Hindi Kavita
मीर तक़ी मीर
Mir Taqi Mir
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Poetry/Shayari in Hindi Mir Taqi Mir

हिन्दी में कविता/शायरी मीर तकी मीर

51. दिल से शौक़-ए-रुख़-ए-निको न गया

दिल से शौक़-ए-रुख़-ए-निको न गया
झँकना ताकना कभु न गया

हर क़दम पर थी उस की मंज़िल लेक
सर से सौदा-ए-जुस्तजू न गया

सब गये होश-ओ-सब्र-ओ-ताब-ओ-तवाँ
लेकिन ऐ दाग़ दिल से तु न गया

हम ख़ुदा के कभी क़ायल तो न थे
उन को देखा तो ख़ुदा याद आ गया

दिल में कितने मसौदे थे वले
एक पेश उस के रू-ब-रू न गया

सुबाह गर्दान ही 'मीर' हम तो रहे
दस्त-ए-कोताह ता सबू न गया

52. आरज़ूएं हज़ार रखते हैं

आरज़ूएं हज़ार रखते हैं
तो भी हम दिल को मार रखते हैं

बर्क़ कम हौसला है, हम भी तो
दिलक एे बेक़रार रखते हैं

ग़ैर है मौरीद ए इनायत हाये
हम भी तो तुझ से प्यार रखते हैं

न निगह ने पयाम ने वादा
नाम को हम भी यार रखते हैं

हम से ख़ुश-ज़मज़मा कहाँ यूँ तो
लब ओ लहजा हज़ार रखते हैं

चोटटे दिल की हैं बुतां मशहूर
बस, यही एतबार रखते हैं

फिर भी करते हैं 'मीर' साहब इश्क़
हैं जवाँ, इख़्तियार रखते

53. रही नगुफ़्ता मेरे दिल में दास्ताँ मेरी

रही नगुफ़्ता मेरे दिल में दास्ताँ मेरी
न इस दयार में समझा कोई ज़बाँ मेरी

बरंग-ए-सौत-ए-जरस तुझ से दूर हूँ तनहा
ख़बर नहीं है तुझे आह कारवाँ मेरी

उसी से दूर रहा अस्ल-ए-मुद्दा जो था
गई ये उम्र-ए-अज़ीज़ आह रायगाँ मेरी

तेरे फ़िराक़ में जैसे ख़याल मुफ़्लिस का
गई है फ़िक्र-ए-परेशाँ कहाँ कहाँ मेरी

दिया दिखाई मुझे तो उसी का जल्वा "मीर"
पड़ी जहाँ में जा कर नज़र जहाँ मेरी

54. अंदोह से हुई न रिहाई तमाम शब

अंदोह से हुई न रिहाई तमाम शब
मुझ दिल-जले को नींद न आई तमाम शब

चमक चली गई थी सितारों की सुबह तक,
की आस्माँ से दीदा-बराई तमाम शब

जब मैंने शुरू क़िस्सा किया आँखें खोल दीं,
यक़ीनी थी मुझ को चश्म-नुमाई तमाम शब

वक़्त-ए-सियाह ने देर में कल यावरी सी की,
थी दुश्मनों से इन की लड़ाई तमाम शब

तारे से तेरी पलकों पे क़तरे अश्क के,
दे रहे हैं "मीर" दिखाई तमाम शब

(अंदोह=दु:ख, तमाम शब=सारी रात,
वक़्त-ए-सियाह=काले,बुरे समय, यावरी=
सहायता,मदद)

55. इश्क़ में जी को सब्र-ओ-ताब कहाँ

इश्क़ में जी को सब्र-ओ-ताब कहाँ
उस से आँखें लगीं तो ख़्वाब कहाँ

बेकली दिल ही की तमाशा है
बर्क़ में ऐसे इज़्तेराब कहाँ

हस्ती अपनी है बीच में पर्दा
हम न होवें तो फिर हिजाब कहाँ

गिरिया-ए-शब से सुर्ख़ हैं आँखें
मुझ बला नोश को शराब कहाँ

इश्क़ है आशिक़ों को जलने को
ये जहन्नुम में है अज़ाब कहाँ

महव हैं इस किताबी चेहरे के
आशिक़ों को सर-ए-किताब कहाँ

इश्क़ का घर है 'मीर' से आबाद
ऐसे फिर ख़ानमाँख़राब कहाँ

(बर्क़=आसमानी बिजली, इज़्तेराब=
तड़प, हिजाब=पर्दा, ख़ानमाँख़राब=
बरबाद)

56. हम जानते तो इश्क न करते किसू के साथ

हम जानते तो इश्क न करते किसू के साथ,
ले जाते दिल को खाक में इस आरजू के साथ।

नाजां हो उसके सामने क्या गुल खिला हुआ,
रखता है लुत्फे-नाज भी रू-ए-निकू के साथ।

हंगामे जैसे रहते हैं उस कूचे में सदा,
जाहिर है हश्र होगी ऐसी गलू के साथ।

मजरूह अपनी छाती को बखिया किया बहुत,
सीना गठा है 'मीर' हमारा रफू के साथ.

