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फ़िराक गोरखपुरी
Firaq Gorakhpuri
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Poetry Firaq Gorakhpuri

फ़िराक गोरखपुरी शायरी/कविता

61. अब दौर-ए-आसमाँ है न दौर-ए-हयात है

अब दौर-ए-आसमाँ है न दौर-ए-हयात है
ऐ दर्द-ए-हिज्र तू ही बता कितनी रात है

हर काएनात से ये अलग काएनात है
हैरत-सरा-ए-इश्क़ में दिन है न रात है

जीना जो आ गया तो अजल भी हयात है
और यूँ तो उम्र-ए-ख़िज़्र भी क्या बे-सबात है

क्यूँ इंतिहा-ए-होश को कहते हैं बे-ख़ुदी
ख़ुर्शीद ही की आख़िरी मंज़िल तो रात है

हस्ती को जिस ने ज़लज़ला-सामाँ बना दिया
वो दिल क़रार पाए मुक़द्दर की बात है

ये मुशगाफ़ियाँ हैं गिराँ तब-ए-इश्क़ पर
किस को दिमाग़-ए-काविश-ए-ज़ात-ओ-सिफ़ात है

तोड़ा है ला-मकाँ की हदों को भी इश्क़ ने
ज़िंदान-ए-अक़्ल तेरी तो क्या काएनात है

गर्दूं शरार-ए-बर्क़-ए-दिल-ए-बे-क़रार देख
जिन से ये तेरी तारों भरी रात रात है

गुम हो के हर जगह हैं ज़-ख़ुद रफ़्तगान-ए-इश्क़
उन की भी अहल-ए-कश्फ़-ओ-करामात ज़ात है

हस्ती ब-जुज़ फ़ना-ए-मुसलसल के कुछ नहीं
फिर किस लिए ये फ़िक्र-ए-क़रार-ओ-सबात है

उस जान-ए-दोस्ती का ख़ुलूस-ए-निहाँ न पूछ
जिस का सितम भी ग़ैरत-ए-सद-इल्तिफ़ात है

यूँ तो हज़ार दर्द से रोते हैं बद-नसीब
तुम दिल दुखाओ वक़्त-ए-मुसीबत तो बात है

उनवान ग़फ़लतों के हैं क़ुर्बत हो या विसाल
बस फ़ुर्सत-ए-हयात 'फ़िराक़' एक रात है

62. आई है कुछ न पूछ क़यामत कहाँ कहाँ

आई है कुछ न पूछ क़यामत कहाँ कहाँ
उफ़ ले गई है मुझ को मोहब्बत कहाँ कहाँ

बेताबी-ओ-सुकूँ की हुईं मंज़िलें तमाम
बहलाएँ तुझ से छुट के तबीअत कहाँ कहाँ

राह-ए-तलब में छोड़ दिया दिल का साथ भी
फिरते लिए हुए ये मुसीबत कहाँ कहाँ

बेगानगी पर उस की ज़माने से एहतिराज़
दर-पर्दा उस अदा की शिकायत कहाँ कहाँ

फ़र्क़ आ गया था दौर-ए-हयात-ओ-ममात में
आई है आज याद वो सूरत कहाँ कहाँ

होश-ओ-जुनूँ भी अब तो बस इक बात हैं 'फ़िराक़'
होती है उस नज़र की शरारत कहाँ कहाँ

63. इक रोज़ हुए थे कुछ इशारात ख़फ़ी से

इक रोज़ हुए थे कुछ इशारात ख़फ़ी से
आशिक़ हैं हम उस नर्गिस-ए-राना के जभी से

करने को हैं दूर आज तो तौ ये रोग ही जी से
अब रक्खेंगे हम प्यार न तुम से न किसी से

अहबाब से रखता हूँ कुछ उम्मीद-ए-शराफ़त
रहते हैं ख़फ़ा मुझ से बहुत लोग इसी से

कहता हूँ उसे मैं तो ख़ुसूसिय्यत-ए-पिन्हाँ
कुछ तुम को शिकायत है किसी से तो मुझी से

