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डाक्टर मुहम्मद इकबाल
Dr Muhammad Iqbal
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Poetry in Hindi Dr Allama Muhammad Iqbal

डाक्टर अलामा मुहम्मद इकबाल की शायरी

1. अफ़लाक से आता है नालों का जवाब आख़िर

अफ़लाक से आता है नालों का जवाब आख़िर
करते हैं ख़िताब आख़िर उठते हैं हिजाब आख़िर

अहवाल-ए-मुहब्बत में कुछ फ़रक नहीं ऐसा
सोज़-ओ-तब-ओ-ताब अव्वल, सोज़-ओ-तब-ओ-ताब आख़िर

मैं तुझको बताता हूं तकदीर-ए-उमस कया है
शमशीर-ए-सनां अव्वल, ताऊस-ओ-रबाब आख़िर

मैख़ाना-ए-यूरोप के दसतूर निराले हैं
लाते हैं सुरूर अव्वल, देते हैं शराब आख़िर

कया दबदबा-ए-नादिर, कया शौकत-ए-तैमूरी
हो जाते हैं सब दफ़तर गरके-मये-नाब आख़िर

था ज़बत बहुत मुशकिल इस मील मुआनी का
कह डाले कलन्दर ने इसरार-ए-किताब आख़िर

2. अगर कज रौ हैं अंजुम, आसमां तेरा है या मेरा

अगर कज रौ हैं अंजुम, आसमां तेरा है या मेरा ?
मुझे फ़िकर-ए-जहां कयों हो, जहां तेरा है या मेरा ?

अगर हंगामा हा'ए शौक से है ला-मकां खाली
खता किस की है या रब ! ला-मकां तेरा है या मेरा ?

उसे सुबह-ए-अज़ल इनकार की जुरअत हुयी कयों कर
मुझे मालूम कया, वो राज़दां तेरा है या मेरा ?

मुहंमद भी तेरा, जिबरील भी, कुरआन भी तेरा
मगर ये हरफ़-ए-शरीं तरजुमान तेरा है या मेरा ?

इसी कोकब की ताबानी से है तेरा जहां रौशन
ज़वाल-ए-आदम-ए-ख़ाकी ज़यां तेरा है या मेरा ?

3. अजब वायज़ की दींदारी है या रब

अजब वायज़ की दींदारी है या रब !
अदावत है इसे सारे जहां से

कोयी अब तक न यह समझा, कि इनसां
कहां जाता है, आता है कहां से ?

वहीं से रात को ज़ुलमत मिली है
चमक तारे ने पायी है जहां से

हम अपनी दरदमन्दी का फ़साना
सुना करते हैं अपने राज़दां से

बड़ी बारीक हैं वायज़ की चालें
लरज़ जाता है आवाज़े-अज़ां से

4. अख़तर-ए-सुबह

सितारा सुबह का रोता था और ये कहता था
मिली निगाह, मगर फुरसत-ए-नज़र न मिली

हूयी है ज़िन्दा दमे-आफ़ताब से हर शैअ
अमां मुझी को तहे दामन-ए-सहर न मिली

बिसात कया है भला सुबह के सितारे की
नफ़स हबाब का ताबिन्दग़ी शरारे की

कहा ये मैंने कि ऐ ज़ेवर-ए-जबीन-ए-सहर
ग़म फ़ना है तुझे, गुम्बद-ए-फ़लक से उतर

टपक बुलन्दी गरदूं से हमरहे शबनम
मेरे र्याज़-ए-सुख़न की फ़िज़ा है जां परवर

मैं बाग़बां हूं, मुहब्बत बहार है इस की
बिना मिसाले-अबद पाएदार है इस की

5. अनोखी वज़य है सारे ज़माने से निराले हैं

अनोखी वज़य है सारे ज़माने से निराले हैं
ये आशिक कौन सी बसती के या रब ! रहने वाले हैं ?

इलाजे-दरद में भी दरद की लज़्ज़त पे मरता हूं
जो थे छालों में कांटे नोक-ए-सूज़न से निकाले हैं

फला फूला रहे या रब ! चमन मेरी उम्मीदों का
जिगर का ख़ून दे दे कर ये बूटे मैंने पाले हैं

रुलाती है मुझे रातों को ख़ामोशी सितारों की
निराला इशक है मेरा, निराले मेरे नाले हैं

न पूछो मुझसे लज़्ज़त ख़ानुमां-बरबाद रहने की
नशेमन सैंकड़ों मैंने बनाकर फूंक डाले हैं

नहीं बेगानगी अच्छी रफ़ीके-राहे-मंज़िल से,
ठहर जा ऐ शरर ! हम भी तो आख़िर मिटने वाले हैं

उमीदे-हूर ने सब कुछ सिखा रक्खा है, वायज़ को,
ये हज़रत देखने में सीधे-सादे भोले-भाले हैं

मेरे अशयार ऐ 'इकबाल' कयूं पयारे न हों मुझ को ?
मेरे टूटे हुए दिल के ये दरद-अंगेज़ नाले हैं

6. अकल-ओ-दिल

अकल ने एक दिन ये दिल से कहा
भूले-भटके की रहनुमा हूं मैं

तू ज़मीं पर, गुज़र फ़लक है मेरा
देख तो किस कदर रसा हूं मैं

काम दुनिया में रहबरी मेरा
मिसल ख़िज़र ख़सता पा हूं मैं

हूं मुफ़सिर किताबे-हसती की
मज़हर-ए-शान किबरीया हूं मैं

दिल ने सुनकर कहा ये सब सच है
पर मुझे भी तो देख कया हूं मैं

राज़े-हसती को तू समझती है
और आंखों से देखता हूं मैं

है तुझे वासता मज़ाहर से
और बातिन से आशना हूं मैं

इलम तुझसे तो मारिफ़त मुझसे
तू ख़ुदा जू ख़ुदा-नुमा हूं मैं

इलम की इनतेहा है बेताबी
इस मरज़ की मगर दवा हूं मैं

शम्हा तू महफ़िल-ए-सदाकत की
हुस्न की बज़म का दीया हूं मैं

तू ज़मान-ओ-मकां से रिशता बपा
तायरा-ए-सिदरा आशना हूं मैं

किस बुलन्दी पे है मकाम मेरा
अरश रब-ए-जलील का हूं मैं

7. असर करे न करे, सुन तो ले मेरी फ़रयाद

असर करे न करे, सुन तो ले मेरी फ़रयाद
नहीं है दाद का तालिब ये बन्दा'ए अज़ाद

ये मुशत-ए-खां (ख़ाक), ये सर सर, ये वुसअत-ए-अफ़लाक
करम है या कि सितम तेरी लज़्ज़त-ए-ईजाद

ठहर सका न हुवा'ए चमन में खेमा'ए गुल
ये है फ़सल-ए-बहारी, ये है बाद-ए-मुराद

कसूरवार, ग़रीब-उद-दियार हूं लेकिन
तेरा ख़राबा फ़रिशते न कर सके अबाद

मेरी जफ़ा तलबी को दुआएं देता है
वो दसत-ए-सदा, वो तेरा जहां-ए-बेबुनियाद

खतर पसन्द तबीयत को साज़गार नहीं
वो गुलसितां के जहां घात में न हो सयाद

मकाम-ए-शौक तेरे कुदस्यों के बस का नहीं
उनहीं का काम है ये जिन के हौसले हैं ज़याद

8. असरार-ए-पैदा

उस कौम को शमशीर की हाजत नहीं रहती
हो जिस के जवानों की खुदी सूरते फ़ौलाद

नाचीज़ जहाने महो परवीं तेरे आगे
वह आलमे मजबूर है तू आलमे आज़ाद

मौजों की तपिश कया है फ़कत ज़ौके तलब है
पिनहां जो सदफ़ में है वह दौलत है खुदादाद

शाहीं कभी परवाज़ से थक कर नहीं गिरता
पुर दम है अगर तू तो नहीं ख़तरा-ए-उफ़ताद

9. औरत

वजूदे जन से है तसवीरे कायनात में रंग
इसी के साज़ से है ज़िन्दगी का सोज़े दरूं

शरफ़ में बड़ के सुरया से मुशते ख़ाक उसी की
कि हर शरफ़ है उसी दुरज का दुरे मकनूं

मुकालमाते फ़लातूं न लिख सकी लेकिन
उसी के शोले से टूटा शरारे अफ़लातूं

10. आज़ाद की रग सख़त है मानिन्द रग-ए-संग

आज़ाद की रग सख़त है मानिन्द रग-ए-संग
महकूम की रग नरम है मानिन्द-ए-रग-ए-ताक

महकूम का दिल मुरदा-ओ-अफ़सुरदा-ओ-नाउमीद
आज़ाद का दिल ज़िन्दा-ओ-पुरसोज़-ओ-तरबनाक

आज़ाद की दौलत-ए-दिल रौशन, नफ़स-ए-गिराम
महकूम का सरमाया फ़कत दीदाए नमनाक

महकूम है बेगाना-ए-इख़लास-ओ-मुरव्वत
हर चन्द कि मनताक की दलीलों में है चालाक

मुमकिन नहीं महकूम हो आज़ाद का हमदोश
वोह बन्दा-ए-अफ़लाक है, येह ख़वाजा-ए-अफ़लाक

11. बज़म-ए-अंजुम

हुस्न अज़ल है पैदा तारों की दिलबरी में
जिस तरह अकस-ए-गुल हो शबनम की आरसी में

आईना-ए-नौ से ड्रना, तरज़े-कुहन पे उड़ना
मंज़िल यही कठिन है कौमों की ज़िन्दगी में

ये कारवाने-हसती है तेज़ गाम ऐसा
कौमें कुचल गई हैं जिसकी रवां रवी में

आंखों से हैं हमारी ग़ायब हज़ारों अंजुम
दाख़िल हैं वोह भी लेकिन अपनी बरादरी में

इक उमर में न समझे उसको ज़मीन वाले
जो बात पा गए हम थोड़्ही सी ज़िन्दगी में

हैं जज़बा-ए-बाहमी से कायम निज़ाम सारे
पोशीदा है ये नुकता तारों की ज़िन्दगी में

12. चांद और तारे

डरते ड्रते दम-ए-सहर से
तारे कहने लगे कमर से

नज़ारे रहे वही फ़लक पर
हम थक भी गए चमक चमक कर

काम अपना है सुबह-ओ-शाम चलना
चलना चलना, मदाम चलना

बेताब है इस जहां की हर शैअ
कहते हैं जिसे सुकूं नहीं है

रहते हैं सितम कशे सफ़र सब
तारे, इनसां, शजर, हजर सब

होगा कभी ख़तम ये सफ़र कया
मंज़िल कभी आएगी नज़र कया

कहने लगा चांद ऐ-हमनशीनों
ऐ-मजरा-ए-शब के ख़ोशाचीनों

जुम्बिश से है ज़िन्दगी यहां की
ये रसम कदीम है यहां की

है दौड़ता अशहबे ज़माना
खा खा के तलब का ताज़ियाना

इस रह में मकाम बे-महल है
पोशीदा करार में अज़ल है

चलने वाले निकल गए हैं
जो ठहरे ज़रा कुचल गए हैं

अंजाम है इस ख़िराम का हुस्न
आग़ाज़ है इशक, इनतेहा हुस्न

13. चमने-ख़ार-ख़ार है दुनिया

चमने-ख़ार-ख़ार है दुनिया
ख़ूने-सद नौबहार है दुनिया

जान लेती है जुसतजू इसकी
दौलते-ज़ेरे-मार है दुनिया

ज़िन्दगी नाम रख दीया किसने
मौत का इंतज़ार है दुनिया

ख़ून रोता है शौक मंज़िल का
रहज़ने-रहगुज़ार है दुनिया

14. दिगरगूं है, जहां, तारों की गरदिश तेज़ है साकी

दिगरगूं है, जहां, तारों की गरदिश तेज़ है साकी
दिल हर ज़र्रा में ग़ोग़ाए रसताख़ेज़ है साकी