57. यही इश्क़ ही जी खपा जानता है

यही इश्क़ ही जी खपा जानता है
कि जानाँ से भी दिल मिला जानता है

मेरा शे'र अच्छा भी दानिस्ता ज़िद से
किसी और ही का कहा जानता है

ज़माने के अक्सर सितम्गार देखे
वही ख़ूब तर्ज़-ए-जफ़ा जानता है

58. नाला जब गर्मकार होता है

नाला जब गर्मकार होता है
दिल कलेजे के पार होता है

सब मज़े दरकिनार आलम के
यार जब हमकिनार होता है

जब्र है, क़ह्र है, क़यामत है
दिल जो बेइख़तियार होता है

59. उम्र भर हम रहे शराबी से

उम्र भर हम रहे शराबी से
दिल-ए-पुर्खूं की इक गुलाबी से

खिलना कम-कम कली ने सीखा है
उसकी आँखों की नीम ख़्वाबी से

काम थे इश्क़ में बहुत ऐ मीर
हम ही फ़ारिग़ हुए शताबी से

60. मसाइब और थे पर दिल का जाना

मसाइब और थे पर दिल का जाना
अजब इक सानेहा सा हो गया है

सरहाने मीर के आहिस्ता बोलो
अभी टुक रोते-रोते सो गया है

61. नहीं विश्वास जी गँवाने के

नहीं विश्वास जी गँवाने के
हाय रे ज़ौक़ दिल लगाने के

मेरे तग़यीर-ए-हाल पर मत जा
इत्तेफ़ाक़ात हैं ज़माने के

दम-ए-आखिर ही क्या न आना था
और भी वक़्त थे बहाने के

इस कदूरत को हम समझते हैं
ढब हैं ये ख़ाक में मिलाने के

दिल-ओ-दीं, होश-ओ-सब्र, सब ही गए
आगे-आगे तुम्हारे आने के

62. बेकली बेख़ुदी कुछ आज नहीं

बेकली बेख़ुदी कुछ आज नहीं
एक मुद्दत से वो मिज़ाज नहीं

दर्द अगर ये है तो मुझे बस है
अब दवा की कुछ एहतेयाज नहीं

हम ने अपनी सी की बहुत लेकिन
मरज़-ए-इश्क़ का इलाज नहीं

शहर-ए-ख़ूबाँ को ख़ूब देखा मीर
जिंस-ए-दिल का कहीं रिवाज नहीं

63. अए हम-सफ़र न आब्ले

अए हम-सफ़र न आब्ले को पहुँचे चश्म-ए-तर
लगा है मेरे पाओं में आ ख़ार देखना

होना न चार चश्म दिक उस ज़ुल्म-पैशा से
होशियार ज़ीन्हार ख़बरदार देखना

सय्यद दिल है दाग़-ए-जुदाई से रश्क-ए-बाग़
तुझको भी हो नसीब ये गुलज़ार देखना

गर ज़मज़मा यही है कोई दिन तो हम-सफ़र
इस फ़स्ल ही में हम को गिरफ़्तार देखना

बुल-बुल हमारे गुल पे न गुस्ताख़ कर नज़र
हो जायेगा गले का कहीं हार देखना

शायद हमारी ख़ाक से कुछ हो भी अए नसीम
ग़िर्बाल कर के कूचा-ए-दिलदार देखना

उस ख़ुश-निगाह के इश्क़ से परहेज़ कीजिओ 'मीर'
जाता है लेके जी ही ये आज़ार देखना

64. राहे-दूरे-इश्क़ से रोता है क्या

राहे-दूरे-इश्क़ से रोता है क्या
आगे-आगे देखिए होता है क्या

सब्ज़ होती ही नहीं ये सरज़मीं
तुख़्मेख़्वाहिश दिल में तू बोता है क्या

क़ाफ़ले में सुबहा के इक शोर है
यानी ग़ाफ़िल हम चले सोता है क्या

ग़ैरत-ए-युसुफ़ है ये वक़्त-ए-अज़ीज़
"मीर" इस को रायगाँ खोता है क्या

65. मामूर शराबों से कबाबों से है सब देर

मामूर शराबों से कबाबों से है सब देर
मस्जिद में है क्या शेख़ प्याला न निवाला

गुज़रे है लहू वाँ सर-ए-हर-ख़ार से अब तक
जिस दश्त में फूटा है मेरे पांव का छाला

देखे है मुझे दीदा-ए-पुरचश्म से वो "मीर"
मेरे ही नसीबों में था ये ज़हर का प्याला

66. मरते हैं हम तो आदम-ए-ख़ाकी की शान पर

मरते हैं हम तो आदम-ए-ख़ाकी की शान पर
अल्लाह रे दिमाग़ कि है आसमान पर

कुछ हो रहेगा इश्क़-ओ-हवस में भी इम्तियाज़
आया है अब मिज़ाज तेरा इम्तिहान पर

मोहताज को ख़ुदा न निकाले कि जू हिलाल
तश्हीर कौन शहर में हो पारा-नान पर

शोख़ी तो देखो आप कहा आओ बैठो "मीर"
पूछा कहाँ तो बोले कि मेरी ज़ुबान पर

67. कुछ करो फ़िक्र मुझ दीवाने की

कुछ करो फ़िक्र मुझ दीवाने की
धूम है फिर बहार आने की

वो जो फिरता है मुझ से दूर ही दूर
