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फ़िराक गोरखपुरी
Firaq Gorakhpuri
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Poetry Firaq Gorakhpuri

फ़िराक गोरखपुरी शायरी/कविता

31. कर गई काम वो नज़र

कर गई काम वो नज़र, गो उसे आज देखकर
दर्द भी उठ सका नहीं,रंग भी उड़ सका नहीं

तेरी कशीदगी में आज शाने-सुपुर्दगी भी है
हुस्न के वश में क्या है और,इश्क़ के वश में क्या नहीं

इससे तो कुफ्र ही भला, जो है इसी जहान का
ऐसे खुदा से क्या जिसे फुर्सते-मासिवा नहीं

वो कोई वारदात है, जिसको कहें कि हो गई
दर्द उसी का नाम है जो शबे-ग़म उठा नहीं

याद तो आये जा कि फ़िर,होश उड़ाये जा कि फ़िर
छाने की ये घटा नहीं,चलने की ये हवा नहीं

देख लिया वहाँ तुझे,दीदा-ए-एतबार ने
हाथ को हाथ भी जहाँ,सुनते हैं सूझता नहीं

कौलो-क़रार भी तेरे ख़्वाबो-ख़याल हो गये
वो न कहा था हुस्न ने इश्क़ को भूलता नहीं

32. क्यों तेरे ग़म-ए-हिज्र में

क्यों तेरे ग़म-ए-हिज्र में नमनाक हैं पलकें
क्यों याद तेरी आते ही तारे निकल आए

बरसात की इस रात में ऐ दोस्त तेरी याद
इक तेज़ छुरी है जो उतरती चली जाए

कुछ ऐसी भी गुज़री हैं तेरे हिज्र में रातें
दिल दर्द से ख़ाली हो मगर नींद न आए

शायर हैं फ़िराक़ आप बड़े पाए के लेकिन
रक्खा है अजब नाम, कि जो रास न आए

(ग़म-ए-हिज्र=जुदाई के दुख में, नमनाक=
आर्द्र,नमी से भरी हुई, बड़े पाए के=धुरंधर)

33. किस तरफ़ से आ रही है

किस तरफ़ से आ रही है आज पैहम बू-ए-दोस्त
ऐ सबा,बिखरे हैं किस अन्दाज़ से गेसू-ए दोस्त

कुछ न पूछ ऐ हमनशीं,रुदादे-रंगो-बू-ए-दोस्त
एक अफ़साना था दीदार-ए-रुखो-गेसू-ए-दोस्त

इस तरफ़ भी कोई मौजे-नकहते-गेसू-ए-दोस्त
हम भी बैठे हैं उसी रुख ऐ हवा-ए-कू-ए-दोस्त

आ गई है नींद-सी दामाने-सहरा में मुझे
उम्र भर रोया हूँ तुझको ऐ ज़मीने-कू-ए-दोस्त

चढ़ गई थी त्योरियाँ मेरी उदासी पर 'फिराक़'
याद आते हैं मुझे वो बल पड़े अबरू-ए-दोस्त

34. जौर-ओ-बे-मेहरी-ए-इग़्माज़ पे क्या रोता है

जौर-ओ-बे-मेहरी-ए-इग़्माज़ पे क्या रोता है
मेहरबाँ भी कोई हो जाएगा जल्दी क्या है

ज़ुल्फ़-ए-शब-गूँ के सिवा नर्गिस-ए-जादू के सिवा
दिल को कुछ और बलाओं ने भी आ घेरा है

आ कि ग़ुर्बत-कदा-ए-दहर में जी बहलाएँ
ऐ दिल उस जल्वा-गह-ए-नाज़ में क्या रक्खा है

खो के इक शख्स को हम पूछते फिरते हैं यही
जिस की तक़दीर बिगड़ जाए वो करता क्या है

निगहे-शौक़ में और दिल में ठनी है कब से
आज तक हम न समझ पाए कि झगड़ा क्या है

इश्क़ से तौबा भी है हुस्न से शिकवे भी हज़ार
कहिए तो हज़रत-ए-दिल आप का मंशा क्या है

दिल तेरा, जान तेरी ,दर्द तेरा,ग़म तेरा
जो है ऐ दोस्त वो तेरा है,हमारा क्या है ?

दिल तिरा जान तिरी आह तिरी अश्क तिरे
जो है ऐ दोस्त वो तेरा है हमारा क्या है

हम जुदाई से भी कुछ काम तो ले ही लेंगे
बे-नियाज़ाना तअल्लुक़ ही छुटा अच्छा है

उन से बढ़-चढ़ के तो ऐ दोस्त हैं यादें इन की
नाज़-ओ-अंदाज़-ओ-अदा में तिरी रक्खा क्या है