मता-ए-दीं-ओ-दानिश लुट गयी अल्ल्हा वालों की
येह किस अदा का ग़मज़दाए ख़ूंरेज़ है साकी

वही देरीना बीमारी वही न-महकामी दिल की
इलाज इस का वही आब-ए-निशात अंग़ेज़ है साकी

हरम के दिल में सोज़-ए-आरज़ू पैदा नहीं होता
कि पायेदारी तेरी अब तक हिजाब आमेज़ है साकी

न उठा फिर कोयी रूमी अजम के लाला-ज़ारों से
वही आब-ओ-गिल्ल इरान, वही तबरेज़ है साकी

नहीं है न-उमीद इकबाल अपनी किशत-ए-वीरां से
ज़रा नम हो तो येह मिट्टी बहुत ज़रख़ेज़ है साकी

फ़कीर-ए-राह को बख़शे गए असरार-ए-सुलतानी
बहा मेरी नवा की दौलत-ए-परवेज़ है साकी

15. दिगरगूं जहां उनके ज़ोर-ए-अमल से

दिगरगूं जहां उनके ज़ोर-ए-अमल से
बड़े मारके ज़िन्दा कौमों ने मारे

मुंजम की तकवीम-ए-फ़रदा है बातिल
गिरे आसमां से पुराने सितारे

ज़मीर-ए-जहां इस कदर आतिशीं है
कि दरिया की मौजों से टूटे किनारे

ज़मीं को फ़राग़त नहीं ज़लज़लों से
नुमायां हैं फ़ितरत के बारीक इशारे

हमाला के चशमें उबलते हैं कब तक
ख़िज़र सोचता है वूलर के किनारे

16. दिल सोज़ से खाली है, निगह पाक नहीं है

दिल सोज़ से खाली है, निगह पाक नहीं है
फिर इसमें अजब कया कि तू बेबाक नहीं है

है ज़ौक-ए-तजल्ली भी इसी ख़ाक में पिनहां
ग़ाफ़िल ! तू निरा साहब-ए-अदराक नहीं है

वोह आंख कि है सुरमा-ए-अफ़रंग से रौशन
पुरकार-ओ-सुख़नसाज़ है, नमनाक नहीं है

कया सूफ़ी व मुल्ला को ख़बर मेरे जुनूं की
उनका सर-ए-दामन भी अभी चाक नहीं है

कब तक रहे महकूमी-ए-अंजुम में मेरी ख़ाक
या मैं नहीं या गरदिश-ए-अफ़लाक नहीं है

बिजली हूं नज़र कोह-ए-बयाबां पे है मेरी
मेरे लीये शायां-ए-ख़श-ओ-ख़शाक नहीं है

आलम है फ़कत मोमिन-ए-जांबाज़ की मीरास
मोमिन नहीं जो साहब-ए-लौलाक नहीं है

17. दुर्राज की परवाज़ में है शौकत-ए-शाहीं

दुर्राज की परवाज़ में है शौकत-ए-शाहीं
हैरत में है सय्याद येह शाहीं है कि दुर्राज

हर कौम के अफ़कार में पैदा है तलातुम
मशरिक में है फ़रदाए कयामत की नमूद आज

फ़िकर के तकाज़ों से हूआ हशर पे मज़बूर
वोह मुरदा कि था बांग-ए-सराफ़ील का मोहताज

18. एजाज़ है किसी का या गरदिश-ए-ज़माना

एजाज़ है किसी का या गरदिश-ए-ज़माना
टूटा है एशिया में सहर-ए-फ़रंग़याना

तामीरे अशीयां से मैंने येह राज़ पाया
अहल-ए-नवा के हक में बिजली है आशीयाना

येह बन्दगी ख़ुदायी वोह बन्दगी गदाई
या बन्दा-ए-ख़ुदा बन, या बन्दा-ए-ज़माना

ग़ाफ़िल न हो ख़ुदी से कर अपनी पासबानी
शायद किसी हरम का तू भी है आसताना

ऐ लायल्लाहा के वारिस बाकी नहीं है तुझ में
गुफ़तार-ए-दिलबराना किरदार-ए-काहराना

तेरी निगाह से दिल सीनों में कांपते थे
खोया गया है तेरा जज़ब-ए-कलन्दराना

राज़-ए-हरम से शायद इकबाल बा-ख़बर है
हैं इस की गुफ़तगू के अन्दाज़ मेहरमाना

19. एक आरज़ू

दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूं या रब
कया लुतफ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो

सोरिश से भागता हूं दिल ढूंढता है मेरा
ऐसा सुकूत जिस पर तकदीर भी फ़िदा हो

मरता हूं ख़ामोशी पर ये आरज़ू है मेरी
दामन में कोह के एक छोटा-सा झौंपड़ा हो

आज़ाद फ़िकर से हूं उज़लत में दिन गुज़ारूं
दुनिया के ग़म का दिल से कांटा निकल गया हो

लज़्ज़त सरोद की हो चिड़ीयों के चहचहों में
चशमों की शोरिशों में बाजा-सा बज रहा हो

गुल की कली चटक कर पैग़ाम दे किसी का
साग़र ज़रा-सा गोया मुझ को जहांनुमा हो

हो हाथ का सरहाना सबज़े का हो बिछौना
शरमाए जिस से जलवत खिलवत में वो अदा हो

मानूस इस कदर हो सूरत से मेरी बुलबुल
नन्न्हे-से दिल में उसके खटका न कुछ मेरा हो

सफ़ बांधे दोनों जानिब बूटे हरे हरे हों
नदी का साफ़ पानी तसवीर ले रहा हो

हो दिलफ़रेब ऐसा कोहसार का नज़ारा
पानी भी मौज बन कर उठ उठ के देखता हो

आगोश में ज़मीं की सोया हुआ हो सबज़ा
फिर फिर के झाड़ीयों में पानी चमक रहा हो

पानी को छू रही हो झुक झुक के गुल की टहनी
जैसे हसीन कोयी आईना देखता हो

मेंहदी लगाए सूरज जब शाम की दुलहन को
सुरख़ी लीए सुनहरी हर फूल की कबा हो

रातों को चलने वाले रह जाएं थक के जिस दम
उमीद उनकी मेरा टूटा हुआ दीया हो

बिजली चमक के उनको कुटीया मेरी दिखा दे
जब आसमां से हर सू बादल घिरा हुआ हो
पिछले पहर की कोयल वो सुबह की मोअज़िन
मैं उसका हमनवा हूं वोह मेरी हमनवा हो

कानों पे हो न मेरे दैरो-हरम का अहसां
रौज़न ही झौंपड़ी का मुझ को सहरनुमा हो

फूलों को आए जिस दम शबनम वुज़ू कराने
रोना मेरा वुज़ू हो नाला मेरी दुआ हो

इस ख़ामोशी में जाएं इतने बुलन्द नाले
तारों के काफ़िले को मेरी सदादरा हो

हर दरदमन्द दिल को रोना मेरा रुला दे
बेहोश जो पड़े हैं शायद उनहें जगा दे

20. एक दानिशे नूरानी, एक दानिशे बुरहानी

एक दानिशे नूरानी, एक दानिशे बुरहानी
है दानिशे बुरहानी हैरत की फ़रावानी

इस पैकर-ए-ख़ाकी में एक शैय है, सो वो तेरी
मेरे लीये मुशकिल है इस शैय की निगहबानी

अब कया जो फ़ुग़ां मेरी पहुंची है सितारों तक
तूने ही सिखायी थी मुझ को ये ग़ज़ल ख़वानी

हो नकश अगर बातिल तकरार से कया हासिल
कया तुझ को ख़ुश आती है आदम की ये अरज़ानी ?

मुझ को तो सिखा दी है अफ़रंग ने ज़नदीकी
इस दौर के मुल्लां हैं कयों नंग-ए-मुसलमानी !