है ये तरकीब जी के जाने की

तेज़ यूँ ही न थी शब-ए-आतिश-ए-शौक़
थी खबर गर्म उस के आने की

जो है सो पाइमाल-ए-ग़म है मीर
चाल बेडोल है ज़माने की

68. हमारे आगे तेरा जब किसी ने नाम लिया

हमारे आगे तेरा जब किसी ने नाम लिया
दिल-ए-सितम-ज़दा को हमने थाम-थाम लिया

ख़राब रहते थे मस्जिद के आगे मयख़ाने
निगाह-ए-मस्त ने साक़ी की इंतक़ाम लिया

वो कज-रविश न मिला मुझसे रास्ते में कभू
न सीधी तरहा से उसने मेरा सलाम लिया

मेरे सलीक़े से मेरी निभी मोहब्बत में
तमाम उम्र मैं नाकामियों से काम लिया

अगरचे गोशा-गुज़ीं हूँ मैं शाइरों में 'मीर'
प' मेरे शोर ने रू-ए-ज़मीं तमाम किया

69. आ के सज्जादः नशीं क़ैस हुआ मेरे बाद

आ के सज्जादः नशीं क़ैस हुआ मेरे बाद
न रही दश्त में ख़ाली कोई जा मेरे बाद

चाक करना है इसी ग़म से गिरेबान-ए-क़फ़न
कौन खोलेगा तेरे बन्द-ए-कबा मेरे बाद

वो हवाख़्वाहे-चमन हूँ कि चमन में हर सुब्ह
पहले मैं जाता था और बाद-ए-सबा मेरे बाद

तेज़ रखना सर-ए-हर ख़ार को ऐ दश्त-ए-जुनूँ !
शायद आ जाए कोई आबला-पा मेरे बाद

मुँह पे रख दामन-ए-गुल रोएंगे मुर्ग़ान-ए-चमन
हर रविश ख़ाक उड़ाएगी सबा मेरे बाद

बाद मरने के मेरी क़ब्र पे आया वो 'मीर'
याद आई मेरे ईसा को दवा मेरे बाद

(सज्जादः नशीं=किसी मस्जिद या मज़ार का प्रबंधन
करने वाले की मौत के बाद उसकी गद्दी संभालने
वाला, क़ैस=मजनूँ, दश्त=जंगल, जा=जगह,स्थान,
गिरेबान-ए-क़फ़न=क़फ़न रूपी वस्त्र का गला,
बन्द-ए-कबा=वस्त्रों में लगाई जाने वाली गांठें,
हवाख़्वाहे-चमन=बग़ीचे में हवाख़ोरी करने का,
शौक़ीन, बाद-ए-सबा=सुबह की समीर, सर-ए-
हर ख़ार=हर कांटे की नोक, दश्त-ए-जुनूँ=
पागलपन के जंगल, आबला-पा=जिसके पैर
में छाले पड़े हों, मुर्ग़ान-ए-चमन=उद्यान के पक्षी)

70. दिखाई दिये यूँ कि बेख़ुद किया

दिखाई दिये यूं कि बेख़ुद किया
हमें आप से भी जुदा कर चले

जबीं सजदा करते ही करते गई
हक़-ए-बन्दगी हम अदा कर चले

परस्तिश की यां तक कि अय बुत तुझे
नज़र में सभों की ख़ुदा कर चले

बहुत आरज़ू थी गली की तेरी
सो यां से लहू में नहा कर चले

71. ज़ख्म झेले दाग़ भी खाए बोहत

ज़ख्म झेले दाग़ भी खाए बोहत
दिल लगा कर हम तो पछताए बोहत

दैर से सू-ए-हरम आया न टुक
हम मिजाज अपना इधर लाये बोहत

फूल, गुल, शम्स-ओ-क़मर सारे ही थे
पर हमें उनमें तुम ही भाये बोहत

रोवेंगे सोने को हमसाये बोहत

मीर से पूछा जो मैं आशिक हो तुम
हो के कुछ चुपके से शरमाये बोहत

72. न दिमाग है कि किसू से हम

न‍ दिमाग है कि किसू से हम,करें गुफ्तगू गम-ए-यार में
न फिराग है कि फकीरों से,मिलें जा के दिल्‍ली दयार में

कहे कौन सैद-ए-रमीद: से,कि उधर भी फिरके नजर करे
कि निकाब उलटे सवार है, तिरे पीछे कोई गुबार में

कोई शोल: है कि शरार: है,कि हवा है यह कि सितार: है
यही दिल जो लेके गड़ेंगे हम,तो लगेगी आग मजार में

73. हर जी का हयात है

हर जी हयात का, है सबब जो हयात का
निकले है जी उसी के लिए, कायनात का

बिखरे हैं जुल्‍फ, उस रूख-ए-आलम फ़रोज पर
वर्न:, बनाव होवे न दिन और रात का

उसके फ़रोग-ए-हुस्‍न से, झमके है सब में नूर
शम्म-ए-हरम हो या कि दिया सोमनात का

क्‍या मीर तुझ को नाम: सियाही की फ़िक्र है
ख़त्‍म-ए-रूसुल सा शख्‍स है, जामिन नजात का

74. चाक करना है इसी ग़म से

चाक करना है इसी ग़म से गिरेबान-ए-कफ़न
कौन खोलेगा तेरे बन्द-ए-कबा मेरे बाद

वो हवाख़्वाह-ए-चमन हूँ कि चमन में हर सुब्ह
पहले मैं जाता था और बाद-ए-सबा मेरे बाद