अशआ'र नहीं हैं ये मिरी रूह की है प्यास
जारी हुए सर-चश्मे मिरी तिश्ना-लबी से

आँसू को मिरे खेल तमाशा न समझना
कट जाता है पत्थर इसी हीरे की कनी से

याद-ए-लब-ए-जानाँ है चराग़-ए-दिल-ए-रंजूर
रौशन है ये घर आज उसी लाल-ए-यमनी से

अफ़्लाक की मेहराब है आई हुई अंगड़ाई
बे-कैफ़ कुछ आफ़ाक़ की आज़ा-शिकनी से

कुछ ज़ेर-ए-लब अल्फ़ाज़ खनकते हैं फ़ज़ा में
गूँजी हुई है बज़्म तिरी कम-सुख़नी से

आज अंजुमन-ए-इश्क़ नहीं अंजुमन-ए-इश्क़
किस दर्जा कमी बज़्म में है तेरी कमी से

इस वादी-ए-वीराँ में है सर-चश्मा-ए-दिल भी
हस्ती मिरी सैराब है आँखों की नमी से

ख़ुद मुझ को भी ता-देर ख़बर हो नहीं पाई
आज आई तिरी याद इस आहिस्ता-रवी से

वो ढूँढने निकली है तिरी निकहत-ए-गेसू
इक रोज़ मिला था मैं नसीम-ए-सहरी से

सब कुछ वो दिला दे मुझे सब कुछ वो बना दे
ऐ दोस्त नहीं दूर तिरी कम-निगही से

मीआ'द-ए-दवाम-ओ-अबद इक नींद है उस की
हम मुंतही-ए-जल्वा-ए-जानाँ हैं अभी से

इक दिल के सिवा पास हमारे नहीं कुछ भी
जो काम हो ले लेते हैं हम लोग इसी से

मालूम हुआ और है इक आलम-ए-असरार
आईना-ए-हस्ती की परेशाँ-नज़री से

इस से तो कहीं बैठ रहे तोड़ के अब पावँ
मिल जाए नजात इश्क़ को इस दर-ब-दरी से

रहता हूँ फ़िराक़ इस लिए वारफ़्ता कि दुनिया
कुछ होश में आ जाए मिरी बे-ख़बरी से

64. कमी न की तिरे वहशी ने ख़ाक उड़ाने में

कमी न की तिरे वहशी ने ख़ाक उड़ाने में
जुनूँ का नाम उछलता रहा ज़माने में

जुनूँ से भूल हुई दिल पे चोट खाने में
'फ़िराक़' देर अभी थी बहार आने में

उसी की शरह है ये उठते दर्द का आलम
जो दास्ताँ थी निहाँ तेरे आँख उठाने में

वो कोई रंग है जो उड़ न जाए ऐ गुल-ए-तर
वो कोई बू है जो रुस्वा न हो ज़माने में

ब्यान शम्अ है हासिल यही है जलने का
फ़ना की कैफ़ियतें देख झिलमिलाने में

ग़रज़ कि काट दिए ज़िंदगी के दिन ऐ दोस्त
वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में

हमीं हैं गुल हमीं बुलबुल हमीं हवा-ए-चमन
फ़िराक़ ख़्वाब ये देखा है क़ैद-ख़ाने में

65. कुछ न कुछ इश्क़ की तासीर का इक़रार तो है

कुछ न कुछ इश्क़ की तासीर का इक़रार तो है
उस का इल्ज़ाम-ए-तग़ाफ़ुल पे कुछ इंकार तो है

हर फ़रेब-ए-ग़म-ए-दुनिया से ख़बर-दार तो है
तेरा दीवाना किसी काम में हुश्यार तो है

देख लेते हैं सभी कुछ तिरे मुश्ताक़-ए-जमाल
ख़ैर दीदार न हो हसरत-ए-दीदार तो है

सर पटकने को पटकता है मगर रुक रुक कर
तेरे वहशी को ख़याल-ए-दर-ओ-दीवार तो है

इश्क़ का शिकवा-ए-बेजा भी न बेकार गया
न सही जौर मगर जौर का इक़रार तो है

सहर-ओ-शाम सर-ए-अंजुमन-ए-नाज़ न हो
जल्वा-ए-हुस्न तो है इश्क़-ए-सियहकार तो है

चौंक उठते हैं 'फ़िराक़' आते ही उस शोख़ का नाम
कुछ सरासीमगी-ए-इश्क़ का इक़रार तो है

66. ग़म तिरा जल्वा-गह-ए-कौन-ओ-मकाँ है कि जो था

ग़म तिरा जल्वा-गह-ए-कौन-ओ-मकाँ है कि जो था
या'नी इंसान वही शो'ला-ब-जाँ है कि जो था

फिर वही रंग-ए-तकल्लुम निगह-ए-नाज़ में है
वही अंदाज़ वही हुस्न-ए-बयाँ है कि जो था

कब है इंकार तिरे लुत्फ़-ओ-करम से लेकिन
तू वही दुश्मन-ए-दिल दुश्मन-ए-जाँ है कि जो था

इश्क़ अफ़्सुर्दा नहीं आज भी अफ़्सुर्दा बहुत
वही कम कम असर-ए-सोज़-ए-निहाँ है कि जो था

क़ुर्ब ही कम है न दूरी ही ज़ियादा लेकिन
आज वो रब्त का एहसास कहाँ है कि जो था

नज़र आ जाते हैं तुम को तो बहुत नाज़ुक बाल
दिल मिरा क्या वही ऐ शीशा-गिराँ है कि जो था

जान दे बैठे थे इक बार हवस वाले भी
फिर वही मरहला-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ है कि जो था

हुस्न को खींच तो लेता है अभी तक लेकिन
वो असर जज़्ब-ए-मोहब्बत में कहाँ है कि जो था

आज भी सैद-गह-ए-इश्क़ में हुसन-ए-सफ़्फ़ाक
लिए अबरू की लचकती सी कमाँ है कि जो था

फिर तिरी चश्म-ए-सुख़न-संज ने छेड़ी कोई बात
वही जादू है वही हुस्न-ए-बयाँ है कि जो था

फिर सर-ए-मय-कद-ए-इश्क़ है इक बारिश-ए-नूर
छलके जामों से चराग़ाँ का समाँ है कि जो था

फिर वही ख़ैर-निगाही है तिरे जल्वों से
वही आलम तिरा ऐ बर्क़-ए-दमाँ है कि जो था

आज भी आग दबी है दिल-ए-इंसाँ में 'फ़िराक़'
आज भी सीनों से उठता वो धुआँ है कि जो था

