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संत मीरा बाई
Sant Meera Bai
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Padavali Sant Meera Bai (Part-4)

पदावली संत मीरा बाई (भाग-४)

1. तनक हरि चितवौ जी मोरी ओर

तनक हरि चितवौ जी मोरी ओर।
हम चितवत तुम चितवत नाहीं
मन के बड़े कठोर।
मेरे आसा चितनि तुम्हरी
और न दूजी ठौर।
तुमसे हमकूँ एक हो जी
हम-सी लाख करोर।।
कब की ठाड़ी अरज करत हूँ
अरज करत भै भोर।
मीरा के प्रभु हरि अबिनासी
देस्यूँ प्राण अकोर।।

पाठांतर
तनक हरि चितवाँ म्हारी ओर ।।टेक।।
हम चितबाँ थें चितवो णा हरि, हिबड़ो बड़ो कठोर।
म्हारी आसा चितवनि यारी, ओर णा दूजा दोर।
ऊभ्याँ ठाड़ी अरज करूँ छूँ, करताँ करताँ भोर।
मीराँ रे प्रभु हरि अबिनासी, देस्यूँ प्राण अँकोर।।

(चितवाँ=देखो, थें=तुम, णा=नहीं, हिवड़ो=हृदय,
दोर=दौड़,स्थान, ऊभ्याँ ठाड़ी=आशा में खड़ी-खडी,
भोर=प्रातःकाल, अंकोर=न्यौछावर करना)

2. तुम आवो जी प्रीतम मेरे

तुम आवो जी प्रीतम मेरे, नित बिरहणी मारग हेरे ।।टेक।।
दुःख मेटण सुख दाइक तुम हों, किरपा करिल्यौ नेरे।
बहुत दिनाँ की जोऊँ मग, अब क्युं करो रे अबेरे।
आतर अधिक कहूँ कि जागै, आज्यौ मित सबेरे।
मीरा दासी चरण की, हम तेरे तुम मेरे।।

(मारग हेरे=पथ देखती है,प्रतीक्षा करती है,
सुख दाइक=सुख देने वाले, नेरे=निकट, जोऊँ=
देखती हूँ, अबेरे=देर, आतर=आतुर, व्याकुल,
मिंत=प्रियतम, सबेरे=शीघ्र)

3. तुम्हरे कारण सब छोड्या

तुम्हरे कारण सब छोड्या, अब मोहि क्यूं तरसावौ हौ।
बिरह-बिथा लागी उर अंतर, सो तुम आय बुझावौ हो॥
अब छोड़त नहिं बड़ै प्रभुजी, हंसकर तुरत बुलावौ हौ।
मीरा दासी जनम जनम की, अंग से अंग लगावौ हौ॥

पाठांतर
तुमर कारण सब सुख छाँड्यां, अब मोही क्यूं तरसावो हो।।टेक।।
बिरह बिथा लागी उर अन्तर, सो तुम आन बुझावो हो।
अब छोड़त नाहिं बणै प्रभु जी, हँसि करि तुरन्त बुलावौ हो।
मीराँ दासी जनम जनम की अँग से अँग लगावौ हो।।

(तुमर=तुम्हारे, उर अन्तर=हृदय में)

4. तुम कीं करो या हूं ज्यानी

तुम कीं करो या हूं ज्यानी॥टेक॥
ब्रिंद्राजी बनके कुंजगलीनमों। गोधनकी चरैया हूं ज्यानी॥१॥
मोर मुगुट पीतांबर सोभे। मुरलीकी बजैया हूं ज्यानी॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। दान दिन ले तब लै हुं ज्यानी॥३॥

5. तुम बिन मेरी कौन खबर ले

तुम बिन मेरी कौन खबर ले, गोवर्धन गिरिधारीरे॥टेक॥
मोर मुगुट पीतांबर सोभे। कुंडलकी छबी न्यारीरे॥१॥
भरी सभामों द्रौपदी ठारी। राखो लाज हमारी रे॥२॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। चरनकमल बलहारीरे॥३॥

6. तुम लाल नंद सदाके कपटी

तुम लाल नंद सदाके कपटी॥टेक॥
सबकी नैया पार उतर गयी। हमारी नैया भवर बिच अटकी॥१॥
नैया भीतर करत मस्करी। दे सय्यां अरदन पर पटकी॥२॥
ब्रिंदाबनके कुंजगलनमों सीरकी। घगरीया जतनसे पटकी॥३॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। राधे तूं या बन बन भटकी॥४॥

