Hindi Kavita
प्रभुदयाल श्रीवास्तव
Prabhudayal Shrivastava
 Hindi Kavita 

Hindi Poetry Prabhudayal Shrivastava

हिन्दी कविता प्रभुदयाल श्रीवास्तव

1. हिन्दी भाषा का रुतवा

जब गुड़िया कापी में लिखती,
क, ख, ग, घ, च, छ, ज ।
हंसकर सबको बतलाती है,
हिन्दी भाषा का रुतवा ।

मजबूरी में जब अंग्रेजी,
में ए. बी .सी .डी लिखती ।
हारी हारी थकी थकी सी,
सूखे पत्ते सी दिखती ।

गुस्से में कहती है मुझको,
हिन्दुस्तानी पढ़ना है ।
अंग्रेजी भाषा से मुझको,
अभी नहीं माँ जुड़ना है ।

2. रेल गाड़ी पर कविता
छुक छुक रेल

एक ज़माना था जब बच्चो,
रेल चला करती थी छुक छुक ।
इंजन काले हाथी जैसा,
धुंआ निकलता था तब भुक भुक।

चाल बहुत धीमी धीमी सी,
चलता जैसे मोपेड वाहन ।
तीस किलोमीटर प्रति घंटे,
यात्री का थक जाता तन मन ।

थोड़ी देर चला की इंजन,
थक कर चूर चूर हो जाता ।
कोयला खाता पानी पीता,
तब ही आगे को बढ़ पाता।

साथ किलोमीटर जाने में,
समय तीन घंटे लगते थे ।
गुस्से में तो पैसेंजर तक,
गाड़ी को गाली बकते थे ।

किन्तु समय अब बदल गया है ।
बूढ़े इंजन बदल गए हैं ।
नए इंजन बिजली वाले,
आये बिलकुल नए नए हैं ।

डिब्बे भी हैं चकमक चकमक,
सीटें भी लकदक करती हैं ।
बिजली की नीली रोशनियां,
आँखों को शीतल करती हैं ।

बिजली वाले नूतन इंजन,
क्षण भर में ही गति धर लेते ।
साठ किलोमीटर की दूरी,
तीस मिनिट में तय कर लेते ।

सुविधा जनक सभी डिब्बों में,
दुविधा कभी कभी होती है ।
बिजली कभी बंद हो जाती,
गाड़ी खड़ी खड़ी रोती है ।

बहुत तेज चलती गाडी में,
जब दुर्घटना हो जाती है।
घायल होते कई मुसाफिर,
जान सैकड़ों की जाती है ।

तेज गति से चलने में तो,
यूं होते हैं कई फायदे ।
पर दुर्घटना हो जाती यदि,
चले छोड़कर नियम कायदे।

इसीलिए हर नियम कायदे,
का पालन करना होगा ।
लोगों को समझाइश देकर,
उन्हें ज्ञान देना होगा ।

यदि रेल लाइन के आसपास,
कोई विध्वंसक मिलता है ।
करता पटरी से छेड़ छाड़,
कोई अपराधी दिखता है।

तो तत्पर हो थाने जाकर,
या स्टेशन पर खबर करो ।
कर्तव्य करो निर्भय होकर,
न शैतानों से कभी डरो ।

तभी देश की रेल गाड़ियां,
निर्भय होकर चल पाएंगीं ।
और यात्रियों को तत्पर हो,
मंजिल तक ले जा पाएंगीं ।

3. अंधकार की नहीं चलेगी

मां बोली सूरज से बेटे, सुबह हुई तुम अब तक सोये,
देख रही हूं कई दिनों से, रहते हो तुम खोये खोये।

जब जाते हो सुबह काम पर, डरे डरे से तुम रहते हो,
क्या है बोलो कष्ट तुम्हें प्रिय,साफ़ साफ़ क्यों न कहते हो।

सूरज बोला सुबह सुबह ही, कोहरा मुझे ढांप लेता है,
निकल सकूं कैसे चंगुल से, कोई नहीं साथ देता है।

मां बोली हे पुत्र तुम्हारा, कोहरा कब है क्या कर पाया,
उसके झूठे चक्रव्यूह को, काट सदा तू बाहर आया।

कवि कोविद बच्चे बूढ़े तक, लेते सदा नाम हैं तेरा,
कहते हैं सूरज आया तो, भाग गया है दूर अंधॆरा।

निश्चित होकर कूद जंग में, विजय सदा तेरी ही होगी,
तेरे आगे अंधकार या, कोहरे की न कभी चलेगी।

4. अब मत चला कुल्हाड़ी

अब मत चला कुल्हाड़ी बंदे,
अब मत चला कुल्हाड़ी।

देख रहा तू कुल्हाड़ी,
इसी ने काटे कई पेड़।
नहीं किसी को छोड़ा बंदे,
बूढ़े युवा अधेड़।
भूखी नदिया सूखे नाले,
नंगी हुई पहाड़ी बंदे,
अब मत चला कुल्हाड़ी।

कहाँ मकोरे कहाँ करोंदे,
झरबेरी की बाड़?
लुच, लुच लाल गुमचियाँ ओझल,
जंगल हुये उजाड़।
घूम रहे जंगल में आरे,
नहीं रुक रही गाड़ी ब‍ंदे,
अब मत चला कुल्हाड़ी।

बादल फटा जलजले जैसा,
पानी ढेरम ढेर।
एक दिवस में तीस इंच तक,
हुआ गजब अंधेर।
सूखा पसरा बाढ़ आ गई,
धरती बहुत दहाड़ी बंदे,
अब मत चला कुल्हाड़ी।

दो पहिया, मोटर, कारों के,
सड़कों पर अंबार।
आसमान में ईंधन छोड़ें,
विष से भरे गुबार।
कान फोड़ते कोलाहल ने,
भू की छाती फाड़ी बंदे,
अब मत चला कुल्हाड़ी।

पर्यावरण प्रदूषण की यूँ,
होती घर घर बात।
किंतु समस्या के निदान में,
नहीं किसी का साथ।
बना नहीं कोई भी पाया,
सबने बात बिगाड़ी बंदे,
अब मत चला कुल्हाड़ी।

अभी समय है अब भी चेतो,
दुनियाँ भर के देश।
चीन अमरिका ने ओढ़े हैं,
नकली झूठे वेश।
पर्यावरण प्रदूषण के ये,
सबसे बड़े खिलाड़ी बंदे,
अब मत चला कुल्हाड़ी।

5. आधी रात बीत गई

आठ लोरियाँ सुना चुकी हूँ,
परियों वाली कथा सुनाई।

आधी रात बीत गई भैया,
अब तक तुमको नींद न आई।

थपकी दे दे हाथ थक गए,
दिया कंठ ने भी अब धोखा ।

अब तो सोजा राजा बेटा,
तू है मेरा लाल अनोखा।

चूर-चूर मैं थकी हुई हूँ,
सचमुच लल्ला राम दुहाई।

आधी रात बीत गई बीत भैया,
अब तक तुमको नींद न आई।

सोए पंख पखेरू सारे,
अलसाए हैं नभ के तारे।

करें अंधेरे पहरेदारी,
धरती सोई पैर पसारे।

बर्फ-बर्फ हो ठंड जम रही,
मार पैर मत फेंक रजाई।

आधी रात बीत गई बीत भैया,
अब तक तुमको नींद न आई।

झपकी नहीं लगी अब भी तो,
सुबह शीघ्र ना उठ पाओगे।

यदि देर तक सोए रहे तो,
फिर कैसे शाला जाओगे।

समझा-समझा हार गई मैं,
बात तुम्हें पर समझ न आई।

आधी रात बीत गई भैया
अब तक तुमको नींद न आई।

6. अब दिन शाला चलने के

अब दिन शाला चलने के...