67. हर नाला तिरे दर्द से अब और ही कुछ है<

हर नाला तिरे दर्द से अब और ही कुछ है
हर नग़्मा सर-ए-बज़्म-ए-तरब और ही कुछ है

मज़हब की ख़राबी है न अख़्लाक़ की पस्ती
दुनिया के मसाइब का सबब और ही कुछ है

ये काम न ले नाला-ओ-फ़र्याद-ओ-फ़ुग़ां से
अफ़्लाक उलट देने का ढब और ही कुछ है

दुनिया को जगा दे जो अदम को भी सुला दे
सुनते हैं कि वो रोज़ वो शब और ही कुछ है

अरबाब-ए-वफ़ा जान भी देने को हैं तयार
हस्ती का मगर हुस्न-ए-तलब और ही कुछ है

क्या हुस्न के अंदाज़-ए-तग़ाफ़ुल की शिकायत
पैमान-ए-वफ़ा इश्क़ का जब और ही कुछ है

आँखों ने 'फ़िराक़' आज न पूछो जो दिखाया
जो कुछ नज़र आता है वो सब और ही कुछ है

68. ज़िंदगी दर्द की कहानी है

ज़िंदगी दर्द की कहानी है
चश्म-ए-अंजुम में भी तो पानी है

बे-नियाज़ाना सुन लिया ग़म-ए-दिल
मेहरबानी है मेहरबानी है

वो भला मेरी बात क्या माने
उस ने अपनी भी बात मानी है

शोला-ए-दिल है ये कि शोला-साज़
या तिरा शोला-ए-जवानी है

वो कभी रंग वो कभी ख़ुशबू
गाह गुल गाह रात-रानी है

बन के मासूम सब को ताड़ गई
आँख उस की बड़ी सियानी है

आप-बीती कहो कि जग-बीती
हर कहानी मिरी कहानी है

दोनों आलम हैं जिस के ज़ेर-ए-नगीं
दिल उसी ग़म की राजधानी है

हम तो ख़ुश हैं तिरी जफ़ा पर भी
बे-सबब तेरी सरगिरानी है

सर-ब-सर ये फ़राज़-ए-मह्र-ओ-क़मर
तेरी उठती हुई जवानी है

आज भी सुन रहे हैं क़िस्सा-ए-इश्क़
गो कहानी बहुत पुरानी है

ज़ब्त कीजे तो दिल है अँगारा
और अगर रोइए तो पानी है

है ठिकाना ये दर ही उस का भी
दिल भी तेरा ही आस्तानी है

उन से ऐसे में जो न हो जाए
नौ-जवानी है नौ-जवानी है

दिल मिरा और ये ग़म-ए-दुनिया
क्या तिरे ग़म की पासबानी है

गर्दिश-ए-चश्म-ए-साक़ी-ए-दौराँ
दौर-ए-अफ़लाक की भी पानी है

ऐ लब-ए-नाज़ क्या हैं वो असरार
ख़ामुशी जिन की तर्जुमानी है

मय-कदों के भी होश उड़ने लगे
क्या तिरी आँख की जवानी है

ख़ुद-कुशी पर है आज आमादा
अरे दुनिया बड़ी दिवानी है

कोई इज़हार-ए-ना-ख़ुशी भी नहीं
बद-गुमानी सी बद-गुमानी है

मुझ से कहता था कल फ़रिश्ता-ए-इश्क़
ज़िंदगी हिज्र की कहानी है

बहर-ए-हस्ती भी जिस में खो जाए
बूँद में भी वो बे-करानी है

मिल गए ख़ाक में तिरे उश्शाक़
ये भी इक अम्र-ए-आसमानी है

ज़िंदगी इंतिज़ार है तेरा
हम ने इक बात आज जानी है

क्यूँ न हो ग़म से ही क़िमाश उस का
हुस्न तस्वीर-ए-शादमानी है

सूनी दुनिया में अब तो मैं हूँ और
मातम-ए-इश्क़-ए-आँ-जहानी है

कुछ न पूछो 'फ़िराक़' अहद-ए-शबाब
रात है नींद है कहानी है

69. जुनून-ए-कारगर है और मैं हूँ

जुनून-ए-कारगर है और मैं हूँ
हयात-ए-बे-ख़बर है और मैं हूँ

मिटा कर दिल निगाह-ए-अव्वलीं से
तक़ाज़ा-ए-दिगर है और मैं हूँ

कहाँ मैं आ गया ऐ ज़ोर-ए-परवाज़
वबाल-ए-बाल-ओ-पर है और मैं हूँ

निगाह-ए-अव्वलीं से हो के बरबाद
तक़ाज़ा-ए-दिगर है और मैं हूँ

मुबारकबाद अय्याम-ए-असीरी
ग़म-ए-दीवार-ओ-दर है और मैं हूँ

तिरी जमइय्यतें हैं और तू है
हयात-ए-मुंतशर है और मैं हूँ

कोई हो सुस्त-पैमाँ भी तो यूँ हो
ये मातम रात भर है और मैं हूँ

निगाह-ए-बे-महाबा तेरे सदक़े
कई टुकड़े जिगर है और मैं हूँ

ठिकाना है कुछ इस उज़्र-ए-सितम का
तिरी नीची नज़र है और मैं हूँ

'फ़िराक़' इक एक हसरत मिट रही है
ये शाम-ए-बे-सहर है और मैं हूँ

70. तेज़ एहसास-ए-ख़ुदी दरकार है

तेज़ एहसास-ए-ख़ुदी दरकार है
ज़िंदगी को ज़िंदगी दरकार है

जो चढ़ा जाए ख़ुमिस्तान-ए-जहाँ
हाँ वही लब-तिश्नगी दरकार है

देवताओं का ख़ुदा से होगा काम
आदमी को आदमी दरकार है

सौ गुलिस्ताँ जिस उदासी पर निसार
मुझ को वो अफ़्सुर्दगी दरकार है

शाएरी है सर-बसर तहज़ीब-ए-क़ल्ब
उस को ग़म शाइस्तगी दरकार है

शो'ला में लाता है जो सोज़-ओ-गुदाज़
वो ख़ुलूस-ए-बातनी दरकार है

ख़ूबी-ए-लफ़्ज़-ओ-बयाँ से कुछ सिवा
शाएरी को साहिरी दरकार है

क़ादिर-ए-मुतलक़ को भी इंसान की
सुनते हैं बे-चारगी दरकार है

और होंगे तालिब-ए-मदह-ए-जहाँ
मुझ को बस तेरी ख़ुशी दरकार है

अक़्ल में यूँ तो नहीं कोई कमी
इक ज़रा दीवानगी दरकार है

होश वालों को भी मेरी राय में
एक गोना बे-ख़ुदी दरकार है

ख़तरा-ए-बिस्यार-दानी की क़सम
इल्म में भी कुछ कमी दरकार है

दोस्तो काफ़ी नहीं चश्म-ए-ख़िरद
इश्क़ को भी रौशनी दरकार है

मेरी ग़ज़लों में हक़ाएक़ हैं फ़क़त
आप को तो शाएरी दरकार है

तेरे पास आया हूँ कहने एक बात
मुझ को तेरी दोस्ती दरकार है

मैं जफ़ाओं का न करता यूँ गिला
आज तेरी ना-ख़ुशी दरकार है

उस की ज़ुल्फ़ आरास्ता-पैरास्ता
इक ज़रा सी बरहमी दरकार है

ज़िंदा-दिल था ताज़ा-दम था हिज्र में
आज मुझ को बे-दिली दरकार है

हल्क़ा हल्क़ा गेसु-ए-शब रंग-ए-यार
मुझ को तेरी अबतरी दरकार है

अक़्ल ने कल मेरे कानों में कहा
मुझ को तेरी ज़िंदगी दरकार है

तेज़-रौ तहज़ीब-ए-आलम को 'फ़िराक़'
इक ज़रा आहिस्तगी दरकार है

71. तुम्हें क्यूँकर बताएँ ज़िंदगी को क्या समझते हैं

तुम्हें क्यूँकर बताएँ ज़िंदगी को क्या समझते हैं
समझ लो साँस लेना ख़ुद-कुशी करना समझते हैं

