Hindi Kavita
प्रभुदयाल श्रीवास्तव
Prabhudayal Shrivastava
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Hindi Poetry Prabhudayal Shrivastava

हिन्दी कविता प्रभुदयाल श्रीवास्तव

55. छोटे लोग‌

हाथी खड़ा नदी के तट पर,
जाना था उस पार।
कश्ती वाला नहीं हुआ ले ,
जाने को तैयार।

इस पर तभी एक मेंढ़क ने,
दरिया दिली दिखाई।
बोला चिंतित क्यों होते हो,
प्यारे हाथी भाई।

बिठा पीठ पर तुमको अपनी,
नदिया पार कराऊं।
कठिन समय में मदद करुं मैं ,
मेंढक धर्म निभाऊं।

प्रोत्साहन ने मेंढक जी के,
हाथी को उकसाया।
पैदल चलकर पार नदी वह ,
चटपट ही कर आया।

छोटे छोटे लोग बड़ों को,
भी हिम्मत दे जाते।
और कठिन से कठिन काम भी
पल मैं हल हो जाते।

56. छुट्टी का आवेदन‌

मां की तबियत बहुत खराब,
बापू को हो रहे जुलाब।
इस कारण से हे शिक्षकजी,
मैं शाला ना आ पाऊंगी।

मुझे पड़ेगा आज बनाना,
अम्मा बापू, सबका खाना।
सुबह सुबह ही चाय बनाई,
घर के लोगों को पिलवाई।
जरा देर में वैद्यराज के,
घर बापू को ले जाऊंगी।
इस कारण से हे शिक्षकजी,
मैं शाला न आ पाऊंगी।

दादा की सुध लेना होगी,
उन्हें दवाई देना होगी।
दादीजी भी हैं लाचार,
उन्हें बहुत करती मैं प्यार।
अभी नहानी में ले जाकर,
उन्हें ठीक से नहलाऊंगी।
इस कारण से हे शिक्षकजी,
मैं शाला न आ पाऊंगी।

छोटा भाई बड़ा शैतान,
दिन भर करता खींचातान।
कापी फेक किताबें फाड़,
रोज बनाता तिल का ताड़।
बड़े प्रेम से धीरे धीरे,
आज उसे मैं समझाऊंगी।
इस कारण से हे शिक्षकजी,
मैं शाला न आ पाऊंगी।

मुझे आज की छुट्टी देना,
शिक्षकजी गुस्सा मत होना।
गृह का कार्य शीघ्र कर लूंगी,
पाठ आज का कल पढ़ लूंगी।
गृहस्थी का सब काम पड़ा है,
आज नहीं पढ़ लिख पाऊंगी।
इस कारण से हे शिक्षकजी,
मैं शाला न आ पाऊंगी।

57. जानवरों के उसूल‌

एक छछूंदर धोती पहने,
गया कराने शादी।
उसके साथ‌ गई जंगल की
आधी-सी आबादी।

जब छछूंदरी लेकर आईं,
फूलों की वरमाला।
छोड़ छछूंदर, चूहेजी को,
पहना दी वह माला।

इस पर कुंवर, छछूंदरजी का
भेजा ऊपर सरका।
ऐसा लगा भयंकर बादल,
फटा और फिर बरसा।

बोला, अरी बावरी तूने,
ऐसा क्यों कर डाला।
मुझे छोड़कर चूहे को क्यों,
पहना दी वरमाला।

वह बोली -रे मूर्ख छछूंदर,
क्यों धोती में आया।
जानवरों के क्या उसूल हैं,
तुझे समझ ना आया।

सभी जानवर रहते नंगे,
यह कानून बना है।
जो कपड़े पहने रहते हैं,
उनसे ब्याह मना है।

58. जूनियर‌ गधा

देखो मम्मी देखो पापा,
बस्ता हमसे उठ न पाता।
हम बच्चों का दर्द आप सब,
लोगों को क्यों समझ न आता।

आठ सेर का वज़न हमारा,
पर बस्ता तो दस का है माँ।
इसको कंधे पर ले जाना,
नहीं हमारे बस का है माँ।

हम बच्चों पर कहर इस तरह,
क्यों दुनियाँ वाले ढाते हैं।
कष्ट हमें है कितना भारी,
क्यों न लोग समझ पाते हैं।

अभी खेलने खाने के दिन,
किंतु गधे सा हमको लादा।
सड़क किनारे खड़ा गधा भी,
हमें जुनियर गधा बुलाता।

हम छोटे छोटे बच्चे हैं,
हमको हंसने मुस्कराने दो।
बिना किताबों के ही हमको,
कुछ दिन तो शाला जाने दो।

59. जो चलता अपने पैरों पर‌

भर्र भर्र कर बस चलती है,
टर टर टर करता स्क्रूटर।
ढर्र ढर्र कर चले टेंपो,
ट्रेन चला करती है सर‌ सर।

तीन चके का होता रिक्शा,
दौड़े सड़कों पर फर फर फर।
किन्तु सायकिल हाय बेचारी,
दो पहियों पर चलती छर छर।

जहाँ ट्रेक्टर और बुल्डोज़र,
करते रहते घर्र घर्र घर।
वहीं लक्ज़री कारें च‌लतीं,
जैसे नदिया बहती हर हर‌।

किन्तु आदमी नामक प्राणी,
जो चलता अपने पैरों पर।
तन तंदुरुस्त रहा करता है,
रहता स्वस्थ सदा जीवन भ‌र।

60. जंगल की बात

जंगल के सारे पेड़ों ने,
डोंडी ऐसी पिटवा दी है।
उन‌ की बेटी पत्तलजी की,
कल दोनेंजी से शादी है।

पहले तो दोनों प्रणय युगल,
बट के नीचे फेरे लेंगे।
संपूर्ण व्यवस्था भोजन की,
पीपलजी ने करवा दी है।

जंगल के सारे वृक्ष लता,
फल फूल सभी आमंत्रित हैं।
खाने पीने हँसने गाने,
की पूर्ण यहाँ आज़ादी है।

रीमिक्स सांग के साथ यहाँ,
सब बाल डांस कर सकते हैं।
टेसू का रंग महुये का रस,
पीने की छूट करा दी है।

यह आमंत्रण में साफ लिखा,
परिवार सहित सब आयेंगे।
उल्लंघन दंडनीय होगा,
यह बात साफ बतला दी है।

वन प्रांतर का पौधा पौधा,
अपनी रक्षा का प्रण लेगा।
इंसानों के जंगल प्रवेश,
पर पाबंदी लगवा दी है।

यदि आदेशों के पालन में,
इंसानों ने मनमानी की।
फतवा ज़ारी होगा उन पर‌,
यह‌ बात‌ साफ जतला दी है।

61. जब दुर्गावती रण में निकलीं

जब दुर्गावती रण में निकलीं,
हाथों में थीं तलवारें दो।
हाथों में थीं तलवारें दो,
हाथों में थीं तलवारें दॊ।
जब दुर्गावती रण में निकलीं,
हाथों में थीं तलवारें दो।