तेज़ रखना सर-ए-हर ख़ार को ऐ दश्त-ए-जुनूं
शायद आ जाए कोई आबला पा मेरे बाद

मुँह पे रख दामन-ए-गुल रोएंगे मुर्ग़ान-ए-चमन
हर रविश ख़ाक उड़ाएगी सबा मेरे बाद

बाद मरने के मेरी क़ब्र पे आया वो 'मीर'
याद आई मेरे ईसा को दवा मेरे बाद

75. गुल ब बुलबुल बहार में देखा

गुल ब बुलबुल बहार में देखा
एक तुझको हज़ार में देखा

जल गया दिल सफ़ेद हैं आखें
यह तो कुछ इंतज़ार में देखा

आबले का भी होना दामनगीर
तेरे कूचे के खार में देखा

जिन बालाओं को 'मीर' सुनते थे
उनको इस रोज़गार में देखा

76. अब नहीं सीने में मेरे जा-ए-दाग़

अब नहीं सीने में मेरे जा-ए-दाग़
सोज़-ए-दिल से दाग़ है बाला-ए-दाग़

दिल जला आँखें जलीं जी जल गया
इश्क़ ने क्या क्या हमें दिखलाए दाग़

दिल जिगर जल कर हुए हैं दोनों एक
दरमियाँ आया है जब से पा-ए-दाग़

मुन्फ़इल हैं लाला ओ शम्अ ओ चराग़
हम ने भी क्या आशिक़ी में खाए दाग़

वो नहीं अब 'मीर' जो छाती जले
खा गया सारे जिगर को हाए दाग़

77. अमीरों तक रसाई हो चुकी बस

अमीरों तक रसाई हो चुकी बस
मिरी बख़्त-आज़माई हो चुकी बस

बहार अब के भी जो गुज़री क़फ़स में
तो फिर अपनी रिहाई हो चुकी बस

कहाँ तक उस से क़िस्सा क़ज़िया हर शब
बहुत बाहम लड़ाई हो चुकी बस

न आया वो मिरे जाते जहाँ से
यहीं तक आश्नाई हो चुकी बस

लगा है हौसला भी करने तंगी
ग़मों की अब समाई हो चुकी बस

बराबर ख़ाक के तो कर दिखाया
फ़लक बस बे-अदाई हो चुकी बस

दनी के पास कुछ रहती है दौलत
हमारे हाथ आई हो चुकी बस

दिखा उस बुत को फिर भी या ख़ुदाया
तिरी क़ुदरत-नुमाई हो चुकी बस

शरर की सी है चश्मक फ़ुर्सत-ए-उम्र
जहाँ दे टुक दिखाई हो चुकी बस

गले में गेरवी कफ़नी है अब 'मीर'
तुम्हारी मीरज़ाई हो चुकी बस

78. आओ कभू तो पास हमारे भी नाज़ से

आओ कभू तो पास हमारे भी नाज़ से
करना सुलूक ख़ूब है अहल-ए-नियाज़ से

फिरते हो क्या दरख़्तों के साए में दूर दूर
कर लो मुवाफ़क़त किसू बेबर्ग-ओ-साज़ से

हिज्राँ में उस के ज़िंदगी करना भला न था
कोताही जो न होवे ये उम्र-ए-दराज़ से

मानिंद-ए-सुब्हा उक़दे न दिल के कभू खुले
जी अपना क्यूँ कि उचटे न रोज़े नमाज़ से

करता है छेद छेद हमारा जिगर तमाम
वो देखना तिरा मिज़ा-ए-नीम-बाज़ से

दिल पर हो इख़्तियार तो हरगिज़ न करिए इश्क़
परहेज़ करिए इस मरज़-ए-जाँ-गुदाज़ से

आगे बिछा के नता को लाते थे तेग़ ओ तश्त
करते थे यानी ख़ून तो इक इम्तियाज़ से

माने हों क्यूँ कि गिर्या-ए-ख़ूनीं के इश्क़ में
है रब्त-ए-ख़ास चश्म को इफ़शा-ए-राज़ से

शायद शराब-ख़ाने में शब को रहे थे 'मीर'
खेले था एक मुग़बचा मोहर-ए-नमाज़ से

79. आम हुक्म-ए-शराब करता हूँ

आम हुक्म-ए-शराब करता हूँ
मोहतसिब को कबाब करता हूँ

टुक तो रह ऐ बिना-ए-हस्ती तू
तुझ को कैसा ख़राब करता हूँ

बहस करता हूँ हो के अबजद-ख़्वाँ
किस क़दर बे-हिसाब करता हूँ

कोई बुझती है ये भड़क में अबस
तिश्नगी पर इताब करता हूँ

सर तलक आब-ए-तेग़ में हूँ ग़र्क़
अब तईं आब आब करता हूँ

जी में फिरता है 'मीर' वो मेरे
जागता हूँ कि ख़्वाब करता हूँ

80. आह जिस वक़्त सर उठाती है

आह जिस वक़्त सर उठाती है
अर्श पर बर्छियाँ चलाती है

नाज़-बरदार-ए-लब है जाँ जब से
तेरे ख़त की ख़बर को पाती है

ऐ शब-ए-हिज्र रास्त कह तुझ को
बात कुछ सुब्ह की भी आती है

चश्म-ए-बद्दूर-चश्म-ए-तर ऐ 'मीर'
आँखें तूफ़ान को दिखाती है

81. इश्क़ क्या क्या आफ़तें लाता रहा

इश्क़ क्या क्या आफ़तें लाता रहा
आख़िर अब दूरी में जी जाता रहा

मेहर ओ मह गुल फूल सब थे पर हमें
चेहरई चेहरा ही वो भाता रहा

दिल हुआ कब इश्क़ की रह का दलील
मैं तो ख़ुद गुम ही उसे पाता रहा

मुँह दिखाता बरसों वो ख़ुश-रू नहीं
चाह का यूँ कब तलक नाता रहा

कुछ न मैं समझा जुनून ओ इश्क़ में
देर नासेह मुझ को समझाता रहा

दाग़ था जो सर पे मेरे शम्अ साँ
पाँव तक मुझ को वही खाता रहा

कैसे कैसे रुक गए हैं 'मीर' हम
मुद्दतों मुँह तक जिगर आता रहा

82. इश्क़ में कुछ नहीं दवा से नफ़ा

इश्क़ में कुछ नहीं दवा से नफ़ा
कुढि़ए कब तक न हो बला से नफ़ा

कब तलक इन बुतों से चश्म रहे
हो रहेगा बस अब ख़ुदा से नफ़ा

मैं तो ग़ैर अज़ ज़रर न देखा कुछ
ढूँढो तुम यार ओ आश्ना से नफ़ा

मुग़्तनिम जान गर किसू के तईं
पहुँचे है तेरे दस्त ओ पा से नफ़ा

अब फ़क़ीरों से कह हक़ीक़त-ए-दिल
'मीर' शायद कि हो दुआ से नफ़ा

83. इश्क़ में ज़िल्लत हुई ख़िफ़्फ़त हुई तोहमत हुई

इश्क़ में ज़िल्लत हुई ख़िफ़्फ़त हुई तोहमत हुई
आख़िर आख़िर जान दी यारों ने ये सोहबत हुई

अक्स उस बे-दीद का तो मुत्तसिल पड़ता था सुब्ह
दिन चढ़े क्या जानूँ आईने की क्या सूरत हुई

लौह-ए-सीना पर मिरी सौ नेज़ा-ए-ख़त्ती लगे
ख़स्तगी इस दिल-शिकस्ता की इसी बाबत हुई

खोलते ही आँखें फिर याँ मूँदनी हम को पड़ीं
दीद क्या कोई करे वो किस क़दर मोहलत हुई

पाँव मेरा कल्बा-ए-अहज़ाँ में अब रहता नहीं
रफ़्ता रफ़्ता उस तरफ़ जाने की मुझ को लत हुई

मर गया आवारा हो कर मैं तो जैसे गर्द-बाद
पर जिसे ये वाक़िआ पहुँचा उसे वहशत हुई

शाद ओ ख़ुश-ताले कोई होगा किसू को चाह कर
मैं तो कुल्फ़त में रहा जब से मुझे उल्फ़त हुई