बीते दिन लड़ने-भिड़ने के,
अब आए दिन पढ़ने के।

छोड़ो अब तो गुड्डा-गुड़िया,
अब दिन कलम पकड़ने के।

घर में रहकर रोने-धोने,
अब दिन गए मचलने के।

कलम-किताबें बस्ता लेकर,
अब दिन शाला चलने के।

7. आम की चटनी

आवाज़ आ रही खटर पटर,
पिस रहे आम सिलबट्टे पर।

अमियों के टुकड़े टुकड़े कर,
मां ने सिल के ऊपर डाले।
धनियां मिरची भी कूद पड़े,
इस घोर युद्ध में, मतवाले।
फिर हरे पुदेने के पत्ते,
भी मां ने रण में झोंक दिये।
फिर बट्टे से सबको कुचला,
सीने में खंजर भोंक दिये।
मस्ती में चटनी पीस रही,
बैठी मां सन के फट्टे पर।
पिस रहे आम सिलबट्टे पर।

आमों की चटनी वैसे ही,
तो लोक लुभावन होती है।
दादा दादी बाबूजी को,
गंगा सी पावन दिखती है।
भाभी को यदि कहीं थोड़ी,
अमियों की चटनी मिल जाती।
तो चार रोटियों के बदले,
वह आठ रोटियां खा जाती।
भैया तो लगा लगा चटनी,
खाते रहते हैं भुट्टे पर।
पिस रहे आम सिलबट्टे पर।

चटनी की चाहत में एक दिन,,
सब छीना झपटी कर बैठे।
भैया भाभी दादा दादी,
चटनी पाने को लड़ बैठे।
छोटी दीदी ने छीन लिया,
भैया से चटनी का डोंगा,
इस खींचातानी में डोंगा,
धरती पर गिरा हुआ ओंधा।
चटनी दीदी पर उछल गई,
दिख रहे निशान दुपट्टे पर।
पिस रहे आम सिलबट्टे पर।

8. आसमान में छेद कराते दादाजी

गरम दूध मुझको पिलवाते दादाजी।
काजू या बादाम खिलाते दादाजी।

थाली में भर भर कर चंदा की किरणे,
मुझे चांदनी में नहलाते दादाजी।

कभी कभी जब मैं जिद पर अड़ जाता हूं,
तोड़ गगन से लाते तारे दादाजी।

मुझको जब भी लगती है ज्यादा गरमी,
बादल से सूरज ढकवाते दादाजी।

नहीं बूंद भर पानी जब होता घर में,
आसमान में छेद कराते दादाजी।

फिर वे मेघों को आदेश दिया करते,
जब चाहे जब जल गिरवाते दादाजी।

9. अम्मू ने फिर छक्का मारा

गेंद गई बाहर दोबारा,
अम्मू ने फिर छक्का मारा।

गेंद आ गई टप्पा खाई।
अम्मू ने की खूब धुनाई।
कभी गेंद को सिर पर झेला,
कभी गेंद की करी ठुकाई।
गूंजा रण ताली से सारा।
अम्मू ने फिर छक्का मारा।

कभी गेंद आती गुगली है।
धरती से करती चुगली है।
कभी बाउंसर सिर के ऊपर,
बल्ले से बाहर निकली है।
अम्मू को ना हुआ गवारा।
अम्मू ने फिर छक्का मारा।

साहस में न कोई कमी है।
सांस पेट तक हुई थमी है।
जैसे मछली हो अर्जुन की,
दृष्टि वहीं पर हुई जमी है।
मिली गेंद तो फिर दे मारा।
अम्मू ने फिर छक्का मारा।

कभी गेंद नीची हो जाए।
या आकर सिर पर भन्नाए।
नहीं गेंद में है दम इतना,
अम्मू को चकमा दे जाए।
चूर हुआ बल्ला बेचारा।
अम्मू ने जब छक्का मारा।

सौ रन कभी बना लेते हैं।
दो सौ तक पहुँचा देते हैं।
कभी कभी तो बाज़ीगर से,
तिहरा शतक लगा देते हैं।
अपने सिर का बोझ उतारा।
अम्मू ने फिर छक्का मारा।

10. अगर पेड़ में रुपये फलते

अगर पेड़ में रुपये फलते-
टप् टप् टप् टप् रोज टपकते
अगर पेड़ में रुपये फलते
सुबह पेड़ के नीचे जाते
ढ़ेर पड़े रुपये मिल जाते

थैलों में भर भर कर रुपये
हम अपने घर में ले आते
मूंछों पर दे ताव रोज हम‌
सीना तान अकड़के चलते

कभी पेड़ पर हम चढ़ जाते
जोर जोर से डाल हिलाते
पलक झपकते ढेरों रुपये
तरुवर के नीचे पुर जाते
थक जाते हम मित्रों के संग‌
रुपये एकत्रित करतॆ करते

एक बड़ा वाहन ले आते
उसको रुपयों से भरवाते
गली गली में टोकनियों से
हम रुपये भरपूर लुटाते
वृद्ध गरीबों भिखमंगों की
रोज रुपयों से झोली भरते

निर्धन कोई नहीं रह पाते
अरबों के मालिक बन जाते
होते सबके पास बगीचे
बड़े बड़े बंगले बन जाते
खाते पीते धूम मचाते
हम सब मिलकर मस्ती करते

11. अम्मा को अब भी है याद‌

नाना खेतों में देते थे,
कितना पानी कितना खाद।
अम्मा को अब भी है याद।

उन्हें याद है तेलन काकी,
सिर पर तेल रखे आती थीं।
दीवाली पर दिये कुम्हारिन,
चाची घर‌ पर रख जाती थीं।
मालिन काकी लिये फुलहरा,
तीजा पर करती संवाद।
अम्मा को अब भी है याद।

चना चबेना नानी कैसे,
खेतों पर उनसे भिजवातीं।
उछल कूद करते करते वे,
रस्ते में मस्ताती जातीं।
खुशी-खुशी देकर कुछ पैसे,
नानाजी देते थे दाद।
अम्मा को अब भी है याद।

खलिहानों में कभी बरोनी,
मौसी भुने सिंगाड़े लातीं।
उसी तौल के गेहूँ लेकर,
भरी टोकनी घर ले जातीं।
वही सिंगाड़े घर ले जाने,
अम्मा सिर पर लेतीं लाद।
अम्मा को अब भी है याद।

छिवा छिवौअल गोली कंचे,
अम्मा ने बचपन में खेले,
नाना के संग चाट पकौड़ी,
खाने वे जातीं थीं ठेले।
छोटे मामा से होता था,
अक्सर उनका वाद विवाद।
अम्मा को अब भी है याद।