धीर वीर वह नारी थी वह,
गढ़मंडल की वह रानी थी।
दूर-दूर तक थी प्रसिद्ध,
सबकी जानी-पहचानी थी।
उसकी ख्याती से घबराकर,
मुग़लों ने हमला बोल दिया।
विधवा रानी के जीवन में,
बैठे-ठाले विष घोल दिया।
मुग़लों की थी यह चाल कि अब,
कैसे रानी को मारें वो।
जब दुर्गावती रण में निकलीं,
हाथों में थीं तलवारें दो।

सैनिक वेश धरे रानी थी,
हाथी पर चढ़ बल खाती थी।
दुश्मन को गाजर मूली-सा,
काटे आगे बढ़ जाती थी।
तलवार चमकती अंबर में,
दुश्मन का सिर नीचे गिरता।
स्वामी भक्त हाथी उनका,
धरती पर था उड़ता-फिरता।
लप-लप तलवार चलाती थी,
पल-पल भरती हुंकारें वो।
जब दुर्गावती रण में निकलीं,
हाथों में थीं तलवारें दो।

जाती थी जहाँ-जहाँ रानी,
बिजली-सी चमक दिखाती थी।
मुग़लों की सेना मरती थी,
पीछे को हटती जाती थी।
दोनों हाथों वह रणचंडी,
कसकर तलवार चलाती थी।
दुश्मन की सेना पर पिलकर,
घनघोर कहर बरपाती थी।
झन-झन ढन-ढन बज उठती थीं,
तलवारों की झंकारें वो।
जब दुर्गावती रण में निकलीं,
हाथों में थीं तलवारें दो।

पर रानी कैसे बढ़‌ पाती,
उसकी सेना तो थोड़ी थी।
मुग़लों की सेना थी अपार,
रानी ने आस न छोड़ी थी।
पर हाय राज्य का भाग्य बुरा,
बेईमानी की घर वालों ने।
उनको शहीद करवा डाला,
उनके ही मंसबदारों ने।
कितनी पवित्र उनके तन से,
थीं गिरीं बूँद की धारें दो।
जब दुर्गावती रण में निकलीं,
हाथों में थीं तलवारें दो।

रानी तू दुनिया छोड़ गई,
पर तेरा नाम अमर अब तक।
और रहेगा नाम हमेशा,
सूरज चंदा नभ में जब तक।
हे देवी तेरी वीर गति,
पर श्रद्धा सुमन चढ़ाते हैं।
तेरी अमर कथा सुनकर ही,
दृग में आँसू आ जाते हैं।
है भारत माता से बिनती,
कष्टों से सदा उबारें वो।
जब दुर्गावती रण में निकलीं,
हाथों में थीं तलवारें दो।

नारी की शक्ति है अपार,
वह तो संसार रचाती है।
माँ पत्नी और बहन बनती,
वह जग जननी कहलाती है।
बेटी बनकर घर आँगन में,
हँसती ख़ुशियाँ बिखराती है।
पालन-पोषण सेवा-भक्ति,
सबका दायित्व निभाती है।
आ जाए अगर मौक़ा कोई,
तो दुश्मन को ललकारे वो।
जब दुर्गावती रण में निकलीं,
हाथों में थीं तलवारें दो।

62. जूता चोर चूहा

चूहा चाचा गये बाग में,
फूल तोड़ने जूही के।
वहीं पेड़ के नीचे देखे,
जूते किसी बटोही के।

फूल तोड़ना भूले चाचा,
पहिने जूते, घर आये।
किंतु हाये जूते थे मोटे,
बिल में नहीं‍ समा पाये।

खोज बीन होने पर जूते,
मिले चचा के दरवाजे।
पहुँची पुलिस बजाये डंडे,
चूहे जी डरकर भागे।

63. झब्बू का नया साल

सबने खूब मिठाई खाई,
नए नए इस साल में।
झब्बूभैया रूठे बैठे,
थे अब तक भोपाल में।

गए साल में झब्बन के संग,
में छिंदवाड़ा छोड़ा था।
जिस घोड़े पर गए बैठकर,
चाबी वाला घोड़ा था।

नहीं ठीक से चल पाया था,
लंगड़ापन था चाल में।

खूब मनाया झब्बू भैया,
नए साल में घर आओ।
मिट्टी की गुड़ियों के हाथों,
का हलुआ तुम भी खाओ।

पर उनके स्वर थे बदले से,
नहीं दिखे थे ताल में।

तभी अचानक शाम ढले ही,
खट खट खट का स्वर आया।
सबने देखा आसमान से,
झब्बू का घो्ड़ा आया।

बजा तालियाँ लगे नाचने,
सभी खिलौने हाल में।

64. झूठे मक्कारों को दंड

मक्खीजी की कक्षा में जब,
मच्छर आया लेट।
ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाया था,
पकड़े अपना पेट।

दर्द हो रहा मैडम मेरे,
आज पेट में भारी।
इस कारण से लेट हो गया,
वैरी वैरी सारी।

मक्खीजी ने कान पकड़कर,
सिर तक उसे उठाया।
बोली, झूठ बोलने में तू,
बिल्कुल न शरमाया।

अभी राह में मैंने देखा,
था तुमको गपयाते।
तिलचट्टा के साथ पकोड़ी,
आलू छोले खाते।

ऐसा कहकर मक्खीजी ने,
मुर्गा उसे बनाया।
बड़ी ज़ोर से फिर पीछे से,
डंडा एक जमाया।

झूठे मक्कारों को ऐसा ,
दंड दिया जाता है।
ऐसा करने से ही जग में,
सदाचार आता है।

65. ट्रेफिक सिगनल‌

ट्रेफिक सिगनल पर ड्यूटी थी,
भूरे गधे सिपाही की।
समय निष्ठ थे, थे चौकन्ने,
कभी न लापरवाही की।

ट्रेफिक सिगनल के नियमों का,
पालन रोज़ कराते थे।
नियम तोड़ने वालों को वे,
कड़ा दंड दिलवाते थे।

भालू चीता हिरण मोर सब,
सिगनल से घबराते थे।
हरा रंग जब तक ना आये,
पग भी नहीं बढ़ाते थे।

मजबूरी में शेर सिंह भी,
सिगनल पर गुर्राते थे।
नियम तोड़ने की हिम्मत पर,
वे भी ना कर पाते थे।

किंतु एक दिन चूहे राजा,
शहर घूमने जब आये।
बिना किसी की रोक टोक के,
चौराहे पर मस्ताये।

एक सड़क से सड़क दूसरी,
पार दनादन कर डाली
वह समझे इस गधेराम का,
भेजा तो होगा खाली।

किंतु एक बस ने जब उनको,
चटनी जैसा था पीसा,
स्वर्ग लोक को चले गये वे,
बिना खर्च धेला पैसा।

भूरा गधा सिपाही अब तो,
बच्चों को समझाता है।
चूहे का जो हाल हुआ था,
वह उनको बतलाता है।

