है,
और जीना यहाँ एक अपमान है,

आदमी प्यार सीखे कभी इसलिए
रात-दिन मैं ढलूँ, रात-दिन तुम ढलो।
प्रेम-पथ हो न सूना कभी इसलिए,
जिस जगह मैं थकूँ, उस जगह तुम चलो।

एक दिन काल-तम की किसी रात ने
दे दिया था मुझे प्राण का यह दिया,
धार पर यह जला, पार पर यह जला
बार अपना हिया विश्व का तम पिया,

पर चुका जा रहा साँस का स्नेह अब
रोशनी का पथिक चल सकेगा नहीं,
आँधियों के नगर में बिना प्यार के
दीप यह भोर तक जल सकेगा नहीं,

पर चले स्नेह की लौ सदा इसलिए
जिस जगह मैं बुझूँ, उस जगह तुम जलो।
प्रेम-पथ हो न सूना कभी इसलिए
जिस जगह मैं थकूँ, उस जगह तुम चलो।

रोज़ ही बाग़ में देखता हूँ सुबह,
धूल ने फूल कुछ अधखिले चुन लिए,
रोज़ ही चीख़ता है निशा में गगन-
'क्यों नहीं आज मेरे जले कुछ दीए ?'

इस तरह प्राण! मैं भी यहाँ रोज़ ही,
ढल रहा हूँ किसी बूँद की प्यास में,
जी रहा हूँ धरा पर, मगर लग रहा
कुछ छुपा है कहीं दूर आकाश में,

छिप न पाए कहीं प्यार इसलिए
जिस जगह मैं छिपूँ, उस जगह तुम मिलो।
प्रेम-पथ हो न सूना कभी इसलिए
जिस जगह मैं थकूँ, उस जगह तुम चलो।

प्रेम का पंथ सूना अगर हो गया,
रह सकेगी बसी कौन-सी फिर गली?
यदि खिला प्रेम का ही नहीं फूल तो,
कौन है जो हँसे फिर चमन में कली?

प्रेम को ही न जग में मिला मान तो
यह धरा, यह भुवन सिर्फ श्मशान है,
आदमी एक चलती हुई लाश है,
और जीना यहाँ एक अपमान है,

आदमी प्यार सीखे कभी इसलिए
राल-दिन में ढलूँ रात-दिन तुम ढलो।
प्रेम-पथ हो न सूना कभी इसलिए
जिस जगह मैं थकूँ, उस जगह तुम चलो।

5. प्रेम को न दान दो

प्रेम को न दान दो, न दो दया,
प्रेम तो सदैव ही समृद्ध है।

प्रेम है कि ज्योति-स्नेह एक है,
प्रेम है कि प्राण-देह एक है,
प्रेम है कि विश्व गेह एक है,

प्रेमहीन गति, प्रगति विरुद्ध है।
प्रेम तो सदैव ही समृद्ध है॥

प्रेम है इसीलिए दलित दनुज,
प्रेम है इसीलिए विजित दनुज,
प्रेम है इसीलिए अजित मनुज,

प्रेम के बिना विकास वृद्ध है।
प्रेम तो सदैव ही समृद्ध है॥

नित्य व्रत करे नित्य तप करे,
नित्य वेद-पाठ नित्य जप करे,
नित्य गंग-धार में तिरे-तरे,

प्रेम जो न तो मनुज अशुद्ध है।
प्रेम तो सदैव ही समृद्ध है॥

6. दुश्मन को अपना हदय जरा देकर देखो

वह नफ़रत की बारूद न बिखराओ साथी!
यह युद्धों का ज़हरीला नारा बन्द करो,
जो प्यार तिजोरी-सेफ़ों में है तड़प रहा
उसके बन्धन खोलो, उसको स्वच्छन्द करो!

मृत मानवता ज़िन्दगी माँगती है तुम से
दो बूँद स्नेह की उसके प्राणों में ढालो,
आदम का जो यह स्वर्ग हो रहा है मरघट
जाओ ममता का एक दिया उसमें बालो!

निर्माण घृणा से नहीं, प्यार से होता है,
सुख-शान्ति खड्ग पर नहीं फूल पर चलते हैं,
आदमी देह से नहीं, नेह से जीता है,
बम्बों से नहीं, बोल से वज्र पिघलते हैं।

तुम डरो न, जागे आओ निज भुज फैलाओ,
है प्यार जहाँ, तलवार वहाँ झुक जाती है,
पतवार प्रेम की छू जाये जिस किश्ती को
मँझधार, पार उसको खुद पहुंचा जाती है।

जिसके अधरों पर गीत प्रेम का जीवित है
वह हँसकर तूफ़ानों को गोद खिलाता है,
जिसके सीने में दर्द छुपा है दुनिया का
सैलाबों से बढ़कर वह हाथ मिलाता है।

क्तिना ही क्यों न बड़ा हो घाव ह्रदय में, पर
सच कहता हूँ यह प्यार उसे भर सकता है,
कैसा ही बाग़ी-दुश्मन हो आदमी मगर
बस एक अश्रु का तार क़ैद कर सकता है।

जितना ही ऊबड़-खाबड़ हो रास्ता किन्तु
वह प्यार फूल-सा तुम्हें उठा ले जायेगा,
कैसी ही भीषण अंधियारी हो धुआँ-घुन्ध
पर एक स्नेह का दीप सुबह ले आएगा।

मैं इसीलिए अक्सर लोगों से कहता हूँ
जिस जगह बँटे नफ़रत, जा प्यार लुटाओ तुम
जो चोट करे तुम पर उसके चूम लो हाथ
जो गाली दे उसको आशीष पिन्हाओ तुम ।