नानी थी धरती से भारी,
नाना थे अंबर से ऊँचे।
हँसते हँसते बतियाते थे,
सब दिन उनके बाग बगीचे।
घर आँगन में गूँजा करते,
हर दिन खुशियों से सिंह नाद।
अम्मा को अब भी है याद।

12. अम्मू भाई

दादी हार गईं हैं लगा लगा कर टेरा।
अम्मू भाई उठो हुई शाला की बेरा।

मम्मी ने तो आलू डोसे पका दिये हैं।
मन पसंद हैं तुम्हें, समोसे बना दिये हैं।
पापा खड़े हुये हैं लेकर बस्ता तेरा।
अम्मू भाई उठो हुई शाला की बेरा।

देखो उठकर भोर सुहानी धूप सुनहली।
बैठी है आँगन में चिड़िया रंग-रंगीली।
पूरब में आकर सूरज ने स्वर्ण बिखेरा
अम्मू भाई उठो हुई शाला की बेरा।

वैन तुम्हारी तनिक देर में आ जायेगी।
हार्न बजाकर अम्मू-अम्मू चिल्लायेगी।
नहीं लगेगा वाहन का अब फिर से फेरा।
अम्मू भाई उठो हुई शाला की बेरा।

सुबह-सुबह से तुमको रोज़ उठाना पड़ता।
दादा दादी मम्मी को चिल्लाना पड़ता।
इस कारण से समय व्यर्थ होता बहुतेरा।
अम्मू भाई उठो हुई शाला की बेरा।

13. आई कुल्फी

अम्मा अपने बटुये में से,
कुछ तो नोट निकालो।
बाहर बिकने आई कुल्फी,
चार पाँच मँगवालो।
पापा के तो दाँत नहीं हैं,
तू भी न खा पाती।
तीन चार तो मैं खा लूँगा,
एक खायेगी चाची।
अम्मा बोलीं राजा बेटा,
बटुआ तो है खाली।
ज़रा देर पहले पापा ने,
कुल्फी चार मँगाली।
दो तो पापा ने खाली हैं,
मैंने भी दो खाई।
तुझे हुई है सरदी बेटा,
तुझको नहीं दिलाई।

14. आदत ज़रा सुधारो ना

बात बात पर डाँटो मत अब,
बात बात पर मारो ना।
आदत ठीक नहीं है बापू,
आदत ज़रा सुधारो ना।

बिगड़े हुये अगर हम हैं तो,
समझा भी तो सकते हो।
प्यार जता कर हौले हौले,
पथ भी दिखला सकते हो।
साँप मरे लाठी ना टूटे,
ऐसी राह निकालो ना।

ह‌म बच्चे होते उच्छृंखल,
ज़िद भी थोड़ी करते हैं।
थोड़ी गरमी मिले प्यार की,
बनकर मोम पिघलते हैं।
श्रम के फल होते रसगुल्ले,
बिल्कुल हिम्मत हारो ना।

मीठी बोली, मीठी बातें,
बनकर अमृत झरती हैं।
कड़वाहट के हरे घाव में,
काम दवा का करतीं हैं।
राधा बिटिया मोहन बेटा,
कहकर ज़रा पुकारो ना।

हम तो हैं मिट्टी के लौंदे,
जैसा चाहो ढलवा दें,
बनवा दें चाँदी के सिक्के,
या चमड़े के चलवा दें।
दया प्रेम करुणा ममता की,
शब्दावली उकारो ना।

समर भूमि में एक तरफ तुम,
एक तरफ हम खड़े हुये।
तुम भी अपनी हम भी अपनी,
दोनों अपनी ज़िद पर अड़े हुये।
राम बनों तुम फिर से बापू,
फिर लव कुश से हारो ना।

15. इतिहासों में लिख जाती है

यदि डरे पानी से तो फिर,
कैसे नदी पार जाओगे।
खड़े रहे नदिया के तट पर,
सब कुछ यहीं हार जाओगे।

पार यदि करना है सरिता,
पानी में पग रखना होगा।
किसी तरह के संश‍य भय से,
मुक्त हर तरह रहना होगा।

डरने वाले पार नदी के,
कभी आज तक जा न पाये।
वहीं निडर दृढ़ इच्छा वाले,
अंबर से तारे ले आये।

दृढ़ इच्छा श्रद्धा तनमयता,
अक्सर मंजिल तक पहुंचाती।
मंजिल तक जाना पड़ता है,
मंजिल चलकर कभी न आती।

दृढ़ इच्छा, विश्वास अटल, से,
वीर शिवाजी कभी न हारे,
दुश्मन को चुन चुन कर मारा,
दिखा दिये दिन में ही तारे।

वीर धीर राणा प्रताप से,
त्यागी इसी देश में आये।
पराधीन ना हुये कभी भी,
मुगलों से हरदम टकराये।

रानी लक्ष्मी बाई लड़ी तो,
उम्र तेईस में स्वर्ग सिधारी।
तन मन धन सब कुछ दे डाला,
अंतरमन से कभी ना हारी।

वीर बहादुर बनकर रहना,
वीरों की दुनियाँ दीवानी।
इतिहासों में लिख जाती है,
बलिदानों की अमर कहानी।

16. इसी देश में

इसी देश में कृष्ण हुये हैं,
इसी देश में राम।
सबसे पहिले जाना जग ने,
इसी देश का नाम।

इसी देश में भीष्म सरीखे,
दृढ़ प्रतिग्य भी आये।
इसी देश में भागीरथ,
धरती पर गंगा लाये।
इसी देश में हुये कर्ण से,
धीर वीर और दानी।
इसी देश में हुये विदुर से,
वेद ब्यास से ग्यानी।
सत्य अहिंसा प्रेम सिखाना,
इसी देश का काम।

इसी देश में वीर शिवाजी,
सा चरित्र भी आया।
छत्रसाल जैसा योद्धा भी,
भारत ने उपजाया।
संरक्षण सम्मान सहित,
शरणागत को देता है।
जिसकी रक्षा में यह भारत,
जान लगा देता है।
इसी देश में मात पिता,
होते हैं तीरथ धाम।

इसी देश में हर बेटी,
माँ दुर्गा की अवतारी।
सावित्री सीता की प्रतिमा,
भारत की हर नारी।
वचन दिया तो उसे निभाने,
सिर भी कटवा देते।
भरत भूमि के वीर पुत्र हैं,
इस धरती के बेटे।
यहां भुगतना पड़ा दुष्ट को,
पापों का परिणाम।

इसी देश में कौशल्या सी,
मातायें जनमी हैं।
मातु यशोदा देवकी मां की,
यही कर्म भूमि है।
ध्रुव प्रहलाद सी दृढ़ प्रतिग्य,
भारत मां की संतानें।
महावीर गौतम गांधी भी,
जनमें भारत मां ने।
मनुज धर्म की रक्षा के हित,
हुये घोर संग्राम।