ऐसी बातों से बदलती है कहीं फ़ितरत-ए-हुस्न
जान भी दे दे अगर कोई तो क्या होता है

यही गर आँख में रह जाए तो है चिंगारी
क़तरा-ए-अश्क जो बह जाए तो इक दरिया है

तुझ को हो जाएँगे शैतान के दर्शन वाइज़
डाल कर मुँह को गरेबाँ में कभी देखा है

न हो आँसू कोई हम दोनों तो बेहोश-से थे
चश्मे-पुरनम अभी तारा-सा कोई टूटा है

ज़ख़्म ही ज़ख़्म हूँ मैं सुब्ह की मानिंद 'फ़िराक़'
रात भर हिज्र की लज़्ज़त से मज़ा लूटा है

35. ख़ुदनुमा होके निहाँ छुप के नुमायाँ होना

ख़ुदनुमा होके निहाँ छुप के नुमायाँ होना
अलग़रज़ हुस्न को रूसवा किसी उनवाँ होना

यूँ तो अकसीर है ख़ाके-दरे-जानाँ
लेकिन काविशे-ग़म से उसे गर्दिशे-दौराँ होना

हद्दे-तमकीं से न बाहर हुई खु़द्दार
निगाह आज तक आ न सका हुस्ने को हैराँ होना

चारागर दर्द सरापा हूँ मेरे दर्द
नहीं बावर आया तुझे नश्तनर का रगे-जाँ होना

दफ़्तरे-राज़े-महब्बहत था मलाले-दिल
पर वो सुकूते निगहे-नाज़ का पुरसाँ होना

सर-बसर बर्के़-फ़ना इश्क़ के जलवे हैं 'फ़ि‍राक'
खा़नए-दिल को न आबाद न वीराँ होना

(उनवाँ=शीर्षक, काविशे-ग़म=दुख की खोज,
चारागर=चिकित्सक)

36. छिड़ गये साज़े-इश्क़ के गाने

छिड़ गये साज़े-इश्क़ के गाने
खुल गये ज़िन्दगी के मयख़ाने

आज तो कुफ्रे-इश्क़े चौंक उठा
आज तो बोल उठे हैं दीवाने

कुछ गराँ हो चला है बारे-नशात
आज दुखते हैं हुस्ने के शाने

बाद मुद्दत के तेरे हिज्र में फि‍र
आज बैठा हूँ दिल को समझाने

हासिले-हुस्नो-इश्क़ बस है यही
आदमी आदमी को पहचाने

तू भी आमादा-ए-सफ़र हो 'फ़ि‍राक'
काफ़िले उस तरफ़ लगे जाने

(गराँ=भारी, शाने=कन्धे)

37. जब नज़र आप की हो गई है

जब नजर आप की हो गई है
ज़िन्दगी, ज़िन्दगी हो गई है

बारहा बर-खिलाफ़-ए-हर-उम्मीद
दोस्ती, दुश्मनी हो गई है

है वो तकमील पुरकारियों की
जो मेरी सादगी हो गई है

तेरी हर पुरशिश-ओ-मेहरबानी
अब मेरी बेकसी हो गई है

भूल बैठा है तू कह के जो बात
वो मेरी ज़िन्दगी हो गई है

बज़्म में आंख उठाने की तक्सीर
ऐ फ़िराक, आज भी हो गई है

38. जिससे कुछ चौंक पड़ें

जिससे कुछ चौंक पड़ें सोई हुई तकदीरें
आज होता है उन आँखों का इशारा भी कहाँ !

मैं ये कहता हूँ कि अफ़लाक से आगे हूँ बहुत
इश्क़ कहता है अभी दर्दे-दिल उठ्ठा भी कहाँ

राज़दाँ हाले-मोहब्बत का नहीं मैं, लेकिन
तुमने पूछा भी कहाँ,मैंने बताया भी कहाँ

तज़करा उस निगहे-नाज़ का दिल वालों में कहाँ
दोस्तों,छेड़ दिया तुमने ये किस्सा भी कहाँ

तेरा अंदाज़े-तगाफुल है खुला राज़,मगर
इश्क़ की आँखों से उठता है ये पर्दा भी कहाँ

ज़ब्त की ताब न थी फिरते ही वो आँख 'फिराक़'
आज पैमाना-ए-दिल हाथ से छूटा भी कहाँ

39. जो दिलो-जिगर में उतर गई

जो दिलो-जिगर में उतर गई वो निगाहे-यार कहाँ है अब ?
कोई हद है ज़ख्मे-निहाँ की भी कि हयात वहमो गुमाँ है अब

मिली इश्क़ को वो हयाते नौ कि आदम का जिसमें सुकून है
ये हैं दर्द की नई मंज़िलें न ख़लिश न सोज़े-निहाँ है अब

कभी थीं वो उठती जवानियाँ कि गुबारे-राह नुजूम थे
न बुलंदियाँ वो नज़र में हैं न वो दिल की बर्के-तपाँ है अब

जिन्हें ज़िन्दगी का मज़ाक था, वही मौत को भी समझ सके
न उमीदो-बीम के मरहले में ख्याले-सूदो-ज़ियाँ है अब

न वो हुस्नो इश्क़ की सोहबत न वो मजरे न वो सानिहे
न वो बेकसों का सुकूते-ग़म न किसी को तेग़े-ज़बाँ है अब

ये फ़िराक़ है कि विसाल है कि ये महवियत का कमाल है
वो ख्याले-यार कहाँ है अब वो जमले-यार कहाँ है अब

मुझे मिट के भी तो सुकूँ नहीं कि ये हालतें भी बदल चलीं
जिसे मौत समझे थे इश्क़ में, वो मिसाले-उम्रे-रवाँ है अब ?