66. डेडू

लड्डू मुझे दिला दो डेडू।
पेड़ा मुझे खिला दो डेडू।

गला सूखता जाता मेरा,
लस्सी मुझे पिला दो डेडू।

लगे संतरे ढेर पेड़ में,
पकड़ो डाल हिला दो डेडू।

चड्डी मेरी हुई पुरानी,
नया पेंट सिलवा दो डेडू।

लाकर रॉकेट आसमान की,
अभी सैर करवा दो डेडू।

67. तिलचट्टे का चिट्ठा

टेलीविज़न देखता हर दिन,
आठ आठ घंटे तिल‌चट्टा।
हुई परीक्षा साफ हो गया,
इस कारण कक्षा में फट्टा।

गुस्से से तिलचट्टेजी का,
टीवी से अब है मन खट्टा।
टीवी के विरोध में खुद ही,
लिखा उन्होंने लंबा चिट्ठा।

स्वयं विरोध में खड़े हो गए,
सब मित्रों को किया इकट्ठा।
बोले कम्प्यूटर उल्लू है,
है टीवी उल्लू का पट्ठा।

68. तुमको सजा मिलेगी

टुल्लम टुल्ला गिल्ली डंडा, खेल रहे थे गद्दू।
इसी बीच में ठीक सामने, निकल पड़े थे दद्दू।।

गिल्ली लगी सामने कसकर, दद्दू का सिर फूटा।
डर के मारे गद्दू जी का, इधर पसीना छूटा।।

मार पड़ेगी यही सोचकर, गद्दू घर से भागे।
किंतु हाय तकदीर पड़ गये, दादीजी के आगे।।

दादी ने पकड़ा हाथों से, करदी बहुत धुनाई।
फोड़ा था दद्दू का सिर, तो सजा उन्होंने पाई।।

उल्टे सीधे काम किये, तो अब न दाल गलेगी।
फोड़ा अगर किसी का सिर तो, तुमको सजा मिलेगी

69. तुलसी चौरा मुस्कराता

बिल्ली को मौसी कहते हैं ,
और गाय को हम माता।
यही हमारे संस्कार हैं,
पशुओं तक से है नाता।

चिड़ियों को देते हैं दाना,
कौओं को रोटी देते।
प्यासों को पानी देने में,
हमको मज़ा बहुत आता।

यहाँ बाग में फूलों फूलों
हर दिन भँवरा मड़राता,
पेड़ लगा है जो आंगन में
वह भी तो गाना गाता।

देने वाले हाथ हमारे,
हमको देना ही आता।
पर जितना भी हम‌ देते हैं,
दुगना वापस आ जाता।

रोज हमारे घर आंगन में,
स्वर्ण सबेरा बिखराता।
रात चाँदनी जब खिलती है,
तुलसी चौरा मुस्कराता।

70. थाने में शेरू भाई

शेर सिंहजी नियुक्ति हो गए,
वाहन चालक के पद पर।
तेज-तेज बस लगे चलाने,
दिल्ली कलकत्ता पथ पर।

तीन बार सिग्नल को तोड़ा,
चार हाथियों को रौंधा।
डर के मारे बीच सड़क पर,
घोड़ा गिरा, हुआ औंधा।

सीटी बजा बजा चूहे ने,
किसी तरह बस’ रुकवाई।
उसी समय पर दौड़े दौड़े,
आ पहुंचे घोड़ा भाई।

दोनों ने जाकर थाने में,
रपट शेर की लिखवाई।
जब से अब तक बंद पड़े हैं,
थाने में शेरू भाई।

बड़े बड़े लोगों की भी अब,
नहीं चलेगी मनमानी।
जेल उन्हें भी जाना होगा,
जो करते हैं शैतानी।

71. थाने का कारकून

चूहेजी की रपट लिखाने,
बिल्ली पहुँची थाने।
जगह जगह पर खोद लिए हैं,
उसने बिल मनमाने।

जब भी जाती उसे पकड़ने,
बिल में घुस जाता है।
दिन भर रहती खड़ी मगर,
वह बाहर न आता है।

कोतवाल ने रपट अभी तक,
लिखी न मेरे भाई।
चूहे के संग मिली भगत ,
मुझको पड़ती दिखलाई ।

रोटी के कुछ टुकड़े चूहा,
थाने भिजवाता है।
थाने का हर कारकून,
मिलकर टुकड़े खाता है।

72. दूध गरम‌

बैठा लाला भारी भरकम,
चिल्लाता पीलो दूध गरम।

एक सड़क किनारे पट्टी में,
है रखा कड़ाहा भट्टी में।
भर भर गिलास पिलवाता है,
वह केवल पाँच रुपट्टी में।
देता समान आदर सबको,
थोड़ा ज्यादा ना थोड़ा कम।
चिल्लाता पीलो दूध गरम।

कई युवक युवतियाँ आते हैं,
वे लंबी लाइन लगाते हैं।
दादा दादी नाना नानी,
नाती पोतों को लाते हैं।
सब सुड़ सुड़ दूध सुड़कते हैं,
क्यों करें यहां पर लाज शरम।
चिल्लाता पीलो दूध गरम।

यह दूध बड़ा खुशबू वाला,
मीठा मीठा, केसर डाला।
मन जिसका ललचा जाता है,
पीने को होता मतवाला।
फहराता उसके चेहरे पर,
पल भर को खुशियों का परचम।
चिल्लाता पीलो दूध गरम।

नेता अफसर भी आ जाते,
पीकर यह दूध अघा जाते।
यह दूध बहुत है गुणकारी,
पीने वालों को सम‌झाते।
जो भी इस रस्ते से निकला,
पग उसके जाते हैं थम, थम।
चिल्लाता पीलो दूध गरम।

73. दादी बोली

जितनी ज्यादा बूढ़ी दादी,
दादा उससे ज्यादा।
दादी कहती ‘मैं’ शहजादी,
औ दादा शह्जादा।

दादी का यह गणित नातियों,
पोतों को ना भाता।
बूढ़े लोगों को क्यों माने,
शह‌जादी ,शहजादा।

दादी बोली,अरे बुढ़ापा,
नहीं उमर से आता।
जिनका तन मन निर्मल होता,
वही युवा कहलाता।

74. दहेज‌

अपने मम्मी पापा के संग ,
चुहिया पहुंची थाने।
बोली चूहे के घरवाले,
हैं दहेज दीवाने।