दया धर्म ईमान सचाई,
हमने कभी न छोड़ी।
प्रेम अहिंसा पर सेवा कि,
डोर हमेशा जोड़ी।
किसी पीठ पर धोखे से भी,
हमने किया न वार।
सदा सामने खड़े हुये हम,
लड़ने को तैयार।
भले हानियाँ लाख उठाईं,
हुये दुखद अंजाम।

17. ईश्वर ने जो हमें दिया है

चूहे ने न्योता चिड़िया को,
बोला घर पर आना।
आज बनाया है चुहिया ने,
नई डिश वाला खाना।
पिज़्ज़ा बर्गर चाऊमीन है,
इडली डोसे भी हैं।
अगर ठीक ना लगें तुम्हें तो,
बड़े समोसे भी हैं।
कोल्ड ड्रिंक भी तरह तरह के,
हमने हैं मंगवाये।
जूस संतरे सोडे वाले,
घर पर ही बनवाये।
चिड़िया बोली अरे अनाड़ी,
यह कचरा क्यों खाता!
गेहूँ, दाना, रोटी,चावल,
तुझे नहीं क्या भाता?
हमें प्रकृति ने दिया शुद्ध जल,
दिये अन्न के दाने।
किया धरा पर मन आनंदित,
शीतल शुद्ध हवा ने।
इंसानों ने जिसे बनाया,
उससे क्या है नाता।
ईश्वर ने जो हमें दिया है,
हमको वही सुहाता।

18. एक-एक पल है उपयोगी

दो-दो फुट दिन में जुड़वा दें,
दो फुट की बढ़वा दें रात।
किसी तरह से क्यों न बापू,
बड़े-बड़े कर दें दिन-रात।

छोटे-छोटे दिन होते हैं,
छोटी-छोटी होती रात।
ना हम चंदा से मिल पाते,
ना सूरज से होती बात।

नहीं जान पाते हैं अम्मा,
क्या होती तारों की जात।
ना ही हमें पता लग पाता,
अंबर की कितनी औकात।

माँ बोली ईश्वर की रचना,
सुंदरतम अद्भुोत सौगात।
कभी नहीं दे पाएंगे हम,
उसकी मौलिकता को मात।

बापू बोले सदा प्रकृति ने,
हमको दिया समय पर्याप्त।
हम ही ना सूरज चंदा को,
तारों को कर पाते ज्ञात।

एक-एक पल है उपयोगी,
एक-एक कण है सौगात।
यदि समय श्रम का नियमन हो,
हम सब कुछ कर सकते प्राप्त।

19. एक ज़रा सा बच्चा

एक ज़रा सा बच्चा घर का,
सब माहौल बदल देता है।
बच्चे का कमरे में होना,
है खुशियों का एक खिलौना।
उछल कूद कितनी प्यारी है,
जैसे जंगल में मृग छौना।
बच्चों का हँसना मुस्काना,
भीतर तक संबल देता है।
हा हा ही ही हू हू वाली,
योग साधना बहुत सबल है।
सत मिलता है चित मिलता है,
और आनंद इसी का फल है।
निर्मल मन से फूटा झरना,
कितना मीठा जल देता है।
बच्चे सदा आज में जीते,
कल की चिंता उन्हें कहाँ है।
नहीं बंधे हैं वह बंधन में,
उनका तो संपूर्ण जहां है।
जितनी देर रहो उनके संग,
ख़ुशियाँ ही हर पल देता है।
कहाँ द्वेष है? कहाँ जलन है?
बच्चों के निर्मल से मन में।
अल्लाह ईसा राम लिखा है,
उनके तन मन के कण कण में।
बच्चों के पल पल का जीवन,
सब प्रश्नों के हल देता है।

20. औंदू बोला

मैंने एक सपना देखा है,
तुम दिल्ली जाने वाले हो,
किसी बड़े होटल में जाकर,
रसगुल्ले खाने वाले हो।

मैंने सपने में देखा है,
लल्लूजी फिर फेल हो गये,
इसी ख़ुशी में ओले बरसे,
बाहर रेलम ठेल हो गये।

मैंने सपने में देखा है,
मुन्नी की अम्मा आई है,
चाकलेट के पूरे पेकिट,
अपने साथ पाँच लाई है।

मैंने सपने में देखा है,
तुमने डुबकी एक लगाई,
और नदी में कूद-कूद कर,
उछल-उछल कर धूम मचाई।

मैंने सपने में देखा है,
तुम मेले में घूम रहे हो,
अच्छे-अच्छे फुग्गे लेकर,
बड़े मज़े से चूम रहे हो।

मैंने सपने में देखा है,
तुम बल्ले से खेल रहे हो
चौके वाली गेंद दौड़कर,
कूद-कूद कर झेल रहे हो।

मैंने सपने में देखा है,
भ्रष्टाचार समापन पर है,
बेईमानी सब हवा हो गई,
सच्चाई सिंहासन पर है।

औंदू बोला दादाजी से,
यों इतनी गप्पें देते हो,
किसी किराने की दुकान से,
चाकलेट क्यों न लेते हो।

21. कल के प्रश्न

पापा केवल झाड़ू लेकर
अपनी फोटो मत खिंचवाओ।
न ही छपकर अखबारों में,
अपनी झूठी शान बढाओ।
सच में ही कुछ करना हो तो,
बाहर चलकर सड़क बुहारें।
झूठ दिखावे के रावण को,
पूरी तरह जलाकर मारें।
छोटी गुड़िया ने यह कहकर,
बाहर जाकर सड़क बुहारी।
रेपर बीने कागज़ बीने,
और बीन ली पन्नी सारी।
आगे बढकर डस्टबिन में,
गुड़िया कचरा डाल रही है
झूठ दिखावे के सिक्के से,
कल के प्रश्न उछाल रही है।

22. कितने अच्छे अम्मा बाबू

बाबूजी अम्मा से कहकर,
भटा भर्त बनवाते थे।
बड़े मज़े से हँसकर हम सब,
रोटी के संग खाते थे।

धनिया, हरी प्याज, लहसुन की,
तीखी चटनी बनती थी।
छप्पन भोजन से भी ज़्यादा,
स्वाद हम सभी पाते थे।

घर में लगे ढेर तरुवर थे,
बिही आम के जामुन के।
तोड़-तोड़ फल सभी पड़ोसी,
मित्रों को बँटवाते थे।

काका के संग खेत गये तो,
हरे चने तोड़ा करते।
आग जलाकर इन्हीं चनों से,
होला हम बनवाते थे।

लुका लुकौअल खेल खेलते,
इधर-उधर छिपते फिरते।
हँसते गाते धूम मचाते,
इतराते मस्ताते थे।

कभी नहीं बीमार पड़े हम,
स्वस्थ रहे सब बचपन में।
कई मील बाबू के संग हम,
रोज़ घूमने जाते थे।

कितने अच्छे अम्मा बाबू,
सच का पाठ पढ़ाया है।
कभी किसी का अहित न करना,
यही सदा समझाते थे।

23. कितने पेन गुमाते भैया

करते रहते ताता थैया
कितने पेन गुमाते भैया।
लेकर मम्मी से कुछ पैसे
फिर से नया ले आते भैया।
अब शिक्षण में बदल गया है
लगता है संपूर्ण रवैया।
अब शाला में नहीं पढ़ाते
अद्धा पौना और् सवैया।
टू वन जा टू से होती है
सुबह आजकल उनकी भैया।
लगता है पश्चिम से आकर‌
सिर पर छाया शनि अढ़ैया।