वो निगाह उठ के पलट गयी, वो शरारे उड़ के निहाँ हुए
जिसे दिल समझते थे आज तक वो 'फ़िराक़' उठता धुआँ है अब

40. जो भूलतीं भी नहीं

जो भूलतीं ही नहीं,याद भी नहीं आतीं
तेरी निगाह ने क्यों वो कहानियाँ न कहीं

तू शाद खोके उसे और उसको पाके ग़मी
'फ़िराक़' तेरी मोहब्बत का कोई ठीक नहीं

ह्यात मौत बने,मौत फिर ह्यात बने
तेरी निगाह से ये मोजज़ा भी दूर नहीं

हज़ार शुक्र की मायूस कर दिया तूने
ये और बात कि तुझसे भी कुछ उम्मीदें थीं

खुदा के सामने मेरे कसूरवार हैं जो
उन्हीं से आँखें बराबर मेरी नहीं होतीं

मुझे ये फिकर कि जो बात हो,मुद्ल्लल हो
वहाँ ये हाल कि बस हाँ तो हाँ नहीं तो नहीं

यूँ ही सा था कोई जिसने मुझे मिटा डाला
न कोई नूर का पुतला नकोई ज़ोहरा-जबीं

41. तमाम कैफ़ ख़मोशी तमाम नग़्म-ए-साज़

तमाम कैफ़ ख़मोशी तमाम नग़्म-ए-साज़
नवा-ए-राज़ है ऐ दोस्त या तेरी आवाज़

मेरी ग़ज़ल में मिलेगा तुझे वो आलमे-राज़
जहां हैं एक अज़ल से हक़ीक़त और मजाज़

वो ऐन महशरे-नज्‍़जारा हो कि ख़लवते-राज़
कहीं भी बन्द- नहीं है निगाहे-शाहिदबाज़

हवाएं नींद के खेतों से जैसे आती हों
यहां से दूर नहीं है बहुत वो मक़तले-नाज़

ये जंग क्या है लहू थूकता है नज़्मे-कुहन
शिगू़फ़े और खिलायेगा वक्‍़ते-शोबदाबाज़

मशीअ़तों को बदलते हैं ज़ोरे-बाजू़ से
'हरीफ़े-मतलबे-मुश्किल नहीं फ़सूने-नेयाज़

इशारे हैं ये बशर की उलूहियत की तरफ़
लवें-सीं दे उठी अकसर मेरी जबीने-नेयाज़

भरम तो क़ुर्बते-जानाँ का रह गया क़ाइम
ले आड़े आ ही गया चर्खे़-तफ़र्का़-परदाज़

निगाहे-चश्मे-सियह कर रहा है शरहे-गुनाह
न छेड़ ऐसे में बहसे-जवाज़ो-गै़रे-जवाज़

ये मौजे-नकहते-जाँ-बख्‍़श यूँ ही उठती है
बहारे-गेसु-ए-शबरंग तेरी उम्र दराज़

यॅ है मेरी नयी आवाज़ जिसको सुनके हरेक
ये बोल उठे कि है ये तो सुनी हुई आवाज़

हरीफ़े-जश्ने-चिरागाँ है नग़्म-ए-ग़मे-दोस्त
कि थरथराये हुए देख उठे वो शोला-ए-साज़

'फ़ि‍राक़' मंजि़ले-जानाँ वो दे रही है झलक
बढ़ो कि आ ही गया वो मुक़ामे-दूरो-दराज़

(ख़लवते-राज़=गुप्त एकांत, निगाहे-शाहिदबाज़=
सौन्दर्य के प्रति आसक्त आँखें, वक्‍़ते-शोबदाबाज़=
बाज़ीगर समय, फ़सूने-नेयाज़=जादुई अदा,
चर्खे़-तफ़र्का़-परदाज़=वैमनस्य पैदा करने वाला
आकाश, बहसे-जवाज़ो-गै़रे-जवाज़=उचित-अनुचित
का तर्क)