शादी के पहले से ही वे,
मांग रहे हैं कार।
बंद करो थाने में उनको,
चटपट थानेदार।

इस पर भालू कॊतवाल ने,
चूहे को बुलवाया।
थाने में घरवालों के संग,
उसको बंद कराया।

75. दादी को समझाओ जरा

मुझे कहानी अच्छी लगती
कविता मुझको बहुत सुहाती

पर मम्मी की बात छोड़िये
दादी भी कुछ नहीं सुनातीं

पापा को आफिस दिखता है
मम्मी किटी पार्टी जातीं

दादी राम राम जपती हैं
जब देखो जब भजन सुनातीं

मुझको क्या अच्छा लगता है
मम्मी कहां ध्यान देती हैं

सुबह शाम जब भी फुरसत हो
टी वी से चिपकी रहती हैं

कविता मुझको कौन सुनाये
सुना कहानी दिल बहलाये

मेरे घर के सब लोगों को
बात जरा सी समझ न आये

कोई मुझ पर तरस तो खाओ
सब के सब मेरे घर आओ

मम्मी पापा और दादी को
ठीक तरह से समझाओ

76. दादी ने जब खो खो खेली

हुई देर तक हंसी ठिठोली ,
दादी ने जब खो खो खेली ।

दौड़ रही थी दादी आगे ,
पीछे दौड़ी नानी ।
नहीं पा सकी नानी उनको ,
लगीं मांगने पानी ।
हंसी खूब बच्चों की टोली।
दादी ने जब खो खो खेली ।

दादी हारीं नानीं हारीं,
दोनों का दम फूला ।
सूज गया दादी का घुटना ,
नानीं जी का कूल्हा ।
मोल व्यर्थ में आफत ले ली ।
दादी ने जब खो खो खेली।

हाय! बुढ़ापे में मत दौड़ो ,
बच्चे अब समझाते।
कैसे रहना कैसे जीना,
बूढ़ों को सिखलाते ।
खाना पड़ी दर्द की गोली ,
दादी ने जब खो खो खेली ।

77. दादाजी का डंडा

दादाजी से झगड़ रहा था,
उस दिन टंटू पंडा।
मुरगी पहले आई दादा,
या फिर पहले अंडा।

दादा बोले व्यर्थ बात पर,
क्यों बकबक का फंडा।
काम धाम कुछ ना करता तू,
आवारा मुस्तंडा।

इतना कहकर दादा दौड़े,
लेकर मोटा डंडा।
'इससे पूछो 'मुरगी आई,
या फिर‌ पहले अंडा।

78. दादी का जन्म दिवस

आज जन्म दिन है दादी का

धूम मची है सारे घर में।
बच्चों के गाने इक स्वर में।
रम्मी तबला बजा रही है।
पम्मी घर को सजा रही है।
झूम रहे हैं सब मस्ती में,
सब को ज्वर है उन्मादी का।

हँसती है मुस्काती दादी।
सब पर प्यार लुटाती दादी।
सत्तर पार हो गई फिर भी,
है गुलाब सी पुलकित ताज़ी।
बच्चों ने भी घेर लिया है,
उन्हें सजाया शहज़ादी सा।

केक कटा है जन्म दिवस का।
देखो दादीजी का ठसका।
केक काटकर बाँट रही हैं।
हँसती हँसती डाँट रहीं है।
कहतीं आज, दिवस फिर आया,
धूम धड़क्का आज़ादी का।

79. दादीजी के बोल

मिश्री जैसे मीठे मीठे,
दादीजी के बोल पिताजी।

परियों वाली कथा सुनाती,
किस्से बड़े पुराने।
रहें सुरक्षा वाली छतरी,
हम बच्चों पर ताने।
बच्चे लड़ते आपस में तो,
न्यायधीश बन जातीं।
अपराधी को वहीं फटाफट,
कन्बुच्ची लगवातीं।
कितनी प्यारी प्यारी बातें,
बातें हैं अनमोल पिताजी।

यह कमरा है परदादा का,
उसमें थीं परदादी।
इस आँगन में रची गई थी,
बड़ी बुआ की शादी।
अब तक बैठीं रखे सहेजे,
पाई धेला आना।
पीतल का हंडा बतलातीं,
दो सौ साल पुराना।
दादी हैं इतिहास हमारा,
दादी हैं भूगोल पिताजी।

रोज़ शाम को दादाजी से,
चिल्लर लेकर जातीं।
दिखे जहाँ कम‌ज़ोर भिखारी,
उन्हें बाँटकर आतीं।
चिड़ियों को दाना चुगवातीं,
पिलवातीं हैं पानी।
पर सेवा में दया धर्म में,
बनी अहिल्या रानी।
चुपके चुपके मदद सभी की,
नहीं पीटतीं ढोल पिताजी।

अब भी काम वालियाँ हर दिन,
साँझ ढले आ जातीं।
चार चार रोटी सब्जी का,
अगरासन ले जातीं।
दिन ऊगे से बड़े बरेदी,
कक्का घर आ जाते।
कबरी गैया बित्तो भैंसी,
का नित दूध लगाते।
म‌क्खन दही मलाई मट्ठा,
लिया कभी ना मोल पिताजी।

सप्त ऋषि ध्रुवतारा दिखते,
उत्तर में बतलातीं।
मंगल लाल लाल दिखता है,
शुक्र कहाँ? समझातीं।
तीन तरैयों वाली डोली,
को कहतीं हैं हिरणी।
यह भी उन्हें पता है नभ में,
कहाँ विचरता भरणी।
लगता जैसे सारी विद्या,
आती उन्हें खगोल पिताजी।

80. दाल बाटियों के दिन

फूल हँसे पत्ते मुस्काये,
दाल बाटियों के दिन आये।
आँगन बीचों बीच अभी माँ,
ने कंडे सुलगाये।
बड़े-बड़े बैंगन लेकर फिर,
उनके बीच दबाये।

बैठ पटे पर चाची थीं जो,
बाटी गोल बनातीं।
इसका क्या इतिहास रहा क्या,
था भूगोल बतातीं।
बाल मंडली फिल्मी गाने,
ताक धिना धिन धिन धिन गाये।

धूप हल्दिया ओढ़े थे सिर,
पर सब जेठे सयाने।
नाच दिखाया काकी ने तो,
गाया था कक्का ने।
अपने अपने हुनर और हथ-
कंडे सभी बताते।
लोग अचानक हुए पात्र थे,
जैसे परी कथा के।
ना जाने क्यों छोटी भाभी,
झुका नज़र हँसकर शर्माए।

घी से भरे कटोरों में जब,
गोल बाटियाँ नाचीं।
हृदय हुआ फ़ुटबाल उछाल यह,
बात सौ टका साँची।
लड्डू बने चूरमा के थे,
कितने मीठे मीठे।
मजे मजे से खाए थे बस,
गए गले के नीचे।
खाने वाली पता नहीं क्यों कैसे,
फिर भी नहीं अघाये।

दाल बाटियाँ भटा बना था,
कितना भला भला था।
जिसके रग रग कण कण में बस,
माँ का प्यार मिला था।
बड़े बुजुर्गों ने दिल से ही,
इतना प्यार मिलाया।
मौसम जैसे फूल बना हो,
ताजा खिला खिलाया।
सूरज छुपा छुपाउअल खेले,
बदली फिर फिर स्वांग रचाये।

81. दीपक बनकर‌

सुस्ती दूर भगायें बहना,
झटपट आलस त्यागें।
दीपक बाती से बोला है,
आज रात भर जागें।

तेल सखा से भी वह बोला,
साथ साथ चलना है।
बाती के संग सखे रात भर,
तिल तिलकर जलना है।