तकदीर शिकन कुव्वत बाकी है अभी इसमें
नादां जिसे कहते है तकदीर का ज़िन्दानी

तेरे भी सनम ख़ाने, मेरे भी सनम ख़ाने
दोनों की सनम ख़ाकी, दोनों की सनम फ़ानी

21. एक नौजवान के नाम

तेरे सोफ़े हैं अफ़रंगी तेरे कालीं हैं ईरानी
लहू मुझ को रुलाती है जवानों की तन आसानी

इमारत कया शुकोह-ए-खुसरवी भी हो तो कया हासिल
न ज़ोर-ए-हैदरी तुझ में न इसतग़ना-ए-सलमानी

न ढूंड इस चीज़ को तहज़ीब-ए-हाज़िर की तजल्ली में
कि पाया मैंने इसतग़ना में मेराज-ए-मुसलमानी

उकाबी रूह जब बेदार होती है जवानों में
नज़र आती है उनको अपनी मंज़िल आसमानों में

न हो नाउमीद, नाउमीदी ज़वाल-ए-इलम-ओ-इरफ़ां है
उमीद-ए-मरद-ए-मोमिन है ख़ुदा के राज़दानों में

नहीं तेरा नशेमन कसर-ए-सुलतानी के गुम्बद पर
तू शाहीं है बसेरा कर पहाड़ों की चटानों में

22. फ़रिशते आदम को जन्नत से रुख़सत करते हैं

अता हूयी है तुझे रोज़-ओ-शब की बेताबी
ख़बर नहीं तू ख़ाकी है याकि सीमाबी

सुना है ख़ाक से तेरी नुमूद है लेकिन
तेरी सिरिशत में है कोकबी-ओ-महताबी

जमाल अपना अगर ख़ाब में भी तू देखे
हज़ारों होश से ख़ुशतर तेरी शकर ख़वाबी

गिरां बहा है तेरा गिरया-ए-सहर गाही
उसी से है तेरे नख़ले-कुहन की शादाबी

तेरी नवा से है बे परदा ज़िन्दगी का ज़मीर
कि तेरे साज़ की फ़ितरत ने की है मिज़राबी

23. फ़रमान-ए-ख़ुदा (फ़रिशतों से)

उठो मेरी दुनियां के ग़रीबों को जगा दो
काख़े उमरा के दरो दीवार हिला दो

गरमायो गुलामों का लहू सोज़े यकीं से
कंजशक फ़रो माया को शाहीं से लड़ा दो

सुलतानी-ए-जुमहूर का अता है ज़माना
जो नकशे कोहन तुम को नज़र आए मिटा दो

जिस खेत से दहकां को मयस्सर न हो रोज़ी
उस खेत के हर ख़ोशा-ए-गन्दुम को जला दो

कयूं ख़ालिको मख़लूक में हायल रहें परदे
पीराने कलीसा को कलीसा से उठा दो

मैं नाखुशो बेज़ार हूं मरमर की सिलों से
मेरे लीए मिट्टी का हरम और बना दो

24. गरम-ए-फ़ुग़ां है जरस, उठ के गया काफ़ला

गरम-ए-फ़ुग़ां है जरस, उठ के गया काफ़ला
वाये वोह रहरू कि है मुंतज़िर-ए-राहला

तेरी तबीयत है और, तेरा ज़माना है और
तेरे मुआफ़िक नहीं खानकाही सिलसिला

दिल हो ग़ुलाम-ए-खिरद, या कि इमाम-ए-खिरद
सालिक-ए-राह, होशियार ! सख़त है येह मरहला

उस की ख़ुदी है अभी शाम-ओ-सहर में असीर
गरदिश-ए-दौरां का है जिस की ज़ुबां पर गिला

तेरे नफ़स से हुयी आतिश-ए-गुल तेज़ तर
मुरग-ए-चमन ! है यही तेरी नवा का सिला

25. गरम हो जाता है जब महकूम कौमों का लहू

गरम हो जाता है जब महकूम कौमों का लहू
थरथराता है जहान-ए-चार सू-ए-रंग–ओ-बू

पाक होता है ज़न-ओ-तख़मीन से इनसां का ज़मीर
करता है हर राह को रौशन चिराग़-ए-आरज़ू

वोह पुराने चाक जिन को अकल सी सकती नहीं
इशक सीता है उनहें बे-सोज़न-ओ-तार-ए-रफ़ू

26. गेसू-ए-ताबदार को और भी ताबदार कर

गेसू-ए-ताबदार को और भी ताबदार कर
होश-ओ-ख़िरद शिकार कर, कलब-ओ-नज़र शिकार कर

इशक भी हो हिजाब में, हुस्न भी हो हिजाब में
या तो ख़ुद आशकार हो या मुझे आशकार कर

तू है मुहीत-ए-बेकरां, मैं हूं ज़रा सी आबजू
या मुझे हमकिनार कर, या मुझे बेकिनार कर

मैं हूं सदफ़ तो तेरे हाथ मेरे गुहर की आबरू
मैं हूं ख़ज़फ़ तो तू मुझे गौहर-ए-शाहसवार कर

बाग़-ए-बहशत से मुझे हुकम-ए-सफ़र दीया था कयूं
कार-ए-जहां दराज़ है अब मेरा इंतज़ार कर

रोज़-ए-हसाब जब मेरा पेश हो दफ़तर-ए-अमल
आप भी शरमशार हो, मुझ को भी शरमशार कर

27. ग़ुलामी कया है ज़ौक-ए-हुस्न-ओ-ज़ेबायी से महरूमी

ग़ुलामी कया है ज़ौक-ए-हुस्न-ओ-ज़ेबायी से महरूमी
जिसे ज़ेबा कहें आज़ाद बन्दे है वही ज़ेबा

भरोसा कर नहीं सकते ग़ुलामों की बसीरत पर
कि दुनिया में फ़कत मरदान-ए-हुर की आंख है बीना

वही है साहब-ए-इमरोज़ जिसने अपनी हिंमत से
ज़माने के समन्दर से निकाला गौहर-ए-फ़रदा

फ़रंगी शीशागर के फ़न से पत्थर हो गये पानी
मेरी अकसीर ने शीशे को बख़शी सख़ती-ए-खारा

रहे हैं और हैं फ़िरऔन मेरी घात में अब तक
मगर कया ग़म कि मेरी आसतीं में है यद-ए-बैज़ा

वोह चिंगारी ख़स-ओ-खशाक से किस तरह दब जाये
जिसे हक ने कीया हो नेसतां के वासते पैदा

मुहब्बत खावेशतां बीनी, मुहब्बत खावेशतां दारी
मुहब्बत असतान-ए-कैसर-ओ-कसरा से बेपरवाह

अजब कया गर मह-ओ-परवीं मेरे नखचीर हो जाएं
'कि बर फ़तराक-ए-साहब दौलते बिसतम सर-ए-खुद रा'

वोह दाना-ए-सुबुल, ख़तम-उर रसूल, मौला-ए-कुल जिस ने
ग़ुबार-ए राह को बख़शा फ़रोग-ए-वादी-ए-सीना

निगाह-ए-इशक-ओ-मसती में वही अव्वल वही आख़िर
वही कुरआन, वही फ़ुरकां वही यासीन, वही ताहा

सानायी के आदाब से मैंने गावासी न की वरना
अभी इस बहर में बाकी हैं लाखों लुलूआए लाला

28. गुलामी में काम आती शमशीरें न तदबीरें

गुलामी में काम आती शमशीरें न तदबीरें
जो हो ज़ौक-ए-यकीं पैदा तो कट जाती हैं जंज़ीरें

कोयी अन्दाज़ा कर सकता है उस के ज़ोरे बाज़ू का
निगाह मरद-ए-मोमिन से बदल जाती हैं तकदीरें

विलायत, पादशाही, इलम, अशया की जहांगीरी
यह सब कया हैं फ़कत इक नुकता-ए-इमां की तफ़सीरें

बराहीमी नज़र पैदा मगर बड़ी मुशकिल से होती है
हवस छुप छुप के सीने में बना लेती है तसवीरें

तमीज़ बन्द-ओ-आका, फ़साद आदमीयत है
हज़र ए चीरा-ए-दासतां सख़त हैं फ़ितरत की ताज़ीरें

हकीकत एक है हर शै की ख़ाकी हो के नूरी हो
लहू खुरशीद का टपके, अगर ज़र्रे का दिल चीरें

यकीं मुहकम, अमल पैहम, मोहब्बत फ़ातहे आलम
जेहाद-ए-ज़िन्दगानी में यह मरदों की शमशीरें

29. गुलज़ारे-हसतो-बूद न बेगानावार देख

गुलज़ारे-हसतो-बूद न बेगानावार देख
है देखने की चीज़ इसे बार बार देख

आया है तू जहां में मिसाले-शरार, देख
दम दे न जाए हसती-ए-नापाएदार, देख

माना कि तेरी दीद के काबिल नहीं हूं मैं
तू मेरा शौक देख, मेरा इंतिज़ार देख

खोली हैं ज़ौके-दीद ने आंखें तेरी अगर
हर रह गुज़र में नकशे-कफ़े-पाए-यार देख

30. हमदरदी-विलियम कूपर

टहनी पे किसी शजर की तनहा
बुलबुल था कोयी उदास बैठा

कहता था कि रात सर पे आयी
उड़ने चुगने में दिन गुज़रा

पहुंचूं किस तरह आशीयां तक
हर चीज़ पे छा गया अंधेरा

सुन कर बुलबुल की आह-ओ-ज़ारी
जुगनू कोयी पास ही से बोला

हाज़िर हूं मदद को जां-ओ-दिल से
कीड़ा हूं अगरचे मैं ज़रा सा

कया ग़म है जो रात है अंधेरी
मैं राह में रौशनी करूंगा

अल्ल्हा ने दी है मुझ को मिशाल
चमका के मुझे दीया बनाया

हैं लोग वोही जहां में अच्छे
आते हैं जो काम दूसरों के

31. हम मशरिक के मुसलमानों का दिल मग़रिब में जा अटका है

हम मशरिक के मुसलमानों का दिल मग़रिब में जा अटका है
वहां कुंतर सब बिलौरी हैं, यहां एक पुराना मटका है

इस दौर में सब मिट जायेंगे, हां बाकी वो रह जायेगा
जो कायम अपनी राह पे है, और पक्का अपनी हट का है

ऐ शैख़-ओ-ब्र्रहमन सुनते हो कया अहल-ए-बसीरत कहते हैं
गरदों ने कितनी बुलन्दी से उन कौमों को दे पटका है