24. कड़क ठंड है

कितनी ज्यादा कड़क ठंड है,
करते सी-सी पापा।
दादा कहते शीत लहर है,
कैसे कटे बुढ़ापा।

बरफ पड़ेगी मम्मी कहतीं,
ओढ़ रजाई सोओ।
किसी बात की जिद मत करना,
अब बिलकुल ना रोओ।

किंतु घंटे दो घंटे में,
पापा चाय मंगाते।
बार बार मम्मीजी को ही,
बिस्तर से उठवाते।

दादा कहते गरम पकोड़े,
खाने का मन होता।
नाम पकोड़ों का सुनकर,
किस तरह भला मैं सोता।

दादी कहती पैर दुख रहे,
बेटा पैर दबाओ।
हाथ दबाकर मुन्ने राजा,
ढेर दुआएं पाओ।

शायद बने पकोड़े आगे,
मन में गणित लगाता।
दादी के हाथों पैरों को,
हँसकर खूब दबाता।

25. कहां जांयें हम‌

भालू चीता शेर सियार सब,
रहने आये शहर में।
बोले’अब तो सभी रहेंगे,
यहीं आपके घर में।’

तरुवर सारे काट लिये हैं ,
नहीं बचे जंगल हैं।
जहाँ देखिये वहीं दिख रहे,
बंगले और महल हैं।
अब तो अपना नहीं ठिकाना,
लटके सभी अधर में।
भालू चीता शेर सियार सब,
रहने आये शहर में।

जगह जगह मैदान बन गये,
नहीं बची हरियाली।
जहाँ देखिये वहीं आदमी,
जगह नहीं है खाली।
अब तो हम हैं बिना सहारे,
भटके डगर डगर में।
भालू चीता शेर सियार सब,
रहने आये शहर में।

पता नहीं कैसा विकास का ,
घोड़ा यह दौड़ाया।
का‍ट छांट कर दिया,वनों का
ही संपूर्ण सफाया।
बोलो बोलो जांयं कहां अब,
भर गरमी दुपहर में।
भालू चीता शेर सियार सब ,
रहने आये शहर में।

26. कुशल वैद्य होते हैं बच्चे

चित्त उदास और मन चंचल,
हो तो यह कर डालें।

चलकर किन्हीं सड़क गलियों में,
बच्चा गोद गोद उठा लें।

बच्चे को गुदगुदी लगाकर,
उसको खूब हँसा लें।

वह लग जाये ठिल ठिल करने,
तो खुद भी मुस्करा लें।

खुशियों के उन, मुक्त पलों को,
आंखों में बैठा लें।

कुशल वैद्य होते हैं बच्चे,
बस इलाज करवा लें।

27. कल आना है फिर संडे

छ:दिन बीते किसी तरह से, कल आना है फिर संडे।
खेल खेल के नये तरीके, नूतन सीखेंगे फंडे।

सुबह देर तक सोऊंगा मैं,कोई मुझे जगाना मत।
उठ जाने के बाद कहीं भी,घर का काम कराना मत।
और नाश्ते में खाऊंगा,गरम गरम आलू बंडे।

मित्रों के संग चेयर रेस हम‌, मज़े मज़े से खेलेंगे।
पीकर दूध किलो भर मीठा, खूब दंड हम पेलेगें।
और शाम को खायेंगे फिर, उबले हुये पांच अंडे।

देर शाम को देखूँगा मैं, अच्छी सी पिक्चर जाकर।
भोज करुंगा बढ़िया बढ़िया, अच्छे होटल में जाकर।
देर रात जो सोऊँगा तो, आ जायेगा फिर मंडे।

28. कौवा और कोयल‌

रखे टोकरी सिर पर कोयल,
इठलाते इठलाते आई।

कौवे के घर की चौखट पर,
“सब्जी ले ले” टेर लगाई ।

कौवा बोला नहीं पता क्या?
कितनी ज्यादा है मँहगाई।

सब्जी लेने के लायक अब ,
नहीं रहा है तेरा भाई।

ऐसा कहकर कौवेजी ने,
आसमान में दौड़ लगाई।

फिर नीचे आकर मुन्ना की,
रोटी झपटी, छीनी खाई।

कौवे की हरकत को दुनियाँ,
वालों ने समझा चतुराई।

छीन छीन कर खाने में ही,
लोग समझने लगे भलाई।

पर चिड़ियों ने चुग चुग दाना,
जीवन की सच्चाई बताई।

कड़े परिश्रम की रोटी ही,
होती है सबसे सुखदाई।

29. क्या होता है रमतूला

मम्मी मुझको नहीं खेलने, देती है अब घर घूला।
ना ही मुझे बनाने देती, गोबर मिट्टी का चूल्हा।
गपई समुद्दर क्या होता है, नहीं जानता अब कोई।
गिल्ली डंडे का टुल्ला तो, बचपन बिल्कुल ही भूला।
अब तो सावन खेल रहा है, रात और दिन टी वी से।
आम नीम की डालों पर अब, कहीं नहीं दिखता झूला।
अब्ब्क दब्बक दांयें दीन का, बिसरा खेल जमाने से।
अटकन चटकन दही चटाकन, लगता है भूला भूला।
न ही झड़ी लगे वर्षा की, न ही चलती पुरवाई।
मौसम हुआ आज जादूगर, वक्त हुआ ल‍गड़ा लूला।
ऐसी चली हवा पश्चिम की, हम खुद को ही भूल गये।
गुड़िया अब ये नहीं जानती, क्या होता है रमतूला।

30. करतब सूरज-चंदा के

मिलता चाँद चवन्नी में है,
और अठन्नी में सूरज माँ।
माँ यह बिलकुल सत्य बात है।
नहीं कहीं इसमें अचरज माँ।

कल बांदकपुर के मेले में,
मैंने एक जलेबी खाई।
बिलकुल चांद सरीखी थी वह,
एक चवन्नी में ही आई।
खाने में तो मजा आ गया,
कितना आया मत पूछो माँ।

और इमरती गोल गोल माँ,
सूरज जैसी सुर्ख लाल थी।
अहा स्वाद में री प्यारी माँ,
कितनी अदभुत क्या कमाल थी।
एक अठन्नी भूली बिसरी,
सच में थी उसकी कीमत माँ।

किंतु चवन्नी और अठन्नी,
अब तो सपनों की बातें हैं।
पर सूरज चंदा से अब भी,
होती मुफ्त मुलाकातें हैं।
कितने लोक लुभावन होते,
इन दोनों के हैं करतब माँ।

जब आती है पूरन मासी,
सोचा करता क्या क्या कर लूँ।
किसी बड़े बरतन को लाकर‌,
स्वच्छ चांदनी उसमें भर लूँ।
किंतु हठीला चांद हुआ ना,
कहीं कभी इस पर सहमत माँ।