किसी बदमस्त को राज़-आश्ना सब का समझते हैं
निगाह-ए-यार तुझ को क्या बताएँ क्या समझते हैं

बस इतने पर हमें सब लोग दीवाना समझते हैं
कि इस दुनिया को हम इक दूसरी दुनिया समझते हैं

कहाँ का वस्ल तन्हाई ने शायद भेस बदला है
तिरे दम भर के मिल जाने को हम भी क्या समझते हैं

उमीदों में भी उन की एक शान-ए-बे-नियाज़ी है
हर आसानी को जो दुश्वार हो जाना समझते हैं

यही ज़िद है तो ख़ैर आँखें उठाते हैं हम उस जानिब
मगर ऐ दिल हम इस में जान का खटका समझते हैं

कहीं हों तेरे दीवाने ठहर जाएँ तो ज़िंदाँ है
जिधर को मुँह उठा कर चल पड़े सहरा समझते हैं

जहाँ की फितरत-ए-बेगाना में जो कैफ़-ए-ग़म भर दें
वही जीना समझते हैं वही मरना समझते हैं

हमारा ज़िक्र क्या हम को तो होश आया मोहब्बत में
मगर हम क़ैस का दीवाना हो जाना समझते हैं

न शोख़ी शोख़ है इतनी न पुरकार इतनी पुरकारी
न जाने लोग तेरी सादगी को क्या समझते हैं

भुला दीं एक मुद्दत की जफ़ाएँ उस ने ये कह कर
तुझे अपना समझते थे तुझे अपना समझते हैं

ये कह कर आबला-पा रौंदते जाते हैं काँटों को
जिसे तलवों में कर लें जज़्ब उसे सहरा समझते हैं

ये हस्ती नीस्ती सब मौज-ख़ेज़ी है मोहब्बत की
न हम क़तरा समझते हैं न हम दरिया समझते हैं

'फ़िराक़' इस गर्दिश-ए-अय्याम से कब काम निकला है
सहर होने को भी हम रात कट जाना समझते हैं

72. तूर था काबा था दिल था जल्वा-ज़ार-ए-यार था

तूर था काबा था दिल था जल्वा-ज़ार-ए-यार था
इश्क़ सब कुछ था मगर फिर आलम-ए-असरार था

नश्शा-ए-सद-जाम कैफ़-ए-इंतिज़ार-ए-यार था
हिज्र में ठहरा हुआ दिल साग़र-ए-सरशार था

अलविदा'अ ऐ बज़्म-ए-अंजुम हिज्र की शब अल-फ़िराक़
ता-बा-ए-दौर-ए-ज़िंदगानी इंतिज़ार-ए-यार था

एक अदा से बे-नियाज़-ए-क़ुर्ब-ओ-दूरी कर दिया
मावरा-ए-वस्ल-ओ-हिज्राँ हुस्न का इक़रार था

जौहर-ए-आईना-ए-आलम बने आँसू मिरे
यूँ तो सच ये है कि रोना इश्क़ में बेकार था

शोख़ी-ए-रफ़्तार वज्ह-ए-हस्ती-ए-बर्बाद थी
ज़िंदगी क्या थी ग़ुबार-ए-रहगुज़ार-ए-यार था

उल्फ़त-ए-देरीना का जब ज़िक्र इशारों में किया
मुस्कुरा कर मुझ से पूछा तुम को किस से प्यार था

दिल-दुखे रोए हैं शायद इस जगह ऐ कू-ए-दोस्त
ख़ाक का इतना चमक जाना ज़रा दुश्वार था

ज़र्रा ज़र्रा आइना था ख़ुद-नुमाई का फ़िराक़
सर-ब-सर सहरा-ए-आलम जल्वा-ज़ार-ए-यार था

73. दीदार में इक-तरफ़ा दीदार नज़र आया

दीदार में इक-तरफ़ा दीदार नज़र आया
हर बार छुपा कोई हर बार नज़र आया

छालों को बयाबाँ भी गुलज़ार नज़र आया
जब छेड़ पर आमादा हर ख़ार नज़र आया

सुब्ह-ए-शब-ए-हिज्राँ की वो चाक-गरेबानी
इक आलम-ए-नैरंगी हर तार नज़र आया

हो सब्र कि बेताबी उम्मीद कि मायूसी
नैरंग-ए-मोहब्बत भी बे-कार नज़र आया

जब चश्म-ए-सियह तेरी थी छाई हुई दिल पर
इस मुल्क का हर ख़ित्ता तातार नज़र आया

तू ने भी तो देखी थी वो जाती हुई दुनिया
क्या आख़री लम्हों में बीमार नज़र आया

ग़श खा के गिरे मूसा अल्लाह-री मायूसी
हल्का सा वो पर्दा भी दीवार नज़र आया

ज़र्रा हो कि क़तरा हो ख़ुम-ख़ाना-ए-हस्ती में
मख़मूर नज़र आया सरशार नज़र आया

क्या कुछ न हुआ ग़म से क्या कुछ न किया ग़म ने
और यूँ तो हुआ जो कुछ बे-कार नज़र आया

ऐ इश्क़ क़सम तुझ को मामूरा-ए-आलम की
कोई ग़म-ए-फ़ुर्क़त में ग़म-ख़्वार नज़र आया

शब कट गई फ़ुर्क़त की देखा न 'फ़िराक़' आख़िर
तूल-ए-ग़म-ए-हिज्राँ भी बे-कार नज़र आया

