Hindi Kavita
संत मीरा बाई
Sant Meera Bai
 Hindi Kavita 

Padavali Sant Meera Bai (Part-1)

पदावली संत मीरा बाई (भाग-१)

1. अखयाँ तरसा दरसण प्यासी

अखयाँ तरसा दरसण प्यासी।।टेक।।
मग जोवाँ दिण बीताँ सजणी, णैण पड्या दुखरासी।
डारा बेठ्या कोयल बोल्या, बोल सुण्या री गासी।
कड़वा बोल लोक जग बोल्या करस्याँ म्हारी हांसी।
मीरां हरि रे हाथ दिकाणी जणम जणम री दासी।।

(तरसा=तरस रही है, दुखरासी=दुःखों का ढेर,
अत्यधिक दुःख, डारा=डाली, गासी=दुःख से भरा हुआ)

2. अच्छे मीठे फल चाख चाख

अच्छे मीठे फल चाख चाख, बेर लाई भीलणी।
ऐसी कहा अचारवती, रूप नहीं एक रती।
नीचे कुल ओछी जात, अति ही कुचीलणी।
जूठे फल लीन्हे राम, प्रेम की प्रतीत त्राण।
उँच नीच जाने नहीं, रस की रसीलणी।
ऐसी कहा वेद पढी, छिन में विमाण चढी।
हरि जू सू बाँध्यो हेत, बैकुण्ठ में झूलणी।
दास मीरा तरै सोई, ऐसी प्रीति करै जोइ।
पतित पावन प्रभु, गोकुल अहीरणी।

(अचारवती=अचार-विचार से रहने वाली, एक
रती = रत्ती भर भी, कुचीलणी=मैले-कुचैले
वस्त्रों वाली, प्रतीति=विश्वास, रस की रसीलणी=
भक्ति-प्रेम-रस की रसिकता, छिन में विमाण चढ़ी=
मोक्ष पा गई,स्वर्ग चली गई, हेत=प्यार,प्रेम, गोकुल
अहीरणी=गोकुल की ग्वालिन;पूर्व जन्म की गोपी)

3. अजब सलुनी प्यारी मृगया नैनों

अजब सलुनी प्यारी मृगया नैनों। तें मोहन वश कीधोरे॥टेक॥
गोकुळमां सौ बात करेरे बाला कां न कुबजे वश लीधोरे॥१॥
मनको सो करी ते लाल अंबाडी अंकुशे वश कीधोरे॥२॥
लवींग सोपारी ने पानना बीदला राधांसु रारुयो कीनोरे॥३॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर चरणकमल चित्त दीनोरे॥४॥

(सलुनी=सुंदर, मृगया नैनों=हिरण जैसी आंखों वाली, कीधो=
कर लिया, लवींग=लौंग)

4. अपणे करम को वै छै दोस

अपणे करम को वै छै दोस, काकूं दीजै रे ऊधो अपणे।।टेक।।
सुणियो मेरी बगड़ पड़ोसण, गेले चलत लागी चोट।
पहली ज्ञान मानहिं कीन्ही, मैं मत ताकी बाँधी पोट।
मैं जाण्यूँ हरि अबिनासी, परी निवारोनी सोच।।

(छै=है, बगड़ पडोसन=पडोसी स्त्री, गेले=रास्ते में,
पोच=बुरा, निवारोनी=निवारण करो, सोच=चिंता)

5. अपनी गरज हो मिटी सावरे

अपनी गरज हो मिटी सावरे हाम देखी तुमरी प्रीत॥टेक॥
आपन जाय दुवारका छाय ऐसे बेहद भये हो नचिंत॥१॥
ठार सलेव करित हो कुलभवर कीसि रीत॥२॥
बीन दरसन कलना परत हे आपनी कीसि प्रीत।
मीराके प्रभु गिरिधर नागर प्रभुचरन न परचित॥३॥