7. तुम सुणौ दयाल म्हारी अरजी

तुम सुणौ दयाल म्हारी अरजी॥
भवसागर में बही जात हौं, काढ़ो तो थारी मरजी।
इण संसार सगो नहिं कोई, सांचा सगा रघुबरजी॥
मात पिता औ कुटुम कबीलो सब मतलब के गरजी।
मीरा की प्रभु अरजी सुण लो चरण लगाओ थारी मरजी॥

8. तेरे सावरे मुख पर वारी

तेरे सावरे मुख पर वारी। वारी वारी बलिहारी॥टेक॥
मोर मुगुट पितांबर शोभे। कुंडलकी छबि न्यारी न्यारी॥१॥
ब्रिंदामन मों धेनु चरावे। मुरली बजावत प्यारी॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरण कमल चित्त वारी॥३॥

9. तेरो कोई नहिं रोकणहार, मगन होइ मीरा चली

तेरो कोई नहिं रोकणहार, मगन होइ मीरा चली।।
लाज सरम कुल की मरजादा, सिरसै दूर करी।
मान-अपमान दोऊ धर पटके, निकसी ग्यान गली।।
ऊँची अटरिया लाल किंवड़िया, निरगुण-सेज बिछी।
पंचरंगी झालर सुभ सोहै, फूलन फूल कली।
बाजूबंद कडूला सोहै, सिंदूर मांग भरी।
सुमिरण थाल हाथ में लीन्हों, सौभा अधिक खरी।।
सेज सुखमणा मीरा सौहै, सुभ है आज घरी।
तुम जाओ राणा घर अपणे, मेरी थांरी नांहि सरी।।

10. तेरो मरम न पायौ रे जोगी

तेरो मरम न पायौ रे जोगी।।टेक।।
आसण मांडि गुफा में बैठो, ध्यान हरि को लगायो।
गल बिच सेली हाथ हाजरियो, अंग भभूति रमायो।
मीराँ के प्रभु हरि अबिनासी, भाग लिख्यो सो ही पायो।।

(मरम=भेद, जोगी=योगी,श्रीकृष्ण, मांडि=मारकर,
सेली=योगियों की माला, हाजरियो=हाथ में रखने
का एक प्रकार का रूमाल, भभूति=भस्म, भाग=भाग्य)

11. तोती मैना राधे कृष्ण बोल

तोती मैना राधे कृष्ण बोल। तोती मैना राधे कृष्ण बोल॥टेक॥
येकही तोती धुंडत आई। लकट किया अनी मोल॥१॥
दाना खावे तोती पानी पीवे। पिंजरमें करत कल्लोळ॥२॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। हरिके चरण चित डोल॥३॥

12. तोरी सावरी सुरत नंदलालाजी

तोरी सावरी सुरत नंदलालाजी॥टेक॥
जमुनाके नीर तीर धेनु चरावत। कारी कामली वालाजी॥१॥
मोर मुगुट पितांबर शोभे। कुंडल झळकत लालाजी॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। भक्तनके प्रतिपालाजी॥३॥

13. तोसों लाग्यो नेह रे प्यारे, नागर नंद कुमार

तोसों लाग्यो नेह रे प्यारे, नागर नंद कुमार।
मुरली तेरी मन हर्यो, बिसर्यो घर-व्यौहार॥
जब तें सवननि धुनि परि, घर आँगण न सुहाइ।
पारधि ज्यूँ चूकै नहीं, मृगी बेधी दइ आइ॥
पानी पीर न जानई ज्यों मीन तड़फि मरि जाइ।
रसिक मधुप के मरम को नहिं समुझत कमल सुभाइ॥
दीपक को जो दया नहिं, उड़ि-उड़ि मरत पतंग।
'मीरा' प्रभु गिरिधर मिले, जैसे पाणी मिलि गयो रंग॥

14. थारी छब प्यारी लागै राज

थारी छब प्यारी लागै राज, राघावर महाराज।
रतन जटित सिर पेच कलगी, केसरिया सहब साज।
मोर मुकुट मकराकृत कुण्डल, रसिकारां सिरताज।
मीरां के प्रभु गिरधरनागर, म्हारे मिल गया ब्रजराज।।

(थारी=तुम्हारी, छब=छबि, शोभा, जटित=जड़ा हुआ,
मकराकृत=मकर की आकृति के, रसिकारां=रसिकों के,
सिरताज=स्वामी)