74. दौर-ए-आग़ाज़-ए-जफ़ा दिल का सहारा निकला

दौर-ए-आग़ाज़-ए-जफ़ा दिल का सहारा निकला
हौसला कुछ न हमारा न तुम्हारा निकला

तेरा नाम आते ही सकते का था आलम मुझ पर
तुझ से ऐ दिल न मगर काम हमारा निकला

इबरत-अंगेज़ है क्या उस की जवाँ-मर्गी भी
हाए वो दिल जो हमारा न तुम्हारा निकला

अक़्ल की लौ से फ़रिश्तों के भी पर जलते हैं
रश्क-ए-ख़ुर्शीद-ए-क़यामत ये शरारा निकला

रोने वाले हुए चुप हिज्र की दुनिया बदली
शम्अ बे-नूर हुई सुब्ह का तारा निकला

उँगलियाँ उट्ठीं 'फ़िराक़'-ए-वतन-आवारा पर
आज जिस सम्त से वो दर्द का मारा निकला

75. नर्म फ़ज़ा की करवटें दिल को दुखा के रह गईं

नर्म फ़ज़ा की करवटें दिल को दुखा के रह गईं
ठंडी हवाएँ भी तिरी याद दिला के रह गईं

शाम भी थी धुआँ धुआँ हुस्न भी था उदास उदास
दिल को कई कहानियाँ याद सी आ के रह गईं

मुझ को ख़राब कर गईं नीम-निगाहियाँ तिरी
मुझ से हयात ओ मौत भी आँखें चुरा के रह गईं

हुस्न-ए-नज़र-फ़रेब में किस को कलाम था मगर
तेरी अदाएँ आज तो दिल में समा के रह गईं

तब कहीं कुछ पता चला सिद्क़-ओ-ख़ुलूस हुस्न का
जब वो निगाहें इश्क़ से बातें बना के रह गईं

तेरे ख़िराम-ए-नाज़ से आज वहाँ चमन खिले
फ़सलें बहार की जहाँ ख़ाक उड़ा के रह गईं

पूछ न उन निगाहों की तुर्फ़ा करिश्मा-साज़ियाँ
फ़ित्ने सुला के रह गईं फ़ित्ने जगा के रह गईं

तारों की आँख भी भर आई मेरी सदा-ए-दर्द पर
उन की निगाहें भी तिरा नाम बता के रह गईं

उफ़ ये ज़मीं की गर्दिशें आह ये ग़म की ठोकरें
ये भी तो बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता के शाने हिला के रह गईं

और तो अहल-ए-दर्द कौन सँभालता भला
हाँ तेरी शादमानियाँ उन को रुला के रह गईं

याद कुछ आईं इस तरह भूली हुई कहानियाँ
खोए हुए दिलों में आज दर्द उठा के रह गईं

साज़-ए-नशात-ए-ज़िंदगी आज लरज़ लरज़ उठा
किस की निगाहें इश्क़ का दर्द सुना के रह गईं

तुम नहीं आए और रात रह गई राह देखती
तारों की महफ़िलें भी आज आँखें बिछा के रह गईं

झूम के फिर चलीं हवाएँ वज्द में आईं फिर फ़ज़ाएँ
फिर तिरी याद की घटाएँ सीनों पे छा के रह गईं

क़ल्ब ओ निगाह की ये ईद उफ़ ये मआल-ए-क़ुर्ब-ओ-दीद
चर्ख़ की गर्दिशें तुझे मुझ से छुपा के रह गईं

फिर हैं वही उदासियाँ फिर वही सूनी काएनात
अहल-ए-तरब की महफ़िलें रंग जमा के रह गईं

कौन सुकून दे सका ग़म-ज़दगान-ए-इश्क़ को
भीगती रातें भी 'फ़िराक़' आग लगा के रह गईं

76. 'फ़िराक़' इक नई सूरत निकल तो सकती है

'फ़िराक़' इक नई सूरत निकल तो सकती है
ब-क़ौल उस आँख के दुनिया बदल तो सकती है

तिरे ख़याल को कुछ चुप सी लग गई वर्ना
ब-क़ौल इश्क़ के साँचे में ढल तो सकती है

अब इतनी बंद नहीं ग़म-कदों की भी राहें
हवा-ए-कूच-ए-महबूब चल तो सकती है

बदलता जाए ग़म-ए-रोज़गार का मरकज़
ये चाल गर्दिश-ए-अय्याम चल तो सकती है

तिरी निगाह सहारा न दे तो बात है और
कि गिरते गिरते भी दुनिया सँभल तो सकती है

न भूलना ये है ताख़ीर हुस्न की ताख़ीर
'फ़िराक़' आई हुई मौत टल तो सकती है

77. बहसें छिड़ी हुई हैं हयात-ओ-ममात की

बहसें छिड़ी हुई हैं हयात-ओ-ममात की
सौ बात बन गई है फ़िराक़ एक बात की

साज़-नवा-ए-दर्द हिजाबात-ए-दहर में
कितनी दुखी हुई हैं रगें काएनात की

यूँ फ़र्त-ए-बे-ख़ुदी से मोहब्बत में जान दे
तुझ को भी कुछ ख़बर न हो इस वारदात की

शाम-ए-अबद को जल्वा-ए-सुब्ह-ए-बहार दे
रूदाद छेड़ ज़िंदगी-ए-बे-सबात की

इस बज़्म-ए-बे-ख़ुदी में वजूद-ए-अदम कहाँ
चलती नहीं है साँस हयात-ओ-ममात की

सौ दर्द इक तबस्सुम-ए-पिन्हाँ में बंद हैं
तस्वीर हूँ 'फ़िराक़' नशात-ए-हयात की

78. मय-कदे में आज इक दुनिया को इज़्न-ए-आम था

मय-कदे में आज इक दुनिया को इज़्न-ए-आम था
दौर-ए-जाम-ए-बे-ख़ुदी बेगाना-ए-अय्याम था

रूह लर्ज़ां आँख महव-ए-दीद दिल का नाम था
इश्क़ का आग़ाज़ भी शाइस्ता-ए-अंजाम था

रफ़्ता रफ़्ता इश्क़ को तस्वीर-ए-ग़म कर ही दिया
हुस्न भी कितना ख़राब-ए-गर्दिश-ए-अय्याम था

ग़म-कदे में दहर के यूँ तो अंधेरा था मगर
इश्क़ का दाग़-ए-सियह-बख़्ती चराग़-ए-शाम था