तुम शान्ति नहीं ला पाए युद्धों के द्वारा
अब फेंक ज़रा तलवार, प्यार लेकर देखो,
सच मानो निश्चय विजय तुम्हारी ही होगी
दुश्मन को अपना हृदय ज़रा देकर देखो।

7. दीप नहीं, दीप का

दीप नहीं, दीप का प्रकाश मुझे चाहिए,
आँज मैं सकूँ जिसे ठीक आँख में अभय,
बाँट मैं सकूँ जिसे समस्त विश्व में सदय,
बाँध क्षुद्र धूल का सके जिसे न क्रय, न क्षय,
दीप नहीं, दीप का प्रकाश मुझे चाहिए।।

जो बँधे न वृन्त से, न डाल से न पात से,
जो मुँदे न, जो छुपे न रात में प्रभात से,
जो थके. न जो सुने न धूप-वारि-वात से,
फूल नहीं, फूल का सुवास मुझे चाहिए।
दीप नहीं, दीप का प्रकाश मुझे चाहिए।।

घूँट-घूँट पी सके घृणा-समुद्र जो अतल
बूँद-बूँद सोख ले सकल विषम-कलुष-गरल,
अश्रु-अश्रु बीन ले धरा बने सुखी सकल,
तृप्ति नहीं, चिर अतृप्त प्यास मुझे चाहिए।
दीप नहीं, दीप का प्रकाश मुझे चाहिए।।

घेर जो सके समग्र स्वर्ग, नर्क, भू, गगन,
बाँध जो सके सकल करम-धरम जनम-मरण,
छू सके जिसे न देश-काल की गरम पवन,
मुक्ति नहीं, मुक्त प्रेम-पाश मुझे चाहिए।
दीप नहीं, दीप का प्रकाश मुझे चाहिए।।

देवता नहीं, मनुष्य बस मनुष्य बन रहे,
अर्चना न, वन्दना न, द्वेष-मुक्त मन रहे,
स्वर्ग नहीं, भूमि-भूमि के लिए शरण रहे,
अमृत नहीं, मर्त्य का विकास मुझें चाहिए।
दीप नहीं, दीप का प्रकाश मुझे चाहिए।।

8. जलाओ दिए पर

जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

नई ज्योति के धर नए पंख झिलमिल,
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
ऊषा जा न पाए, निशा आ ना पाए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यूँ ही,
भले ही दिवाली यहाँ रोज आए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आयें नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,
कटेंगे तभी यह अँधरे घिरे अब,
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।

9. मूर्ख पुजारी है वह जो कहता है

मूर्ख पुजारी है वह जो कहता है मन्दिर ईश्वर का घर,
मुल्ला भी वह बहका है जो कहता वह मस्जिद के अन्दर,
मन्दि-मस्जिद में ही उनका ईश्वर और खुदा होता तो
मन्दिर में बन सक्ती मस्जिद; मस्जिद में बन सकता मन्दिर ।

10. खोजने तुमको गया

खोजने तुमको गया मठ में विकल अरमान मेरा,
पत्थरों पर झुक न पाया पर सरल शिशु-ध्यान मेरा,
जन-जनार्दन की चरण-रज किन्तु जब शिर पर चढ़ाई
मिल गया मुझको सहज उस धूल में भगवान मेरा ।

11. जब न तुम ही मिले

जब न तुम ही मिले राह पर तो मुझे
स्वर्ग भी गर धरा पर मिले-व्यर्थ है !

दीप को रात - भर जल सुबह मिल गई
चिर कुमारी उषा की किरन-पालकी,
सूर्य ने चल दिवस भर अगिन-पन्थ पर
रात, लट चूम ली चाँद के भाल की,
ज़िन्दगी में सभी को सदा मिल गया
प्राण का मीत औ' सारथी राह का,
एक मैं ही अकेला जिसे आज तक
मिल न पाया सहारा क्रिसी बाँह का,
बेसहारे हुई अब कि जब ज़िन्दगी
साथ संसार सारा चले व्यर्थ है!

जब न तुम ही मिले राह पर तो मुझे
स्वर्ग भी गर धरा पर मिले-व्यर्थ है !

एक ही कील पर घूमती है धरा,
एक ही डोर से बस बँधा है गगन,
एक ही साँस में ज़िन्दगी क़ैद है
एक ही तार से बुन गया है कफ़न,
इस तरह हर किसी के नयन में यहाँ
एक ऐसी बसी शक्ल खामोश है,
प्यार संसार भर का मिले क्यों न, पर
आदमी को न उसके बिना होश है,
होश ही आज अपना नहीं जब मुझे
फूल बन उर्वशी भी खिले-व्यर्थ है!

जब न तुम ही मिले राह पर तो मुझे
स्वर्ग भी गर धरा पर मिले-व्यर्थ है !

नाश के इस नगर में तुम्हीं एक थे
खोजता मैं जिसे आ गया था यहाँ,
तुम न होते अगर तो मुझे क्या पता
तन भटकता कहाँ, मन भटकता कहाँ,
वह तुम्हीं हो कि जिसके लिए आज तक
मैं सिसकता रहा शब्द में, गान में,
वह तुम्हीं हो कि जिसके बिना शव बना
मैं भटकता रहा रोज़ शमशान में,
पर तुम्हीं अब न मेरी पियो प्यास तो
ओंठ पर भी हिमालय गले व्यर्थ-है,

जब न तुम ही मिले राह पर तो मुझे
स्वर्ग भी गर धरा पर मिले-व्यर्थ है !