15. थारो रूप देख्याँ अटकी

थारो रूप देख्याँ अटकी।।टेक।।
कुल कुटम्ब सजण सकलस बार बार हटकी।
बिसर्यां णा लगण लगां मोर मुगट नटकी।
म्हाँरो मण मगण स्याम लोक कह्याँ भटकी।
मीराँ प्रभु सरण गह्याँ जाण्या घट घट की।।

(थारो=तुम्हारो, देख्यां=देखकर, अटकी=अटक गई,
फँस गई, सजण=लोग, हटकी=बाधाएँ डालीं,
लगण=लग्न,प्रेम, मगण=प्रसन्न, जाण्या=ज्ञाता,
घट-घट की=प्रत्येक मनुष्य के मन की)

16. थारो विरुद्ध घेटे कैसी भाईरे

थारो विरुद्ध घेटे कैसी भाईरे॥टेक॥
सैना नायको साची मीठी। आप भये हर नाईरे॥१॥
नामा शिंपी देवल फेरो। मृतीकी गाय जिवाईरे॥२॥
राणाने भेजा बिखको प्यालो। पीबे मिराबाईरे॥३॥

17. थाँणो काँई काँई बोल सुणावा

थाँणो काँई काँई बोल सुणावा म्हाँरा साँवरां गिरधारी।।टेक।।
पूरब जणम री प्रीत पुराणी, जावा णा गिरधारी।
सुन्दर बदन जोवताँ साजण, थारी छबि बलहारी।
म्हाँरे आँगण स्याम पधारो, मंगल गावाँ नारी।
मोती चौक पुरावाँ ऐणाँ, तण म डारां बारी।
चरण सरण री दासी मीरां, जणम जणम री क्वाँरी।।

(थाँणो=थाँएँ,तुझे, काँई-काँई=क्या-क्या,
जोवताँ=देखती ही)

18. थें जीम्या गिरधरलाल

थें जीम्या गिरधरलाल।
मीरां दासी अरज कर्यां छे, म्हारो लाल दयाल।
छप्पण भोग छतीशां बिंजण, पावां जन प्रतिपाल।
राजभोग आरोग्यां गिरधर, सम्मुख राखां थाल।
मीरां दासी सरणां ज्याशीं, कीज्याँ बेग निहाल।।

(जीम्या=जीमना,भोजन करना, लाल=प्रियतम,
दयाल=दयालु, बिंजण=व्यंजन, आरोग्याँ=ग्रहण
कर लिया, निहाल=प्रसन्न)

19. थें तो पलक उघाड़ो दीनानाथ

थें तो पलक उघाड़ो दीनानाथ,
मैं हाजिर नाजिर कबकी खड़ी।।टेक।।
साजनियाँ दुसमण होय बैठ्या सबने लगूँ कड़ी।
तुम बिन साजन कोई नहीं है डिगी नाग समंद अड़ी।
दिन नहिं चैण रैण नहिं, निदरा, सूखूँ खड़ी-खड़ी।
बाण बिरह का लाग्या हिये में, भूलूँ न एक घड़ी।
पत्थर की तो अहिल्या तारी, बन के बीच पड़ी।
कहा बोझ मीराँ में कहिये, सौ पर एक धड़ी।।

(पलक उघाड़ो=आँखे खोलो, मेरी ओर देखो,
हाजिर नाजिर =आँखों से सामने,आज्ञा-पालन
के लिए प्रस्तुत, साजनियाँ=सगे-सम्बन्धी,
कड़ी=कड़वी,बुरी, सौ पर एक धड़ी=सौ मन
की तुलना में एक पंसेरी के समान)

20. थें बिण म्हारे कोण खबर ले

थें बिण म्हारे कोण खबर ले, गोबरधन गिरधारी।
मोर मुकुट पीतांबर शोभाँ, कुंडल री छव न्यारी।
भरी सभाँ मा द्रुपद सुताँरी, राख्या लाज मुरारी।
मीराँ रे प्रभु गिरधरनागर, चरण केवल बलिहारी।।

(थें बिण=तुम्हारे बिना, पीताम्बर=पीले वस्त्र)

21. थें मत बरजां माइड़ी

थें मत बरजां माइड़ी, साधां दरसण जावां।
स्याम रूप हिरदां बसां, म्हारे, ओर न भावां।
सब सोवां सुख नींदड़ी म्हारे नैण जगावां।
ग्याण नसां जग बाबरा ज्याकुं स्याम णा भावां।
मा हिरदां बस्या सांबरो म्हारे णींद न आवां।
चौमास्यां री बावड़ी, ज्यां कूं नीर णा पीवां।
हरि निर्झर अमृत झर्या म्हारी प्यास बुझावां।
रूप सुरंगा सांवरो, मुख निरखण जावां।
मीरां व्याकुल विरहणी, अपनी कर ल्यावां।।