32. हकीकत-ए-हुस्न

ख़ुदा से हुस्न ने इक रोज़ ये सवाल कीया
जहां में कयूं न मुझे तूने ला-ज़वाल कीया

मिला जवाब कि तसवीरख़ाना है दुनिया
शब-ए-दराज़ अदम का फ़साना है दुनिया

हुयी है रंगे-तग़य्युर से जब नुमूद इसकी
वही हसीन है हकीकत ज़वाल है जिसकी

कहीं करीब था, ये गुफ़तगू कमर ने सुनी
फ़लक पे आम हुई, अख़तर-ए-सहर ने सुनी

सहर ने तारे से सुनकर सुनायी शबनम को
फ़लक की बात बता दी ज़मीं के महरम को

भर आये फूल के आंसू पयामे-शबनम से
कली का नन्न्हा सा दिल ख़ून हो गया ग़म से

चमन से रोता हुआ मौसमे-बहार गया
शबाब सैर को आया था सोग़वार गया

33. हर चीज़ है महव-ए-ख़ुद नुमाई

हर चीज़ है महव-ए-ख़ुद नुमाई
हर ज़र्रा शहीद-ए-किबरियायी

बे-ज़ौक-ए-नमूद ज़िन्दगी, मौत
तामीर-ए-ख़ुदी मैं है खुदाई

रायी ज़ोर-ए-ख़ुदी से परबत
परबत ज़ुआफ़-ए-ख़ुदी से रायी

तारे आवारा-ओ-कम मेज़
तकदीर-ए-वुज़ूद है जुदाई

येह पिछले पहर का ज़रदरू चेहरा
बे राज़-ओ-न्याज़-ए-आशनाई

तेरी कन्दील है तेरा दिल
तू आप है अपनी रौशनाई

एक तू है कि हक है इस जहां में
बाकी है नमूद-ए-सीमीयाई

हैं औकदाह कुशा येह ख़ार-ए-सहरा
कम कर गिला-ए-बरहना पायी

34. हर शैय मुसाफ़िर, हर चीज़ राही

हर शैय मुसाफ़िर, हर चीज़ राही
कया चांद तारे, कया मुरग-ओ-माही

तू मरद-ए-मैदां, तू मीर-ए-लशकर
नूरी हुज़ूरी तेरे सिपाही

कुछ कदर अपनी तूने न जानी
ये बेसवादी ये कम निगाई

दुनिया-ए-दूं की कब तक ग़ुलामी
ये राहबी कार या पादशाही

पीर-ए-हरम को देखा है मैंने
किरदार बे-सोज़, गुफ़तार वाही

35. हज़ार ख़ौफ़ हों लेकिन ज़ुबां हो दिल की रफ़ीक

हज़ार ख़ौफ़ हों लेकिन ज़ुबां हो दिल की रफ़ीक
यही रहा है अज़ल से कलन्दरों का तरीक

हुजूम कयों है ज़्यादा शराब ख़ाने में
फ़कत ये बात कि पीर-ए-मुग़ां है मरद-ए-ख़लीक

इलाज-ए-ज़ुआफ़-ए-यकीं इन से हो नहीं सकता
गरीब अगरचे हैं राज़ी कि नुकता हाअए दकीक

मुरीद-ए-सादा तो रो रो के हो गया तायब
ख़ुदा करे कि शेख़ को भी मिले येह तौफ़ीक

उसी तलिसम-ए-कुहन में असीर है आदम
बग़ल में उस की हैं अब तक बुतां-ए-अहद-ए-अतीक

मेरे लीये तो है इकरार-ए-बिल-लिसां भी बहुत
हज़ार शुकर कि मुल्ल्हा हैं साहब-ए-तसदीक

अगर हो इशक तो है कुफ़र भी मुसलमानी
न हो तो मरद-ए-मुसलमां भी काफ़िर-ओ-ज़नदीक

36. इनसान

मंज़र चमनिसतां के ज़ेबा हों कि नाज़ेबा
महरूम-ए-अमल नरगिस, मज़बूरे-तमाशा है

रफ़तार की लज़्ज़त का अहसास नहीं इस को
फ़ितरत ही सनोबर की महरूमे-तमन्ना है

तसलीम की ख़ूगर है जो चीज़ है दुनिया में
इनसान की हर कुव्वत सरगरमे-तकाज़ा है

इस ज़र्रे को रहती है वुसअत की हवस हर दम
ये ज़र्रा नहीं शायद सिमटा हुआ सहरा है

चाहे तो बदल डाले हैअत चमनिसतां की
ये हसती-ए-दाना है, बीना है, तवाना है

37. इनसान-कुदरत का अजीब येह सितम है

इनसान को राज़ जु बनाया
राज़ उस की निगाह से छुपाया
बेताब है ज़ौक आगही का
खुलता नहीं भेद ज़िन्दगी का

हैरत-ए-आग़ाज़-ओ-इंतेहा है
आईने के घर में और कया है

है ग़रम ख़ुराम-ए-मौज-ए-दरीया
दरीया सूए बहर जादा-ए-पैमां

बादल को हवा उड़ा रही है
शानों पे उठाए ला रही है

तारे मसत-ए-शराब-ए-तकदीर
ज़िन्दान-ए-फ़लक में पा-ब-ज़ंजीर

खुरशीद वोह आबिद-ए-सहर खेज़
लाने वाला पयाम-ए-बरख़ेज़

मग़रिब की पहाड़ीयों में छुप कर
पीता है मय शफ़क का सागर

लज़्ज़त गीर-ए-वजूद हर शैअ
सर मसत-ए-मय नुमूद हर शैअ

कोयी नहीं ग़मगुसार-ए-इनसां
कया तलख़ है रोज़गार-ए-इनसां

38. इकबाल यहां नाम न ले इलमे खुदी का

इकबाल यहां नाम न ले इलमे खुदी का
मौजूं नही मकतब के लीए ऐसे मकालात

बेहतर है कि बेचारे ममूलों की नज़र से
पोशीदा रहें बाज़ के अहवालो मकामात

आज़ाद की एक आन है महकूम का एक साल
किस दरजा गिरां सैर हैं महकूम के अवकात

आज़ाद का हर लहज़ा पयामे अबदियत
महकूम का हर लहज़ा नई मरगेमुफ़ाज़ात

आज़ाद का अन्देशा हकीकत से मुनव्वर
महकूम का अन्देशा गिरफ़तारे ख़ुराफ़ात

महकूम को पीरों की करामात का सौदा
है बन्दा-ए-आज़ाद ख़ुद एक ज़िन्दा करामात

महकूम के हक में है यही तरबीयत अच्छी
मौसीकी वह सूरत गरी वह इलमेनबातात

39. जब इशक सिखाता है आदाब-ए-ख़ुद आगाही

जब इशक सिखाता है आदाब-ए-ख़ुद आगाही
खुलते हैं ग़ुलामों पर असरार-ए-शहनशाही

अत्तार हो, रूमी हो, राज़ी हो, ग़ज़ाली हो
कुछ हाथ नहीं आता बे आह-ए-सहरगाही

नाउमीद न हो इनसे ऐ रहबर-ए-फ़रज़ाना
कमकोश तो हैं लेकिन बे ज़ौक नहीं राही

ऐ तायर-ए-लाहूती उस रिज़क से मौत अच्छी
जिस रिज़क से आती हो परवाज़ में कोताही

दारा-ओ-सिकन्दर से वोह मरद-ए-फ़कीर औला
हो जिसकी फ़कीरी में बू-ए-असदुल्लाही

आईन-ए-जवांमरदां हकगोयी-ओ-बेबाकी
अल्ल्हा के शेरों को आती नहीं रूबाही

40. जावेद इकबाल के नाम

दयार-ए-इशक में अपना मुकाम पैदा कर
नया ज़माना नये सुबह-ओ-शाम पैदा कर

ख़ुदा अगर दिले-फ़ितरत-शनास दे तुझ को
सुकूते-लाल-ओ-गुल से कलाम पैदा कर

उठा न शीशा-गराने-फ़िरंग के अहसां
सिफ़ाले-हन्द से मीना-ओ-जाम पैदा कर

मैं शाख़े-ताक हूं मेरी ग़ज़ल है मेरा समर
मेरे समर से मय-ए-लालाफ़ाम पैदा कर

मेरा तरीक अमीरी नहीं फ़कीरी है
ख़ुदी न बेच, ग़रीबी में नाम पैदा कर

41. जवानों को मेरी आह-ए-सहर दे

जवानों को मेरी आह-ए-सहर दे
फिर इन शाहीं बच्चों को बाल-ओ-पर दे
ख़ुदाया आरज़ू मेरी यही है
मेरा नूर-ए-बसीरत आम कर दे

42. जज़बा-ए-दरूं

येह कायनात छुपाती नहीं ज़मीर अपना
कि ज़र्रे-ज़र्रे में है ज़ोक आशकाराई

कुछ और ही नज़र आता है कारोबार जहां
निगाह-ए-शौक हो अगर शरीके बीनाई

इसी निगाह से महकूम कौम के फ़रज़न्द
हूए जहां में सज़ावार कार-ए-फ़रमाई

इसी निगाह में है काहरी वह जबारी
इसी निगाह में है दिलबरी वह रानाई

इसी निगाह से हर ज़र्रे को जुनूं मेरा
सिखा रहा है रह-ओ-रसम दसत-ए-पैमाई

निगाह-ए-शौक मयस्सर अगर नहीं तुझ को
तेरा वज़ूद है कलब-यो- नज़र की रुसवाई

43. जिनहें मैं ढूंढता था आसमानों में ज़मीनों में

जिनहें मैं ढूंढता था आसमानों में ज़मीनों में
वो निकले मेरे ज़ुलमत-ख़ाने-दिल के मकीनों में

हकीकत अपनी आंखों पर नुमायां जब हूयी अपनी
मकां निकला हमारे ख़ाना-ए-दिल के मकीनों में

अगर कुछ आशना होता मज़ाके-जुब्बासायी से
तो संगे-आसताने-काबा जा मिलता जबीनों में

कभी अपना भी नज़ारा कीया है तूने ऐ मजनूं ?
कि लैला की तरह तू खुद भी है महमिल-नशीनों में

महीने वसल के घड़्यों की सूरत उड़ते जाते हैं
मगर घड़ीयां जुदायी की गुज़रती हैं महीनों में

मुझे रोकेगा तू ऐ नाख़ुदा कया ग़रक होने से ?
कि जिनको डूबना है डूब जाते हैं सफ़ीनों में

छुपाया हुस्न को अपने कलीम-अल्लाह से जिस ने
वुही नाज़-आफ़रीं है जलवापैरा नाज़नीनों में

जला सकती है शमा-ए-कुशता को मौज-ए-नफ़स उनकी
इलाही ! कया छुपा होता है अहले-दिल के सीनों में ?