12. तुम्हारे बिना आरती

तुम्हारे बिना आरती का दीया यह
न बुझ पा रहा है न जल पा रहा है।

भटकती निशा कह रही है कि तम में
दिए से किरन फूटना ही उचित है,
शलभ चीखता पर बिना प्यार के तो
विधुर सांस का टूटना ही उचित है,
इसी द्वंद्व में रात का यह मुसाफिर
न रुक पा रहा है, न चल पा रहा है।

तुम्हारे बिना आरती का दिया यह
न बुझ पा रहा है, न जल पा रहा है।

मिलन ने कहा था कभी मुस्करा कर
हँसो फूल बन विश्व-भर को हँसाओ,
मगर कह रहा है विरह अब सिसक कर
झरा रात-दिन अश्रु के शव उठाओ,
इसी से नयन का विकल जल-कुसुम यह
न झर पा रहा है, न खिल पा रहा है।

तुम्हारे बिना आरती का दिया यह
न बुझ पा रहा है, न जल पा रहा है।

कहाँ दीप है जो किसी उर्वशी की
किरन-उंगलियों को छुए बिना जला हो?
बिना प्यार पाए किसी मोहिनी का
कहाँ है पथिक जो निशा में चला हो!
अचंभा अरे कौन फिर जो तिमिर यह
न गल पा रहा है, न ढल पा रहा है।

तुम्हारे बिना आरती का दिया यह
न बुझ पा रहा है, न जल पा रहा है।

किसे है पता धूल के इस नगर में
कहाँ मृत्यु वरमाल लेकर खड़ी है?
किसे ज्ञात है प्राण की लौ छिपाए
चिता में छुपी कौन-सी फुलझड़ी है?
इसी से यहाँ राज हर जिंदगी का
न छुप पा रहा है, न खुल पा रहा है।

तुम्हारे बिना आरती का दिया यह
न बुझ पा रहा है, न जल पा रहा है।

13. कहते-कहते थके

कहते-कहते थके कल्प, युग, वर्ष, मास, दिन,
पर जीवन की राम-कहानी अभी शेष है।

सौ-सौ बार उठा जुड़कर सपनों का मेला,
सौ-सौ बार गया मंज़िल तक प्राण अकेला,
बूँद-बूँद घन हुए हज़ारों बार नयन के,
ढहे करोडों बार महल चाँदी-कंचन के
पर है यह इन्सान कि फिर भी जिसके मन में
नीड़ बसाने की नादानी अभी शेष है!

कहते-कहते थके कल्प, युग, वर्ष, मास, दिन,
पर जीवन की राम-कहानी अभी शेष है।

छिन-छिन क्षीण हो रहा श्वास-कोष जीवन का,
छिन-छिन बढ़ता जाता है व्यापार मरण का,
हुए जा रहे टूक-टूक सब चाँद-सितारे,
बने जा रहे मरु दिन-दिन सागर-सरि सारे,
पर है यह आश्चर्य कि मिट्टी की आँखों में
एक बूँद आँसू का पानी अभी शेष है ।

कहते-कहते थके कल्प, युग, वर्ष, मास, दिन,
पर जीवन की राम-कहानी अभी शेष है।

'आज', आज का वर्तमान, कल का अतीत है,
और भविष्यत् सिर्फ भूत का मूक गीत है,
आता बनकर जन्म, मरण बन जाता हर पल,
बस चुटकी भर ख़ाक ज़िन्दगी-भर की हलचल,
लेकिन बुझी-बुझी प्राणों की हर धड़कन में,
किसी चोट की पीर पुरानी अभी शेष है।

कहते-कहते थके कल्प, युग, वर्ष, मास, दिन,
पर जीवन की राम-कहानी अभी शेष है।

14. इस तरह तय हुआ

इस तरह तय हुआ साँस का यह सफ़र
ज़िन्दगी थक गई, मौत चलती रही !

एक ऐसी हँसी हँस पड़ी धूल यह
लाश इन्सान की मुस्कुराने लगी,
तान ऐसी किसी ने कहीं छेड़ दी
आँख रोती हुई गीत गाने लगी,
एक नाज़ुक किरन छू गई इस तरह
खुद-ब-खुद प्राण का दीप जलने लगा,
एक आवाज़ आई किसी ओर से
हर मुसाफ़िर बिना पांव चलने लगा,
रूप के गांव का पर मिला छोर यूँ-
देह बढ़ती रही, उम्र ढलती रही ।

इस तरह तय हुआ साँस का यह सफ़र
ज़िन्दगी थक गई, मौत चलती रही !

एक दिन ज़िन्दगी की कड़ी धूप में
दो पखेरू मिले मुक्त नभ के तले,
कुछ न बोले, न डोले न कुछ बात की
हो गया प्यार लेकिन नयन जब मिले,
होठ ज्यों ही उठे तो नियति हँस उठी,
आँधियां चल पड़ीं, तम बरसने लगा,
छुट गया हाथ से हाथ भीगा हुआ,
गालियाँ मार संसार हँसने लगा,
और फिर यूँ कटी वह विरह की निशा
स्नेह बुझता रहा, याद जलती रही ।

इस तरह तय हुआ साँस का यह सफ़र
ज़िन्दगी थक गई, मौत चलती रही !

एक दिन एक आया पथिक द्वार पर
टुक रुका, एक-दो घूंट पानी पिया
पथ-सफ़र का लिया साथ सामान सब
एक फेंकी विवश दृष्टि और चल दिया,
उस दिवस से मगर एक तस्वीर-सी
अश्रु की भीति पर रोज़ खिंचने लगी,
रंग भरने लगे जागकर रात, दिन,
मोतियों से गली-गैल सिंचने लगी,
किन्तु पूरा हुआ चित्र वह इस तरह
रंग हुए एक सब, छवि बदलती रही।

इस तरह तय हुआ साँस का यह सफ़र
ज़िन्दगी थक गई, मौत चलती रही !