6. अब कोऊ कछु कहो दिल लागा रे

अब कोऊ कछु कहो दिल लागा रे।।टेक।।
जाकी प्रीति लगी लालन से, कँचन मिला सुहागा रे।
हँसा की प्रकृति हँसा जाने, का जाने मर कागा रे।
तन भी लागा, मन भी लागा, ज्यूँ बाभण गल धागा रे।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, भाग हमारा जागा रे।।

(लालन=कृष्ण, कंचन=सोना, हँसा=हँस, प्रकृति=
स्वभाव मर=बेचारा, कागा=कौवा, बाभण=ब्राह्मण,
धागा=यज्ञोपवीत,जनेऊ, भाग=भाग्य)

7. अब तो निभायाँ सरेगी

अब तो निभायाँ सरेगी, बांह गहेकी लाज।।टेक।।
समरथ सरण तुम्हारी सइयां, सरब सुधारण काज॥
भवसागर संसार अपरबल, जामें तुम हो झयाज।
निरधारां आधार जगत गुरु तुम बिन होय अकाज॥
जुग जुग भीर हरी भगतन की, दीनी मोच्छ समाज।
मीरां सरण गही चरणन की, लाज रखो महाराज॥

पाठांतर
अबतो निभायाँ, बांह गह्याँरी लाज।।टेक।।
असरण सरण कह्याँ गिरधारी, पतित उधारत पाज।
भोसागर मझधार अधाराँ थें बिण घणो अकाज।
जुग जुग भीर हराँ भगतारीं, दीश्याँ मोच्छ नेवाज।
मीराँ सरण यहाँ चरणांरी, लाल रखाँ महाराज।।

(निभायाँ=निभा दीजिये। बांह गहेकी,बांह गह्याँरि=
बांह पकड़ने की,अपना लेने की, झयाज=जहाज, पाज=
प्राण, थें विण=तुम्हारे बिना, अकाज=हानि, भीर=संकट,
दीश्याँ=दीखा, मोच्छ=मोक्ष, नेवाज=दयालु)

8. अब तो मेरा राम नाम दूसरा न कोई

अब तो मेरा राम नाम दूसरा न कोई॥
माता छोडी पिता छोडे छोडे सगा भाई।
साधु संग बैठ बैठ लोक लाज खोई॥
सतं देख दौड आई, जगत देख रोई।
प्रेम आंसु डार डार, अमर बेल बोई॥
मारग में तारग मिले, संत राम दोई।
संत सदा शीश राखूं, राम हृदय होई॥
अंत में से तंत काढयो, पीछे रही सोई।
राणे भेज्या विष का प्याला, पीवत मस्त होई॥
अब तो बात फैल गई, जानै सब कोई।
दास मीरा लाल गिरधर, होनी हो सो होई॥

9. अब तौ हरी नाम लौ लागी

अब तौ हरी नाम लौ लागी।।टेक।।
सब जगको यह माखनचोरा, नाम धर्‌यो बैरागी॥
कित छोड़ी वह मोहन मुरली, कित छोड़ी सब गोपी।
मूड़ मुड़ाइ डोरि कटि बांधी, माथे मोहन टोपी॥
मात जसोमति माखन-कारन, बांधे जाके पांव।
स्यामकिसोर भयो नव गौरा, चैतन्य जाको नांव॥
पीतांबर को भाव दिखावै, कटि कोपीन कसै।
गौर कृष्ण की दासी मीरा, रसना कृष्ण बसै॥

(कटि=कमर, पीतांबर=पीले वस्त्रों वाला)

10. अब मीरां मान लीजी म्हांरी

अब मीरां मान लीजी म्हांरी, हो जी थांने सखियाँ बरजे सारी ।।टेक।।
राणा बरजे, राणी बरजे, बरजे सब परिवारी।
कुँवर पाटवी सो भी बरजे, और सहेल्यां सारी।
सीसफूल सिर ऊपर सोहै, बिंदली सोभा भारी।
साधन के ढिंग बैठ-बैठ कै, लाज गमाई सारी।
नित प्रति उठि नीच घर जाओ, कुल को लगाओ गारी।
बड़ा घराँ की छोरूं कहावो, नाचो दे दे तारी।
वर पायो हिन्दुवाणे सूरज, इब दिल में काँई धारी।
तार्यो पीहर, सासरों तार्यो, माय मोसाली तारी।
मीराँ ने सद्गुरू मिलिया जी, चरण कमल बलिहारी।।