तमन्ना दरद-ए-दिल की हो तो कर ख़िदमत फ़कीरों की
नहीं मिलता ये गौहर बादशाहों के ख़ज़ीनों में

न पूछ इन ख़िरकापोशों की इरादत हो तो देख इनको
यदे-बैज़ा लीए बैठे हैं अपनी आसतीनों में

तरसती है निगाहे-नारसा जिस के नज़ारे को
वुह रौनक अंजुमन की है इन्हीं ख़लवत-ग़ज़ीनों में

किसी ऐसे शरर से फूंक अपने ख़िरमने-दिल को
कि ख़ुरशीदे-कयामत भी हो तेरे खोशाचीनों में

मुहब्बत के लीये दिल ढूंढ कोयी टूटने वाला
ये वुह मै है जिसे रखते हैं नाज़ुक आबगीनों में

सरापा हुस्न बन जाता है जिस के हुस्न का आशिक
भला ऐ दिल ! हसीं ऐसा भी है कोयी हसीनों में

फड़क उट्ठा कोयी तेरी अदा-ए-'माअरफ़ना' पर
तिरा रुतबा रहा बड़्ह चड़्ह के सब नाज़-आफ़रीनों में

नुमायां हो के दिखला दे कभी इनको जमाल अपना
बहुत मुद्दत से चरचे हैं तेरे बारीक-बीनों में

ख़मोश ऐ दिल ! भरी महफ़िल में चिल्लाना नहीं अच्छा
अदब पहला करीना है मुहब्बत के करीनों में

बुरा समझूं उन्हें, मुझ से तो ऐसा हो नहीं सकता
कि मैं खुद भी तो हूं 'इकबाल' अपने नुकताचीनों में

44. जुगनूं

परवाना इक पतंगा, जुगनूं भी इक पतंगा
वोह रौशनी का तालिब, ये रौशनी सरापा

हर चीज़ को जहां में कुदरत ने दिलबरी दी
परवाने को तपिश दी, जुगनूं को रौशनी दी

रंगीन नवा बनाया मुरग़ान-ए-बेज़ुबां को
गुल को ज़ुबान दे कर तालीम-ए-ख़ामोशी दी

नज़ारा-ए-शफ़क की ख़ूबी ज़वाल में थी
चमका के इस परी को थोड़्ही सी ज़िन्दगी दी

रंगीं कीया सहर को बांकी दुलहन की सूरत
पहना के लाल जोड़ा शबनम की आरसी दी

साया दीया शजर को परवाज़ दी हवा को
पानी को दी रवानी मौजों को बे-कली दी

हुस्न-ए-अज़ल की पैदा हर चीज़ में झलक है
इनसां में वोह सुख़न है, गुंचे में वोह चटक है

ये चांद आसमां का शायर है दिल है गोया
वां चांदनी है जो कुछ, जां दरद की कसक है

अन्दाज़-ए-गुफ़तगू ने धोखे दीये हैं वरना
नग़मा है बू-ए-बुलबुल, बू फूल की चहक है

कसरत में हो गया है वहदत का राज़ मख़फ़ी
जुगनूं में जो चमक है वोह फूल में महक है

ये इख़तलाफ़ फिर कयूं हंगामों का महल हो
हर शैय में जबकि पिनहां ख़ामोशी-ए-अज़ल हो

45. कभी ऐ हकीकत मुंतज़िर नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में

कभी ऐ हकीकत-ए-मुंतज़िर नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
के हज़ारों सिजदे तड़प रहे मेरी जबीं-ए-नियाज़ में

तरब आशनाय-ए-ख़रोश हो तो नवा है महरम-ए-गोश में
वो सरोद कया के छुपा हूआ हो सुकूत परदा-ए-साज़ में

तू बचा बचा के न रख उसे, तेरा आईना है वो आईना
के शिकसता हो तो अज़ीज़ तर है निगाह आईना साज़ में

दम तौफ़ किरमक शमा ने यह कहा कि वोह असर कुहन है
न तेरी हिकायत-ए-सोज़ में, न मेरी हदीस-ए-गुदाज़ में

न कहीं जहां में अमां मिली, जो अमां मिली तो कहां मिली
मेरे ज़ुरम-ए-ख़ाना ख़राब को तेरे अफ़ब-ओ-बन्दा नवाज़ में

न वो इशक में रहीं गरमीयां, न वो हुस्न में रहीं शोखियां
न वो ग़ज़नवी में तड़प रही न वो ख़म है ज़ुलफ़-ए-अयाज़ में

जो मैं सर ब-सिजदा हूआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तेरा दिल तो है सनम-आशना, तुझे कया मिलेगा नमाज़ में

46. कहूं कया आरज़ू-ए-बेदिली मुझ को कहां तक है

कहूं कया आरज़ू-ए-बेदिली मुझ को कहां तक है ?
मिरे बाज़ार की रौनक ही सौदा-ए-ज़यां तक है ?

वुह मै-कश हूं फ़ुरोग़े-मै से ख़ुद गुलज़ार बन जाऊं
हवाए-गुल फ़िराके-साकीए-ना-मेहरबां तक है

चमन-अफ़रोज़ है, सय्याद मेरी ख़ुश-नवायी तक
रही बिजली की बेताबी, सो मेरे आशयां तक है

वुह मुशते-ख़ाक हूं, फ़ैज़े-परेशानी से सहरा हूं
न पूछो मेरी वुसअत की, ज़मीं से आसमां तक है

जरस हूं नाला ख़वाबीदा है मेरे हर रगो-पै में
ये ख़ामोशी मिरी वकते-रहीले-कारवां तक है

सुकूने दिल से सामाने-कशूदे-कार पैदा कर
कि उकदा ख़ातिरे-गिरदाब का आबे-रवां तक है

चमनज़ारे-मुहब्बत में ख़मोशी मौत है बुलबुल !
यहां की ज़िन्दगी पाबन्दीए-रसमे-फ़ुग़ां तक है

जवानी है तो ज़ौके-दीद भी, लुतफ़े-तमन्ना भी
हमारे घर की आबादी कयामे-मेहमां तक है

ज़माने भर में रुसवा हूं, मगर ऐ वाय नादानी !
समझता हूं कि मेरा इशक मेरे राज़दां तक है

47. ख़िरद मन्दों से कया पूछूं के मेरी इबतदा कया है

ख़िरद मन्दों से कया पूछूं के मेरी इबतदा कया है
के मैं इस फ़िकर में रहता हूं, मेरी इंतहा कया है

ख़ुदी को कर बुलन्द इतना के हर तकदीर से पहले
ख़ुदा बन्दे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा कया है

मकाम-ए-गुफ़तगू कया है अगर मैं कीमियागर हूं
यही सोज़-ए-नफ़स है और मेरी कीमिया कया है

नज़र आएं मुझे तकदीर की गहराईआं इस में
ना पूछ ऐ हमनशीं मुझसे वो चशम-ए-सुरमा सा कया है

अगर होता वो मजज़ूब फ़िरंगी इस ज़माने में
तो 'इकबाल' उस को समझाता मकाम-ए-किबर्या कया है

नवाए सुबहगायी ने जिगर-खूं कर दीया मेरा
ख़ुदाया जिस ख़ता की यह सज़ा है वोह ख़ता कया है

48. ख़िरद से राहरू रौशन बसर हे

ख़िरद से राहरू रौशन बसर हे
ख़िरद कया है, चिराग़-ए-रहगुज़र है
दुरूं-ए-ख़ाना हंगामे हैं कया कया
चिराग़-रे-रहगुज़र को कया ख़बर है

49. ख़िरद वाकिफ़ नहीं है नेक-ओ-बद से

ख़िरद वाकिफ़ नहीं है नेक-ओ-बद से
बड़्ही जाती है ज़ालिम अपनी हद से
ख़ुदा जाने मुझे कया हो गया है
ख़िरद बेज़ार दिल से, दिल ख़िरद से

50. ख़ुदी हो इलम से मुहकम तो ग़ैरत-ए-जिबरील

ख़ुदी हो इलम से मुहकम तो ग़ैरत-ए-जिबरील
अगर हो इशक से मुहकम तो सूर-ए-इसराफ़ील

अज़ाब-ए-दानिश-ए-हाज़िर से बा-ख़बर हूं मैं
कि मैं इस आग में डाला गया हूं मिसल-ए-ख़लील

फ़रेब ख़ुरदाह-ए-मंज़िल है कारवां वरना
ज़्यादा राहत-ए-मंज़िल से है निशात-ए-रहील

नज़र नहीं तो मेरे हलका-ए-सुख़न में न बैठ
कि नुकताह-ए-ख़ुदी हैं मिसाल-ए-तेग़े-असील

मुझे वोह दरस-ए-फ़रंग आज याद आते हैं
कहां हुज़ूर की लज़्ज़त, कहां हिजाब-ए-दलील

अंधेरी शब है, जुदा अपने काफ़ले से है तू
तेरे लीये है मेरा शोला-ए-नवा, कन्दील

ग़रीब-ओ-सादा-ओ-रंगीन है दासतान-ए-हरम
नेहायत इस की हुसैन, इबतदा है इसमाईल

51. खुला जब चमन में कुतबख़ाना-ए-गुल

खुला जब चमन में कुतबख़ाना-ए-गुल
न काम आया मुल्ला को इलम-ए-किताबी

मतानत शिकन थी हवा-ए-बहारां
ग़ज़ल ख़वां हूआ पीराक-ए-अन्दराबी

कहा लाला-ए-आतिशीं पैरहन ने
कि असरार-ए-जां की हूं मैं बेहजाबी

समझता है मौत जो ख़वाब-ए-लहद को
नेहां उस की तामीर में है ख़राबी

नहीं ज़िन्दगी सिलसिला रोज़-ओ-शब का
नहीं ज़िन्दगी मसती-ओ-नीम ख़वाबी

हयात असत दर आतिश-ए-ख़ुद तपेयदां
ख़ुश आं दम कि आयेन नुकता रा बाज़याबी

अगर ज़ा आतिश-ए-दिल शराराए बगीरीरी
तवान करद ज़ेर-ए-फ़लक अफ़ाबी

52. कोशिश-ए-नातमाम

फुरकत-ए-आफ़ताब में खाती है पेच-ओ-ताब सुबह
चशमे शफ़क है ख़ूं-फ़िशां अख़तरे-शाम के लीए

रहती है कैश-ए-रूज़ को लैली-ए-शाम की हवस
अख़तर-ए-सुबह मुज़तरिब ताब दवाम के लीए

कहता था कुतबे-आसमां काफ़िला-ए-नजूम से
हमरहो मैं तरस गया लुतफ़े-ख़िराम के लीए

सोतों को नद्यों का शौक, बहर का नद्यों को इशक
मौजा-ए-बहर की तपिश माहे-तमाम के लीए

हुस्न अज़ल के परदा-ए-लाल-ओ-गुल में हैं नेहां
कहते हैं बे-करार हैं जलवा-ए-आम के लीए

राज़-ए-हयात पूछ ले ख़िज़रे-ख़ुजसता गाम से
ज़िन्दा हर एक चीज़ है कोशिश-ए-नातमाम से

53. कुशादा दसते-करम जब वुह बेनियाज़ करे

कुशादा दसते-करम जब वुह बेनियाज़ करे
नियाज़-मन्द न कयों आज़िज़ी पे नाज़ करे ?