एक दिन एक तारा गिरा टूटकर
एक उजड़े हुए नीड़ ने रख लिया,
फूल ने मुस्कराकर तभी यह कहा-
'यह बुझा है दिया क्यों इसे दिल दिया ?'
बोलने तब लगा नीड़ का एक तृण
'हर दुखी को दुखी से सदा प्यार है,
आँसुओं के लिए गोद बस धूल है,
फूल को तो धरे शीश संसार है !'
ख़त्म झगड़ा मगर इस तरह यह हुआ
फूल झरता रहा, धूल खिलती रही।

इस तरह तय हुआ साँस का यह सफ़र
ज़िन्दगी थक गई, मौत चलती रही ।

एक दिन एक बोली पिटी गोट यूँ-
'एक मौका अगर तू मुझे और दे,
मान सच यह कि बाज़ी बदल दूँ अभी
हार को जीत से, जीत को हार से,
सुन खिलाड़ी प्रथम बार झिझका जरा
फिर बदल गोट वह चाल चलने लगा,
जब लगी अक्ल सब तब बहुत देर में
खेल का कुछ तराजू बदलने लगा,
'ख़त्म वो खेल भी पर हुआ इस तरह'
गोट पिटती रही, चाल चलती रही ।

इस तरह तय हुआ साँस का यह सफ़र
ज़िन्दगी थक गई, मौत चलती रही !

15. यूँही यूँही

भोर हुआ,
धूप चढ़ी,
शोर हुआ,
साँझ बढ़ी,
यूँही यूँही एक दिन निकल क्या।

प्राण तपे,
प्यास जगी,
मेघ घिरे,
झड़ी लगी,
यूँही यूँही हिय-हिमाद्रि गल गया ।

स्नेह चुका,
साँस थकी,
तिमिर झुका,
ज्योति बिकी,
यूँही यूँही एक दीप जल गया।

रुप हँसा,
रास रचा,
मिलन सजा,
विरह बचा,
यूँही यूँही एक स्वप्न छल गया।

जन्म रोया,
मृत्यु हँसी,
आयु लुटी,
धूल बसी,
यूँही यूँही बस मनुष्य ढल क्या।

16. आदमी है मौत से लाचार

आदमी है मौत से लाचार,
जी रहा है इसलिए संसार ॥

बूँद बनने के लिए बेसब्र घन है,
धूल चुनने के लिए व्याकुल सुमन है,
ढल रहा है चाँद निशि की बाहु में,
गोद में तम को लिए चंचल किरन है,
प्राण ! नश्वर है सकल श्रृंगार,
इसलिए सौन्दर्य है सुकुमार ।
आदमी है मौत से लाचार,
जी रहा है इसलिए संसार ॥

बज रही सरगम मरण की भू, गगन में,
है चिता की राख लिपटी हर चरण में,
हँस रहा हर डाल पर पतझर समय का,
एक विष की बूँद है सबके नयन में,
प्राण ! जीवन क्या, प्रणय क्या प्यार,
एक आंसू और एक अंगार ।
आदमी है मौत से लाचार,
जी रहा है इसलिए संसार ॥

धूल को मरघट सदा प्यारा लगा है,
अमृत को तन-घट सदा कारा लगा है,
चल रहा है गीत आँसू की डगर में,
मृत्यु से हारा सदा जीवन-समर में,
मत कहो रण-क्षेत्र है संसार,
हारता आया मनुज हर बार ।
आदमी है मौत से लाचार,
जी रहा है इसलिए संसार ॥

17. यह प्रवाह है

यह प्रवाह है, यह न रुका है, यह न रुकेगा ।

जाने दो अवरोध पर्वतों की काया धर,
लगने दो गिरि-चट्टानों की हाट बाट पर,
उठने दो भूचाल आँधियों के आँगन में,
झरने दो उल्काओं की बरसात गगन से,
या न मौसमी जल गड्ढों में जो बंध जाये,
यह प्रवाह है, यह न रुका है, यह न रुकेगा ।

कुछ परवाह नहीं जो अम्बर में हलचल है,
चिंता क्या जो सम्मुख मुरदों का दल बल है,
चीख़ रहा विध्वंस, ढह रहा संस्कृति का गढ़,
मानवता की लाश रक्त में पड़ी रही सड़,
यह न नाश का दूत, थके जो इस बस्ती में,
यह विकास है, यह न थका है, यह न थकेगा ।

मुट्ठी में भूकम्प, शीश पर मेरु उठाये,
नयनों में निर्माण, कण्ठ में राग बसाये,
एकाकी पाथेयहीन तन, मन चिर, जर्जर,
स्वर्ग छीन लाने को जो बढ़ रहा निरन्तर,
उसे झुकाने, उसे मिटाने की सोचो मत,
वह मनुष्य है, वह न झुका है, वह न झुकेगा,
वह भविष्य है, वह न मिटा है, वह न मिटेगा,
वह विकास है, वह न थका है, वह न थकेगा,
वह प्रवाह है, वह न रुका है, वह न रुकेगा ।

18. आदमी को प्यार दो

सूनी-सूनी ज़िंदगी की राह है,
भटकी-भटकी हर नज़र-निगाह है,
राह को सँवार दो,
निगाह को निखार दो,