42. तहों में दिल के जहां कोई वारदात हुई

तहों में दिल के जहां कोई वारदात हुई
हयाते-ताज़ा से लबरेज़ कायनात हुई

तुम्हीं ने बायसे-ग़म बारहा किया दरयाफ़्त
कहा तो रूठ गये यह भी कोई बात हुई

हयात राज़े-सुकूँ पा गयी अजल ठहरी
अजल में थोड़ी-सी लर्ज़िशे हुई हयात हुई

थी एक काविशे-बेनाम1 दिल में फ़ितरत के
सिवा हुई तो वही आदमी की ज़ात हुई

बहुत दिनों में महब्ब़त को यह हुआ मालूम
जो तेरे हिज़्र में गुज़री वो रात रात हुई

फ़ि‍राक को कभी इतना ख़मोश देखा था
जरूर ऐ निगहे-नाज़ कोई बात हुई

43. देखते देखते उतर भी गये

देखते देखते उतर भी गये
उन के तीर अपना काम कर भी गये

हुस्न पर भी कुछ आ गये इलज़ाम
गो बहुत अहल-ए-दिल के सर भी गये

यूँ भी कुछ इश्क नेक नाम ना था
लोग बदनाम उसको कर भी गये

कुछ परेशान से थे भी अहल-ए-जुनूंन
गेसु-ए-यार कुछ बिखर भी गए

आज उन्हें मेहरबान सा पाकर
खुश हुए और जी में डर भी गए

इश्क में रूठ कर दो आलम से
लाख आलम मिले जिधर भी गये

हूँ अभी गोश पुर सदा और वो
ज़ेर-ए-लब कह के कुछ मुकर भी गये

44. न आना तेरा अब भी

न आना तेरा अब भी गरचे दिल तड़पा ही जाता है
तेरे जाने पे भी लेकिन सुकूँ-सा आ ही जाता है

न बुझने वाला शोला था कि नख्ले-इल्म का फल था
अभी तक दिल से इंसाँ के धुँआ उठता ही जाता है

ये भोली-भाली दुनिया भी सयानी है कयामत की
कोई करता है चालाकी,तो धोखा खा ही जाता है

न यूँ तस्वीरे-उजलत बन के बैठो मेरे पहलू में
मुझे महसूस होता है,कोई उठता ही जाता है

निखरता ही चला जाता है हुस्न आईना-आईना
अज़ल से दिल के साँचे में कोई ढलता ही जाता है

मोहब्बत सीधी-सादी चीज़ हो,पर इसको क्या कीजै
कि कोई सुलझी हुई गुत्थी कोई उलझा ही जाता है

मेरा ग़म पुरसिशों की दस्तरस से दूर है हरदम
मगर खुश हूँ कि जो आता है,कुछ समझा ही जाता है

दिले-नादाँ,मोहब्बत में ख़ुशी का ये भरम,क्या ख़ूब
तेरी इस सादगी पर हुस्न को प्यार आ ही जाता है

उलट जातीं हैं तदबीरें,पलट जातीं हैं तकदीरें
अगर ढूँढे नई दुनियाँ तो इंसाँ पा ही जाता है

(नख्ले-इल्म=ज्ञान का वृक्ष, तस्वीरे-उजलत=
जल्दी का चित्र (अभी आए अभी चले),
अज़ल=अनादिकाल, पुरसिशों=पूछताछ,
दस्तरस=पहुँच)

45. नई हुई फिर रस्म पुरानी

नई हुई फिर रस्म पुरानी दीवाली के दीप जले
शाम सुहानी रात सुहानी दीवाली के दीप जले

धरती का रस डोल रहा है दूर-दूर तक खेतों के
लहराये वो आंचल धानी दीवाली के दीप जले

नर्म लबों ने ज़बानें खोलीं फिर दुनिया से कहन को
बेवतनों की राम कहानी दीवाली के दीप जले

लाखों-लाखों दीपशिखाएं देती हैं चुपचाप आवाज़ें
लाख फ़साने एक कहानी दीवाली के दीप जले

निर्धन घरवालियां करेंगी आज लक्ष्मी की पूजा
यह उत्सव बेवा की कहानी दीवाली के दीप जले

लाखों आंसू में डूबा हुआ खुशहाली का त्योहार
कहता है दुःखभरी कहानी दीवाली के दीप जले

कितनी मंहगी हैं सब चीज़ें कितने सस्ते हैं आंसू
उफ़ ये गरानी ये अरजानी दीवाली के दीप जले

मेरे अंधेरे सूने दिल का ऐसे में कुछ हाल न पूछो
आज सखी दुनिया दीवानी दीवाली के दीप जले

तुझे खबर है आज रात को नूर की लरज़ा मौजों में
चोट उभर आई है पुरानी दीवाली के दीप जले

जलते चराग़ों में सज उठती भूके-नंगे भारत की
ये दुनिया जानी-पहचानी दीवाली के दीप जले

भारत की किस्मत सोती है झिलमिल-झिलमिल आंसुओं की
नील गगन ने चादर तानी दीवाली के दीप जले

देख रही हूं सीने में मैं दाग़े जिगर के चिराग लिये
रात की इस गंगा की रवानी दीवाली के दीप जले

जलते दीप रात के दिल में घाव लगाते जाते हैं
शब का चेहरा है नूरानी दीवाले के दीप जले

जुग-जुग से इस दुःखी देश में बन जाता है हर त्योहार
रंजोख़ुशी की खींचा-तानी दीवाली के दीप जले

रात गये जब इक-इक करके जलते दीये दम तोड़ेंगे
चमकेगी तेरे ग़म की निशानी दीवाली के दीप जले

जलते दीयों ने मचा रखा है आज की रात ऐसा अंधेर
चमक उठी दिल की वीरानी दीवाली के दीप जले