बिठा के अरश पे रक्खा है तू ने ऐ वायज़ !
ख़ुदा वुह कया है जो बन्दों से इहतिराज़ करे ?

मिरी निगाह में वुह रिन्द ही नहीं साकी !
जो होशियारी-ओ-मसती में इमतियाज़ करे

मुदाम गोश-बा-दिल रह, ये साज़ है ऐसा
जो हो शिकसता तो पैदा नवाए-राज़ करे

कोयी ये पूछे कि वायज़ का कया बिगड़ता है
जो बेअमल पे भी रहमत वुह बे-नियाज़ करे ?

सुख़न में सोज़ इलाही कहां से आता है ?
ये वुह चीज़ है जो पत्थर को भी गुदाज़ करे

तमीज़े-लाला-ओ-गुल से है नाला-ए-बुलबुल
जहां में वा न कोयी चशमे-इमतियाज़ करे

ग़ुरूर ज़ुहद ने सिखला दीया है वायज़ को
कि बन्दगान-ए-ख़ुदा पर ज़ुबां-दराज़ करे

हवा हो ऐसी कि हिन्दोसतां से ऐ 'इकबाल'
उड़ा के मुझ को ग़ुबारे-रहे-हजाज़ करे

54. कया इशक एक ज़िन्दगी-ए-मसतार का

कया इशक एक ज़िन्दगी-ए-मसतार का
कया इशक पायेदार से ना-पायेदार का

वहो इशक जिस की शमा बुझा दे अजल की फूंक
उस में मज़ा नहीं तपिश-ओ-इंतेज़ार का

मेरी बिसात कया है, तब-ए-ताब यक नफ़स
शोले से बेमहल है उलझना शरार का

कर पहले मुझ को ज़िन्दगी-ए-जाविदां अता
फिर ज़ौक-ओ-शौक देख दिल-ए-बेकरार का

कांटा वोह दे कि जिस की खटक ला-ज़वाल हो
या रब ! वोह दरद जिस की कसक ला-ज़वाल हो

55. कया कहूं, ऐसे चमन से मैं जुदा कयोंकर हुआ

कया कहूं, ऐसे चमन से मैं जुदा कयोंकर हुआ ?
और असीरे-हलकए-दामे-हवा कयोंकर हुआ ?

जाय-हैरत है बुरा सारे ज़माने का हूं मैं
मुझ को ये खिलअत शराफ़त का अता कयोंकर हुआ ?

कुछ दिखाने देखने का था तकाज़ा तूर पर
कया ख़बर है तुझ को ऐ दिल ! फ़ैसला कयोंकर हुआ ?

है तलब बे-मुद्दआ होने की भी इक मुद्दआ
मुरग़-ए-दिल दामे-तमन्ना से रहा कयोंकर हुआ ?

देखने वाले यहां भी देख लेते हैं तुझे,
फिर ये वादा हशर का सबर-आज़मा ! कयोंकर हुआ ?

हुस्न-ए-कामिल ही न हो इस बे-हज़ाबी का सबब ?
वुह जो था परदों में पिनहां, ख़ुद-नुमा कयोंकर हुआ ?

मौत का नुसख़ा अभी बाकी है ऐ दरदे-फ़िराक !
चारागर दीवाना है, मैं लादवा कयोंकर हुआ ?

तूने देखा है कभी ऐ दीदए-इबरत ! कि गुल
हो के पैदा ख़ाक से रंगीं-कबा कयोंकर हुआ ?

पुरसिशे-अम्माल से मकसद था रुसवायी मिरी
वरना ज़ाहर था सभी कुछ, कया हुआ ? कयोंकर हुआ ?

मेरे मिटाने का तमाशा देखने की चीज़ थी
कया बताऊं, उन का मेरा सामना कयोंकर हुआ ?

56. लाऊं वो तिनके कहां से आशियाने के लीए

लाऊं वो तिनके कहां से आशियाने के लीए
बिजलीयां बेताब हैं जिन को जलाने के लीए

वाए नाकामी ! फ़लक ने ताक कर तोड़ा उसे
मैंने जिस डाली को ताड़ा आशियाने के लीए

आंख मिल जाती है हफ़तादु-दो-मिल्लत से तेरी
एक पैमाना तेरा सारे ज़माने के लीए

दिल में कोयी इस तरह की आरज़ू पैदा करूं
लौट जाए आसमां मेरे मिटाने के लीए

जमा कर ख़िरमन तो पहले दाना दाना चुनके तू
आ ही निकलेगी कोयी बिजली जलाने के लीए

पास था नाकामीए-सय्याद का ऐ हम-सफ़ीर !
वरना मैं, और उड़ के आता एक दाने के लीए ?

इस चमन में मुरग़े-दिल गाए न आज़ादी के गीत
आह ! ये गुलशन नहीं ऐसे तराने के लीए

57. मजनूं ने शहर छोड़ा तो सहरा भी छोड़ दे

मजनूं ने शहर छोड़ा तो सहरा भी छोड़ दे
नज़्ज़ारे की हवस हो तो लैला भी छोड़ दे

वायज़ ! कमाल-ए-तरक से मिलती है यां मुराद
दुनियां जो छोड़ दी है तो उकबा भी छोड़ दे ।

तकलीद की रविश से तो बेहतर है ख़ुद-कुशी
रसता भी ढूंड, ख़िज़र का सौदा भी छोड़ दे

मानिन्द-ए-ख़ामा तेरी ज़ुबां पर है हरफ़े-ग़ैर
बेगाना शै पे नाज़िशे-बेजा भी छोड़ दे

लुतफ़े-कलाम कया जो न हो दिल में दरदे-इशक ?
बिसमिल नहीं है तू, तो तड़पना भी छोड़ दे

शबनम की तरह फूलों पे रो, और चमन से चल
इस बाग़ में कयाम का सौदा भी छोड़ दे

है आशिकी में रसम अलग सब से बैठना
बुत-ख़ाना भी, हरम भी, किलीसा भी छोड़ दे

सौदागरी नहीं, ये अबादत ख़ुदा की है
ऐ बेख़बर ! जज़ा की तमन्ना भी छोड़ दे

अच्छा है दिल के साथ रहे पासबाने-अकल
लेकिन कभी कभी इसे तनहा भी छोड़ दे

जीना वुह कया जो हो नफ़से-ग़ैर पर मदार ?
शुहरत की ज़िन्दगी का भरोसा भी छोड़ दे

शोख़ी जो है सवाले-मुकर्रर में ऐ कलीम !
शरते-रज़ा ये है कि तकाज़ा भी छोड़ दे

वायज़ सबूत लाए जो मै के जवाज़ में
'इकबाल' की ये ज़िद है कि पीना भी छोड़ दे

58. मकतबों में कहीं रानायी-ए-अफ़कार भी है ?

मकतबों में कहीं रानायी-ए-अफ़कार भी है ?
ख़ानकाहों में कहीं लज़्ज़त-ए-असरार भी है ?

मंज़िल-ए-रहरवां दूर भी दुशवार भी है
कोयी इस काफ़ले में काफ़ला सलार भी है ?

बड़्ह के ख़ैबर से है येह मारका-ए-दीन-ओ-वतन
इस ज़माने में कोयी हैदर-ए-करार भी है ?

इलम की हद से परे, बन्दा-ए-मोमिन के लीये
लज़्ज़त-ए-शौक भी है, नेमत-ए-दीदार भी है ?

पीर-ए-मैख़ाना येह कहता है कि ऐवान-ए-फ़रंग
सुसत बुनियाद भी है, आईना दीवार भी है

59. मौज-ए-दरीया

मुजतरिब रखता है मेरा दिल-ए-बेताब मुझे
ऐन हसती है तड़प सूरते सीमाब मुझे
मौज है नाम मेरा, बहर है पायाब मुझे
हो न ज़ंजीर कभी हलका-ए-गरदाब मुझे
आब में मिसल-ए-हवा हुआ जाता है तौसन मेरा
ख़ार-ए-माही से न अटका कभी दामन मेरा

मैं उछलती हूं कभी जज़बा-ए-मै कामिल से
जोश में सर को पटकती हूं कभी साहल से
हूं वोह रहरौ कि मुहब्बत है मुझे मंज़िल से
कयूं तड़पती हूं ये पूछे कोयी मेरे दिल से
ज़हमत तंगी-ए-दरीया से गुरेज़ां हूं मैं
वुसअते-बह की फुरकत में परेशां हूं मैं

60. मौत है एक सख़त तर जिस का ग़ुलामी है नाम

मौत है एक सख़त तर जिस का ग़ुलामी है नाम
मकर-ओ-फ़न-ए-ख़ुवाजगी काश समझता ग़ुलाम !

शरा-ए-मलूकाना में जिद्दत-ए-अहकाम देख
सूर का ग़ोग़ा हिलाल, हशर की लज़्ज़त हराम !

देख ग़ुलामी से रूह तेरी है मुज़महल
सीना-ए-बे-सोज़ में ढूंड ख़ुदी का मकाम !

61. मुहब्बत

शहीद-ए-मुहब्बत ना काफ़िर ना ग़ाज़ी
मुहब्बत की रसमें ना रूमी ना राज़ी
वोह मुहब्बत नहीं कुछ और शै है
सिखाती है जो ग़ज़नवी को इयाज़ी
तुरकी भी शीरीं ताज़ी भी शीरीं
हरफ़-ए-मुहब्बत ना तुरकी ना ताज़ी

62. मुझे आह-ओ-फ़ुग़ां-ए-नीम शब का फिर पयाम आया

मुझे आह-ओ-फ़ुग़ां-ए-नीम शब का फिर पयाम आया
थम ऐ रहरो कि शायद कोयी मुशकिल मकाम आया

ज़रा तकदीर की गहराईयों में डूब जा तू भी
कि इस जंगाह से मैं बन के तेग़-ए-बे-नियाम आया

येह मिसरा लिख दीया किस शोख़ ने मेहराब-ए-मसजिद पर
येह नादां गिर गये सजदों में जब वकत-ए-कयाम आया

चल ऐ मेरी ग़रीबी का तमाशा देखने वाले
वोह महफ़िल उठ गयी जिस दम तो मुझ तक दौर-ए-जाम आया

दीया इकबाल ने हिन्दी मुसलमानों को सोज़ अपना
येह इक मरद-ए-तन आसां था, तन आसानों के काम आया

इसी इकबाल की मैं जुसतजू करता रहा बरसों
बड़ी मुद्दत के बाअद आख़िर वोह शाहीं ज़ेर-ए-दाम आया

63. मुल्ला और बहशत

मैं भी हाज़िर था वहां, ज़बत-ए-सुख़न कर न सका
हक से जब हज़रत-ए-मुल्ला को मिला हुकम-ए-बहशत

अरज़ की मैंने इलाही मेरी तकसीर मआफ़
ख़ुश न आयेंगे इसे हूर-ओ-शराब-ओ-लब-ए-किशत

नहीं फ़िरदौस मकाम-ए-जदल-ओ-कौल-ओ-अकल
बहस-ओ-तकरार इस अल्लाह के बन्दे की सरिशत

है बदआमेज़ी-ए-अकवाम-ए-मिलल काम इसका
और जन्नत में न मसजिद, न कलीसा, न कुनिशत

64. न आते हमें इस में तकरार कया थी

न आते, हमें इस में तकरार कया थी ?
मगर, वाअदा करते हुए आर कया थी ?