आदमी हो तुम कि उठा आदमी को प्यार दो,
दुलार दो।
रोते हुए आँसुओं की आरती उतार दो।

तुम हो एक फूल कल जो धूल बनके जाएगा,
आज है हवा में कल ज़मीन पर ही आएगा,
चलते व़क्त बाग़ बहुत रोएगा-रुलाएगा,
ख़ाक के सिवा मगर न कुछ भी हाथ आएगा,

ज़िंदगी की ख़ाक लिए हाथ में,
बुझते-बुझते सपने लिए साथ में,
रुक रहा हो जो उसे बयार दो,
चल रहा हो उसका पथ बुहार दो।
आदमी हो तुम कि उठो आदमी को प्यार दो,
दुलार दो।

ज़िंदगी यह क्या है- बस सुबह का एक नाम है,
पीछे जिसके रात है और आगे जिसके शाम है,
एक ओर छाँह सघन, एक ओर घाम है,
जलना-बुझना, बुझना-जलना सिर्फ़ जिसका काम है,
न कोई रोक-थाम है,

ख़ौफनाक-ग़ारो-बियाबान में,
मरघटों के मुरदा सुनसान में,
बुझ रहा हो जो उसे अंगार दो,
जल रहा हो जो उसे उभार दो,
आदमी हो तुम कि उठो आदमी को प्यार दो,
दुलार दो।

ज़िंदगी की आँखों पर मौत का ख़ुमार है,
और प्राण को किसी पिया का इंतज़ार है,
मन की मनचली कली तो चाहती बहार है,
किंतु तन की डाली को पतझर से प्यार है,
क़रार है,

पतझर के पीले-पीले वेश में,
आँधियों के काले-काले देश में,
खिल रहा हो जो उसे सिंगार दो,
झर रहा हो जो उसे बहार दो,
आदमी हो तुम कि उठो आदमी को प्यार दो,
दुलार दो।

प्राण एक गायक है, दर्द एक तराना है,
जन्म एक तारा है जो मौत को बजाता है,
स्वर ही रे! जीवन है, साँस तो बहाना है,
प्यार की एक गीत है जो बार-बार गाना है,
सबको दुहराना है,

साँस के सिसक रहे सितार पर
आँसुओं के गीले-गीले तार पर,
चुप हो जो उसे ज़रा पुकार दो,
गा रहा हो जो उसे मल्हार दो,
आदमी हो तुम कि उठो आदमी को प्यार दो,
दुलार दो।

एक चाँद के बग़ैर सारी रात स्याह है,
एक फूल के बिना चमन सभी तबाह है,
ज़िंदगी तो ख़ुद ही एक आह है कराह है,
प्यार भी न जो मिले तो जीना फिर गुनाह है,

धूल के पवित्र नेत्र-नीर से,
आदमी के दर्द, दाह, पीर से,
जो घृणा करे उसे बिसार दो,
प्यार करे उस पै दिल निसार दो,
आदमी हो तुम कि उठो आदमी को प्यार दो,
दुलार दो।
रोते हुए आँसुओं की आरती उतार दो॥

19. कौन तुम हो

रात के कज्जल-तिमिर में झिलमिलाती
प्रात की कंचन-किरन-सी कौन तुम हो!

श्याम-पट में स्नात-स्मित-शशि-मुख छिपाये,
जुगुनुओं के दीप अंचल में जलाये,
दामिनी - दुति - ज्योति - मुक्ताहार पहने,
इन्द्रधनुषी कंचुकी तन पर सजाये,
बूँद के घुंघरु बजाती पल निमिष में,
लोचनों में अश्रु-घन-सी कौन तुम हो!
प्रात की कंचन-किरन-सी कौन तुम हो!!

आ रहीं तुम श्वास लौटी आ रही है,
गा रहीं तुम भग्न संसृति गा रही है,
झुक गई है मृत्यु जीवन की शरण में,
चेतना बन देह बिखरी जा रही है,
नैश-तम को ज्योति का वरदान देती,
मरण में जीवन-वरण-सी कौन तुम हो!
प्रात की कंचन-किरन-सी कौन तुम हो!!

कौन हो तुम श्वास में सरगम बनी-सी,
गरल के घट में अमृत-मधु की कनी-सी,
नाश में निर्माण, सुख-श्रृंगार की श्री,
स्वप्न में सत की सरल छायातनी-सी,
चरण की गति, पंथ की यति, सृष्टि की कृति,
विश्व में कारण-करण-सी कौन तुम हो!!
प्रात की कंचन-किरन-सी कौन तुम हो!!

झर रहे शत शत हिमालय अग्नि-कण से,
स्वाति चातक पी रहे प्यासी तपन से,
एक दुर्बल मीन में संगीत सारा
बंध गया अमरत्व नश्वर एक क्षण से,
वेदना में मधुर स्वीकृति-सी किसी की
विरह के पथ पर मिलन-सी कौन तुम हो।
प्रात की कंचन-किरन-सी कौन तुम हो!!

प्राण से परिचित, नयन से चिर अपरिचित,
मुखरता में मीन चिर, चिर मौन मुखरित,
ध्यान में वन्दिनि, अवन्दिनि धारणा में,
शब्द में सीमित, स्वरों में चिर असीमित,
भृकुटि में लय-सृष्टि अधरों में अमृत-विष
अचित में चेतन-जतन-सी कौन तुम हो!
प्रात की कंचन-किरन-सी कौन तुम हो!!