बाती बोली काम हमारा,
उजयारा फैलाना।
दुनियाँ की ख़ुशियों की क़ातिर,
खुद जलकर मर जाना।

भले लोग औरों की करते,
रहते सदा भलाई।
सदियों से ही रीत यही है,
जग में चलती आई।

पेड़ नदी सागर झर‌ने नग,
बस देते ही जाते।
अपने ख़ुद के लिये किसी से,
कुछ भी नहीं मंगाते।

बिना किसी भी स्वार्थ भाव के,
हम भी जलते जायें।
दीपक बनकर सारे जग से,
तम को दूर भगायें।

82. दिन और रात

रोज रोज हो जाता है दिन,
रोज रोज हो जाती रात।
बोलो बापू क्या है कारण,
बोलो बापू क्या है बात।

बापू बोले बात जरासी,
बात ठीक से सोचा कर।
धरती माता रोज लगाती,
सूरज बाबा के चक्कर।
पेट सामने जब धरती का,
सूरज बाबा के होता।
उसी समय धरती के ऊपर,
सोनॆ जैसा दिन होता।
धरती को सूरज की होती,
कितनी अदभुत यह सौगात।

जहां पीठ धरती की होती,
वहां अंधेरा हो जाता।
धरती के पिछले हिस्से से,
सूरज जरा न दिख पाता।
थके थकाये दिन के प्राणी,
नींद ओढ़कर सो जाते,
जंगल नदियां पर्वत सागर,
अंधियारे में खो जाते।
बेटे इसी समय को हम सब,
दुनियां वाले कहते रात।

बापू बोले इसी तरह से,
होते रहते हैं दिन रात।

83. धन्य धरा बुंदेली

धन्य धरा बुंदेली है जा,
धन्य धरा बुंदेली।

रामलला कौ नगर ओरछा,
कित्तो लोक लुवावन।
कलकल,हरहर बहत बेतवा,
कित्ती नौनी पावन।
बीच पहारन में इतरा रई,
जैसें दुल्हन नवेली।
धन्य धरा बुंदेली है जा,
धन्य धरा बुंदेली।

वीर नारियां ई धरती की,
रईं दुस्मन पे भारी।
जान लगाकें लड़ी लड़ाई,
जीतन कबहूं ने हारीं।
जुद्ध भूम में लच्छमी बाई,
तलवारन से खेली।
धन्य धरा बुंदेली है जा,
धन्य धरा बुंदेली।

गौंड़ बंस की रानी ने तो,
कैसो कहर ढहाओ।
दुर्गावती नाम सुनकें तो,
अकबर लौ चकराओ।
सिंगौरगढ़ में रानी की,
ठाँड़ी अबे हवेली।
धन्य धरा बुंदेली है जा,
धन्य धरा बुंदेली।

फागें कवि ईसुरी कीं,
दुनियाँ में रंग जमा रईं।
बूढ़े बारे लोग लुगाई,
बिटियां लौ अब गा रईं।
एक एक चौकड़िया कित्ती,
मीठी और रसीली।
धन्य धरा बुंदेली है जा,
धन्य धरा बुंदेली।

छत्रसाल की तलवारन ने,
कैसी धूम मचाई।
जित जित घोड़ा ने मुख कीनो,
उत उत फत्ते पाई।
चंबल टमस नरबदा जमुना,
लौ रई सत्ता फैली।
धन्य धरा बुंदेली है जा,
धन्य धरा बुंदेली।

ब्याओ सादियन में हरदौल,
अबे तक पूजे जा रये।
सबरे काम छोड़ कें मम्मा,
चीकट लेकें आ रये।
लड़ुआ जल्दी परसो मम्मा,
पंगत अब लौ मेली।
धन्य धरा बुंदेली है जा,
धन्य धरा बुंदेली।

आल्हा जैसे वीर बहादुर,
ई धरती पे आये।
मरे ने कबहूं काऊ के मारे,
ई सें अमर कहाये।
दुस्मन खों तो ऐंसे पौलो,
जैसें गाज़र मूली।
धन्य धरा बुंदेली है जा,
धन्य धरा बुंदेली।

सर‌नागत खों सरन दये में,
बुंदेली रये आगे।
समर भूम सें हटे कबहूं ने,
अपनी पीठ दिखाकें।
कबहूं ने छोड़ी भासा अपनी,
कबहूं ने अपनी बोली।
धन्य धरा बुंदेली है जा,
धन्य धरा बुंदेली।

84. नर्मदा में नौका विहार

अम्मा बापू भैया औ मैं,
मिलकर पूरे चार हुए।
करना था नौका विहार तो,
उसमें सभी सवार हुए।

नाव बड़े इंजन वाली थी,
सर सर सर सर भाग चली।
नदी नर्मदा मैया की जो,
गोदी में थी बढ़ी पली।

रेवा के दोनों तट कैसे,
सुन्दर मनमोहक दिखते।
शीतल जल कण मोती जैसे,
ठिल-ठिल ठिल-ठिल हँसते।

एक तरफ ओंकारेश्वर थे,
एक तरफ थे ममलेश्वर।
नदी नर्मदा बहती जाती,
करती कल-कल हर-हर-हर।

हवा चली तो ऊँची लहरें,
हँसती और उछलती थीं।
डाल हाथ में हाथ पवन के,
मस्ती करती चलतीं थी।

हाथ डालकर ठण्डे जल में,
लहरों का आनंद लिया।
चुल्लू चुल्लू पानी लेकर,
हाथों से कई बार पीया।

अम्मा ख़ुश थीं बापू थे ख़ुश,
भैया भी आनंदित था।
नदिया पार कर चुके थे हम,
लगा सामने फिर तट था।

नौका से हम बाहर निकले,
कूद-कूद तट पर आये।
शिवजी के अम्मा बापू ने,
हमको दर्शन करवाये।

85. नुस्खे सीखो दादी से

तरबूजा आया था घर में
काटा और खाया था घर में।
रम्मू ने कुछ ज़्यादा खाया
गुड़ गुड़ उसके हुआ उदर में।
नहीं डाक्टर मिला कहीं भी
कर्फ्यू कल से लगा शहर में।
दादी ने देसी नुस्खे से
उसको ठीक किया पल भर में।

86. नदी ताल भर जाने दो

कुंठा के दरवाज़े खोलो.
पवन सुगंधित आने दो।
ओंठों पर से हटें बंदिशें.
बच्चों को मुस्काने दो।

भौरों के गुंजन पर अब तक.
कभी रोक न लग पाई।
फूलों के हँसने की फाइल.
रब ने सदा खुली पाई।
थकी हुई बैठी फूलों पर.
तितली को सुस्ताने दो।

गुमसुम गुमसुम मौसम बैठा.
अंबर भी क्यों चुप चुप है।
पेड़ लतायें मौन साधकर.
बता रहीं अपना दुख है।
बादल से ढोलक बजवाओ.
हवा मुखर हो जाने दो।