तुम्हारे पयामी ने सब राज़ खोला
ख़ता इस में बन्दे की सरकार ! कया थी ?

भरी बज़म में अपने आशिक को ताड़ा
तेरी आंख मसती में हुशयार कया थी ?

तअम्मुल तो था उन को आने में कासिद
मगर ये बता, तरज़-ए-गुफ़तार कया थी ?

खिंचे ख़ुद-ब-ख़ुद जानिब-ए-तूर मूसा
कशिश तेरी ऐ शौक-ए-दीदार ! कया थी ?

कहीं ज़िकर रहता है 'इकबाल' तेरा
फुसूं था कोई, तेरी गुफ़तार कया थी ?

65. न कर ज़िकर-ए-फ़िराक व आशनाई

न कर ज़िकर-ए-फ़िराक व आशनाई
कि असल ज़िन्दगी है ख़ुद नुमाई

न दरीया का ज़ियां है न गुहर का
दिल दरीया से गौहर की जुदाई

तमीज़ ख़ार व गुल से आशकारा
नसीम सुबह की रौशन ज़मीरी

हफ़ाज़त फूल की मुमकिन नहीं है
अगर कांटे में हो ख़ू-ए-हुरेरी

66. नानक

कौम ने पैग़ामे गौतम की ज़रा परवाह न की
कदर पहचानी न अपने गौहरे यक दाना की

आह ! बदकिसमत रहे आवाज़े हक से बेख़बर
ग़ाफ़िल अपने फल की शीरीनी से होता है शजर

आशकार उसने कीया जो ज़िन्दगी का राज़ था
हन्द को लेकिन ख़याली फ़लसफ़े पर नाज़ था

शमएं-हक से जो मुनव्वर हो ये वो महफ़िल न थी
बारिशे रहमत हूयी लेकिन ज़मीं काबिल न थी

आह ! शूदर के लीए हिन्दुसतान ग़म ख़ाना है
दरदे इनसानी से इस बसती का दिल बेगाना है

ब्रहमन शरशार है अब तक मये पिन्दार में
शमएं गौतम जल रही है महफ़िले अग़यार में

बुतकदा फिर बाद मुद्दत के रौशन हूआ
नूरे इबराहीम से आज़र का घर रौशन हूआ

फिर उठी आख़िर सदा तौहीद की पंजाब से
हन्द को इक मरदे कामिल ने जगाया ख़ाब से

67. न तू ज़मीं के लीए है न आसमां के लीए

न तू ज़मीं के लीए है न आसमां के लीए
जहां है तेरे लीए तू नहीं जहां के लीए

मकामे परवरिश-ए आह-ओ-नाला है ये चमन
ना सैरो गुल के लीए है न आशियां के लीए

निशने राह दिखाते थे जो सितारों को
तरस गये हैं किसी मरदे राहदां के लीए

निगह बुलन्द, सुखन दिलनवाज़ जां पुरसोज़
यही है रख़ते सफ़र मीरे कारवां के लीए

ज़रा सी बात थी अन्देशा-ए-अज़म ने उसे
बड़ा दिया है फ़कत ज़ेबे दासतां के लीए

68. नया शिवाला

सच कह दूं ऐ बरहमन गर तू बुरा न माने
तेरे सनम कदों के बुत हो गए पुराने

अपनों से बैर रखना तूने बुतों से सीखा
जंग ओ जदल सिखाया वाईज़ को भी ख़ुदा ने

तंग आ के मैंने अख़िर दैर ओ हरम को छोड़ा
वाईज़ का वाज़ छोड़ा छोड़े तेरे फ़साने

पत्थर की मूरतों में समझा है तू ख़ुदा है
ख़ाके वतन का मुझ को हर ज़र्रा देवता है

आ ग़ैरियत के परदे एक बार फिर उठा दें
बिछड़ों को फिर मिला दें नकशे दूयी मिटा दें

सूनी पड़ी हूयी है मुद्दत से दिल की बसती
आ एक नया शिवाला इस देश में बना दें

दुनियां के तीरथों से ऊंचा हो अपना तीरथ
दामने आसमां से इसका कलश मिला दें

हर सुबह उठ के गाएं मंतर वो मीठे-मीठे
सारे पुजारीयों को मय प्रीत की पिला दें

शकती भी शांती भी भकतों के गीत में है
धरती के बासीयों की मुकती प्रीत में है

69. नै मुहरह बाकी, नै मुहरह बाज़ी

नै मुहरह बाकी, नै मुहरह बाज़ी
जीता है रूमी हारा है राज़ी

रौशन है जाम-ए-जमशेद अब तक
शाही नहीं है बे शीशा बाज़ी

दिल है मुसलमां मेरा न तेरा
तू भी नमाज़ी मैं भी नमाज़ी

मैं जानता हूं अंजाम उसका
जिस मारके में मुल्ला हो ग़ाज़ी

तुरकी भी शीरीं ताज़ी भी शीरीं
हरफ़-ए-मुहब्बत तुरकी न ताज़ी

आज़र का पेशा खारा तराशी
कार-ए-ख़लीलां खारा गुदाज़ी

तू ज़िन्दगी है पायन्दगी है
बाकी है जो कुछ सब ख़ाक बाज़ी

70. निगाह-ए-फ़कर में शान-ए-सिकन्दरी कया है

निगाह-ए-फ़कर में शान-ए-सिकन्दरी कया है
ख़िराज़ की जो गदा हो वोह कैसरी कया है

बुतों से तुझ को उमीदें ख़ुदा से नाउमीदी
मुझे बता तो सही और काफ़िरी कया है

फ़लक ने उनको अता की है ख़वाजगी कि जिनहें
ख़बर नहीं रविश-ए-बन्दा परवरी कया है

फ़कत निगाह से होता है फ़ैसला दिल का
न हो निगाह में शोख़ी तो दिलबरी कया है

इसी ख़ता से इताब-ए-मलूक है मुझ पर
कि जानता हूं माल-ए-सिकन्दरी कया है

किसे नहीं है तमन्ना-ए-सरवरी, लेकिन
ख़ुदी की मौत हो जिस में वोह सरवरी कया है

ख़ुश आ गई है जहां को कलन्दरी मेरी
वगरना शेयर मेरा कया है शाअरी कया है

71. निशां यही है ज़माने में ज़िन्दा कौमों का

निशां यही है ज़माने में ज़िन्दा कौमों का
कि सुबहो शाम बदलती हैं उनकी तकदीरें

कमाले सिदको मुरव्वत है ज़िन्दगी उनकी
मआफ़ करती है फ़ितरत भी उनकी तकसीरें

कलन्दराना अदाएं सिकन्दराना जलाल
यह उमतें हैं जहां में बरहना शमशीरें

ख़ुदी है मरदे ख़ुद आगाह का जमालो जलाल
कि यह किताब है, बाकी तमाम तफ़सीरें

शुकोहो ईद का मुनकिर नहीं हूं मैं लेकिन
कुबूले हक हैं फ़कत मरदे हुर की तकबीरें

हकीम मेरी नवायों का राज़ कया जाने
वराए अकल है अहलेजुनूं की तदबीरें

72. ऐ वादी-ए-लोलाब

पानी तेरे चशमों का तड़पता हूआ सीमाब
मुरग़ान-ए-सहर तेरी फ़िज़ायों में हैं बेताब
ऐ वादी-ए-लोलाब

गर साहब-ए-हंगामा न हों मनबर-ओ-महराब
दीन बन्दा-ए-मोमिन के लीये मौत है या ख़वाब
ऐ वादी-ए-लोलाब

हैं साज़ पे मौकूफ़ नावा हाअए जियां सोज़
ढीली हों अगर तार तो बेकार है मिज़राब
ऐ वादी-ए-लोलाब

मुल्ला की नज़र नूर-ए-फ़िरसत से है खाली
बेसोज़ है मैख़ाना-ए-सूफ़ी की मै-ए-नाब
ऐ वादी-ए-लोलाब

बेदार हों दिल जिस की फ़ुग़ां-ए-सहरी से
इस कौम में मुद्दत से वोह दरवेश है नायाब
ऐ वादी-ए-लोलाब

73. फिर बाद-ए-बहार आई, इकबाल ग़ज़ल ख़वां हो

फिर बाद-ए-बहार आई, इकबाल ग़ज़ल ख़वां हो
गुंचा है अगर गुल हो, गुल हो तो गुलसितां हो

तू ख़ाक की मुट्ठी है, अज़ां की हरारत से
बरहम हो, परेशां हो, वुसअत में बयाबां हो

तू जिनस-ए-मुहब्बत है, कीमत है गिरां तेरी
कम माया है सौदागर, इस देश में अरज़ां हो

कयूं साज़ के परदे में मसतूर हो लै तेरी
तू नग़मा-ए-रंगीं है, हर गोश पर उरियां हो

ऐ-रहरवे फ़रज़ाना, रसते में अगर तेरे
गुलशन है तो शबनम हो, सहरा है तो तूफ़ां हो

सामां की मुहब्बत में मुज़मिर है तन-ए-आसानी
मकसद है अगर मंज़िल ग़ारत गर सामां हो

74. फिर चिराग़-ए-लाला से रौशन हूए कोह-ओ-दमन

फिर चिराग़-ए-लाला से रौशन हूए कोह-ओ-दमन
मुझ को फिर नग़मों पे उकसाने लगा मुरग़-ए-चमन