20. एक बार यदि अपने मदिर

एक बार यदि अपने मदिर-मदिर अधरों से
छू लो मेरे तृषित अधर मदिरांगमयी तुम
सच कहता हूँ हँस-हँसकर मैँ
जग भर का
विष पी जाऊँगा ।

मैँ सोया था किसी कफ़न के नीचे थककर
तुमने मुझे जगा, मुझ में संगीत जगाया,
कोई चिता छिपाये बैठी थी मेरा तन
तुमने मुझे चुरा मिट्टी के हाथ बिकाया,
अब जागी यह प्यास मुझे पी जायेगी जो
यह न बुझी है यह न बुझेगी जीकर, मरकर
सौ-सौ बार अमृत बरसा पर यह अतृप्त है,
सौ-सौ बार गरल पीकर भी यह जागृत, पर…
एक बार यदि अपने अरुण-अरुण अधरों से
पी लो मेरी प्यासी प्यास अनंगमयी तुम
सच कहता हूँ कोटि-कोटि
वरदान तृप्ति
के ठुकराऊँगा ।

मुझको चारों ओर खड़ी है मौत समेटे
पल-पल पर है समय सांप-सा फन फैलाये,
शिर पर धरी हुई पचीस वर्षों की लाशें,
युगल-करों में नियति लोह-जंजीर पिन्हाये,
इस पर भी तो बन्द ज़ुबां करने को मेरी
लाखों ठेकेदार धरम के खड़े कमर कस,
अपने दु:ख में रोना दूर, न गा सकता हूँ
मैं कितना मज़बूर यहां कितना मैं बेबस !
एक बार पर अपनी नरम-नरम बांहों में
बांध मुझे लो क्षण-भर यदि निर्बन्धमयी तुम
सच कहता हूँ मैं अपनी क्या
युग की मुक्ति
बुला लाऊँगा ।

मैं दुनिया-भर में भूला भटका भरमाया
पर न मिला कोई जो दुर्बलता दुलराता,
शूल हंसाकर, फूल रुलाकर गये हज़ारों
किन्तु न कोई ऐसा जो दुख-दर्द बंटाता,
अमरों की आरती उतारी, करी अर्चना
गये दिवस पर एक बार भी लौट न आये,
जाकर बसा गगन की चन्द्र-घाटियों में भी
पर आंखों के अश्रु वहां भी सूख न पाये,
एक बार पर अपनी नमित-नमित पलकों में,
मेरे अश्रु सुला लो यदि आनन्दमयी तुम !
सच कहता हूँ मैं अमरों के
कर से अमृत
छिना लाऊँगा !

अपने दुख का गीत लिखा मैंने जब रोकर
सुखी जगत ने हंसकर खूब मज़ाक उड़ाया,
सुख का गीत रचा जब अपना दर्द दबाकर
निर्दय आलोचक ने कलम-कुठार चलाया,
सोच रहा अब एक गीत ऐसा गाना मैं,
जिसको सब जग, सब युग-काल रहें दुहराते,
इससे पकड़ा है जीवन का अंचल लेकिन
सब युग वाले शब्द नहीं मुझको मिल पाते,
एक बार पर सजल-सजल करुणा-कज्जल निज,
मेरी स्याही में घोलो शब्दांगमयी तुम !
सौ-सौ जीवन-गीत
मरण की छाती पर
मैं लिख आऊँगा।

21. भूखी धरती अब भूख मिटाने आती है

भूखी धरती अब भूख मिटाने आती है!

छुपते जाते हैँ सूरज, चांद-सितारे सब
मुरदा मिट्टी अम्बर पर चढ़ती जाती है
हो सावधान ! सँभलो ओ ताज-तख्तवालो !
भूखी धरती अब भूख मिटाने आती है।

कंकालों की जुड़ रही भीड़ चौराहे पर,
फिर से बनने चाला है कोई बज्रबान,
बिक रहे प्राण, बिक रहे शीश, बिक रही मौत
फिर से जगने को हैं सोये मरघट मसान,
हर ओर मची है होली खून-पसीने की,
हर ओर अंगारों की खेती लहराती है ।
हो सावधान ! सँभलो ओ ताज-तख्तवालो !
भूखी धरती अब भूख मिटाने आती है।

है कांप रहीं मन्दिर-मस्जिद की मीनारें
गीता-क़ुरान के अर्थ बदलते जाते हैँ
ढहते जाते हैं दुर्ग द्वार, मक़बरे-महल
तख्तों पर इस्पाती बादल मँडराते हैं,
अंगड़ाई लेकर जाग रहा इन्सान नया
ज़िन्दगी कब्र पर बैठी बीन बजाती है ।
हो सावधान ! सँभलो ओ ताज-तख्तवालो !
भूखी धरती अब भूख मिटाने आती है।

मासूम लहू की गंगा में आ रही बाढ़,
नादिरशाही सिंहासन डूबा जाता है,
गल रही बर्फ-सी डालर की काली कोठी,
एटम को भूखा पेट चबाये जाता है,
निकला है नभ पर नये सबेरे का सूरज
हर किरन नई दुलहिन-सी सेज सजाती है ।
हो सावधान ! सँभलो ओ ताज-तख्तवालो !
भूखी धरती अब भूख मिटाने आती है।

पड़ रहीं समय की भौंहों में सलबटें-शिकन,
विन्धाचल करवट शीघ्र बदलने वाला है,
उठने वाली है आग समुन्दर के दिल से
हिमवान किसी का खून उगलने वाला है,
हर एक हवा का रुख कुछ बदला-बदला है,
हर एक फ़िजां में गरमी-सी दिखलाती है ।
हो सावधान ! सँभलो ओ ताज-तख्तवालो !
भूखी धरती अब भूख मिटाने आती है।