(भांवा=अच्छा लगना, चौमास्याँ=वर्षा ऋतु,
बावड़ी=सीखर, निर्झर=झरना, निरखण=देखने
के लिए)

22. थें म्हाँरे घरआवो जी प्रीतम प्यारा

थें म्हाँरे घरआवो जी प्रीतम प्यारा ।।टेक।।
चुन चुन कलियाँ मैं सेज बनाऊ, भोजन करूं मैं सारा।
तुम सगुणाँ में अवगुणधारी, तुम छो बगसणहारा।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, तुम बिनि नैण दुखियारा।।

(थें=तुम, करूँ=तैयार करूं, सगुणां=गुणवान्‌,
अवगुणधारी=दोषों से भरपूर, बगसणहार=क्षमा करने वाला)

23. दरस बिन दूखण लागे नैन

दरस बिन दूखण लागे नैन।
जबसे तुम बिछुड़े प्रभु मोरे, कबहुं न पायो चैन।
सबद सुणत मेरी छतियां, कांपै मीठे लागै बैन।
बिरह व्यथा कांसू कहूं सजनी, बह गई करवत ऐन।
कल न परत पल हरि मग जोवत, भई छमासी रैन।
मीरा के प्रभु कब रे मिलोगे, दुख मेटण सुख दैन।

पाठांतर
दरस बिन दूखण लागे नैन ।।टेक।।
जब के तुम बिछुरे प्रभु जी, कबहूँ न पायो चैन।
सबद सुणत मेरी छतियाँ काँपे, मीठे मीठै बैन।
बिरह-बिथा काँसू कहूँ सजनी, बह गई करवत थैन।
कल न परत पल हरि मग जोवत, भई छमासी रैण।
मीरां के प्रभु कब रैं मिलोगे, दुख मेटण सुख दैण।।

(सबद=शब्द,आहट, बिरह-बिथा=विरह-व्यथा,
जोवत=देखते देखते, छमासी=छः महीने की,
बहुत लम्बी, मेटण=मिटाने वाले, दैण=देने वाले)

पाठांतर
दरस बिण दूखाँ म्हारा णैण।।टेक।।
सबदाँ सुणतां मेरी छतियाँ काँपाँ मीठों थारो बैण।
बिरह बिथा काँसूँ री कह्यां पेटाँ करवता ऐण।
कल णआ परतां पल हरि मग जोवाँ भयाँ छमासी रैण।
थें बिछड़्याँ म्हाँ कलपाँ प्रभुजी, म्हारो गयो सब चैण।
मीराँ रे प्रभु कब रे मिलोगे, दुख मेटण सुक दैण।।

(सबदाँ=शब्दों को, सुणताँ=सुनते ही,याद करते ही,
बैण=वचन,वाणी, पेटाँ करवत=आरी चल गई, ऐण=
पूरी-पूरी, छमाही=छःमाही की,बहुत लम्बी)

24. दरस म्हारे बेगि दीज्यो जी

दरस म्हारे बेगि दीज्यो जी
ओ जी अन्तरजामी ओ राम खबर म्हारी बेगि लीज्यो जी
आप बिन मोहे कल ना पडत है जी
ओजी तडपत हूं दिन रैन रैन में नीर ढले है जी
गुण तो प्रभुजी मों में एक नहीं छै जी
ओ जी अवगुण भरे हैं अनेक अवगुण म्हारां माफ करीज्यो जी
भगत बछल प्रभु बिड़द कहाये जी
ओ जी भगतन के प्रतिपाल सहाय आज म्हांरी बेगि करीज्यो जी
दासी मीरा की विनती छै जी
ओजी आदि अन्त की ओ लाज आज म्हारी राख लीज्यो जी

25. दीजो हो चुनरिया हमारी

दीजो हो चुनरिया हमारी। किसनजी मैं कन्या कुंवारी॥टेक॥
गौलन सब मिल पानिया भरन जाती। वहंको करत बलजोरी॥१॥
परनारीका पल्लव पकडे। क्या करे मनवा बिचारी॥२॥
ब्रिंद्रावनके कुंजबनमों। मारे रंगकी पिचकारी॥३॥
जाके कहती यशवदा मैया। होगी फजीती तुम्हारी॥४॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। भक्तनके है लहरी॥५॥

26. दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी

दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी
कैसे मैं तेरी गोकुल नगरी
दूर नगरी बड़ी दूर नगरी
रात को कान्हा डर माही लागे,
दिन को तो देखे सारी नगरी।
सखी संग कान्हा शर्म मोहे लागे,
अकेली तो भूल जाऊँ तेरी डगरी।
धीरे-धीरे चलूँ तो कमर मोरी लचके
झटपट चलूँ तो छलकाए गगरी।
मीरा कहे प्रभु गिरधर नागर,
तुमरे दरस बिन मैं तो हो गई बावरी।

27. देखत राम हंसे सुदामाकूं देखत राम हंसे

देखत राम हंसे सुदामा कूं देखत राम हंसे॥

फाटी तो फूलडियां पांव उभाणे चरण घसे।
बालपणेका मिंत सुदामां अब क्यूं दूर बसे॥

कहा भावजने भेंट पठाई तांदुल तीन पसे।
कित गई प्रभु मोरी टूटी टपरिया हीरा मोती लाल कसे॥

कित गई प्रभु मोरी गउअन बछिया द्वारा बिच हसती फसे।
मीराके प्रभु हरि अबिनासी सरणे तोरे बसे॥

पाठांतर
देखत राम हँसे सुदामाँ कूँ, देखत राम हँसे।।टेक।।
फाटयी तो फूलड़ियाँ पाँव उभाणे, चलतै चरण घसे।
बाँलपणे का मिंत सुदामा, अब क्यूँ दूर बसे।
कहाँ भावजने भेट पठाई, तान्दुल तीन पसे।
कित गई प्रभु मोरी टूट टपरिया, हीरा, मोतीलाल कसे।
कित गी प्रभु मोरी गउवन बछिया द्वारा बिच हँसती फसे।
मीराँ के प्रभु हरि अबिनासी, सरणे तोरे बसे।।

(सुदामाँ=एक दरिद्र ब्राह्मण का नाम जो कृष्ण
सहपाठी था, फाटी=फटी हुई, फूलड़ियाँ=जूतियाँ,
उभाणे=नंगे, घसे=घिसता था, बाँलपणे का=
बाल्यावस्था का, मिंत=मित्र, तान्दुल=तन्दुल,
चावण, पसे=मुट्ठी)

28. देखाँ माई हरि, मण काठ कियाँ

देखाँ माई हरि, मण काठ कियाँ ।।टेक।।
आवण कह गयाँ अजाँ ण आया, कर म्हाणे कोल गयाँ।
खान पान सुध बुध सब बिसरयाँ, काइ म्हारो प्राण जियाँ।
यारो कोल विरूद्ध जग यारो, थे काँई बिसर गयां।
मीरां रे प्रभु गिरधरनागर, थें बिण फटा हियां।।

(काठ=कठिन, कोल=वचन,वायदा, फटा हियाँ=हृदय
फटना,बहुत अधिक दुख देना)

29. देखोरे देखो जसवदा मैय्या तेरा लालना

देखोरे देखो जसवदा मैय्या तेरा लालना, तेरा लालना मैय्यां झुले पालना॥टेक॥
बाहार देखे तो बारारे बरसकु। भितर देखे मैय्यां झुले पालना॥१॥
जमुना जल राधा भरनेकू निकली। परकर जोबन मैय्यां तेरा लालना॥२॥
मीराके प्रभु गिरिधर नागर। हरिका भजन नीत करना॥३॥

30. धूतारा जोगी एकरसूँ हँसि बोल

धूतारा जोगी एकरसूँ हँसि बोल।।टेक।।
जगत बदीत करी मनमोहन, कहा बजावत ढोल।
अंग भभूति गले मृगछाला, तू जन गुढ़िया खोल।
सदन सरोज बदन की सोभा, ऊभी जोऊँ कपोल।
सेली नाद बभूत न बटवो, अजूँ मुनी मुख खोल।
चढ़ती बैस नैण अणियाले, तूं धरि धरि मत डोल।
मीराँ के प्रभु हरि अविनासी, चेरी भई बिन मोल।।

(धूतारा=छली, एकरसूँ,एकासूँ=एक बार ही,
बदीत=विदित। गुढ़िया खोल=रहस्य को खोल दे,
सदन=सद्य,नवीन, सरोज=कमल, बदन=मुख,
ऊभी=खड़ी, जोऊँ=देखती हूँ, सेली=योगियों के
पहनने की एक माला या चादर, नाद=योगियों
के बजाने का एक बाजा, बभूत=भस्म, बटवो=
योगियों की एक थैली, अजूँ=अब भी, मुनी=मौनी,
बैस,वैस=अवस्था, अणियाले=अनियारे,तीक्ष्ण,
चेरी=दासी)