(थाँने=तुमको, बरजे=रोकती हैं, कुँवर पाटवी=सस्भवतः
भोजराज, बिंदली=बिन्दी की, साधन के ढिंग=साधुओं
के पास, लाज=लज्जा, गमाई=नष्ट कर दी, गारी=
गारा,कलंक, छोरूँ=लड़की, हिन्दुवाणए सूरज=हिन्दुओं
में सूरज के समान,अत्यन्त पराक्रमी, काँई=क्या)

11. अब मैं सरण तिहारी जी, मोहि राखौ कृपा निधान

अब मैं सरण तिहारी जी, मोहि राखौ कृपा निधान।
अजामील अपराधी तारे, तारे नीच सदान।
जल डूबत गजराज उबारे, गणिका चढ़ी बिमान।
और अधम तारे बहुतेरे, भाखत संत सुजान।
कुबजा नीच भीलणी तारी, जाणे सकल जहान।
कहं लग कहूँ गिणत नहिं आवै, थकि रहे बेद पुरान।
मीरा दासी शरण तिहारी, सुनिये दोनों कान।

(अजामील=अजामल, गज=हाथी, अधम=नीच,पापी)

12. अरज करे छे मीरा रोकडी

अरज करे छे मीरा रोकडी। उभी उभी अरज॥टेक॥
माणिगर स्वामी मारे मंदिर पाधारो सेवा करूं दिनरातडी॥१॥
फूलनारे तुरा ने फूलनारे गजरे फूलना ते हार फूल पांखडी॥२॥
फूलनी ते गादी रे फूलना तकीया फूलनी ते पाथरी पीछोडी॥३॥
पय पक्कानु मीठाई न मेवा सेवैया न सुंदर दहीडी॥४॥
लवींग सोपारी ने ऐलची तजवाला काथा चुनानी पानबीडी॥५॥
सेज बिछावूं ने पासा मंगावूं रमवा आवो तो जाय रातडी॥६॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर तमने जोतमां ठरे आखडी॥७॥

13. अरे राणा पहले क्यों न बरजी

अरे राणा पहले क्यों न बरजी, लागी गिरधरिया से प्रती।।टेक।।
मार चाहे छाँड, राणा, नहीं रहूँ मैं बरजी।
सगुन साहिब सुमरताँ रे, में थाँरे कोठे खटकी।
राणा जी भेज्या विष रां प्याला, कर चरणामृत गटकी।
दीनबन्धु साँवरिया है रै, जाणत है घट-घट की।
म्हारे हिरदा माँहि बसी है, लटवन मोर मुकूट की।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, मैं हूँ नागर नट की।।

(बरजी=रोक, सगुन=साकार,गुणों का भण्डार,
साहिब=कृष्ण, कोठे=मन में, गटकी=एकदम पी
गई, घट-घट की=प्रत्येक आदमी के हृदय की)

14. आई ती ते भिस्ती जनी जगत देखके रोई

आई ती ते भिस्ती जनी जगत देखके रोई।
मातापिता भाईबंद सात नही कोई।
मेरो मन रामनाम दुजा नही कोई॥टेक॥
साधु संग बैठे लोक लाज खोई। अब तो बात फैल गई।
जानत है सब कोई॥१॥
आवचन जल छीक छीक प्रेम बोल भई। अब तो मै फल भई।
आमरूत फल भई॥२॥
शंख चक्र गदा पद्म गला। बैजयंती माल सोई।
मीरा कहे नीर लागो होनियोसी हो भई॥३॥