कितनी उमंगों का सीने में वक़्त ने पत्ता काट दिया
हाय ज़माने हाय जवानी दीवाली के दीप जले

लाखों चराग़ों से सुनकर भी आह ये रात अमावस की
तूने पराई पीर न जानी दीवाली के दीप जले

लाखों नयन-दीप जलते हैं तेरे मनाने को इस रात
ऐ किस्मत की रूठी रानी दीवाली के दीफ जले

ख़ुशहाली है शर्ते ज़िंदगी फिर क्यों दुनिया कहती है
धन-दौलत है आनी-जानी दीवाली के दीप जले

बरस-बरस के दिन भी कोई अशुभ बात करता है सखी
आंखों ने मेरी एक न मानी दीवाली के दीप जले

छेड़ के साज़े निशाते चिराग़ां आज फ़िराक़ सुनाता है
ग़म की कथा ख़ुशी की ज़बानी दीवाली के दीप जले

46. न जाना आज तक क्या शै ख़ुशी है

ना जाना आज तक क्या शै खुशी है
हमारी ज़िन्दगी भी ज़िन्दगी है

तेरे गम से शिकायत सी रही है
मुझे सचमुच बडी शर्मिन्दगी है

मोहब्बत में कभी सोचा है यूं भी
कि तुझसे दोस्ती या दुश्मनी है

कोई दम का हूं मेहमां, मुंह ना फ़ेरो
अभी आंखों में कुछ कुछ रोशनी है

ज़माना ज़ुल्म मुझ पर कर रहा है
तुम ऐसा कर सको तो बात भी है

झलक मासूमियों में शोखियों की
बहुत रंगीन तेरी सादगी है

इसे सुन लो, सबब इसका ना पूछो
मुझे तुम से मोहब्बत हो गई है

सुना है इक नगर है आंसूओं का
उसी का दूसरा नाम आंख भी है

वही तेरी मोहब्बत की कहानी
जो कुछ भूली हुई, कुछ याद भी है

तुम्हारा ज़िक्र आया इत्तिफ़ाकन
ना बिगडो बात पर, बात आ गई है

47. न पूछ क्या काम कर गई है

न पूछ क्या काम कर गई है
दिलो-नज़र में उतर गई है
तेरी नज़र सब को आज़माए,
तेरी नज़र कौन आज़माए

शिगुफ़्ता दिल को न कर सकेगा,
रुका-रुका ज़ेरे-लब तबस्सुम
मैं उन लबों पर कभी तो देखूँ,
वो मुस्कुराहट जो मुस्कुराए

हयाते-फ़ानी से बढ़ के फ़ानी,
निगाहे-बर्को-शरर से कमतर
ये इश्क़ है तो सलाम अपना,
यही वफ़ा है तो बाज़ आए

तू इस तरह याद आ रहा है,
कि शामे-ग़म में मैं डर रहा हूँ
कहीं न आ जाए मेरे दिल में,
वो याद जो तुझको भूल जाए

हज़ारहा दिल तड़प-तड़प कर,
बयक अदा मिट के रह गये हैं
न पूछ क्या उन दिलों पे गुज़री,
जो रह गये थे बचे-बचाए

(शिगुफ़्ता=स्फुटित, ज़ेरे-लब तबस्सुम=
होठों में ही मुस्कुराना, फ़ानी=नश्वर,
निगाहे-बर्को-शरर=चिंगारी भरी आँख)

48. मैं होशे-अनादिल हूँ मुश्किल है सँभल जाना

मैं होशे-अनादिल हूँ मुश्किल है सँभल जाना
ऐ बादे-सबा मेरी करवट तो बदल जाना

तक़दीरे-महब्बत हूँ मुश्किल है बदल जाना
सौ बार सँभल कर भी मालूम सँभल जाना

उस आँख की मस्ती हूँ ऐ बादाकशो जिसका
उठ कर सरे-मैख़ाना मुमकिन है बदल जाना

अय्यामे-बहारां में दीवानों के तेवर भी
जिस सम्त नज़र उट्ठी आलम का बदल जाना

घनघोर घटाओं में सरशार फ़ज़ाओं में
मख्म़ूर हवाओं में मुश्किल है सँभल जाना

हूँ लग़्जिशे-मस्ताना मैख़ान-ए-आलम में
बर्के़-निगहे-साक़ी कुछ बच के निकल जाना

इस गुलशने-हस्ती में कम खिलते हैं गुल ऐसे
दुनिया महक उट्ठेगी तुम दिल को मसल जाना

मैं साज़े-हक़ीक़त हूँ सोया हुआ नग़्मा था
था राज़े-निहां कोई परदों से निकल जाना

हूँ नकहते-मस्ताना गुलज़ारे महब्बत में
मदहोशी-ए-आलम है पहलू का बदल जाना

मस्ती में लगावट से उस आंख का ये कहना
मैख्‍़वार की नीयत हूँ मुमकिन है बदल जाना

जो तर्ज़े-गज़लगोई मोमिन ने तरह की थी
सद-हैफ़ फ़ि‍राक़ उसका सद-हैफ़ बदल जाना

(होशे-अनादिल=बुलबुल के स्वभाव का,
बादाकशो=शराब पीनेवाले, लग़्जिशे-
मस्ताना=मस्ताने की लड़खड़ाहट,
नकहते-मस्ताना=मस्ती भरी महक)