दिल का जाना आज कल ताज़ा हुआ हो तो कहूँ
गुज़रे उस भी सानेहे को हम-नशीं मुद्दत हुई

शौक़-ए-दिल हम ना-तवानों का लिखा जाता है कब
अब तलक आप ही पहुँचने की अगर ताक़त हुई

क्या कफ़-ए-दस्त एक मैदाँ था बयाबाँ इश्क़ का
जान से जब उस में गुज़रे तब हमें राहत हुई

यूँ तो हम आजिज़-तरीन-ए-ख़ल्क़-ए-आलम हैं वले
देखियो क़ुदरत ख़ुदा की गर हमें क़ुदरत हुई

गोश ज़द चट-पट ही मरना इश्क़ में अपने हुआ
किस को इस बीमारी-ए-जाँ-काह से फ़ुर्सत हुई

बे-ज़बाँ जो कहते हैं मुझ को सो चुप रह जाएँगे
मारके में हश्र के गर बात की रुख़्सत हुई

हम न कहते थे कि नक़्श उस का नहीं नक़्क़ाश सहल
चाँद सारा लग गया तब नीम-रुख़ सूरत हुई

इस ग़ज़ल पर शाम से तो सूफ़ियों को वज्द था
फिर नहीं मालूम कुछ मज्लिस की क्या हालत हुई

कम किसू को 'मीर' की मय्यत की हाथ आई नमाज़
नाश पर उस बे-सर-ओ-पा की बला कसरत हुई

84. इश्क़ हमारे ख़याल पड़ा है ख़्वाब गई आराम गया

इश्क़ हमारे ख़याल पड़ा है ख़्वाब गई आराम गया
जी का जाना ठहर रहा है सुब्ह गया या शाम गया

इश्क़ किया सो दीन गया ईमान गया इस्लाम गया
दिल ने ऐसा काम किया कुछ जिस से मैं नाकाम गया

किस किस अपनी कल को रोवे हिज्राँ में बेकल उस का
ख़्वाब गई है ताब गई है चैन गया आराम गया

आया याँ से जाना ही तो जी का छुपाना क्या हासिल
आज गया या कल जावेगा सुब्ह गया या शाम गया

हाए जवानी क्या क्या कहिए शोर सरों में रखते थे
अब क्या है वो अहद गया वो मौसम वो हंगाम गया

गाली झड़की ख़श्म ओ ख़ुशुनत ये तो सर-ए-दस्त अक्सर हैं
लुत्फ़ गया एहसान गया इनआम गया इकराम गया

लिखना कहना तर्क हुआ था आपस में तो मुद्दत से
अब जो क़रार किया है दिल से ख़त भी गया पैग़ाम गया

नाला-ए-मीर सवाद में हम तक दोशीं शब से नहीं आया
शायद शहर से उस ज़ालिम के आशिक़ वो बदनाम गया

85. उस का ख़याल चश्म से शब ख़्वाब ले गया

उस का ख़याल चश्म से शब ख़्वाब ले गया
क़स्मे कि इश्क़ जी से मिरे ताब ले गया

किन नींदों अब तू सोती है ऐ चश्म-ए-गिर्या-नाक
मिज़्गाँ तो खोल शहर को सैलाब ले गया

आवे जो मस्तबा में तो सुन लो कि राह से
वाइज़ को एक जाम-ए-मय-ए-नाब ले गया

ने दिल रहा बजा है न सब्र ओ हवास ओ होश
आया जो सैल-ए-इश्क़ सब अस्बाब ले गया

मेरे हुज़ूर शम्अ ने गिर्या जो सर किया
रोया मैं इस क़दर कि मुझे आब ले गया

अहवाल उस शिकार ज़ुबूँ का है जाए रहम
जिस ना-तवाँ को मुफ़्त न क़स्साब ले गया

मुँह की झलक से यार के बेहोश हो गए
शब हम को 'मीर' परतव-ए-महताब ले गया

86. कल शब-ए-हिज्राँ थी लब पर नाला बीमाराना था

कल शब-ए-हिज्राँ थी लब पर नाला बीमाराना था
शाम से ता सुब्ह दम-ए-बालीं पे सर यकजा न था

शोहरा-ए-आलम उसे युम्न-ए-मोहब्बत ने किया
वर्ना मजनूँ एक ख़ाक उफ़्तादा-ए-वीराना था

मंज़िल उस मह की रहा जो मुद्दतों ऐ हम-नशीं
अब वो दिल गोया कि इक मुद्दत का मातम-ख़ाना था

इक निगाह-ए-आश्ना को भी वफ़ा करता नहीं
वा हुईं मिज़्गाँ कि सब्ज़ा सब्ज़ा-ए-बेगाना था

रोज़ ओ शब गुज़रे है पेच-ओ-ताब में रहते तुझे
ऐ दिल-ए-सद-चाक किस की ज़ुल्फ़ का तू शाना था

याद अय्यामे कि अपने रोज़ ओ शब की जा-ए-बाश
या दर-ए-बाज़-ए-बयाबाँ या दर-ए-मय-ख़ाना था

जिस को देखा हम ने इस वहशत-कदे में दहर के
या सिड़ी या ख़ब्ती या मजनून या दीवाना था

बाद ख़ूँ-रेज़ी के मुद्दत बे-हिना रंगीं रहा
हाथ उस का जो मिरे लोहू में गुस्ताख़ाना था

ग़ैर के कहने से मारा उन ने हम को बे-गुनाह
ये न समझा वो कि वाक़े में भी कुछ था या न था

सुब्ह होते वो बिना-गोश आज याद आया मुझे
जो गिरा दामन पे आँसू गौहर-ए-यक-दाना था

शब फ़रोग़-ए-बज़्म का बाइस हुआ था हुस्न-ए-दोस्त
शम्अ का जल्वा ग़ुबार-ए-दीदा-ए-परवाना था

रात उस की चश्म-ए-मयगूँ ख़्वाब में देखी थी मैं
सुब्ह सोते से उठा तो सामने पैमाना था