तेरी दुज़दीदा-निगाही यूँ तो ना-महसूस थी
हाँ मगर दफ़्तर का दफ़्तर हुस्न का पैग़ाम था

शाक़ अहल-ए-शौक़ पर थीं उस की इस्मत-दारियाँ
सच है लेकिन हुस्न दर-पर्दा बहुत बद-नाम था

महव थे गुल्ज़ार-ए-रंगा-रंग के नक़्श-ओ-निगार
वहशतें थी दिल के सन्नाटे थे दश्त-ए-शाम था

बे-ख़ता था हुस्न हर जौर-ओ-जफ़ा के बाद भी
इश्क़ के सर ता-अबद इल्ज़ाम ही इल्ज़ाम था

यूँ गरेबाँ-चाक दुनिया में नहीं होता कोई
हर खुला गुलशन शहीद-ए-गर्दिश-ए-अय्याम था

देख हुस्न-ए-शर्मगीं दर-पर्दा क्या लाया है रंग
इश्क़ रुस्वा-ए-जहाँ बदनाम ही बदनाम था

रौनक़-ए-बज़्म-ए-जहाँ था गो दिल-ए-ग़म-गीं 'फ़िराक़'
सर्द था अफ़्सुर्दा था महरूम था नाकाम था

79. ये मौत-ओ-अदम कौन-ओ-मकाँ और ही कुछ है

ये मौत-ओ-अदम कौन-ओ-मकाँ और ही कुछ है
सुन ले कि मिरा नाम-ओ-निशाँ और ही कुछ है

इतना तो यक़ीं है कि वही हैं तिरी आँखें
इस पर भी मगर वहम-ओ-गुमाँ और ही कुछ है

इक कैफ़ियत-ए-राज़ है ग़म है न मसर्रत
इस बज़्म-ए-मोहब्बत में समाँ और ही कुछ है

या दर्द के नग़्मों में वही है तिरी आवाज़
या पर्दा-ए-साज़-ए-रग-ए-जाँ और ही कुछ है

अच्छे हैं जहाँ हैं मगर ऐ दामन-ए-जानाँ
पाते हैं जो तुझ में वो अमाँ और ही कुछ है

शाइर हैं 'फ़िराक़' और भी इस दौर में लेकिन
ये रंग-ए-बयाँ रंग-ए-ज़बाँ और ही कुछ है

80. रस्म-ओ-राह-ए-दहर क्या जोश-ए-मोहब्बत भी तो हो

रस्म-ओ-राह-ए-दहर क्या जोश-ए-मोहब्बत भी तो हो
टूट जाती है हर इक ज़ंजीर वहशत भी तो हो

ज़िंदगी क्या मौत क्या दो करवटें हैं इश्क़ की
सोने वाले चौंक उट्ठेंगे क़यामत भी तो हो

'हरचे बादा-बाद' के नारों से दुनिया काँप उठी
इश्क़ के इतना कोई बरगश्ता क़िस्मत भी तो हो

कार-ज़ार-ए-दहर में हर कैफ़ हर मस्ती बजा
कुछ शरीक-ए-बे-ख़ुदी रिंदाना-ए-जुरअत भी तो हो

कम नहीं अहल-ए-हवस की भी ख़याल-आराइयाँ
ये फ़ना की हद से भी बढ़ जाएँ हिम्मत भी तो हो

कुछ इशारात-ए-निहाँ हों तो निगाह-ए-नाज़ के
भाँप लेंगे हम ये महफ़िल रश्क-ए-ख़ल्वत भी तो हो

अब तो कुछ अहल-ए-रज़ा भी हो चले मायूस से
हर जफ़ा-ए-ना-रवा की कुछ निहायत भी तो हो

हर नफ़स से आए बू-ए-आतिश-ए-सय्याल-ए-इश्क़
आग वो दिल में लहू में वो हरारत भी तो हो

ये तिरे जल्वे ये चश्म-ए-शौक़ की हैरानियाँ
बर्क़-ए-हुस्न-ए-यार नज़्ज़ारे की फ़ुर्सत भी तो हो

गर्दिश-ए-दौराँ में इक दिन आ रहेगा होश भी
ख़त्म ऐ चश्म-ए-सियह ये दौर-ए-ग़फ़्लत भी तो हो

हर दिल-अफ़सुर्दा से चिंगारियाँ उड़ जाएँगी
कुछ तिरी मासूम आँखों में शरारत भी तो हो

अब वो इतना भी नहीं बेगाना-ए-वज्ह-ए-मलाल
पुर्सिश-ए-ग़म उस को आती है ज़रूरत भी तो हो

एक सी हैं अब तो हुस्न-ओ-इश्क़ की मजबूरियाँ
हम हों या तुम हो वो अहद-ए-बा-फ़राग़त भी तो हो

देख कर रंग-ए-मिज़़ाज-ए-यार क्या कहिए 'फ़िराक़'
इस में कुछ गुंजाइश-ए-शुक्र-ओ-शिकायत भी तो हो

81. लुत्फ़-सामाँ इताब-ए-यार भी है

लुत्फ़-सामाँ इताब-ए-यार भी है
महरम-ए-इश्क़ शर्मसार भी है

सुस्त-पैमान ओ बे-नियाज़ सही
हुस्न तस्वीर-ए-इंतिज़ार भी है

क्या करे वो निगाह-ए-लुत्फ़ कि इश्क़
शादमाँ भी है सोगवार भी है

गुलशन-ए-इश्क़ हूँ ख़िज़ाँ मेरी
वज्ह-ए-रंगीनी-ए-बहार भी है

उक़्दा-ए-इश्क़ को न तू समझा
यही उक़्दा कुशूद-ए-कार भी है

अपनी तक़दीर अपने हाथ में ले
शामिल-ए-जब्र इख़्तियार भी है

आप अपना चढ़ाव अपना उतार
ज़िंदगी नश्शा है ख़ुमार भी है

उन निगाहों में है शिकायत सी
इश्क़ शायद जफ़ा-शिआर भी है

दिल से है दूर भी निगाह तिरी
दिल के अंदर है दिल के पार भी है

सर-ब-सर ग़र्क़-ए-नूर हो लेकिन
ज़िंदगी इकतिसाब-ए-नार भी है

कौन तरग़ीब-ए-होश दे कि जुनूँ
बे-ख़बर भी है होशियार भी है

ख़लवत-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ भी है उदास
सर्द कुछ बज़्म-ए-रोज़गार भी है