49. ये निकहतों की नर्म रवी, ये हवा ये रात

ये निकहतों कि नर्म रवी, ये हवा, ये रात
याद आ रहे हैं इश्क़ के टूटे तआल्लुक़ात

मासूमियों की गोद में दम तोड़्ता है इश्क़्
अब भी कोई बना ले तो बिगड़ी नहीं है बात

इक उम्र कट गई है तेरे इन्तज़ार में
ऐसे भी हैं कि कट न सकी जिनसे एक रात

हम अहले-इन्तज़ार के आहट पे कान थे
ठण्डी हवा थी, ग़म था तेरा, ढल चली थी रात

हर साई-ओ-हर अमल में मोहब्बत का हाथ है
तामीर-ए-ज़िन्दगी के समझ कुछ मुहरकात

अहल-ए-रज़ा में शान-ए-बग़ावत भी हो ज़रा
इतनी भी ज़िन्दगी न हो पाबंद-ए-रस्मियात

उठ बंदगी से मालिक-ए-तकदीर बन के देख
क्या वसवसा अजब का क्या काविश-ए-निज़ात

मुझको तो ग़म ने फ़ुर्सत-ए-ग़म भी न दी फ़िराक
दे फ़ुर्सत-ए-हयात न जैसे ग़म-ए-हयात

50. रस में डूब हुआ लहराता बदन क्या कहना

रस में डूब हुआ लहराता बदन क्या कहना
करवटें लेती हुई सुबह-ए-चमन क्या कहना

बाग़-ए-जन्नत में घटा जैसे बरस के खुल जाये
सोंधी सोंधी तेरी ख़ुश्बू-ए-बदन क्या कहना

जैसे लहराये कोई शोला कमर की ये लचक
सर ब-सर आतिश-ए-सय्याल बदन क्या कहना

क़ामत-ए-नाज़ लचकती हुई इक क़ौस-ओ-ए-क़ज़ाह
ज़ुल्फ़-ए-शब रंग का छया हुआ गहन क्या कहना

जिस तरह जल्वा-ए-फ़िर्दौस हवाओं से छीने
पैराहन में तेरे रंगीनी-ए-तन क्या कहना

जल्वा-ओ-पर्दा का ये रंग दम-ए-नज़्ज़ारा
जिस तरह अध-खुले घुँघट में दुल्हन क्या कहना

जगमगाहट ये जबीं की है के पौ फटती है
मुस्कुराहट है तेरी सुबह-ए-चमन क्या कहना

ज़ुल्फ़-ए-शबगूँ की चमक पैकर-ए-सीमें की दमक
दीप माला है सर-ए-गंग-ओ-जमन क्या कहना

51. रात आधी से ज्यादा गई थी सारा आलम सोता था

रात आधी से ज्यादा गई थी, सारा आलम सोता था
नाम तेरा ले ले कर कोई दर्द का मारा रोता था

चारागरों, ये तस्कीं कैसी, मैं भी हूं इस दुनिया में
उनको ऐसा दर्द कब उठा, जिनको बचाना होता था

कुछ का कुछ कह जाता था मैं फ़ुरकत की बेताबी में
सुनने वाले हंस पडते थे होश मुझे तब आता था

तारे अक्सर डूब चले थे, रात को रोने वालों को
आने लगी थी नींद सी कुछ, दुनिया में सवेरा होता था

तर्के-मोहब्बत करने वालों, कौन ऐसा जग जीत लिया
इश्क के पहले के दिन सोचो, कौन बडा सुख होता था

उसके आंसू किसने देखे, उसकी आंहे किसने सुनी
चमन चमन था हुस्न भी लेकिन दरिया दरिया रोता था

पिछला पहर था हिज़्र की शब का, जागता रब, सोता इन्सान
तारों कि छांव में कोई ’फ़िराक’ सा मोती पिरोता था

(चारागर=हकीम, तस्कीन=तसल्ली, फ़ुरकत=जुदाई,
तर्के-मोहब्बत=मोहब्बत का खात्मा)