रहम कुछ पैदा किया शायद कि उस बे-रहम ने
गोश उस का शब इधर ता आख़िर-ए-अफ़्साना था

'मीर' भी क्या मस्त ताफ़ेह था शराब-ए-इश्क़ का
लब पे आशिक़ के हमेशा नारा-ए-मस्ताना था

87. कहते हैं बहार आई गुल फूल निकलते हैं

कहते हैं बहार आई गुल फूल निकलते हैं
हम कुंज-ए-क़फ़स में हैं दिल सीनों में जलते हैं

अब एक सी बेहोशी रहती नहीं है हम को
कुछ दिल भी सँभलते हैं पर देर सँभलते हैं

वो तो नहीं इक छींटा रोने का हुआ गाहे
अब दीदा-ए-तर अक्सर दरिया से उबलते हैं

उन पाँव को आँखों से हम मलते रहे जैसा
अफ़्सोस से हाथों को अब वैसा ही मलते हैं

क्या कहिए कि आज़ा सब पानी हुए हैं अपने
हम आतिश-ए-हिज्राँ में यूँ ही पड़े गलते हैं

करते हैं सिफ़त जब हम लाल-ए-लब-ए-जानाँ की
तब कोई हमें देखे क्या लाल उगलते हैं

गुल फूल से भी अपने दिल तो नहीं लगते टुक
जी लोगों के बेजानाँ किस तौर बहलते हैं

हैं नर्म सनम गो न कहने के तईं वर्ना
पत्थर हैं उन्हों के दिल काहे को पिघलते हैं

ऐ गर्म-ए-सफ़र याराँ जो है सो सर-ए-रह है
जो रह सको रह जाओ अब 'मीर' भी चलते हैं

88. कहते हो इत्तिहाद है हम को

कहते हो इत्तिहाद है हम को
हाँ कहो ए'तिमाद है हम को

शौक़ ही शौक़ है नहीं मालूम
इस से क्या दिल निहाद है हम को

ख़त से निकले है बेवफ़ाई-ए-हुस्न
इस क़दर तो सवाद है हम को

आह किस ढब से रोइए कम कम
शौक़ हद से ज़ियाद है हम को

शैख़ ओ पीर-ए-मुग़ाँ की ख़िदमत में
दिल से इक ए'तिक़ाद है हम को

सादगी देख इश्क़ में उस के
ख़्वाहिश-ए-जान शाद है हम को

बद-गुमानी है जिस से तिस से आह
क़स्द-ए-शोर-ओ-फ़साद है हम को

दोस्ती एक से भी तुझ को नहीं
और सब से इनाद है हम को

नामुरादाना ज़ीस्त करता था
'मीर' का तौर याद है हम को

89. काश उठें हम भी गुनहगारों के बीच

काश उठें हम भी गुनहगारों के बीच
हों जो रहमत के सज़ा-वारों के बीच

जी सदा उन अबरूओं ही में रहा
की बसर हम उम्र तलवारों के बीच

चश्म हो तो आईना-ख़ाना है दहर
मुँह नज़र आता है दीवारों के बीच

हैं अनासिर की ये सूरत बाज़ियाँ
शोबदे क्या क्या हैं उन चारों के बीच

जब से ले निकला है तू ये जिंस-ए-हुस्न
पड़ गई है धूम बाज़ारों के बीच

आशिक़ी ओ बेकसी ओ रफ़्तगी
जी रहा कब ऐसे आज़ारों के बीच

जो सरिश्क उस माह बिन झमके है शब
वो चमक काहे को है तारों के बीच

उस के आतिशनाक रुख़्सारों बग़ैर
लोटिए यूँ कब तक अँगारों के बीच

बैठना ग़ैरों में कब है नंग-ए-यार
फूल गुल होते ही हैं ख़ारों के बीच

यारो मत उस का फ़रेब-ए-मेहर खाओ
'मीर' भी थे उस के ही यारों के बीच

90. कुछ तो कह वस्ल की फिर रात चली जाती है

कुछ तो कह वस्ल की फिर रात चली जाती है
दिन गुज़र जाएँ हैं पर बात चली जाती है

रह गए गाह तबस्सुम पे गहे बात ही पर
बारे ऐ हम-नशीं औक़ात चली जाती है

टुक तो वक़्फ़ा भी कर ऐ गर्दिश-ए-दौराँ कि ये जान
उम्र के हैफ़ ही क्या सात चली जाती है

याँ तो आती नहीं शतरंज-ज़माना की चाल
और वाँ बाज़ी हुई मात चली जाती है

रोज़ आने पे नहीं निस्बत-ए-इश्क़ी मौक़ूफ़
उम्र भर एक मुलाक़ात चली जाती है

शैख़-ए-बे-नफ़स को नज़ला नहीं है नाक की राह
ये है ज़िर्यान-ए-मनी धात चली जाती है

ख़िर्क़ा मिंदील ओ रिदा मस्त लिए जाते हैं
शैख़ की सारी करामात चली जाती है

है मुअज़्ज़िन जो बड़ा मुर्ग़ मुसल्ली उस की
मस्तों से नोक ही की बात चली जाती है

पाँव रुकता नहीं मस्जिद से दम-ए-आख़िर भी
मरने पर आया है पर लात चली जाती है

एक हम ही से तफ़ावुत है सुलूकों में 'मीर'
यूँ तो औरों की मुदारात चली जाती है

91. कुछ मौज-ए-हवा पेचाँ ऐ 'मीर' नज़र आई

कुछ मौज-ए-हवा पेचाँ ऐ 'मीर' नज़र आई
शायद कि बहार आई ज़ंजीर नज़र आई

दिल्ली के न थे कूचे औराक़-ए-मुसव्वर थे
जो शक्ल नज़र आई तस्वीर नज़र आई

मग़रूर बहुत थे हम आँसू की सरायत पर
सो सुब्ह के होने को तासीर नज़र आई

गुल-बार करे हैगा असबाब-ए-सफ़र शायद
ग़ुंचे की तरह बुलबुल दिल-गीर नज़र आई

उस की तो दिल-आज़ारी बे-हेच ही थी यारो
कुछ तुम को हमारी भी तक़्सीर नज़र आई

92. क्या कहिए क्या रक्खें हैं हम तुझ से यार ख़्वाहिश

क्या कहिए क्या रक्खें हैं हम तुझ से यार ख़्वाहिश
यक जान ओ सद तमन्ना यक दिल हज़ार ख़्वाहिश

