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Pradeep Kumar Singh

धरती देखती गगन की ओर-प्रदीप कुमार सिंह

धरती देखती गगन की ओर

धरती देखती गगन की ओर, कब गिरेंगी बूँदें चारों ओर।
कब बिखरेगी हरियाली, कब मदमस्त होकर नाचेगा मोर।
होगी शांति स्थापित कब और कब खत्म होगा ये शोर।
अपने आँसू स्वयं पोछती, माता देखती गगन की ओर।
जैसे चाँद को देखता है चकोर , धरती देखती गगन की ओर।

सब रिश्ते नाते तोड़ कर मानव चला जिस मोड़ पर,
उस पथ पर अँधियारा है घोर।
कब मिटा कर अँधेरे की थाती, फिर चमकेगा सूरज चहुँ ओर।
यही पूछती बेटों से, चुपचाप देखती मरण की ओर।
धरती देखती गगन की ओर। धरती देखती गगन की ओर।

लेकर मन में आशा के अंकुर, टूटे हुए सपनों की जोड़ती है डोर।
यही सोचती मन ही मन की ना जाने कब होगी ये भोर।
मानवीय दोहन से आहत, माता देखती दमन की ओर।
धरती देखती गगन की ओर। धरती देखती गगन की ओर।

सिमटती जा रही है माँ, मिटती जा रही है माँ,
कब मानव करेगा जननी पर गौर?
अपनी ही परछाई से डरती, धरती देखती गगन की ओर।
धरती देखती गगन की ओर। धरती देखती गगन की ओर।

(प्रदीप कुमार सिंह-इन्दौर)

 
 
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