नीरस सुस्ती और उदासी.
शब्द कहाँ से यह आये।
इनकी हमको कहाँ ज़रूरत.
इन्हें धरा पर क्यों लाये।
अमृत की बूँदें बरसाओ.
नदी ताल भर जाने दो।

87. नाना आये

नाना आये, नाना आये,
आज हमारे नाना आये।
बोला तो था पिज्जा बर्गर,
नाना चना चबेना लाये।

ये मनमानी थी नानाकी,
नाना की थी ये मनमानी।
बात हमारी क्यों ना मानी,
करना अपने मन की ठानी।
हमने मांगे थे रसगुल्ले,
नाना भुना चिखोना लाये।

नाना को मैंनेँ बोला था,
बोला था मैंनें नाना को
आज हमारा मन होता है,
खाने का फल्ली दाना को।
रिक्शे वाले से लड़ बैठे,
बैठे खड़े बिदोना लाये।

हर दिन नानी से लड़ते हैं,
लड़ते हैं नानी से हर दिन।
उचक उचक कत्थक के जैसी,
ताक धिना धिन ताक धिना धिन।
साक्षात हाथी ले आये,
कहते बड़ा खिलोना लाये।

88. नया साल‌

नया साल सुंदर सपना,
हम तुम सबका है अपना।

हममें बची बुराई जो,
चलो कहीं आयें दफना।

हमें श‌पथ अब लेना है,
काम सदा अच्छे करना।

अच्छाई के साथ रहें,
सदा बुराई से लड़ना।।

बहुत कठिन है डगर अभी,
व्यर्थ काम में क्यों पड़ना।

आयें राह में रोड़े तो,
उनसे निर्भय हो लड़ना।

पथ पर आगे बढ़ना है,
नहीं किसी से अब डरना।

पोखर तो ठहरा पानी,
बनकर नदी सदा बहना।

89. नहीं बूंद भर पानी

दादा कहते हाती डुब्बन, जल होता था नदियों में।
कहीं कहीं तो मगरमच्छ का ,डर होता था नदियों में।

डुबकी जब गहरे में लेते ,थाह नहीं मिल पाती थी।
बड़े बड़े मेंढक कछुओं का, डर होता था नदियों में।

बीच में गहरी चट्टानों के, फँस जाने का डर होता।
खून से लथपथ तैराकों का, डर होता था नदियों में।

गरमी में भी मटका लेकर, दादी जल भर लाती थी।
बारहों महिने जब पानी, झर झर होता था नदियों में।

सुबह सुबह ही रोज नहाकर, सूरज को अरगा देते।
वैदिक मंत्रों से स्वागत, जी भर होता था नदियों में।

भले नारियां तीरों पर, पानी में छप छप करतीं हों।
नदी पार कर जाने वाला, नर होता था नदियों में।

अब तो नदी घाट सब सूने, नहीं बूँद भर पानी है।
पहले जी भर के पानी, क्योंकर होता था नदियों में?

पर्यावरण प्रदूषण क्या है, नही‍ म् जानता था कोई।
इस कारण ही हर हर का, स्वर होता था नदियों में।

90. पानी नहीं नहानी में

जरा ठीक से देखो बेटे,
पानी नहीं नहानी में।
तुमको आज नहाना होगा
इक लोटे भर पानी में।

नहीं बचा धरती पर पानी,
बहा व्यर्थ मन मानी में।
खूब मिटाया हमने-तुमने,
पानी यूं नादानी में।

बीस बाल्टी पानी सिर पर,
डाला भरी जवानी में।
पानी को जी भर के फेंका,
बिना विचारे पानी में।

ढेर-ढेर पानी मिलता था,
सबको कौड़ी-कानी में।
अब तो पानी मोल बिक रहा,
पैसा बहता पानी में ।

कितना घाटा उठा चुके हैं,
हम अपनी मनमानी में।
नहीं जबलपुर में है पानी,
ना ही अब बड़वानी में।

91. प्रजातंत्र का राजा

एक कहानी बड़ी पुरानी, कहती रहती नानी।
शेर और बकरी पीते थे, एक घाट पर पानी।
कभी शेर ने बकरी को, न घूरा न गुर्राया।
बकरी ने जब भी जी चाहा, उससे हाथ मिलाया।
शेर भाई बकरी दीदी के, जब तब घर हो आते।
बकरी के बच्चे मामा को, गुड़ की चाय पिलाते।
बकरी भी भाई के घर पर, बड़े शान से जाती।
कभी मुगेड़े भजिये लड्डू, रसगुल्ले खा आती।
किंतु अचानक ही जंगल में, प्रजातंत्र घुस आया।
और प्रजा को मिली शक्तियों, से अवगत करवाया।
उँच नीच होता क्या होता, छोटा और बड़ा क्या।
जाति धर्म वर्गों में होता, कलह और झगड़ा क्या।
निर्धन और धनी लोगों में, बड़ा फासला होता।
एक रहा करता महलों में, एक सड़क पर सोता।
शेर भाई को जैसे ही, यह बात समझ में आई।
तोड़ी बकरी की गर्दन, और बड़े स्वाद से खाई।
जो भी पशु मिलता है उसको, उसे मार खा जाता।
जंगल में अब प्रजातंत्र का, वह राजा कहलाता।
प्रजातंत्र का मतलब भी वह, दुनिया को समझाता।
इसी तंत्र में जिसकी मर्जी, जो हो वह कर पाता।

92. पता नहीं क्यों

हाथी घोड़े बंदर भालू,
की कविताएं मुझे सुहातीं।

पता नहीं क्यों अम्मा मुझको,
परियों वाली कथा सुनाती।

मुझको य‌ह मालूम पड़ा है,
परियां कहीं नहीं होतीं हैं।

जब‌ सपने आते हैं तो वे,
पलकों की म‍हमां होती हैं।

पर हाथी भालू बंदर तो,
सच में ही कविता पढ़‌ते हैं।

कविता में मिल-जुल कर रहते,
कविता में लड़ते-भिड़ते हैं।

बंदर खीं-खीं कर पढ़ता है,
हाथी की चिंघाड़ निराली।

भालू हाथी शेर बजाते,
इनकी कविता सुनकर ताली।

सियार मटककर दोहे पढ़ता,
और लोमड़ी गजल सुनाती।

कभी शेरनी गजलें सुनने,
भूले-भटके से आ आती।

रोज नीम के पेड़ बैठकर,
कोयल मीठे गाने पाती।

पता नहीं क्यों अम्मा मुझको,
परियों वाली कथा सुनाती।

हिरण चौकड़ी भरकर गाता,
होता है जब वह मस्ती में।

रोज सुबह ही गीत सुनाता,
मुर्गा जब होता बस्ती में।

शतुर्मुग की ऊंची गर्दन,
नहीं किसी मुक्तक से कम है।

कविता पढ़कर करें सामना,
गधा कह रहा किसमें द‌म है।

बड़ा सलौना सुंदर लगता,
बकरी का मैं-मैं का गाना।

मन को झंकृत कर देता है,
सुबह-सुबह से गाय रंभाना।

बतख‌ नदी और तालाबों में,
तैर-तैर कर छंद सुनाती।

मछली की रंगीन लोरियां,
मन को पुल‌कित करकर जातीं।

देख-देख मैंना को तोता,
हर दिन पढ़ता सुबह प्रभाती।

पता नहीं क्यों अम्मा मुझको,
परियों वाली कथा सुनाती।

93. पतंगें

गुन गुन धूप तोड़ लाती हैं,
सूरज से मिलकर आती हैं,
कितनी प्यारी लगें पतंगें,
अंबर में चकरी खाती हैं।