15. आओ मनमोहना जी जोऊं थांरी बाट

आओ मनमोहना जी जोऊं थांरी बाट।।टेक।।
खान पान मोहि नैक न भावै नैणन लगे कपाट॥
तुम आयां बिन सुख नहिं मेरे दिल में बहोत उचाट।
मीरा कहै मैं बई रावरी, छांड़ो नाहिं निराट॥

(जोऊं थांरी(थारी) बाट=तेरी राह देखती हूं, आयां बिन=
बिना आये, उचाट=बेचैनी, निराट=असहाय)

16. आओ सहेल्हां रली करां

आओ सहेल्हां रली करां है पर घर गवण निवारि॥
झूठा माणिक मोतिया री झूठी जगमग जोति।
झूठा आभूषण री, सांची पियाजी री प्रीति॥
झूठा पाट पटंबरा रे, झूठा दिखडणी चीर।
सांची पियाजी री गूदड़ी, जामें निरमल रहे सरीर॥
छपन भोग बुहाय दे हे इण भोगन में दाग।
लूण अलूणो ही भलो है अपणे पिया जी रो साग॥
देखि बिराणे निवांणकूं है क्यूं उपजावे खीज।
कालर अपणो ही भलो है, जामें निपजै चीज॥
छैल बिराणो लाखको है अपणे काज न होय।
ताके संग सीधारतां है भला न कहसी कोय॥
बर हीणो अपणो भलो है कोढी कुष्टी कोय।
जाके संग सीधारतां है भला कहै सब लोय॥
अबिनासी सूं बालबा हे जिनसूं सांची प्रीत।
मीरा कूं प्रभुजी मिल्या है एही भगति की रीत॥

पाठांतर
आवो सहेल्यां रली करां हे, पर घर गावण निवारी।
झूठा माणिक मोतिया री, झूठी जगमग जोति।
झूठा सब आभूषण री, सांचि पियाजी री पोति।
झूठा पाट पटंबरारे, झूठा दिंखणी चीर।
सांची पियाजी री गूदड़ी, जामे निरमल रहे सररी।
छप्पन भोग बुहाई दे है, इन भोगिन में दाग।
लूया अलूणओ ही भलो है, अपणए पियाजी को साग।
देखि बिराणै निवांण कूँ है, क्यूँ उपजावै खीज।
कालर अपणो ही भलो है, जामें निपजै चीज।
छैल बिराणओ लाख को है, अपणे काज न होइ।
ताके संग सीधारतां हे, भला न कहसी कोइ।
वर हीणओं आपणों भलो है, कोढ़ी कुष्टि कोई।
जाके संग सीधारतां है, भला कहै सब लोइ।
अबिनासी सूं बालवां है, जिनसूं सांची प्रीत।
मीरां कूं प्रभु मिल्या है, एहि भगति की रीत।।

(सहेल्याँ=सहेलियाँ,सखियाँ, रलि=क्रीड़ा,आनन्द,
परघर गवण=दूसरों के घर आना-जाना, निवारि,
निवारी=निवारण करके,छोड़कर, पिया जी री जोति=
परमात्मा का प्रेम, पाट पटंबरा=रेशमी वस्त्र, दिखणी=
दक्खिन, चीर=साड़ी। गूदड़ी=फटा-पुराना कपड़ा, बुहाय,
बुहाई दे=छोड़ दी, लूण=लवण,नमक, साग=सगे,साथ,
विराणै=दूसरों का, निवांण=उपाजऊ भूमि, खीज=द्वेष,
ईर्ष्या, कालर=अनुपजाऊ भूमि, निपजै=उत्पन्न होना,
छैल=रसिक व्यक्ति, सीधारतां=आना जाना, हीणो=
हीन, साधरण, वर=पति, बालबा,बालवां=बालम,पति)

17. आज अनारी ले गयो सारी

आज अनारी ले गयो सारी, बैठी कदम की डारी, हे माय।।टेक।।
म्हारे गेल पड़्यो गिरधारी है माय, आज अनारी।
मैं जल चमुना भर गई थी, आ गयो कृश्न मुरारी, हे माय।
ले गयो सारी अनारी म्हारी, जल में ऊभी उधारी, हे माय।
सखी साइनि मोरी हँसत है, हंसि हंसि दे मोंहि तारी, हे माय।
सास बुरी अर नणद हठीली, लरि लरि दे मोहिं गारी, हे माय।
मीरां के प्रभु गिरधरनागर, चरण कमल की बारी, हे माय।।