तुम कफ़न चुराकर बैठ गए जा महलों में
देखो ! गांधी की अर्थी नंगी जाती है,
इस रामराज्य के सुघर रेशमी दामन में
देखो सीता की लाज उतारी जाती है,
उस ओर श्याम की राधा वह वृन्दावन में
आलिंगन-चुम्बन बेच पेट भर पाती है ।
हो सावधान ! सँभलो ओ ताज-तख्तवालो !
भूखी धरती अब भूख मिटाने आती है।

तुमने नवयुग के बिश्वासों, को बहकाया
भूखे के मुंह तक से तुम कौर छीन लाये,
ब्लैक-ट्रेड किया तुमने मां की चोली तक से
आज़ादी तक धर चोर-बाज़ारों में आये,
मानवता के क़ातिलो ! मगर यह याद रहे
क़ातिल की ही तलवार उसे खा जाती है ।
हो सावधान ! सँभलो ओ ताज-तख्तवालो !
भूखी धरती अब भूख मिटाने आती है।

22. सृष्टि हो जाये सुरभिमय इसलिए

सृष्टि हो जाये सुरभिमय इसलिए
कंटकों में फूल मुस्काता रहा।

जल रही थी हर दिशा अंगार बन,
आग में शिर से नहाई थी पवन,
खाक़-सी खामोश लेटी थी धरा,
अजगरों को छेड़ देता था गगन,
नाश में मधुमास लाने को मगर
कंटकों में फूल मुस्काता रहा।

आंधियाँ आयीं पहाड़ उछालतीं,
बदलियाँ छायीं समुद्र सँभालतीं,
चांद, सूरज, तारकों के शव उठा
बिजलियाँ टूटी चिताएँ बालतीं,
पर सभी ही आफ़तों पर मुस्करा-
कंटकों में फूल मुस्काता रहा।

सामने थी लाश उपवन की पड़ी,
बेकफ़न अर्थी भ्रमर की थी खड़ी,
थी धरी चट्टान जलती होठ पर,
गूँथती थी आंख लोहू की लड़ी,
फूंकने को प्राण लेकिन धूल में-
कंटकों में फूल मुस्काता रहा।

चांद को खोकर हंसा हैं कब गगन
सूर्य से बिछड़ी कहाँ थिरकी किरन !
तोड़ आकर्षण कभी एकाकिनी
है न चल सकती धरा भी एक क्षण,
पर अकेला, सब तरह बिछुड़ा हुआ-
कंटकों में फूल मुस्काता रहा।

हो धरा मुखरित, दिशा हर गा उठे,
सृष्टि में मधुमास फिर लहरा उठे,
हंस उठें सूनी सजल आंखें सभी
मर्त्य मिट्टी से अमृत शरमा उठे,
इसलिए पाकर घृणा भी विश्व से-
विश्व पर मैं प्यार बरसाता रहा।

सृष्टि हो जाये सुरभिमय इसलिए
कंटकों में फूल मुस्काता रहा।

23. "30 जनवरी-एक आदेश"

है तीस जनवरी आज, न स्याही मांग कलम,
क्या लिखना है तो आंसू कागज़ पर उतार
गाने का है गर चाव तोड़ दे यह वीणा
बन्दूक उठा, गोली निकाल कर भर मल्हार ।

ओ चित्रकार ! तस्वीर देवता की न खींच
जो मनुज मर गया है उसको दे रूप-रंग
यमुना तट पर सो रहा मसीहा जो अपना
उसको जीवित कर, भर उसमें यौवन उमंग ।

ओ शिल्पी ! मूर्ति न गढ़ युद्धों की, देख उधर
गोली खाकर ले रहा प्रेम आखिरी श्वास
लोहे के कपड़े पहने शान्ति बिलखती है
ढोते-ढोते बारूद थक गया है विकास ।

इतिहासकार ! यह पृष्ठ अंधेरे का न जोड़
आने वाली सदियाँ काली हो जाएंगी
ओ कवि ! इस नफ़रत को मत दे अपनी ज़ुबान
लाशें जो कुछ जी रहीं, न वे जी पायेंगी ।

वैज्ञानिक ! ऐटम बम फेंक, मत और बना-
है नागासाकी अब तक मुरदों का बज़ार
टैंकों के नीचे अब तक पड़ी तड़पती है
वह देख, कोरिया बीच एशिया की बहार ।

मत शंख बजा ओ मठ, मस्जिद आज़ान न दे !
कर रहा शहीदों का शहीद मरणाभिषेक
आहिस्ता बोल अरे, ओ मज़हब की किताब !
हो गया आज खामोश विश्व-भर का विवेक ।

सब उठो चलो उस राजघाट पर आज जहाँ
बुन रही कफ़न कल्पना, चिता रच रहे छन्द
हैं मूक जहां सौ-सौ कवियों के महाकाव्य
आनन्द स्वयं ही जहां हो रहा निरानन्द ।

पर ठहरो अपने रक्त-सने इन हाथों से
उनकी समाधि मत छुओ, न दो पूजापाधी
सिंहासन' छोड़ो अगर वन्दना करनी है
पथ पर जाओ मर रहे जहां लाखों गांधी ।

24. मन आज़ाद नहीं है

तन तो आज स्वतंत्र हमारा, लेकिन मन आज़ाद नहीं है।

सचमुच आज काट दी हमने
जंजीरें स्वदेश के तन की
बदल दिया इतिहास बदल दी
चाल समय की चाल पवन की
देख रहा है राम राज्य का
स्वप्न आज साकेत हमारा
खूनी कफन ओढ़ लेती है
लाश मगर दशरथ के प्रण की
मानव तो हो गया आज
आज़ाद दासता बंधन से पर
मज़हब के पोथों से ईश्वर का जीवन आज़ाद नहीं है।
तन तो आज स्वतंत्र हमारा, लेकिन मन आज़ाद नहीं है।