सूरज ने भी दिन भर तपकर,
ढेर धरा पर स्वर्ण बिखेरा।
किंतु शाम को जाते जाते,
खुद लूटा बन गया लुटेरा।
इस युग की तो बात निराली,
नहीं बचा है जग में सच माँ।

31. कड़े परिश्रम का फल मीठा

मत जाना तुम बाहर बापू,
मत जाना तुम बाहर।
गली-गली में बैठे कुत्ते,
बीच सड़क पर नाहर।
बापू बीच सड़क पर नाहर।

यदि जाओगे बाहर बापू,
लपक पड़ेंगे कुत्ते।
यह भी हो सकता चढ़ जाओ,
तुम नाहर के हत्थे।
नाहर हों या कुत्ते दोनों,
हैं भूखे, जग जाहिर।
बापू मत जाना तुम बाहर।

टांग पकड़कर कुत्ता खींचे,
नाहर गुर्राता है।
खींचतान या गुर्राना ही,
दुनिया को भाता है।
ढोंग दिखावा पदवी के सब,
हैं दीवाने कायर।
बापू मत जाना तुम बाहर।

बापू बोले डरकर जीना,
भी कैसा है जीना।
बनो बहादुर बह जाने दो,
अपना खून-पसीना।
विजय सदा उनको मिलती जो,
संघर्षों में माहिर।
बेटा मैं जाऊँगा बाहर।

डरे-डरे से नदी किनारे,
खड़े रहे क्या पाया।
जिसने मारा गोता उसमें,
मोती वह ले आया।
कड़े परिश्रम का फल मीठा,
कहते हैं कवि शायर।
बेटा मैं जाऊँगा बाहर।

32. कंधे प‌र‌ न‌दी

अगर हमारे बस में होता,
नदी उठाकर घर ले आते।

अपने घर के ठीक सामने,
उसको हम हर रोज बहाते।

कूद कूद कर उछल उछलकर,
हम मित्रों के साथ नहाते।

कभी तैरते कभी डूबते,
इतराते गाते मस्ताते।

'नदी आ गई' चलो नहाने,
आमंत्रित सबको करवाते।

सभी उपस्थित भद्र जनों का,
नदिया से परिचय करवाते।

अगर हमारे मन में आता,
झटपट नदी पार कर जाते।

खड़े-खड़े उस पार नदी के,
मम्मी मम्मी हम चिल्लाते।

शाम ढले फिर नदी उठाकर,
अपने कंधे पर रखवाते।

लाए जहाँ से थे हम उसको,
जाकर उसे वहीं रख आते।

33. कम्प्यूटर पर चिड़िया

बहुत देर से कम्प्यूटर पर, बैठी चिड़िया रानी।
बड़े मजे से छाप रही थी, कोई बड़ी कहानी।।

तभी अचानक चिड़िया ने जब,गर्दन जरा घुमाई।
किंतु न जाने किस कारण वह,जोरों से चिल्लाई।।

कौआ भाई फुदक-फुदक कर, शीघ्र वहाँ पर आए।
'तुम्हें क्या हुआ बहिन चिरैया', कौआ जी घबराए।।

चिड़िया बोली 'पता नहीं है, कैसी ये लाचारी।
हुआ दर्द गर्दन में मुझको, कौआ भाई भारी'।।

तब कौए ने गिद्ध वैद्य से, उसकी जांच कराई।
वैद्यराज ने सर्वाई कल, की बीमारी पाई।।

कम्प्यूटर पर बहुत देर थी, बैठी चिड़िया रानी।
जोर पड़ा गर्दन पर सच मेम, की थी तो नादानी ।

कम्प्यूटर पर बहुत देर मत,बैठो मेरे भाई।
बहुत देर बैठा जो उसको,यह बीमारी आई।।

34. कौवा का स्कूल‌

सिर पर भारी बस्ता लादे,
कौवा जी पहुँचे स्कूल।
लेकिन जल्दी जल्दी में वे,
रबर पेंसिल आए भूल।

टीचर जी कौवा से बोले,
वापिस घर को जाओ।
रबर पेंसिल लेकर ही तुम,
फिर शाला को आओ।

35. कलयुग के मुर्गे

रोज चार पर मुर्गों की अब,
नींद नहीं खुल पाती बापू।
इस कारण से ही तो अब वे,
गाते नहीं प्रभाती बापू।

कुछ सालों पहिले तो मुर्गे,
सुबह बाँग हर दिन देते थे।
उठो उठो हो गया सबेरा,
संदेशा सबको देते थे।
किंतु बात अब यह मुर्गों को,
बिल्कुल नहीं सुहाती बापू।
इस कारण से ही तो अब वे,
गाते नहीं प्रभाती बापू।

हो सकता है अब ये मुर्गे,
देर रात तक जाग रहे हों।
कम्पूटर टी वी के पीछे,
पागल होकर भाग रहे हों।
लगता है कि मुर्गी गाकर,
फिल्मी गीत रिझाती बापू।
इस कारण से ही तो अब वे,
गाते नहीं प्रभाती बापू।

नई सभ्यता पश्चिमवाली,
सबके सिर‌ चढ़ बोल रही है।
सोओ देर से उठो देर से,
बात लहू में घोल रही है।
मजे मजे की यही जिंदगी,
अब मुर्गों को भाती बापू।
इस कारण से ही तो अब वे,
गाते नहीं प्रभाती बापू।

पर पश्चिम की यही नकल तो,
हमको लगती है दुखदाई।
भूले अपने संस्कार क्यों,
हमको अक्ल जरा न आई।
यही बात कोयल कौये से,
हर दिन सुबह बताती बापू।
इस कारण से ही तो अब वे,
गाते नहीं प्रभाती बापू।

36. खेल भावना

एक सड़क पर मक्खी मच्छर,
बैठ गये शतरंज खेलने।
थे सतर्क बिल्कुल चौकन्ने
इक दूजे के वार झेलने।

मक्खी ने जब चला सिपाही,
मच्छर ने घोड़ा दौड़ाया।
मक्खी ने चलकर वजीर को,
मच्छर का हाथी लुड़काया।

मच्छर ने गुस्से के मारे,
ऊँट चलाकर हमला बोला।
मक्खी ने मारा वजीर से,
ऊँट हो गया बम बम भोला।

ऊँट मरा जैसे मच्छर का,
वह गुस्से से लाल हो गया।
मक्खी बोली यह मच्छर तो,
अब जी का जंजाल हो गया।

मच्छर ने तलवार उठाकर,
मक्खीजी पर वार कर दिया।
मक्खी ने मच्छर का सीना,
चाकू लेकर पार कर दिया।

मच्छर औ मक्खी दोनोँ का,
पल में काम तमाम हो गया।
देख तमाशा रुके मुसाफिर,
सारा रास्ता जाम हो गया।

खेल हमेशा खेल भावना
से मिलकर खेलो भाई,
खेल खेल में लड़ जाने से
होती बच्चो नहीं भलाई।