(अनारी=नटखट,शरारती। सारी=साड़ी,वस्त्र, गेल=साथ,पीछे,
ऊभी=खड़ी, उधारी=निरवस्त्र, साइनि=सदा साथ रहने वाली,
तारी=ताली, बारी=न्यौछावर)

18. आज मारे साधुजननो संगरे राणा

आज मारे साधुजननो संग रे राणा। मारा भाग्ये मळ्यो॥टेक॥
साधुजननो संग जो करीये पियाजी चडे चोगणो रंग रे॥१॥
सीकुटीजननो संग न करीये पियाजी पड़े भजनमां भंगरे॥२॥
अडसट तीर्थ संतोनें चरणें पियाजी कोटी काशी ने कोटी गंगरे॥३॥
निंदा करसे ते तो नर्क कुंडमां जासे पियाजी थशे आंधळा अपंगरे॥४॥
मीरा कहे गिरिधरना गुन गावे पियाजी संतोनी रजमां शीर संगरे॥५॥

पाठांतर
आज म्हारं साधु जननो संग रे, राणा म्हारां भाग भल्यां।।टेक।।
साधु जननो संग जो करिये, चढ़े ते चौगणो रंग रे।
साकत जननो संग न करिये, पड़े भजन में भंग रे।
अठसठ तीरथ सन्तों ने चरणए, कोटि कासी ने कोटि गंग रे।
निन्दा करसे नरक कुण्ड सां, जासे याते आंधला अपंग रे।
मीरां के प्रभु गिरधरनागर, संतोनी रज म्हारे अंग रे।।

(जननो=जनों का, चौगुणो=चार गुना बहुत अधिक,
साकत=शक्ति सम्प्रदाय के अनुयायी,ये लोग दुर्गा,
काली आदि देवियों की उपासना करते हैं। ये प्रायः
वाममार्गी होते हैं और अपने सम्प्रदाय में विहित
मद्य, मांस आदि का सेवन करते हैं। नारी को ये
लोग शक्ति का प्रतीक मानते हैं तथा उसकी पूजा
एवं सेवा में रत रहते हैं, संतो नें चरणों=सन्तों के
चरणों में ही, करसे=करेगा, आंधला=अन्धा, अपंग=
अंगरहित, लूला, रज=धूल)

19. आज मेरेओ भाग जागो

आज मेरेओ भाग जागो साधु आये पावना॥टेक॥
अंग अंग फूल गये तनकी तपत गये।
सद्‌गुरु लागे रामा शब्द सोहामणा ॥१॥
नित्य प्रत्यय नेणा निरखु आज अति मनमें हरखू।
बाजत है ताल मृदंग मधुरसे गावणा ॥२॥
मोर मुगुट पीतांबर शोभे छबी देखी मन मोहे।
मीराबाई हरख निरख आनंद बधामणा ॥३॥

(पावना=पवित्र, सोहामणा=सुंदर, हरखू=हर्ष,खुश,
निरख=देखकर)

20. आजु शुण्या हरी आवाँ री

आजु शुण्या हरी आवाँ री, आवाँ री मण भावां री।।टेक।।
घरि णा आवां गेउ लखावां, बाण पड़्या ललचावां री।
णेणा म्हारा कह्यां णा बस म्हारो, णआ म्हारे पंख उड़ावां री।
मीरां रे प्रभु गिरधरनागर, बाट जोहां थे आवाँरी।।

(शुण्या=सुना है, गेउ=मार्ग, बाण=स्वभाव)