ले हाथ में क़फ़स टुक सय्याद चल चमन तक
मुद्दत से है हमें भी सैर-ए-बहार ख़्वाहिश

ने कुछ गुनह है दिल का ने जुर्म-ए-चश्म इस में
रखती है हम को इतना बे-इख़्तियार ख़्वाहिश

हालाँकि उम्र सारी मायूस गुज़री तिस पर
क्या क्या रखें हैं उस के उम्मीद-वार ख़्वाहिश

ग़ैरत से दोस्ती की किस किस से हो जे दुश्मन
रखता है यारी ही की सारा दयार ख़्वाहिश

हम मेहर ओ रज़ क्यूँ कर ख़ाली हों आरज़ू से
शेवा यही तमन्ना फ़न ओ शिआर ख़्वाहिश

उठती है मौज हर यक आग़ोश ही की सूरत
दरिया को है ये किस का बोस ओ कनार ख़्वाहिश

सद रंग जल्वा-गर है हर जादा ग़ैरत गुल
आशिक़ की एक पावे क्यूँ कर क़रार ख़्वाहिश

यक बार बर न आए उस से उम्मीद दिल की
इज़हार करते कब तक यूँ बार बार ख़्वाहिश

करते हैं सब तमन्ना पर 'मीर' जी न इतनी
रक्खेगी मार तुम को पायान-ए-कार ख़्वाहिश

93. क्या कहें आतिश-ए-हिज्राँ से गले जाते हैं

क्या कहें आतिश-ए-हिज्राँ से गले जाते हैं
छातियाँ सुलगें हैं ऐसी कि जले जाते हैं

गौहर-ए-गोश किसू का नहीं जी से जाता
आँसू मोती से मिरे मुँह पे ढले जाते हैं

यही मसदूद है कुछ राह-ए-वफ़ा वर्ना बहम
सब कहीं नामा ओ पैग़ाम चले जाते हैं

बार-ए-हिरमान-ओ-गुल-ओ-दाग़ नहीं अपने साथ
शजर-ए-बाग़-ए-वफ़ा फूले फले जाते हैं

हैरत-ए-इश्क़ में तस्वीर से रफ़्ता ही रहे
ऐसे जाते हैं जो हम भी तो भले जाते हैं

हिज्र की कोफ़्त जो खींचे हैं उन्हीं से पूछो
दिल दिए जाते हैं जी अपने मले जाते हैं

याद-ए-क़द में तिरे आँखों से बहें हैं जुएँ
गर किसू बाग़ में हम सर्व तले जाते हैं

देखें पेश आवे है क्या इश्क़ में अब तो जूँ सैल
हम भी इस राह में सर गाड़े चले जाते हैं

पुर-ग़ुबारी-ए-जहाँ से नहीं सुध 'मीर' हमें
गर्द इतनी है कि मिट्टी में रुले जाते हैं

94. क्या मुआफ़िक़ हो दवा इश्क़ के बीमार के साथ

क्या मुआफ़िक़ हो दवा इश्क़ के बीमार के साथ
जी ही जाते नज़र आए हैं इस आज़ार के साथ

रात मज्लिस में तिरी हम भी खड़े थे चुपके
जैसे तस्वीर लगा दे कोई दीवार के साथ

मर गए पर भी खुली रह गईं आँखें अपनी
कौन इस तरह मुआ हसरत-ए-दीदार के साथ

शौक़ का काम खिंचा दूर कि अब मेहर मिसाल
चश्म-ए-मुश्ताक़ लगी जाए है तूमार के साथ

राह उस शोख़ की आशिक़ से नहीं रुक सकती
जान जाती है चली ख़ूबी-ए-रफ़्तार के साथ

वे दिन अब सालते हैं रातों को बरसों गुज़रे
जिन दिनों देर रहा करते थे हम यार के साथ

ज़िक्र-ए-गुल क्या है सबा अब कि ख़िज़ाँ में हम ने
दिल को नाचार लगाया है ख़स ओ ख़ार के साथ

किस को हर दम है लहू रोने का हिज्राँ में दिमाग़
दिल को इक रब्त सा है दीदा-ए-ख़ूँ-बार के साथ

मेरी उस शोख़ से सोहबत है बे-ऐनिहि वैसी
जैसे बन जाए किसू सादे को अय्यार के साथ

देखिए किस को शहादत से सर-अफ़राज़ करें
लाग तो सब को है उस शोख़ की तलवार के साथ

बेकली उस की न ज़ाहिर थी जो तू ऐ बुलबुल
दमकश-ए-'मीर' हुई उस लब ओ गुफ़्तार के साथ

95. क्या मैं भी परेशानी-ए-ख़ातिर से क़रीं था

क्या मैं भी परेशानी-ए-ख़ातिर से क़रीं था
आँखें तो कहीं थीं दिल-ए-ग़म-दीदा कहीं था

किस रात नज़र की है सू-ए-चश्मक-ए-अंजुम
आँखों के तले अपने तो वो माह-जबीं था

आया तो सही वो कोई दम के लिए लेकिन
होंठों पे मिरे जब नफ़स-ए-बाज़-पुसीं था

अब कोफ़्त से हिज्राँ की जहाँ तन पे रखा हाथ
जो दर्द ओ अलम था सो कहे तू कि वहीं था

जाना नहीं कुछ जुज़ ग़ज़ल आ कर के जहाँ में
कल मेरे तसर्रुफ़ में यही क़ितआ ज़मीं था

नाम आज कोई याँ नहीं लेता है उन्हों का
जिन लोगों के कल मुल्क ये सब ज़ेर-ए-नगीं था

मस्जिद में इमाम आज हुआ आ के वहाँ से
कल तक तो यही 'मीर' ख़राबात-नशीं था

96. क्या लड़के दिल्ली के हैं अय्यार और नट-खट

क्या लड़के दिल्ली के हैं अय्यार और नट-खट
दिल लें हैं यूँ कि हरगिज़ होती नहीं है आहट