37. खुला पुस्तकालय जंगल में

बालवाटिका पढ़ पढ़कर, कालू बंदर हो गये विद्वान।
इसी बात का हाथीजी ने, शेर चचा का खींचा ध्यान।
देखो तो यह कालू बंदर, पढ़ लिखकर हो गया महान।
हम तो मात्र हिलाते रह गये, अपने पूँछ गला और कान।
बाल वटिका बुलवाने का, खुलकर किया गया एलान।
शाल ओढ़ाकर बंदरजी का, किया गोष्ठी में सम्मान।
पढ़ने लिखने से ही आता, है दुनियादारी का ग्यान।
खुला पुस्तकालय जंगल में, पढ़ते हैं सब चतुर सुजान।

38. गरमी मई की जून की

आई चिपक पसीने वाली,
गरमी मई की जून की।

चैन नहीं आता है मन को,
दिन बेचेनी वाले।
सल्लू का मन करता कूलर ,
खीसे में रखवाले।
बातें तो बस उसकी बातें ,
बातें अफलातून की।

दादी कहतीं सत्तू खाने ,
से जी ठंडा होता।
जिसने बचपन से खाया है,
तन मन चंगा होता।
खुद ले आतीं खुली पास में,
इक दूकान परचून की।

बोले पापा इस गरमी में ,
हम शिमला जाएंगे।
वहीं किसी भाड़े के घर में,
सब रहकर आयेंगे ।
मजे मजे बीतेगी सबकी ,
छुट्टी बड़े सुकून की ।

39. गरम जलेबी

पापा गरमा गरम जलेबी,
लेकर आये हैं ।

मुनियाँ ने पहचानी उनके,
पैरों की आहट।
मम्मी के मुखड़े पर आ
मीठी मुस्काहट ।
दादा तो दरवाजे से ही,
आ पछियाए हैं ।

गंध मिली तो दादी जी का,
पत्ता मन डोला ।
ताक रहीं थीं गरम जलेबी,
वाला वह झोला ।
मुन्ना के हाथों संदेशे ,
दो भिजवाये हैं ।

गरम जलेबी मम्मी ने जब,
सबको खिलवाई ।
ऊपर चढ़ी सांस थी सबकी ,
तब नीचे आई ।
चेहरों पर खुशियों के परचम ,
अब लहराए हैं ।

40. गधे से सस्ता

हुआ हाथ से,
कठिन उठाना,
इतना भारी बस्ता।
फिर भी मैंने,
इसे उठाया,
हाल हुये हैं खस्ता।

सड़क किनारे,
खड़ा गधा भी,
मुझे देखकर हँसता।
हँसकर कहता,
बच्चा है अब,
हाय गधे से सस्ता।

41. गप्पी

सुबह सुबह से उठे रामजी,
पर्वत एक उठा लाये।
नदी पड़ी थी बीच सड़क पर,
उसे जेब में भर लाये।

फिर खजूर के एक पेड़ पर,
हाथी जी को चढ़वाया।
तीन गधों को तीन चीटियों,
से आपस में लड़वाया।

पानीपत के घोर समर में,
गधे हारकर घर भागे।
किन्तु चीटियों ने पकड़ा,
तो हाथ पैर कसकर बाँधे।

अपने इसी गधेपन से ही,
गधे गधे कहलाते हैं।
डील डौल इतना भारी पर,
चींटी से डर जाते हैं।

पूछा -गप्पी, इन बातों में,
क्या कुछ भी सच्चाई है।
बोले- गप्पी, मुझको तो,
बाबा ने बात बताई है।

बाबा के बाबा को भी तो,
उनके बाबा ने बोला।
इसी बात को सब पुरखों ने,
सबके कानों में घोला।

बाबा के बाबा के बाबा,
पक्के हिंदुस्तानी थे।
झूठ बोलना कभी न सीखा,
वे सच के अनुगामी थे।

42. ग़लती नहीं करूँगी

चिड़िया कहती शाला जाऊँ,
मुझको भी अब पढ़ना।
नहीं सुहाता अब तो मुझको,
आसमान में उड़ना।

हवा बहुत ज़हरीली है मैं,
ऊपर उड़ न पाऊँ।
दम फूला जाता है मेरा,
साँस नहीं ले पाऊँ।

दरवाज़ों खिड़की आलों में,
लगी सब जगह जाली।
छतों मुँडेरों पर लिक्खा है,
रूम नहीं है खाली।

ऐसे में हम कहाँ रहेंगे,
कौन आजकल पूछे।
पत्ते डालें सूख गए हैं।
पेड़ खड़े हैं छूंछे।

शाला जाकर करूँ पढाई,
मैं अफ़सर बन जाऊँ।
एक बड़े से बंगले में मैं,
भी रहने लग जाऊँ।

ए.सी. वाली बड़ी कार में,
मैं भी सफ़र करूँगी।
आसमान में उड़ने की अब,
ग़लती नहीं करुँगी।

43. गाय सलोनी

रोज़ सुबह आ जाती गाय
फाटक पर अड़ जाती गाय।
वापिस कहीं नहीं जाती
जब तक रोटी न मिल जाये।
सबको बहुत सुहाती है
सुंदर और सलोनी गाय।
सब बच्चे मिलकर करते
हर दिन उसको हल्लो हाय।

44. घर का मतलब‌

धरती सुबह-सुबह छप्पर से,
लगी जोर से लड़ने।
उसकी ऊंचाई से चिढ़कर,
उस पर लगी अकड़ने।

बोली बिना हमारे तेरा,
बनना नहीं सरल है।
मेरे ऊपर बनते घर हैं,
तू उसका प्रतिफल है।

अगर नहीं मैं होती भाई,
तू कैसे बन पाता।
दीवारें न होतीं, तुझको,
सिर पर कौन बिठाता।

छत बोला यह सच है बहना,
तुम पर घर बनते है।
किंतु बिना छप्पर छत के क्या,
उसको घर कहते हैं?

घर का मतलब, फर्श दीवारें,
छप्पर का होना है।
करो अकड़ना बंद तुम्हारा,
ज्ञान बहुत बौना है।

बिना सहारे एक-दूसरे,
के हम रहें अधूरे।
छत, धरती, दीवारों, दर से,
ही घर बनते पूरे।

45. चल री मुनिया

फुलकी और फुलकी का पानी,
मुझको अच्छा लगता नानी।
पर बेटी भीतर तो देखो,
फुलकी बासी गंदा पानी।

नहीं खाओगी गंदी फुलकी,
नहीं पियोगी गंदा पानी।
चल री मुनिया भीतर तो चल,
तुझे सुनाऊँ एक कहानी।

46. चींटी बोली

चींटी बोली चलो कहीं से,
च‌ना खरीदें भाई।
अब तो सहन नहीं होता है,
भूख मुझे लग आई।

चींटा बोला शक्कर-गुड़ की,
गंध मुझे है आती।
इतना मीठा माल रखा,
तू खाने क्यों न जाती।

बोली चींटी अरे भाईजी,
गुड़ से डर है लग‌ता।
जो भी उसके गया पास‌ तो,
जाकर वहीं चिपकता।

47. चुहिया और संपादक‌

चुहिया रानी रोज डाक से,
कविताएं भिजवाती।
संपादक हाथी साहब को,
कभी नहीं मिल पातीं।

इक दिन चुहिया सुबह सुबह ही,
हाथी पर चिल्लाई।
बाल पत्रिका में मैं अब तक,
कभी नहीं छप पाई।

तब हाथी ने मोबाइल पर,
चुहिया को समझाया।
क्यों ना अब तक तुमने अपना,
मिस ई-मेल‌ बनाया?