52. रुकी-रुकी-सी

रुकी-रुकी सी शबे-मर्ग खत्म पर आई
वो पौ फटी,वो नई ज़िन्दगी नज़र आई

ये मोड़ वो हैं कि परछाइयाँ देगी न साथ
मुसाफ़िरों से कहो, उसकी रहगुज़र आई

फ़ज़ा तबस्सुमे-सुबह-बहार थी लेकिन
पहुँच के मंजिले-जानाँ पे आँख भर आई

किसी की बज़्मे-तरब में हयात बटती थी
उम्मीदवारों में कल मौत भी नज़र आई

कहाँ हरएक से इंसानियत का वार उठा
कि ये बला भी तेरे आशिक़ो के सर आई

दिलों में आज तेरी याद मुद्दतों के बाद
ब-चेहरा-ए-तबस्सुम व चश्मे-तर आई

नया नहीं है मुझे मर्गे-नागहाँ का पयाम
हज़ार रंग से अपनी मुझे खबर आई

फ़ज़ा को जैसे कोई राग चीरता जाये
तेरी निगाह दिलों में यूँहीं उतर आई

ज़रा विसाल के बाद आईना तो देख ऐ दोस्त !
तेरे ज़माल कि दोशीज़गी निखर आई

अजब नहीं कि चमन-दर-चमन बने हर फूल
कली-कली की सबा जाके गोद भर आई

शबे-'फिराक़'उठे दिल में और भी कुछ दर्द
कहूँ मैं कैसे,तेरी याद रात भर आई

53. वुसअते-बेकराँ में खो जायें

वुसअते-बेकराँ में खो जायें
आसमानों के राज़ हो जायें

क्या अजब तेरे चंद तर दामन
सबके दागे-गुनाह धो जायें

शादो-नाशाद हर तरह के हैं लोग
किस पे हँस जायें,किस पे रो जायें

यूँ ही रुसवाईयों का नाम उछले
इश्क़ में आबरू डुबो जायें

ज़िन्दगी क्या है आज इसे ऐ दोस्त!
सोच लें और उदास हो जायें

54. फरिश्तों और देवताओं का भी

फ़रिश्तों और देवताओं का भी,
जहाँ से दुश्वार था गुज़रना
हयात कोसों निकल गई है,
तेरी निगाहों के साए-साए

हज़ार हो इल्मी-फ़न में यकता,
अगर न हो इश्क आदमी में
न एक जर्रे का राज़ समझे,
न एक क़तरे की थाह पाए

ख़िताब बे-लफ़्ज़ कर गए हैं,
पयामे-ख़ामोश दे गए है
वो गुज़रे हैं इस तरफ़ से,जिस दम
बदन चुराए नज़र बचाए

मेरे लिए वक्त वो वक्त है जिस दम,
'फ़िराक़' दो वक्त मिल रहे हों
वो शाम जब ज़ुल्फ़ लहलहाए,
वो सुबह चेहरा रिसमिसाए

(यकता=अद्वितीय, ख़िताब=
सम्बोधन)

55. सोजें-पिनहाँ हो, चश्मे-पुरनम हो

सोज़े-पिनहाँ हो,चश्मे-पुरनम हो
दिल में अच्छा-बुरा कोई ग़म हो

फिर से तरतीब दें ज़माने को
ऐ ग़में ज़िन्दगी मुनज़्ज़म हो

इन्किलाब आ ही जाएगा इक रोज़
और नज़्में-हयात बरहम हो

ताड़ लेते हैं हम इशारा-ए-चश्म
और मुबहम हो, और मुबहम हो

दर्द ही दर्द की दवा ना बन जाये
ज़ख्म ही ज़ख्मे-दिल का मरहम हो

वो कहाँ जाके अपनी प्यास बुझाए
जिसको आबे-हयात सम हो

कीजिये जो जी में आये 'फ़िराक़'
लेकिन उसकी खुशी मुकद्दम हो

(सोज़े-पिनहाँ=गुप्त पीड़ा, चश्मे-पुरनम=
सजल आंखे, मुनज़्ज़म=संगठित, नज़्में-
हयात=जीवन-व्यवस्था, बरहम=अस्त-व्यस्त,
इशारा-ए-चश्म=आँखों का इशारा, मुबहम=
अस्पष्ट, आबे-हयात=अमृत, सम=विष,
मुकद्दम=सर्वोपरि)

56. इश्क़ की मायूसियों में सोज़-ए-पिन्हाँ कुछ नहीं

इश्क़ की मायूसियों में सोज़-ए-पिन्हाँ कुछ नहीं
इस हवा में ये चराग़-ए-ज़ेर-ए-दामाँ कुछ नहीं

क्या है देखो हसरत-ए-सैर-ए-गुलिस्ताँ कुछ नहीं
कुछ नहीं ऐ सकिनान-ए-कुंज-ए-ज़िंदाँ कुछ नहीं

इश्क़ की है ख़ुद-नुमाई इश्क़ की आशुफ़्तगी
रू-ए-ताबाँ कुछ नहीं ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ कुछ नहीं

याद आ ही जाती है अक्सर दिल-ए-बर्बाद की
यूँ तो सच है चंद ज़र्रात-ए-परेशाँ कुछ नहीं

सच है जो कुछ भी है वो है गर्मी-ए-बाज़ार-ए-हुस्न
अहल-ए-दिल का सोज़-ए-पिन्हाँ कुछ नहीं हाँ कुछ नहीं

और उन की ज़िंदगी है और उनवान-ए-हयात
ख़ु़द-फ़रामोशों को तेरे अहद-ओ-पैमाँ कुछ नहीं

एक हो जाए न जब तक सरहद-ए-होश-ओ-जुनूँ
एक हो कर चाक-ए-दामान-ओ-गरेबाँ कुछ नहीं

जो न हो जाए वो कम है जो भी हो जाए बहुत
कार-ज़ार-ए-इश्क़ में दुश्वार-ओ-आसाँ कुछ नहीं