ऊपर को चढ़ती जाती हैं,
फर फर फिर नीचे आती हैं,
सर्र सर्र करतीं करती फिर,
नील गगन से बतयाती हैं।

डोरी के संग इठलाती हैं,
ऊपर जाकर मुस्काती हैं,
जैसे अंगुली करे इशारे,
इधर उधर उड़ती जाती हैं।

कभी काटती कट जाती हैं,
आवारा उड़ती जाती हैं,
बिना सहारे हो जाने पर,
कटी पतंगें कहलाती हैं।

तेज हवा से फट जाती हैं,
बंद हवा में गिर जाती हैं,
उठना गिरना जीवन का क्रम,
बात हमें यह समझाती हैं।

94. पर्यावरण बचाओ

भैया पानी नहीं बहाना
अब घंटे भर नहीं नहाना।

पानी बहुत हुआ है मँहगा
बड़ा कठिन है पानी लाना।

अब तो सहन नहीं होता है
सूरज का अंगार गिराना।

सोन चिरैया भी गाती है
जल जंगल ज़मीन का गाना।

हम सबको है बड़ा ज़रूरी
धरती का पर्यावरण बचाना।

95. प्रकृति की मौलिकता

दो-दो फुट दिन में जुड़वा दें,
दो फुट की बढ़वा दें रात।
किसी तरह से क्यों न बापू,
बड़े-बड़े कर दें दिन रात।

छोटे-छोटे दिन होते हैं,
छोटी-छोटी होती रात।
ना हम चंदा से मिल पाते,
ना सूरज से होती बात।
नहीं जान पाते हैं अम्मा,
क्या होती तारों की जात।

ना ही हमें पता लग पाता,
अंबर की कितनी औकात।
माँ बोली ईश्वर की रचना,
सुंदरतम अदभुत सौगात।
कभी नहीं दे पायेंगे हम,
उसकी मौलिकता को मात।
बापू बोले सदा प्रकृति ने,
हमको दिया समय पर्याप्त।

हम ही ना सूरज चंदा को,
तारों को कर पाते ज्ञात।
एक-एक पल है उपयोगी,
एक-एक कण है सौगात।
यदि समय श्रम का नियमन हो,
हम सब कुछ कर सकते प्राप्त।

96. बिना परीक्षा

बिना परीक्षा दिए छिपकली,
हो गई पहली कक्षा पास।

दीवारों पर घूम रही थी,
फिर भी चिंतित और उदास।

किए बिना श्रम मिली सफलता,
उसे न आई बिलकुल रास‌।

नाम लिखाने फिर पहली में,
पहुँच गई शिक्षक के पास।

97. बाबूजी का दिवाला

आठ-आठ सौ की दो साड़ी,
तेरह सौ का चश्मा काला।

मां बोली कुल कितना होगा,
है क्या तुमने जोड़ निकाला?

बेटा बोला, जोड़ ठीक है,
पर मां तुमने डाका डाला।

इसी तरह से तो निकला है,
बाबूजी का हाय दिवाला।

98. बचपन का चेहरा

चलो किसी ठेले पर चलकर,
दोनों खाएँ चना चबेना।
आधे पैसे मैं दे दूँगा,
आधे पैसे तुम दे देना।

झूठ बोलना ठीक नहीं है,
लिखा किताबों में है ऐसा।
झूठ बोलने वाला हर पल,
मन ही मन डरता रहता है ।
हमने खाई चाट पकौड़ी,
अम्मा से सच-सच कह देना।

चुरा-चुरा कर रात‌ चाँदनी,
फूलों ने भीतर भर ली है।
अपनी कंचन निर्मल काया,
दुग्ध बरफ जैसी कर ली है।
चोरी का इल्जाम भूल से,
भी फूलों पर मत धर देना।

बचपन की यह भोली चोरी,
कभी नहीं चोरी कहलाती।
मात यशोदा कृष्ण कन्हैया,
की चोरी से खुश हो जातीं।
ऐसी मन भावन चोरी को,
श्वास-श्वास भीतर भर लेना।

चोरी की परिभाषा भी तो,
बचपन कहाँ जान पाता है।
जो भी उसे ठीक लगता है,
उठा-उठा कर ले आता है।
वहाँ सिर्फ ईमान लिखा है,
बचपन का चेहरा पढ़ लेना।

99. बादल जी

तितली उड़ती,चिड़िया उड़ती,
कौये कोयल उड़ते।
इनके उड़ने से ही रिश्ते,
भू सॆ नभ के जुड़ते।

धरती से संदेशा लेकर ,
पंख पखेरु जाते।
गंगा कावेरी की चिठ्ठी,
अंबर को दे आते।

पूरब से लेकर पश्चिम तक,
उत्तर दक्षिण जाते।
भारत की क्या दशा हो रही ,
मेघों को बतलाते।

संदेशा सुनकर बाद‌लजी,
हौले से मुस्कराते।
पानी बनकर झर झर झर,
धरती की प्यास बुझाते।

100. बेटे की सीख‌

बेटे ने उस दिन बापू से,
कहा, पिताजी वोट डालिये।
आज मिला चुनने का मौका,
इस मौके को को नहीं टालिये।

यह अवसर भी गया हाथ से,
पांच साल फिर न आयेगा।
थोड़ी सी गफलत के कारण,
गलत आदमी चुन जायेगा।

ऐसे में तो अंधकार के,
हाथों सूरज हार जायेगा।
झूठों के चाबुक सॆ सच्चा,
निश्चित ही सच मार खायेगा।

यह कहना है व्यर्थ पिताजी,
कि चुनाव से क्या करना है?
“सच्चाई के वोट वोट से,
अच्छों की रक्षा करना है।”

उठो पिताजी करो शीघ्रता,
अच्छे मतदाता बन जाओ।
किसी योग्य अच्छे व्यक्ति को,
चलो वोट डालकर आओ।

101. बेसन‌ की मिठाई

बेसन की मिठाई है आई रे,
मोरे मम्मा ने भेजी।
मम्मा ने भेजी और माईं ने भेजी।
बेसन की मिठाई है आई रे,
मोरे मम्मा ने भेजी।

देखो मिठाई है कितनी गुरीरी,
घी की बनी है और रंग की है पीरी।
माईं ने ममता मिलाई रे,
मोरे मम्मा ने भेजी।

काजू डरे हैं और किसमिस डरी है,
पिस्ता की रंगत तो कैसी हरी है।
सिंदूरी केसर मिलाई रे,
मोरे मम्मा ने भेजी।