31. नन्द को बिहारी म्हाँरे हियड़े बस्यो छै

नन्द को बिहारी म्हाँरे हियड़े बस्यो छै ।।टेक।।
कटि पर लाल काछनी छाले, हीरा मोती-वालो मुकुट धर्यो छै।
गहिर ल्यो डाल कदम्ब की ठाढी, मोहत मो, तन हेरि हँस्यो छै।
मीराँ कै प्रभु गिरधरनागर,निरखि दृगन में नीर भर्यो छै।।

(नन्द को बिहारी=श्रीकृष्ण, हियड़े=हृदय में, बस्यौ छै=
बसा हुआ है, कटि=कमर पर, काछे=बांधे हुए, धर्यो छै=
धारण किये हुये है, हेरि=देखकर, निरखि=देखकर,
दृगन में=आंखो में)

32. नंदननंदन मण भायां णभ छायां

नंदननंदन मण भायां णभ छायां।।टेक।।
इत घन गरजां उत घन लरजां, चमकां बिज्जु डरायां।
उमड़ घुमड घण छायां, पवण चल्यां पुरवायां।
दादुर मोर पपीहा बोलां, कोयल सबद सुणायां।
मीरां रे प्रभु गिरधरनागर, चरण केवल चितलायां।।

(नंदनंदन=श्रीकृष्ण, मण=मन, णभ=नभ,आकाश,
बिज्जु=विद्युत,बिजली, पवण=पहन,हवा, दादुर=मेंढक)

33. नटवर नागर नन्दा, भजो रे मन गोविन्दा

नटवर नागर नन्दा, भजो रे मन गोविन्दा,
श्याम सुन्दर मुख चन्दा, भजो रे मन गोविन्दा।
तू ही नटवर, तू ही नागर, तू ही बाल मुकुन्दा ,
सब देवन में कृष्ण बड़े हैं, ज्यूं तारा बिच चंदा।
सब सखियन में राधा जी बड़ी हैं, ज्यूं नदियन बिच गंगा,
ध्रुव तारे, प्रहलाद उबारे, नरसिंह रूप धरता।
कालीदह में नाग ज्यों नाथो, फण-फण निरत करता ;
वृन्दावन में रास रचायो, नाचत बाल मुकुन्दा।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, काटो जम का फंदा।।

34. नहिं एसो जनम बारंबार

नहिं एसो जनम बारंबार॥
का जानूं कछु पुन्य प्रगटे मानुसा-अवतार।
बढ़त छिन-छिन घटत पल-पल जात न लागे बार॥
बिरछ के ज्यूं पात टूटे, लगें नहीं पुनि डार।
भौसागर अति जोर कहिये अनंत ऊंड़ी धार॥
रामनाम का बांध बेड़ा उतर परले पार।
ज्ञान चोसर मंडा चोहटे सुरत पासा सार॥
साधु संत महंत ग्यानी करत चलत पुकार।
दासि मीरा लाल गिरधर जीवणा दिन च्यार॥

35. नहिं भावै थांरो देसड़लो जी रंगरूड़ो

नहिं भावै थांरो देसड़लो जी रंगरूड़ो॥
थांरा देसा में राणा साध नहीं छै, लोग बसे सब कूड़ो।
गहणा गांठी राणा हम सब त्यागा, त्याग्यो कररो चूड़ो॥
काजल टीकी हम सब त्याग्या, त्याग्यो है बांधन जूड़ो।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर बर पायो छै रूड़ो॥

पाठांतर
नहिं भावै थाँरो देसलडो रँगरूडो।।टेक।।
थाँरे देसाँ में राणा साध नहीं छै, लोग बसै सब कूड़ो।
गहना गाँठी राणा हम सब त्यागा, त्याग्यो कररो चूड़ो।
काजल टीकी हम सब त्यागां, त्याग्यो छै बांधन जूड़ो।
मीरां के प्रभु गिरधरनागर, बर पायो छै पूरो।।

(नहिं भावै=अच्छा नहीं लगता है, देसलड़ो=देश,
रंगरूडो=विचित्र, साध=साधु, छै=है, कूड़ो=बेकार के,
दुर्जन, गांठी=कपड़ा,वस्त्र, कररो=हाथ का)

36. नही जाऊंरे जमुना पाणीडा

नही जाऊंरे जमुना पाणीडा, मार्गमां नंदलाल मळे॥टेक॥
नंदजीनो बालो आन न माने। कामण गारो जोई चितडूं चळे॥१॥
अमे आहिउडां सघळीं सुवाळां। कठण कठण कानुडो मळ्यो॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। गोपीने कानुडो लाग्यो नळ्यो॥३॥