21. आण मिल्यो अनुरागी गिरधर

आण मिल्यो अनुरागी गिरधर आण मिल्यो अनुरागी ।।टेक।।
साँसों सोच अंग नहि अब तो तिस्ना दुबध्या त्यागी।
मोर मुकुट पीताम्बर सोहै, स्याम बरण बड़ भागी।
जनम जनम के साहिब मेरो, वाही से लौ लागी।
अपण पिया सैग हिलमिल खेलूं अधर सुधारस पागी।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, अब के भई सुभागी।।

(अनुरागी=प्रेमी, साँसों=संशय,सन्देह, सोच=शोक,
अंग=भाग, तिस्ना=तृष्णा, दुबध्या=दुविधा, वरण=
बरण,वरना,पति-रूप स्वीकार करना, साहिब=पति,
लौ=लग्न,प्रेम, पागी=छकना, सुभागा=सौभाग्यवाली)

22. आतुर थई छुं सुख जोवांने

आतुर थई छुं सुख जोवांने घेर आवो नंद लालारे॥टेक॥
गौतणां मीस करी गयाछो गोकुळ आवो मारा बालारे॥१॥
मासीरे मारीने गुणका तारी टेव तमारी ऐसी छोगळारे॥२॥
कंस मारी मातपिता उगार्या घणा कपटी न थी भोळारे॥३॥
मीरा कहे प्रभू गिरिधर नागर गुण घणाज लागे प्यारारे॥४॥

(आतुर थई छुं=व्याकुल हो रही हूं)

23. आयी देखत मनमोहनकू

आयी देखत मनमोहनकू।
मोरे मनमों छबी छाय रही॥टेक॥
मुख परका आचला दूर कियो।
तब ज्योतमों ज्योत समाय रही॥२॥
सोच करे अब होत कंहा है।
प्रेमके फुंदमों आय रही॥३॥
मीरा के प्रभु गिरिधर नागर।
बुंदमों बुंद समाय रही॥४॥

(फुंद=फंद, बुंद=बूँद)

24. आली, म्हांने लागे वृन्दावन नीको

आली, म्हांने लागे वृन्दावन नीको।।टेक।।
घर घर तुलसी ठाकुर पूजा दरसण गोविन्दजी को॥
निरमल नीर बहत जमुना में, भोजन दूध दही को।
रतन सिंघासन आप बिराजैं, मुगट धर्‌यो तुलसी को॥
कुंजन कुंजन फिरति राधिका, सबद सुनन मुरली को।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर, भजन बिना नर फीको॥

पाठांतर
आली म्हाँणे लागाँ बृन्द्रावण नीकाँ।।टेक।।
घर-घर तुलसी ठाकर पूजां, दरसण गोविन्द जी काँ।
निरमल नीर बह्या जमणाँ माँ, भोजण दूध दही काँ।
रतण सिंघासण आप बिराज्याँ, मुगुट धर्यां तुलसी काँ।
कुँजन-कुँजन फिर्या सांवरा, सबद सुण्या मुरली काँ।
मीरां रे प्रभु गिरधरनागर, भजण बिणआ नर फीकाँ।।

(म्हांने,म्हाँणे=मुझको, नीको,नीकाँ=सुन्दर, ठाकुर=कृष्ण,
जमणाँ मां=यमुना में, दरसण=दर्शन, मुगट,मुगुट=मुकुट,
ताज, धर्यां=धारण करके, फीको,फीकां=नीरस,व्यर्थ)

25. आली रे मेरे नैणा बाण पड़ी

आली रे मेरे नैणा बाण पड़ी।।टेक।।
चित्त चढ़ो मेरे माधुरी मूरत उर बिच आन अड़ी।
कब की ठाढ़ी पंथ निहारूँ अपने भवन खड़ी।।
कैसे प्राण पिया बिन राखूँ जीवन मूल जड़ी।
मीरा गिरधर हाथ बिकानी लोग कहै बिगड़ी।।