अगर मेल पर रचनाएं कुछ,
मुझको भिजवा पातीं।
तो मिस चुहिया निश्चित ही तुम,
कई बार छप जातीं।

48. चूहा भाई

सुबह-सुबह चूहा भाई ने,
संपादक को डांटा।

'चार लेख भेजे थे मैंने,
नहीं एक भी छापा।'

संपादक ने एक पत्रिका,
उसकी तरफ बढ़ाई।

बोला 'इसमें आप छपे हैं,
इसको पढ़ लो भाई।'

मुख्य पृष्ठ पर ज्योंहि उनको,
बिल्ली पड़ी दिखाई।

डर के मारे दौड़ लगाकर,
भागे चूहा भाई।

49. चींटी की शादी

चींटा की मिस चींटी के संग,
जिस दिन हुई सगाई।
चींटीजी के आंगन में थी,
गूंज उठी शहनाई।

घोड़े पर बैठे चींटाजी,
बनकर दूल्हे राजा।
आगे चलतीं लाल चींटियां,
बजा रहीं थीं बाजा।

दीमक की टोली थी संग में,
फूंक रहीं रमतूला।
खटमल भाई नाच रहे थे,
मटका-मटका कूल्हा।

दुरकुचियों का दल था मद में,
मस्ताता जाता था।
पैर थिरकते थे ढोलक पर,
अंग-अंग गाता था।

घमरे, इल्ली और केंचुएं,
थे कतार में पीछे।
मद में थे संगीत मधुर के,
चलते आंखें मींचे।

जैसे ही चींटी सजधज कर,
ले वरमाला आई।
दूल्हे चींटे ने दहेज में,
महंगी कार मंगाई।

यह सुनकर चींटी के दादा,
गुस्से में चिल्लाए।
'शरम न आई जो दहेज में,
कार मांगने आए।

धन दहेज की मांग हुआ,
करती है इंसानों में।
हम जीवों को तो यह विष-सी,
चुभती है कानों में।'

मिस चींटी बोली चींटा से,
'लोभी हो तुम धन के।
नहीं ब्याह सकती मैं तुमको,
कभी नहीं तन-मन से।

सभी बाराती बंधु-बांधवों,
को वापिस ले जाओ।
इंसानों के किसी वंश में,
अपना ब्याह रचाओ।'

50. चूहों की चतुराई

देखे जब दो दर्जन चूहे,
कंडेक्टर घबराया।
सारे थे बस में सवार,
पर टिकिट एक कटवाया।

बोला दो दर्जन हो तुम सब,
सबको टिकिट लगेगा।
एक टिकिट में सब जा पायें,
यह तो नहीं चलेगा।

कंडेक्टर की बातें सुनकर,
चूहे आगे आये।
दे दो अलग अलग टिकटें,कह,
आगे नोट बढ़ाये।

पर चूहों ने शर्त रखी,हम,
अलग अलग बैठेंगे,
चौबीस टिकिट यदि लेंगे तो,
उतनी सीटें लेंगे।

चूहे की फरमाइश सुनकर,
कंडेक्टर चकराया।
एक टिकिट में ही उन सबको,
मंजिल तक पहुंचाया

51. चुहिया रानी

बिल से निकली चुहिया रानी,
लगी चाल चलने मस्तानी।

बोली मैं हूँ घर की मुखिया,
दुनिया है मेरी दीवानी।

मेरी मर्जी से ही मिलता,
सबको घर का राशन पानी।

मुझसे आकर कोई न उलझे,
पहलवान है मेरी नानी।

तभी अचानक खिड़की में से,
आ धमकी बिल्ली महारानी।

डर के मारे बिल में घुस गई
वीर बहादुर चुहिया रानी।

52. चलना है अबकी बेर तुम्हें

बच्चो बनना है शेर तुम्हें।
यह देश रहा है टेर तुम्हें।

सच्चाई ईमान लाना है।
अब भ्रष्टाचार मिटाना है।
जो करें देश से गद्दारी,
अब उन्हें जेल भिजवाना है।
बनना है वीर दिलेर तुम्हें।
यह देश रहा है टेर तुम्हें।

तुम सच्चे सेवक भारत के।
लेखक हो नई इबारत के।
तुम बनों नीव के पत्थर अब,
भारत की नई इमारत के।
ना करना होगी देर तुम्हें
यह देश रहा है टेर तुम्हें।

कुछ लोग चले, चल ना पाये।
जो चाहा था, कर ना पाये।
पथ पर थोड़े से काँटे थे।
डर गये कदम वापस आये।
चलना है अबकी बेर तुम्हें।
यह देश रहा है टेर तुम्हें।

सच कभी मार ना खा पाये।
ईमान हारने ना पाये।
साहस के सोते फूट पड़ें,
सागर खुद मिलने आ जाये।
हटवाना हर अँधेर तुम्हें।
यह देश रहा है टेर तुम्हें।

53. चिंगारी

सिर पर टोपी आँखों चश्मा,
हाथों में मोबाइल।
चींटी रानी चली ठुमककर,
पैरों में थी पायल।

तभी अचानक बीच सड़क पर,
बस उनसे टकराई।
डर के मारे वहीं बीच में ,
तीन पल्टियाँ खाईं।

थर थर थर थी लगी काँपने,
बस अब डर के मारे।
उतर उतर कर बाहर आये,
तभी मुसाफ़िर सारे।

हाथ जोड़कर सबने माफ़ी,
मिस चींटी से माँगी।
तब जाकर मिस चींटीजी ने,
क्रोध मुद्रा त्यागी।

बस से बोली आगे से वह,
बीच राह न आये।
अगर दिखूँ मैं कहीं सामने,
राह छोड़ हट जाये।

नहीं आँकना छोटों को भी,
कमतर मेरे भाई।
एक ज़रा सी चिंगारी ने,
अक्सर आग लगाई।

54. चूहे की सज़ा

हाथीजी के न्यायालय में,
एक मुकदमा आया।
डाल हथकड़ी इक चूहे को,
कोतवाल ले आया।

बोला साहब इस चूहे ने,
रुपये पाँच चुराये।
किंतु बताया नहीं अभी तक,
उनको कहाँ छुपाये।

सुबह शाम डंडे से मारा,
पंखे से लटकाया।
दिये बहुत झटके बिजली के,
मुँह ना खुलवा पाया।

चूहा बोला दया करें हे,
मुझ पर हाथी भाई।
कोतवाल भालू है मूरख,
उसमें अकल न आई।

नोट चुराया था मैंने यह ,
बात सही है लाला।
किंतु समझकर कागज‌ मैंने,
कुतर कुतर खा डाला।

न्यायधीश हाथी ने तब भी,
सज़ा कठोर सुनाई।
"कर दो किसी मूढ़ बिल्ली से,
इसकी अभी सगाई।"

तब से चूहा भाग रहा है,
अपनी जान बचाने।
बिल्ली पीछे दौड़ रही है,
उससे ब्याह रचाने।

 
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