37. नही तोरी बलजोरी राधे

नही तोरी बलजोरी राधे॥टेक॥
जमुनाके नीर तीर धेनु चरावे। छीन लीई बांसरी॥१॥
सब गोपन हस खेलत बैठे। तुम कहत करी चोरी॥२॥
हम नही अब तुमारे घरनकू। तुम बहुत लबारीरे॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरणकमल बलिहारीरे॥४॥

38. नागर नंदकुमार, लाग्यो थारो नेह

नागर नंदकुमार, लाग्यो थारो नेह।।टेक।।
मुरली धुण सुण बीसराँ म्हारो, कुणवो गेह।
पाणी पीर णा जाणई, मीण तलफि तज्यां देह।
दीपक जाण्या पीर णा पतंग जल्या जल खेह।
मीराँ रे प्रभु सांवरे रेष थें बिण देह अदेह।।

(नागर=चतुर,रसिक, नेह=स्नेह,प्रेम, धुण=
ध्वनि, बीसराँ=छुट गया, कुणवो,कुणबां=कुल,
खानदान, गेह=घर, मीण=मीन मछली, तलफि=
तड़फकर, खेह=धूल,राख, अदेह=बिना देह)

39. नातो नामको जी म्हांसूं तनक न तोड्यो जाय

नातो नामको जी म्हांसूं तनक न तोड्यो जाय॥
पानां ज्यूं पीली पड़ी रे, लोग कहैं पिंड रोग।
छाने लांघण म्हैं किया रे, राम मिलण के जोग॥
बाबल बैद बुलाइया रे, पकड़ दिखाई म्हांरी बांह।
मूरख बैद मरम नहिं जाणे, कसक कलेजे मांह॥
जा बैदां, घर आपणे रे, म्हांरो नांव न लेय।
मैं तो दाझी बिरहकी रे, तू काहेकूं दारू देय॥
मांस गल गल छीजिया रे, करक रह्या गल आहि।
आंगलिया री मूदड़ी (म्हारे) आवण लागी बांहि॥
रह रह पापी पपीहडा रे,पिवको नाम न लेय।
जै कोई बिरहण साम्हले तो, पिव कारण जिव देय॥
खिण मंदिर खिण आंगणे रे, खिण खिण ठाड़ी होय।
घायल ज्यूं घूमूं खड़ी, म्हारी बिथा न बूझै कोय॥
काढ़ कलेजो मैं धरू रे, कागा तू ले जाय।
ज्यां देसां म्हारो पिव बसै रे, वे देखै तू खाय॥
म्हांरे नातो नांवको रे, और न नातो कोय।
मीरा ब्याकुल बिरहणी रे, (हरि) दरसण दीजो मोय॥

40. नाथ तुम जानतहो सब घटकी

नाथ तुम जानतहो सब घटकी, मीरा भक्ति करे प्रगटकी॥टेक॥
ध्यान धरी प्रभु मीरा संभारे पूजा करे अट पटकी।
शालिग्रामकूं चंदन चढत है भाल तिलक बिच बिंदकी॥१॥
राम मंदिरमें नाचे ताल बजावे चपटी।
पाऊमें नेपुर रुमझुम बाजे। लाज संभार गुंगटकी॥२॥
झेर कटोरा राणाजिये भेज्या संत संगत मीरा अटकी।
ले चरणामृत मिराये पिधुं होगइे अमृत बटकी॥३॥
सुरत डोरी पर मीरा नाचे शिरपें घडा उपर मटकी।
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर सुरति लगी जै श्रीनटकी॥४॥

41. नामोकी बलहारी गजगणिका तारी

नामोकी बलहारी गजगणिका तारी॥टेक॥
गणिका तारी अजामेळ उद्धरी। तारी गौतमकी नारी॥१॥
झुटे बेर भिल्लणीके खावे। कुबजा नार उद्धारी॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरणकमल बलिहारी॥३॥

42. नाव किनारे लगाव प्रभुजी

नाव किनारे लगाव प्रभुजी नाव किनारे लगाव॥टेक॥
नदीया घहेरी नाव पुरानी। डुबत जहाज तराव॥१॥
ग्यान ध्यानकी सांगड बांधी। दवरे दवरे आव॥२॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। पकरो उनके पाव॥३॥