राज़ उस आँख का नहीं खुलता
दिल शकेबा भी बे-क़रार भी है

ख़ुद तुझे भी हुई न जिन की ख़बर
उन जफ़ाओं का कुछ शुमार भी है

इस में लाखों निज़ाम-ए-शम्सी हैं
यूँ तो दिल तीरा-रोज़गार भी है

इस की ज़ौ उस की गर्मियाँ मत पूछ
ज़िंदगी नूर भी है नार भी है

इश्क़-ए-हिज्राँ-नसीब का भी है ध्यान
तिरे वा'दे का ए'तिबार भी है

इश्क़ ही से हैं मंज़िलें आबाद
कारवाँ कारवाँ पुकार भी है

कोई समझा उसे न देख सका
निगह-ए-शोख़ शर्मसार भी है

उस से छुट कर ये सोचता हूँ फ़िराक़
इस में कुछ अपना इख़्तियार भी है

82. वक़्त-ए-ग़ुरूब आज करामात हो गई

वक़्त-ए-ग़ुरूब आज करामात हो गई
ज़ुल्फ़ों को उस ने खोल दिया रात हो गई

कल तक तो उस में ऐसी करामत न थी कोई
वो आँख आज क़िबला-ए-हाजात हो गई

ऐ सोज़-ए-इश्क़ तू ने मुझे क्या बना दिया
मेरी हर एक साँस मुनाजात हो गई

ओछी निगाह डाल के इक सम्त रख दिया
दिल क्या दिया ग़रीब की सौग़ात हो गई

कुछ याद आ गई थी वो ज़ुल्फ़-ए-शिकन-शिकन
हस्ती तमाम चश्मा-ए-ज़ुल्मात हो गई

अहल-ए-वतन से दूर जुदाई में यार की
सब्र आ गया 'फ़िराक़' करामात हो गई

83. समझता हूँ कि तू मुझ से जुदा है

समझता हूँ कि तू मुझ से जुदा है
शब-ए-फ़ुर्क़त मुझे क्या हो गया है

तिरा ग़म क्या है बस ये जानता हूँ
कि मेरी ज़िंदगी मुझ से ख़फ़ा है

कभी ख़ुश कर गई मुझ को तिरी याद
कभी आँखों में आँसू आ गया है

हिजाबों को समझ बैठा मैं जल्वा
निगाहों को बड़ा धोका हुआ है

बहुत दूर अब है दिल से याद तेरी
मोहब्बत का ज़माना आ रहा है

न जी ख़ुश कर सका तेरा करम भी
मोहब्बत को बड़ा धोका रहा है

कभी तड़पा गया है दिल तिरा ग़म
कभी दिल को सहारा दे गया है

शिकायत तेरी दिल से करते करते
अचानक प्यार तुझ पर आ गया है

जिसे चौंका के तू ने फेर ली आँख
वो तेरा दर्द अब तक जागता है

जहाँ है मौजज़न रंगीन-ए-हुस्न
वहीं दिल का कँवल लहरा रहा है

गुलाबी होती जाती हैं फ़ज़ाएँ
कोई इस रंग से शरमा रहा है

मोहब्बत तुझ से थी क़ब्ल-अज़-मोहब्बत
कुछ ऐसा याद मुझ को आ रहा है

जुदा आग़ाज़ से अंजाम से दूर
मोहब्बत इक मुसलसल माजरा है

ख़ुदा-हाफ़िज़ मगर अब ज़िंदगी में
फ़क़त अपना सहारा रह गया है

मोहब्बत में 'फ़िराक़' इतना न ग़म कर
ज़माने में यही होता रहा है

84. सुना तो है कि कभी बे-नियाज़-ए-ग़म थी हयात

सुना तो है कि कभी बे-नियाज़-ए-ग़म थी हयात
दिलाई याद निगाहों ने तेरी कब की बात

ज़माँ मकाँ है फ़क़त मद्द-ओ-जज़्र-ए-जोश-ए-हयात
बस एक मौज की हैं झलकियाँ क़रार-ओ-सबात

हयात बन गई थी जिन में एक ख़्वाब-ए-हयात
अरे दवाम-ओ-अबद थे वही तो कुछ लम्हात

हयात-ए-दोज़ख़ियाँ भी तमाम मुबहम है
अज़ाब भी न मयस्सर हुआ कहाँ की नजात

तिरी निगाह की सुब्हें निगाह की शामें
हरीम-ए-राज़ ये दुनिया जहाँ न दन हैं न रात

बस इक शराब-ए-कुहन के करिश्मे हैं साक़ी
नए ज़माने नई मस्तियाँ नई बरसात

किसी पे ज़ुल्म बुरा है मगर ये कहता हूँ
कि आदमी पे हो एहसान आदमी हैहात

सुकूत-ए-राज़ वही है जो दास्ताँ बन जाए
निगाह-ए-नाज़ वही जो निकाले बात में बात

ग़म-ओ-निशात मोहब्बत की छोड़ दे लालच
हर इक से उठते नहीं ये अज़ाब ये बर्कात

तमाम अक्स है दुनिया तमाम अक्स अदम
कहाँ तक आइना-दर-आइना हयात-ओ-ममात

फ़ज़ा में महकी हुई चाँदनी कि नग़्मा-ए-राज़
कि उतरें सीना-ए-शाइर में जिस तरह नग़्मात

बस एक राज़-ए-तसलसुल बस इक तसलसुल-ए-राज़
कहाँ पहुँच के हुई ख़त्म बहस-ए-ज़ात-ओ-सिफ़ात