हम शोणित से सींच देश के
पतझर में बहार ले आए
खाद बना अपने तन की-
हमने नवयुग के फूल खिलाए

डाल डाल में हमने ही तो
अपनी बाहों का बल डाला
पात पात पर हमने ही तो
श्रम जल के मोती बिखराए

कैद कफस सय्यद सभी से
बुलबुल आज स्वतंत्र हमारी
ऋतुओं के बंधन से लेकिन अभी चमन आज़ाद नहीं है।
तन तो आज स्वतंत्र हमारा, लेकिन मन आज़ाद नहीं है।

यद्यपि कर निर्माण रहे हम
एक नयी नगरी तारों में
सीमित किन्तु हमारी पूजा
मन्दिर मस्जिद गुरूद्वारों में

यद्यपि कहते आज कि हम सब
एक हमारा एक देश है
गूंज रहा है किन्तु घृणा का
तार बीन की झंकारों में

गंगा ज़मज़म के पानी में
घुली मिली ज़िन्दगी़ हमारी
मासूमों के गरम लहू से पर दामन आज़ाद नहीं है।
तन तो आज स्वतंत्रत हमारा लेकिन मन आज़ाद नहीं है।

25. सत्य का निर्माण करती

सत्य का निर्माण करती स्वप्न की अन्तिम शरण ही ।

दीप अम्बर के बुझाकर विश्व में नित प्रात आता,
छीन कर जीवन धरा का घन गगन में मुस्कराता,
कर हजारों घर तिमिरमय एक जलता दीप सुख का
एक ढलता अश्रु तब जब ज्वाल में जल प्राण जाता,
सृष्टि का संहार करता सृष्टि का नूतन सृजन ही।
सत्य का निर्माण करती स्वप्न की अन्तिम शरण ही।।

यामिनी के अश्रु से धुलती कुसुम-कलि की सुघरता,
अश्रु बनकर ही सदा झरती नयन से प्रीति, कविता,
एक गिरता अश्रु जब बनकर समर्पण पूर्णता का-
मौन हाहाकार कर पाषाण पूजा का पिघलता,
निर्बलों का बल सदा है एक दुर्बल अश्रु-कण ही।
सत्य का निर्माण करती स्वप्न की अन्तिम शरण ही।।

घोर तम की ही दिशा से ज्योति पहली फूटती है,
दग्ध उर की जाग से ही धार जल की छूटती है,
चिर-निराशा से सदा होती उदय आशा सुनहली,
वासना में साधना की नीद सहसा टूटती है,
मुक्ति-पद निर्देश करता विश्व-बन्धन का चरण ही।
सत्य का निर्माण करती स्वप्न की अन्तिम शरण ही।।

26. प्राण की धड़कन

प्राण की धड़कन बनी जो प्राण की मरु-प्यास ही है।

प्यास ही वह है कि जिससे विश्व के मधु में मधुरता,
प्यास ही-जिससे निखरती प्राण-प्याले की सुघरता,
दग्ध उर की प्यास ही वह जो उपेक्षित हो जगत से,
है गरल को भी सदा ललकारती बनकर-अमरता,
मृत्यु को ललकारती जो क्रुद्ध दुख की साँस ही है।
प्राण की धड़कन बनी जो प्राण की मरु-प्यास ही है।

प्यार ही वह छाँह में सबके हृदय का ताप पलता,
वह शलभ जिसके प्रणय-बलिदान से युग-दीप जलता,
चिर-विवश कवि के सजल दो आँसुओं का हास ही वह
विश्व के दुख का विकल ज्वालामुखी जिसमें मचलता,
पर मचलती मुक्ति जिसको वह प्रणय-भुज-पाश ही है।
प्राण की धड़कन बनी जो प्राण की मरु-प्यास ही है।

एक सुख की साँस ही वह जो अमरता को लजाती,
अश्रु की ही बूँद है वह जो न मरु में सूख पाती,
एक अन्तिम आस ही वह जो प्रतिध्वनि बन चिता की
दे चुनौती नाश को नैराश्य की छाती हिलाती,
सत्य को जो दे चुनौती स्वप्न का विश्वास ही है।
प्राण की धड़कन बनी जो प्राण की मरु-प्यास ही है।

27. स्वप्न-तरी (Dream Boat)-अनुवाद

ज्योति शिखा-सी भृकुटि प्रदीपित तप्त कांचन सदृश शरीर,
स्वप्न-ज्वाल निर्मित नौका में आया था वह मेरे तीर ।
बोला-साथ चलोगे क्या तुम, अन्तराग्नि है क्या तैयार ?
नीरवता हो गई ध्वनित बन एक निगूढ़ मधुर झंकार ।

अन्तर की विश्रान्ति-गुहा में छिपा हुआ कुछ उठा सिहर,
जीवन का चिर वांछित सुख सब स्मृति-पटल पर गया बिखर ।
सोचा जब, आनन्द गया वह, त्याग सदा को अतिथि समान,
स्वप्न-तरी तिर गयी, हो गया स्वर्न पुरुष वह अन्तर्ध्यान ।

लोकान्तर के रिक्त शून्य में ही अब है उसका आवास,
प्रेम-शिखा बुझ गई मिटा अब पूर्व हास आनन्द विलास ।
अस्त हुआ सौभाग्य, रिक्तता ही है केवल पूर्ण विराम,
आती स्वप्न-तरी न, न आता वह हिरण्यमय देव अनाम ।

 
 
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