देखनी थी देख ली इस छेड़ की भी सादगी
बे-दिलों में ये तबस्सुम-हा-ए-पिन्हाँ कुछ नहीं

काश अपने दर्द से बेताब होते ऐ 'फ़िराक़'
दूसरे के हाथों ये हाल-ए-परेशाँ कुछ नहीं

57. हिज़ाबों में भी तू नुमायूँ नुमायूँ

हिज़ाबों में भी तू नुमायूँ नुमायूँ
फरोज़ाँ फरोज़ाँ दरख्शाँ दरख्शाँ

तेरे जुल्फ-ओ-रुख़ का बादल ढूंढता हूँ
शबिस्ताँ शबिस्ताँ चाराघाँ चाराघाँ

ख़त-ओ-ख़याल की तेरे परछाइयाँ हैं
खयाबाँ खयाबाँ गुलिस्ताँ गुलिस्ताँ

जुनूँ-ए-मुहब्बत उन आँखों की वहशत
बयाबाँ बयाबाँ गज़लाँ गज़लाँ

लपट मुश्क-ए-गेसू की तातार तातार
दमक ला'ल-ए-लब की बदक्शाँ बदक्शाँ

वही एक तबस्सुम चमन दर चमन है
वही पंखूरी है गुलिस्ताँ गुलिस्ताँ

सरासार है तस्वीर जमीतों की
मुहब्बत की दुनिया हरासाँ हरासाँ

यही ज़ज्बात-ए-पिन्हाँ की है दाद काफी
चले आओ मुझ तक गुरेजाँ गुरेजाँ

"फिराक" खाज़ीं से तो वाकिफ थे तुम भी
वो कुछ खोया खोया परीशाँ परीशाँ

58. हुस्न का जादू जगाए

हुस्न का जादू जगाए इक ज़माना हो गया
ऐ सुकूते-शामे-ग़म फिर छेड़ उन आँखों की बात

ज़िन्दगी को ज़िन्दगी करना कोई आसाँ न था
हज़्म करके ज़हर को करना पड़ा आबे-हयात

जा मिली है मौत से आज आदमी की बेहिसी
जाग ऐ सुबहे-क़यामत, उठ अब ऐ दर्दे-हयात

कुछ हुआ, कुछ भी नहीं और यूँ तो सब कुछ हो गया
मानी-ए-बेलफ्ज़ है ऐ दोस्त दिल की वारदात

तेरी बातें हैं कि नग्में तेरे नग्में है सहर
ज़ेब देते हैं 'फ़िराक़'औरों को कब ये कुफ्रियात

(सुकूते=चुप्पी, बेहिसी=जड़ता, सुबहे-क़यामत=
प्रलय की सुबह, सहर=जादू, ज़ेब=शोभा, कुफ्रियात=
अधर्म)

59. होकर अयाँ वो ख़ुद को छुपाये हुए-से हैं

होकर अयाँ वो ख़ुद को छुपाये हुए-से हैं
अहले-नज़र ये चोट भी खाये हुए-से हैं

वो तूर हो कि हश्रे-दिल अफ़्सुर्दगाने-इश्क
हर अंजुमन में आग लगाये-हुए-से हैं

सुब्हे-अज़ल को यूँ ही ज़रा मिल गयी थी आंख
वो आज तक निगाह चुराये-हुए-से हैं

हम बदगु़माने-इश्क तेरी बज़्मे-नाज से
जाकर भी तेरे सामने आये-हुए-से हैं

ये क़ुर्बो-बोद भी हैं सरासर फ़रेबे-हुस्ने
वो आके भी फ़िराक़ न आए-हुए-से हैं

60. अपने ग़म का मुझे कहाँ ग़म है

अपने ग़म का मुझे कहाँ ग़म है
ऐ कि तेरी ख़ुशी मुक़द्दम है

उस के शैतान को कहाँ तौफ़ीक़
इश्क़ करना गुनाह-ए-आदम है

इक तड़प मौज-ए-तह-नशीं की तरह
ज़िंदगी की बिना-ए-मोहकम है

ये भी नज़्म-ए-हयात है कोई
ज़िंदगी ज़िंदगी का मातम है

रूप के जोत ज़ेर-ए-पैराहन
गुल्सिताँ पर रिदा-ए-शबनम है

आह ये मेहरबानियाँ तेरी
शादमानी की आँख पुर-नम है

नर्म ओ दोशीज़ा किस क़द्र है निगाह
हर नज़र दास्तान-ए-मरयम है

महर-ओ-मह शोला-हा-ए-साज़-ए-जमाल
जिस की झंकार इतनी मद्धम है

दिए जाती है लो सदा-ए-फ़िराक़
हाँ वही सोज़-ओ-साज़ कम कम है

चुनिन्दा शायरी/कवितायें.....(61-87)
चुनिन्दा शायरी/कवितायें.....(1-30)