पाठांतर
आली री म्हारे णेणा बाण पड़ी।।टेक।।
चित्त चढ़ी म्हारे माधुरी मूरत, हिवड़ा अणी गड़ी।
कब री ठाड़ी पंथ निहाराँ, अपने भवण खड़ी।
अटक्याँ प्राण साँवरो, प्यारो, जीवण मूर जड़ी।
मीराँ गिरधर हाथ बिकाणी, लोग कह्यां बिगड़ी ।।

(आली=सखी, बाण=आदत, उर=हृदय, ठाढ़ी,ठाड़ी=
खड़ी, हिवड़ा=हृदय। अणी =अनी, नोक। मूर,मूल=जड़,
बिकानी,बिकाणी=बिक गई,पूर्णतः समर्पित हो गई,
बिगड़ी=पथ भ्रष्ट हो गई)

26. आली, सांवरे की दृष्टि मानो

आली, सांवरे की दृष्टि मानो, प्रेम की कटारी है।।टेक।।
लागत बेहाल भई, तनकी सुध बुध गई,
तन मन सब व्यापो प्रेम, मानो मतवारी है॥
सखियां मिल दोय चारी, बावरी सी भई न्यारी,
हौं तो वाको नीके जानौं, कुंजको बिहारी॥
चंदको चकोर चाहे, दीपक पतंग दाहै,
जल बिना मीन जैसे, तैसे प्रीत प्यारी है॥
बिनती करूं हे स्याम, लागूं मैं तुम्हारे पांव,
मीरा प्रभु ऐसी जानो, दासी तुम्हारी है॥

पाठांतर
आली साँवरो की दृष्टि, मानूँ प्रेम री कटारी हें।।टेक।।
लगन बेहाल भई तन की सुधि बुद्धि गई।
तनह में व्यापी पीर, मन मतवारी हें।
सखियाँ मिलि दोय च्यारी, बावरी भई हें सारी।
हौं तो वाको नीको जानों, कुँज को बिहारी हें।
चन्द को चकरो चाहै, दीपक पतंग दाहें।
जल बिना मरै मीन ऐसी प्रीत प्यारी हें।
बिन देष्याँ कैसे जीवें कल न पड़त हीयै।
जाय वाकूँ ऐसे कहियौ मीराँ तो तिहारी हें।।

(आली=सखी, मानो,मानूँ=मेरे लिए, लागत,लगन=
लगते ही, व्यापो,व्यापी=व्याप्त हो गई, दाहै=जलाता,
मीन=मछली, हीयै=हृदय में)

27. आवत मोरी गलियन में गिरधारी

आवत मोरी गलियन में गिरधारी।
मैं तो छुप गई लाज की मारी।।टेक।।
कुसुमल पाग केसरिया जामा, ऊपर फूल हजारी।
मुकुट ऊपर छत्र बिराजे; कुण्डल की छबि न्यारी।
आवत देखी किसन मुरारी, छिप गई राधा प्यारी।
मोर मुकट मनोहर सोहै, नथनी की छवि न्यारी।
गल मोतिन की माल बिराजे, चरण कमल बलिहारी।
ऊभी राधा प्यारी अरज करत है, सुणजे किसन मुरारी।
मीराँ के प्रभु गिरधरनागर, चरण कमल पर वारी।।

(कुसुमल=लाल, पाग=पगड़ी, जामा=पहनावा, हजारी=
हजारों दल वाले, गल=कण्ठ, ऊभी=खड़ी हुई)

28. आव सजनियाँ बाट मैं जोऊँ

आव सजनियाँ बाट मैं जोऊँ, तेरे कारण रैण न सोऊँ।।टेक।।
जक न परत मन बहुत उदासी, सुन्दर स्याम मिलौ अबिनासी।
तेरे कारण सब हम त्यआगे, षान पान पै मन नहीं लागै।
मीराँ के प्रभु दरसण दीज्यौ, मेरी अरज कान सूँण लीज्यौ।।

(जोऊँ=देखना, जक=चैन, षान=खाना, कान सूँण लीज्यो=
ध्यान देकर सुनो)