43. नींद न आवे बिरह सतावे

नींद न आवे बिरह सतावे, प्रेम की आँच ढुलावै।।टेक।।
बिन पिया जोत मँदिर अँधियारो, दीपक दाय न आवै।
पिया बिन मेरी सेज अलूनी, जागत रैण बिहावै।
पिया कब रे घर आवै।
दादुर मोर पपीहा बोलै, कोयल सबद सुणावै।
घुँमट घटा ऊलर होई आई, दामिन दमक डरावै।
नैन झर लावै।
कहा करूँ कित जाऊं मोरी सजनी, बैदन कूण बुतावै।
बिरह नागण मोरी काय डसी है, लहर लहर जिव जावै।
जड़ी घस लावै।
कोहै सखी सहेली सजनी, पिया कूँ आन मिलावै।
मीराँ कूं प्रभु कब रे मिलोगे, मन मोहन मोहि भावै।
कब हँस कर बतलावै।।

(आँच=आग, ढुलावै=इधर-उधर डुलाती फिरती है,
बेचैन किये रहती है, जोत=ज्योति प्रकाश, मंदिर=घर,
दाय=पसन्द, अलूनी=फीकी, ऊलर होई आई=झुक आई,
बैदन=वेदना को, बुतावै=शांत करे, जड़ी=औषधि)

44. नींद नहीं आवे जी सारी रात

नींद नहीं आवे जी सारी रात ।।टेक।।
करवट लेकर रोज टटोलूँ, पिया नहीं मेरे साथ।
सगरी रैन मोहै तरफत बीती, सोच सोच जिय जात।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर आज भयो परभात।।

(सगरी=सारी, तरफत=तड़पते हुए, जिय जात=
प्राण निकल जाते है, परभात=प्रभात)

45. नींदड़ी आवाँ णा साराँ रात

नींदड़ी आवाँ णा साराँ रात, कुण विधि होय परभात।।टेक।।
चमक उठाँ सुपनाँ लख सजणी, सुध णा भूल्याँ जात।
तलफाँ तलफाँ जियराँ जायाँ कब मिलियाँ दीनानाथ।
भवाँ बावरा सुध बुध भूलाँ, पीव जान्या म्हारी बात।
मीराँ पीडा सोइ जाणै, मरण जीवण जिण हाथ।।

(नींदडी=नींद, कुण विधि=किस प्रकार से, चमक
उठी=चौंक उठी, तलफाँ-तलफाँ=तड़प-तड़पकर, पीडा=
पीड़ा,वेदना)

46. नैना निपट बंकट छबि अटके

नैना निपट बंकट छबि अटके।
देखत रूप मदनमोहन को, पियत पियूख न मटके।
बारिज भवाँ अलक टेढी मनौ, अति सुगंध रस अटके॥
टेढी कटि, टेढी कर मुरली, टेढी पाग लट लटके।
'मीरा प्रभु के रूप लुभानी, गिरिधर नागर नट के॥

पाठांतर
म्हारे णेणा निपट बंकट छब अँटके।।टेक।।
देख्‌आंय रूप मदन मोहन री, पियत पियूख न मटके।
बारिज भवाँ अलक मँतवारी, णैण रूप रस अँटके।
टेढ्याँ कट टेढ़े करि मुरली, टेढ्याँ पाग लर लटके।
मीराँ प्रभु रे रूप लुभाणी, गिरधरनागर नट के।।

(निपट=नितान्त,पूर्ण रूप से, बँकट=वक्र,टेढ़े,
छब=छबि,शोभा, पियूख=पीयूष,अमृत, न मटके=
चलायमान नहीं हुए, बारिज=कमल, करि=हाथ,
लर=मोतियों लड़,लड़ी)

47. नैना लोभी रे बहुरि सके नहिं आय

नैना लोभी रे बहुरि सके नहिं आय ।।टेक।।
रोम रोम नख सिख सब निरखत, ललकि रहै ललचाय।
मैं ठाढी गृह आपणे सै, मोहन निकसे आय।।
बदन चन्द परकातत हेली, मन्द मनद मुसकाय।
लोग कुटुम्बी बरजि बरजहीं, मानस पर हाथ गये बिकाय।
भली कहो कोई बुरी कहो, मैं सब लई सीस चढ़ाय।
मीराँ प्रभु गिरधर लाल बिनु, पल भर रह्यौ न जाय।।

(बहुरि=फिर, हेली=सखी, सब लई सीस चढ़ाय=
शिरोधार्य कर लिया,स्वीकार कर लिया)

पदावली संत मीरा बाई (भाग-५)
पदावली संत मीरा बाई (भाग-३)
 
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