हम आशिक़ों को मरते क्या देर कुछ लगे है
चट जिन ने दिल पे खाई वो हो गया है चट-पट

दिल है जिधर को ऊधर कुछ आग सी लगी थी
उस पहलू हम जो लेटे जल जल गई है करवट

कलियों को तू ने चट चट ऐ बाग़बाँ जो तोड़ा
बुलबुल के दिल जिगर को ज़ालिम लगी है क्या चट

जी ही हटे न मेरा तो उस को क्या करूँ मैं
हर-चंद बैठता हूँ मज्लिस में उस से हट हट

देती है तूल बुलबुल क्या नाला ओ फ़ुग़ाँ को
दिल के उलझने से हैं ये आशिक़ों की फट फट

मुर्दे न थे हम ऐसे दरिया पे जब था तकिया
उस घाट गाह ओ बीगह रहने लगा था जमघट

रुक रुक के दिल हमारा बे-ताब क्यूँ न होवे
कसरत से दर्द ओ ग़म की रहता है उस पे झुरमुट

शब 'मीर' से मिले हम इक वहम रह गया है
उस के ख़याल-ए-मू में अब तो गया बहुत लट

97. क्या हक़ीक़त कहूँ कि क्या है इश्क़

क्या हक़ीक़त कहूँ कि क्या है इश्क़
हक़-शनासों के हाँ ख़ुदा है इश्क़

दिल लगा हो तो जी जहाँ से उठा
मौत का नाम प्यार का है इश्क़

और तदबीर को नहीं कुछ दख़्ल
इश्क़ के दर्द की दवा है इश्क़

क्या डुबाया मुहीत में ग़म के
हम ने जाना था आश्ना है इश्क़

इश्क़ से जा नहीं कोई ख़ाली
दिल से ले अर्श तक भरा है इश्क़

कोहकन क्या पहाड़ काटेगा
पर्दे में ज़ोर-आज़मा है इश्क़

इश्क़ है इश्क़ करने वालों को
कैसा कैसा बहम क्या है इश्क़

कौन मक़्सद को इश्क़ बिन पहुँचा
आरज़ू इश्क़ मुद्दआ है इश्क़

'मीर' मरना पड़े है ख़ूबाँ पर
इश्क़ मत कर कि बद बला है इश्क़

98. ख़ातिर करे है जमा वो हर बार एक तरह

ख़ातिर करे है जमा वो हर बार एक तरह
करता है चर्ख़ मुझ से नए यार एक तरह

मैं और क़ैस ओ कोहकन अब जो ज़बाँ पे हैं
मारे गए हैं सब ये गुनहगार एक तरह

मंज़ूर उस को पर्दे में हैं बे-हिजाबियाँ
किस से हुआ दो-चार वो अय्यार एक तरह

सब तरहें उस की अपनी नज़र में थीं क्या कहें
पर हम भी हो गए हैं गिरफ़्तार एक तरह

घर उस के जा के आते हैं पामाल हो के हम
करिए मकाँ ही अब सर-ए-बाज़ार एक तरह

गह गुल है गाह रंग गहे बाग़ की है बू
आता नहीं नज़र वो तरह-दार एक तरह

नैरंग हुस्न-ए-दोस्त से कर आँखें आश्ना
मुमकिन नहीं वगरना हो दीदार एक तरह

सौ तरह तरह देख तबीबों ने ये कहा
सेहत पज़ीर हुए ये बीमार एक तरह

सो भी हज़ार तरह से ठहरवाते हैं हम
तस्कीन के लिए तिरी नाचार एक तरह

बिन जी दिए हो कोई तरह फ़ाएदा नहीं
गर है तो ये है ऐ जिगर अफ़गार एक तरह

हर तरह तू ज़लील ही रखता है 'मीर' को
होता है आशिक़ी में कोई ख़्वार एक तरह

99. ग़ज़ल 'मीर' की कब पढ़ाई नहीं

ग़ज़ल 'मीर' की कब पढ़ाई नहीं
कि हालत मुझे ग़श की आई नहीं

ज़बाँ से हमारी है सय्याद ख़ुश
हमें अब उम्मीद-ए-रिहाई नहीं

किताबत गई कब कि उस शोख़ ने
बना उस की गड्डी उड़ाई नहीं

नसीम आई मेरे क़फ़स में अबस
गुलिस्ताँ से दो फूल लाई नहीं

मिरी दिल-लगी उस के रू से ही है
गुल-ए-तर से कुछ आश्नाई नहीं

नविश्ते की ख़ूबी लिखी कब गई
किताबत भी एक अब तक आई नहीं

जुदा रहते बरसों हुए क्यूँकि ये
किनाया नहीं बे-अदाई नहीं

गिला हिज्र का सुन के कहने लगा
हमारे तुम्हारे जुदाई नहीं

सियह-तालई मेरी ज़ाहिर है अब
नहीं शब कि उस से लड़ाई नहीं

100. चमन में गुल ने जो कल दावा-ए-जमाल किया

चमन में गुल ने जो कल दावा-ए-जमाल किया
जमाल-ए-यार ने मुँह उस का ख़ूब लाल किया

फ़लक ने आह तिरी रह में हम को पैदा कर
ब-रंग-ए-सब्ज़-ए-नूरस्ता पाएमाल किया

रही थी दम की कशाकश गले में कुछ बाक़ी
सो उस की तेग़ ने झगड़ा ही इंफ़िसाल किया

मिरी अब आँखें नहीं खुलतीं ज़ोफ़ से हमदम
न कह कि नींद में है तू ये क्या ख़याल किया

बहार-ए-रफ़्ता फिर आई तिरे तमाशे को
चमन को युम्न-ए-क़दम ने तिरे निहाल किया

जवाब-नामा सियाही का अपनी है वो ज़ुल्फ़
किसू ने हश्र को हम से अगर सवाल किया

लगा न दिल को कहीं क्या सुना नहीं तू ने
जो कुछ कि 'मीर' का इस आशिक़ी ने हाल किया

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