29. आवाँ मन मोहणा जी जोवाँ थारी बाट

आवाँ मन मोहणा जी जोवाँ थारी बाट।।टेक।।
खाण पाण म्हारे नेक न भावाँ, नैणा खुला कपाट।
थे आप बिण सुख णा म्हारो, हियड़ो घणी उचाट।
मीराँ थे बिण भई बावरी, छाँड्या णा णिरवाट।

(थारी बाट=तुम्हारी राह, कपाट=किवाड़, उचाट=
व्याकुल णिरवाट=निराश्रय,असहाय)

30. आवो मनमोहन जी मीठो थारो बोल

आवो मनमोहन जी मीठो थारो बोल।।टेक।।
बालपनाँ की प्रीत रमइयाजी, कदे नाहिं आयो थारो तोल।
दरसण बिनान मोहि जक न परत है; चित मेरो डावाँडोल।
मीराँ कहै मै भई बाबरी, कहो तो बजाऊँ ढोल।।

(बोल=बाणी, कहे नाहि=कभी भी नहीं, जक=चैन)

31. आसा प्रभु जाण, न दीजै हो

आसा प्रभु जाण, न दीजै हो ।।टेक।।
तन मन धन करि वारणै, हिरदे धरि लीजै, हो।
आव सखी मुख देखिये, नैणां रस पीजै, हो।
जिह जिह विधि रीझै हरि कोई विधि कीजै, हो।
सुन्दर स्याम सुहावणा, देख्यां जीजै हो।
मीराँ के प्रभउ राम जी, बड़ भागण रीझै, हो।।

(वारणै=न्यौछावर करना, आव=आओ,
जिंह-जिंह=जिस जिस, रीझै=प्रसन्न होना,
जीजै=जीवित रहना, बढ़ भागण=बड़े भाग्य
वाली)

32. इक अरज सुनो मोरी

इक अरज सुनो मोरी मैं किन सँग खेलूं होरी।।टेक।।
तुम तो जाँय विदेसाँ छाये, हमसे रहै चितचोरी।
तन आभूषण छोड़यो सब ही, तज दियो पाट पटोरी।
मिलन की लग रही डोरी।
आप मिलाय बिन कल न परत हैं, त्याग दियो तिलक तमोली।
मीराँ के प्रभु मिलज्यो माधव, सुणज्यो अरज मोरी।
दरस बिण विरहणी दोरी।।

(पाट=वस्त्र, पटोरी=साज-शृंगार, डोरी=आशा, कल न परत है=
चैन नहीं मिलता, तमोली=पान, दीरी=दुःखी)

33. उर में णाख चोर गड़े

उर में णाख चोर गड़े।
अब कैसेहुँ निकसत निहं ऊधों, तिरछै ह्व जे अड़े।
णेणा बणज बसावाँ री, म्हारा साँवरा आवाँ।।टेक।।
णैणा म्हौला साँवरा राज्याँ, डरताँ पलक णा लावाँ।
म्हाँरां हिरवाँ बस्ताँ मुरारी, पल पल दरसण पावाँ।
स्याम मिलण सिंगार सजावाँ, सुखरी सेज बिछायाँ।
मीराँ रे प्रभु गिरधरनागर बार सार बलि जावाँ।।

(बणज=कमल के समान कोमल, पलक णा लावाँ=
पलक न मारना,आँखें खुली ही रखना)

34. ऐसी लगन लगाइ कहां तू जासी

ऐसी लगन लगाइ कहां तू जासी ।।टेक।।
तुम देखे बिन कलि न परति है, तलफि तलफि जिव जासी।
तेरे खातिर जोगण हूँगा करबत लूँगी कासी।
मीरां के प्रभु गिरधरनागर, चरण केवल की दासी।।

(लगन=प्रेम, जासी=जाता है, कलि न परति है=चैन
नहीं मिलता है, जिव=जी,प्राण, करबत,करवत=आरे से
कटना, प्राचीन लोगों का वह विश्वास था कि काशी
में आरे से कटने पर मुक्ति मिल जाती है)

संत मीरा बाई पदावली (भाग-२)
 
 Hindi Kavita