नाना ने मीठे के डिब्बा बनाये,
नानी ने रेशम के धागे बंधाये।
जी भरकें आशीष भिजवाई रे,
मोरे मम्मा ने भेजी।

डिब्बा में निकरीं हैं सतरंगी चिठियां,
चिठियों में लिक्खी कैसी मीठी बतियां।
चांदी सी चमके लिखाई रे,
मोरे मम्मा ने भेजी।
बेसन की मिठाई है आई रे,
मोरे मम्मा ने भेजी।

102. बाबू गधाराम‌

एक गधे को मिली नौकरी,
दफ्तर के बाबू की।
सबसे अधिक कमाऊ थी जो,
वह कुर्सी काबू की।

काम कराने के बद्ले वह,
जमकर रिश्वत लेता।
जितना खाता उसका आधा,
साहब को वह देता।

साहब भालूराम मजे से,
सभी काम कर देता।
बाबू गधाराम था उसका,
सबसे बड़ा चहेता।

मौज मजे मेम भालू दादा,
सुरा विदेशी पीते,
और बुलाकर गधेराम को,
देशी पकड़ा देते।

देशी पीकर गधेराम का,
गला हो गया भोंपू।
इस कारण अब करते रहते,
दिन भर चेंपू चेंपू।

103. बेईमानी का फल‌

मिली नौकरी चूहे जी को,
बस के कंडेक्टर की।
लगे समझने बस को जैसे,
खेती हो वह घर की।

बस में बैठे सभी मुसाफिर,
उनसे टिकिट मंगाते।
पैसे तो वे सबसे लेते,
पर ना टिकिट बनाते।

पूछा लोगों ने भैयाजी
कैसी बेई मानी।
सरकारी पैसे से क्यों ये,
करते छेड़ाखानी।

बोला... टिकिट बनाता तो हूं,
तुम तक पहुंच न पाते।
कागज़ खाने की आदत से,
टिकिट हमीं खा जाते।

उत्तर सुन, लोगों ने पूछा,
नोट क्यों नहीं खाये।
लिये टिकिट के रुपये हैं तो,
उनको कहां छुपाये।

बगलें लगा झांकने चूहा,
छोड़ छाड़ बस भागा।
बिल्ली पीछे दौड़ पड़ी तो,
मारा गया अभागा।

104. बुखार की दवा

कुत्ता बोला, बिल्ली दीदी, मुझको चढ़ा बुखार।
यदि हो सके संभव तो, कोई दवा करो तैयार।।

बिल्ली बोली, भौंक भौंक कर, तुम होते बीमारा।
बंद रखोगे मुँह तो होगी, बीमारी की हार।।

यदि छोड़ दो पीछा करना, तुम निरीह लोगोंका।
कुत्ता भाई निश्चित तुम पर, कभी न ताप चढ़ेगा।।

105. बच्चे सरकार चलायेंगे

दिल्ली जाकर अब हम तो,
अपनी सरकार बनायेंगे।
भरत देश के बालक हैं हम,
भारत देश चलायेंगे।

जब अपनी सरकार बनेगी,
ऐसा अलख जगायेंगे।
भय और भूख‌ मिटेगी पल मॆं,
भ्रष्टाचार हटायेंगे।

अब आतंकी सीमाओं से,
भीतर न घुस पायेंगे।
यदि घुसे चोरी चोरी तो,
सारे मारे जायेंगे।

स्वच्छ प्रशासन देंगे सबको,
बिजली घर घर में होगी।
बिना कटोती मिलेगी सबको,
यह करके दिखलायेंगे।

त्राहि त्राहि भी अब पानी की,
किसी गांव में न होगी।
सारे शहर और कस्बों को,
हम पानी पिलवायेंगे।

रिश्वत, घूस कमीशन लेता,
अगर कोई भी मिलता है।
बीच सड़क या चौराहे पर,
हम फाँसी लटकायेंगे।

डर के मारे भूत भागते,
ऐसा लिखा किताबों में।
यही व्यवस्था प्रजातंत्र में,
हम करके दिखलायेंगे।

तस्कर डाकू राजनीति में,
अब घुस भी न पायेंगे।
यदि आ गये चोरी से तो,
उनको मार भगायेंगे।

बच्चों के द्वारा बच्चों की,
और बच्चों की ही खातिर।
दिल्ली में लंबे अर्से तक,
हम सरकार चलायेंगे।

106. बर्फी की शादी

जिस दिन होना थी लड्डू की बर्फीजी से शादी,
बर्फी बहुत कुरूप किसी ने झूठी बात उड़ा दी।

गुस्से के मारे लड्डूजी जोरों से चिल्लाये।
बिना किसी से पूँछतांछ वापस बारात ले आये।

लड्डू के दादा रसगुल्ला बर्फी के घर आये।
बर्फीजी को देख सामने मन ही मन मुस्काये।

बर्फी तो इतनी सुंदर थी जैसे कोई परी हो।
पंख लगाकर आसमान से अभी अभी उतरी हो।

रसगुल्लाजी फिदा हो गये उस सुंदर बर्फी पर।
ब्याह कराकर उसको लाये वे चटपट अपने घर।

लड्डू क्वांरा बेचारा अब लड़ता रसगुल्ला से।
रसगुल्ला मुस्कराता रहता बिना किसी हल्ला के।

सुनी सुनाई बातों पर तुम कभी ध्यान मत देना।
क्या सच है क्या झूठ सुनिश्चित खुद जाकर‌ कर लेना।

107. बादल भैया ता-ता थैया

बादल भैया ता-ता थैया,
पानी के संग बरसा देना,
कम से कम दस पाँच रुपैया।

नोट नहीं सिक्के बरसाना।
एक नहीं कई बार गिराना।
तीस रुपये में हो जाएगा,
चॉकलेट का ठौर ठिकाना।

चॉकलेट की दम पर ही तो,
खेल सकेंगे चोर सिपहिया।

विनती है, दुःख सारे हर लो।
सिक्कों की बौछारें कर दो।
हम सब बालक शरण तुम्हारी,
आज हमारी झोली भर दो।

उन पैसों से ले आएंगे,
चना, कुरकुरा, गुड़ की लैया।

अगर नहीं सिक्के बरसाए,
भागे सिक्के बिना गिराये।
तो चन्दा तारों से कहकर,
हमने चाँटे सौ लगवाये।

चाँटे खाकर हाल तुम्हारा,
कैसा होगा बादल भैया।

108. बिल्ली की दुआएँ

नया साल हो, बिल्ली मौसी,
बहुत मुबारक, चूहा बोला।

मोबाइल पर ही मौसी के,
कानों में मीठा रस घोला।

बेटे चूहे मौसीजी ने,
उसको हँसकर दिया जवाब।

तुम्हें दुआएँ तभी मिलेंगीं,
जब ख़ुद आओ मेरे पास।

अगर दुआएँ मोबाइल पर,
ही मैं तुमको दूँगी।

मेरे बेटे असर ज़रा भी,
तुम पर नहीं करेंगी।

 
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