चमकते दर्द खिले चेहरे मुस्कुराते अश्क
सजाई जाएगी अब तर्ज़-ए-नौ से बज़्म-ए-हयात

जिसे सब अहल-ए-जहाँ ज़िंदगी समझते हैं
कभी कभी तो मिले ऐसी ज़िंदगी से नजात

अगर ख़ुदा भी मिले तो न ले कि ओ नादाँ
है तू ही काबा-ए-दीं तू ही क़िबला-ए-हाजात

तमाम ख़स्तगी-ओ-माँदगी है आलम-ए-हिज्र
थके थके से ये तारे थकी थकी सी ये रात

तिरी ग़ज़ल तो नई रूह फूँक देती है
'फ़िराक़' देर से छूटी हुई है नब्ज़-ए-हयात

85. हाथ आए तो वही दामन-ए-जानाँ हो जाए

हाथ आए तो वही दामन-ए-जानाँ हो जाए
छूट जाए तो वही अपना गरेबाँ हो जाए

इश्क़ अब भी है वो महरम-ए-बे-गाना-नुमा
हुस्न यूँ लाख छुपे लाख नुमायाँ हो जाए

होश-ओ-ग़फ़लत से बहुत दूर है कैफ़िय्यत-ए-इश्क़
इस की हर बे-ख़बरी मंज़िल-ए-इरफ़ाँ हो जाए

आँख वो है जो तिरी जल्वा-गह-ए-नाज़ बने
दिल वही है जो सरापा तिरा अरमाँ हो जाए

इश्क़ फिर इश्क़ है जिस रूप में जिस भेस में हो
इशरत-ए-वस्ल बने या ग़म-ए-हिज्राँ हो जाए

ये भी सच है कोई उल्फ़त में परेशाँ क्यूँ हो
ये भी सच है कोई क्यूँकर न परेशाँ हो जाए

उक़्दा-ए-इश्क़ अजब उक़्दा-ए-मोहमल है 'फ़िराक़'
कभी ला-हल कभी मुश्किल कभी आसाँ हो जाए

86. हिज्र-ओ-विसाल-ए-यार का पर्दा उठा दिया

हिज्र-ओ-विसाल-ए-यार का पर्दा उठा दिया
ख़ुद बढ़ के इश्क़ ने मुझे मेरा पता दिया

गर्द-ओ-ग़ुबार-ए-हस्ती-ए-फ़ानी उड़ा दिया
ऐ कीमिय-ए-इश्क़ मुझे क्या बना दिया

वो सामने है और नज़र से छुपा दिया
ऐ इश्क़-ए-बे-हिजाब मुझे क्या दिखा दिया

वो शान-ए-ख़ामुशी कि बहारें हैं मुंतज़िर
वो रंग-ए-गुफ़्तुगू कि गुलिस्ताँ बना दिया

दम ले रही थीं हुस्न की जब सेहर-कारियाँ
इन वक़्फा-हा-ए-कुफ्र को ईमाँ बना दिया

मालूम कुछ मुझी को हैं उन की रवानियाँ
जिन क़तरा-हा-ए-अश्क को दरिया बना दया

इक बर्क़-ए-बे-क़रार थी तम्कीन-ए-हुस्न भी
जिस वक़्त इश्क़ को ग़म-ए-सब्र-आज़मा दिया

साक़ी मुझे भी याद हैं वो तिश्ना-कामियाँ
जिन को हरीफ़-ए-साग़र-ओ-मीना बना दिया

मालूम है हक़ीक़त-ए-ग़म-हा-ए-रोज़गार
दुनिया को तेरे दर्द ने दुनिया बना दिया

ऐ शोख़ी-ए-निगाह-ए-करम मुद्दतों के बाद
ख़्वाब-ए-गिरान-ए-ग़म से मुझे क्यूँ जगा दिया

कुछ शोरिशें तग़ाफ़ुल-ए-पिन्हाँ में थीं जिन्हें
हंगामा-ज़ार-ए-हश्र-ए-तमन्ना बना दिया

बढ़ता ही जा रहा है जमाल-ए-नज़र-फ़रेब
हुस्न-ए-नज़र को हुस्न-ए-ख़ुद-आरा बना दिया

फिर देखना निगाह लड़ी किस से इश्क़ की
गर हुस्न ने हिजाब-ए-तग़ाफुल उठा दिया

जब ख़ून हो चुका दिल-ए-हस्ती-ए-एतिबार
कुछ दर्द बच रहे जिन्हें इंसाँ बना दिया

गुम-कर्दा-ए-वफ़ूर-ए-ग़म-ए-इंतिज़ार हूँ
तू क्या छुपा कि मुझ को मुझी से छुपा दिया

रात अब हरीफ़-ए-सुब्हह-ए-क़यामत ही क्यूँ न हो
जो कुछ भी हो उस आँख को अब तो जगा दिया

अब मैं हूँ और लुत्फ़-ओ-करम के तकल्लुफ़ात
ये क्यूँ हिजाब-ए-रंजिश-ए-बे-जा बना दिया

थी यूँ तो शाम-ए-हिज्र मगर पिछली रात को
वो दर्द उठा फ़िराक़ कि मैं मुस्कुरा दिया

87. हो के सर-ता-ब-क़दम आलम-ए-असरार चला

हो के सर-ता-ब-क़दम आलम-ए-असरार चला
जो चला मय-कदा-ए-इश्क़ से सरशार चला

हमरह-ए-हुस्न इक अंबोह-ए-ख़रीदार चला
साथ इस जिंस के बाज़ार का बाज़ार चला

न हुआ राह-ए-मोहब्बत में कोई ओहदा-बरा
जो सुबुक-दोश हुआ वो भी गिराँ-बार चला

उन का जो हाल कि पहले था वही हाल रहा
तेरे ग़म-कुश्तों से इक़रार न इंकार चला

आसमाँ हो कि क़यामत हो कि हो तीर-ए-क़ज़ा
चाल इस फ़ित्ना-ए-दौराँ से हर इक बार चला

ज़ौक़-ए-नज़्ज़ारा उसी का है जहाँ में तुझ को
देख कर भी जो लिए हसरत-ए-दीदार चला

हुस्न-ए-काफ़िर से किसी की न गई पेश फ़िराक़
शिकवा यारों का न शुकराना-ए-अग़्यार चला

चुनिन्दा शायरी/कवितायें.....(31-60)