फूल हैं सहरा में या परीयां कितार अन्दर कितार
उदे उदे, नीले नीले, पीले पीले पैरहन

बरग़-ए-गुल पर रख गयी शबनम का मोती बाद-ए-सुबह
और चमकाती है इस मोती को सूरज की किरन

हुस्न-ए-बेपरवा को अपनी बे-नकाबी के लीये
हों अगर शहरों से बन पयारे तो शहर अच्छे कि बन

अपने मन में डूब कर पा जा सुराग़-ए-ज़िन्दगी
तू अगर मेरा नहीं बनता न बन, अपना तो बन

मन की दुनिया ! मन की दुनिया सोज़-ओ-मसती जज़ब-ओ-शौक
तन की दुनिया ! तन की दुनिया सूद-ओ-सौदा मकर-ओ-फ़न

मन की दौलत हाथ आती है तो फिर जाती नहीं
तन की दौलत छायों है आता है धन जाता है धन

मन की दुनिया में न पाया मैनें अफ़रंग़ी का राज
मन की दुनिया में न देखे मैंने शेख़-ओ-बरहमन

पानी पानी कर गयी मुझ को कलन्दर की येह बात
तू झुका जब ग़ैर के आगे न तन तेरा न मन

75. पूछ उस से कि मकबूल है फ़ितरत की गवाही

पूछ उस से कि मकबूल है फ़ितरत की गवाही
तू साहब-ए-मंज़िल है कि भटका हूआ राही

काफ़िर है मुसलमां तो न शाही न फ़कीरी
मोमिन है तो करता है फ़कीरी में भी शाही

काफ़िर है तो शमशीर पे करता है भरोसा
मोमिन है तो बे-तेग़ भी लड़ता है सिपाही

काफ़िर है तो है ताबा-ए-तकदीर मुसलमां
मोमिन है तो वोह आप है तकदीर-ए-इलाही

मैंने तो कीया परदा-ए-असरार को भी चाक
दैरीना है तेरा मरज़-ए-कौर निगाही

76. परीशां हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाये

परीशां हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाये
जो मुशकिल अब है या रब फिर वही मुशकिल न बन जाये

न कर दें मुझ को मजबूर-ए-नवा फ़िरदौस में हूरें
मेरा सोज़-ए-दरूं फिर गरमी-ए-महफ़िल न बन जाये

कभी छोड़ी हुयी मंज़िल भी याद आती है राही को
खटक सी है, जो सीने में, ग़म-ए-मंज़िल न बन जाये

बनाया इशक ने दरीया'ए न पायदा करां मुझ को
ये मेरी ख़ुद निगहदारी मेरा साहल न बन जाये

कहीं इस आलम-ए-बे-रंग-ओ-बू में भी तलब मेरी
वही अफ़साना'ए दम्बाला'ए महमिल न बन जाये

उरूज-ए-आदम-ए-ख़ाकी से अंजुम सहमे जाते हैं
कि ये टूटा हुआ तारा माह-ए-कामिल न बन जाये

77. कौमों के लीये मौत है मरकज़ से जुदाई

कौमों के लीये मौत है मरकज़ से जुदाई
हो साहब-ए-मरकज़ तो ख़ुदी कया है ख़ुदाई

जो फ़कर हूआ तलख़ी-ए-दैरां का गिलामन्द
उस फ़कर में बाकी है अभी बू-ए-गदाई

उस दौर में भी मरद-ए-ख़ुदा को है मयस्सर
जो मोजज़ा परबत को बना सकता है राई

ख़ुरशीद ! सर-ए-परदा-ए-मशरिक से निकल कर
पहना मेरे कोहसार को मलबूस-ए-हनाई

78. राम

लबरेज़ है शराबे हकीकत से जाम-ए-हन्द
सब फ़लसफ़ी हैं ख़िता-ए-मग़रिब के राम-ए-हन्द

यह हिन्दीयों के फ़िकरे-फ़लक रस का है असर
रिफ़अत में आसमां से भी ऊंचा है बाम-ए-हन्द

इस देश में हूए हैं हज़ारों मलक सरिशत
मशहूर जिनके दम से है दुनियां में नाम-ए-हन्द

है राम के वज़ूद पे हिन्दुसतां को नाज़
अहले नज़र समझते हैं उसको इमाम-ए-हन्द

एजाज़ इस चिराग़े-हदायत का यही है
रोशन तर अज सहर है ज़माने में शाम-ए-हन्द

तलवार का धनी था, शुजाअत में फ़रद था
पाकीज़गी में, जोश-ए-मुहब्बत में फ़रद था

79. रिन्दों को भी मालूम हैं सूफ़ी के कमालात

रिन्दों को भी मालूम हैं सूफ़ी के कमालात
हर चन्द कि मशहूर नहीं इन के करामात

ख़ुद-गीरी-ओ-ख़ुदारी-यो-गुलबांग-ए-'अनल-उल-हक'
आज़ाद हो सालिक तो हैं येह उस के मकामात

महकूम हो सालिक तो यही उसका 'हमा ओसत'
ख़ुद मुरदा वा ख़ुद मरकद-ओ-ख़ुद मरग-ए-मफ़ाज़ात

80. सख़तीयां करता हूं दिल पर ग़ैर से ग़ाफ़िल हूं मैं

सख़तीयां करता हूं दिल पर, ग़ैर से ग़ाफ़िल हूं मैं
हाए ! कया अच्छी कही, ज़ालिम हूं मैं, जाहल हूं मैं

मैं जभी तक था कि तेरी जलवापैरायी न थी
जो नमूदे-हक से मिट जाता है वुह बातिल हूं मैं

इलम के दरीया से निकले ग़ोताज़न गौहर-ब-दसत
वाय महरूमी ! ख़ज़फ़-चीने-लबे-साहल हूं मैं

है मेरी ज़िल्लत ही कुछ मेरी शराफ़त की दलील
जिस की ग़फ़लत को मलक रोते हैं, वुह ग़ाफ़िल हूं मैं

बज़मे-हसती अपनी आरायश पे तू नाज़ां न हो
तू तो इक तसवीर है महफ़िल की और महफ़िल हूं मैं

ढूंढता फिरता हूं ऐ 'इकबाल' ! अपने आप को
आप ही गोया मुसाफ़िर, आप ही मंज़िल हूं मैं

81. समझा लहू की बून्द अगर तू इसे तो ख़ैर

समझा लहू की बून्द अगर तू इसे तो ख़ैर
दिल आदमी का है फ़कत एक जज़बाए बुलन्द

गरदिश माह-ओ-सितारा की है नागवार इसे
दिल आप अपने शाम-ओ-सहर का है नकश बन्द

जिस ख़ाक के ज़मीर में है आतिश-ए-चिनार
मुमकिन नहीं कि सरद हो वोह ख़ाक-ए-अरजूमन्द

82. साकी

नशा पिला के गिराना तो सबको आता है
मज़ा तो जब है कि गिरतों को थाम ले साकी

जो बादाकश थे पुराने वो उठते जाते हैं
कहीं से आबे-बकाए-दवाम ले साकी

कटी है रात तो हंगामा गुसतरी में तेरी
सहर करीब है अल्ल्हा का नाम ले साकी

83. तराना-ए-हन्दी

सारे जहां से अच्छा हिन्दुसतां हमारा
हम बुलबुलें हैं इसकी, येह गुलिसतां हमारा

गुरबत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में
समझो वहीं हमें भी दिल हो जहां हमारा

परबत वो सब से ऊंचा, हमसाया आसमां का
वोह संतरी हमारा, वोह पासबां हमारा

गोदी में खेलती हैं इस की हज़ारों नदीयां
गुलशन है जिस के दम से रशके जिनां हमारा

ऐ आब रूद-ए-गंगा ! वोह दिन है याद तुझको
उतरा तेरे किनारे जब कारवां हमारा

मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हन्दी हैं हम वतन है हिन्दुसतां हमारा

यूनान-ओ-मिसर वह रोमा सब मिट गए जहां से
अब तक मगर है बाकी नाम-ओ-निशां हमारा

कुछ बात है कि हसती मिटती नहीं जहां से
सद्यों रहा है दुशमन दौर-ए-जहां हमारा

इकबाल कोयी महरम अपना नहीं जहां में
मालूम कया किसी को दरद-ए-नेहां हमारा

84. शायर

कौम गोया जिसम है अफ़राद हैं आज़ा-ए-कौम
मंज़िल-ए-सनअत के रह पैमां हैं दसत-ओ-पा-ए-कौम

महफ़िले-नज़मे-हुकूमत, चेहरा-ए-ज़ेबा-ए-कौम
शायरे-रंगीं नवा है दीदा-ए-बीना-ए-कौम

मुबतिला-ए-दरद कोयी उज़ज हो, रोती है आंख
किस कदर हमदरद सारे जिसम की होती है आंख

85. शम्हा-ओ-परवाना

परवाना तुझसे करता है ऐ शम्हा प्यार कयूं
ये जान-ए-बेकरार है तुझ पर निसार कयों

सीमाब वार रखती है तेरी अदा इसे
आदाब-ए-इशक तूने सिखाए हैं कया इसे

करता है ये तवाफ़ तेरी ज़लवागाह का
फूंका हुआ है कया तेरी बरके-निगाह का

आज़ार-ए-मौत में इसे आरामे-जां है कया
शोअले में तेरे ज़िन्दगी-ए-जाविदां है कया

ग़मख़ाना-ए-जहां में जो तेरी ज़िया न हो
इस तफ़ता दिल का नखले-तमन्ना हरा न हो

गिरना तेरे हज़ूर में इसकी नमाज़ है
नन्न्हे से दिल में लज़्ज़ते-सोज़-ओ-गुदाज़ है

कुछ इसमें जोश आशिक-ए-हुस्ने-कदीम है
छोटा सा तूर तू, ये ज़रा सा कलीम है

परवाना और ज़ौके तमाशा-ए-रौशनी
कीड़ा ज़रा सा और तमन्ना-ए-रौशनी

86. शिकवा

कयूं ज़ियां कार बनूं सूद फ़रामोश रहूं ?
फ़िकर-ए-फ़रदा न करूं महव-ए-ग़म दोश रहूं
नाले बुलबुल के सुनूं और हमातन गोश रहूं
हमनवा ! मैं भी कोयी गुल हूं कि ख़ामोश रहूं
जुरअत आमूज़ मेरी ताब-ए-सुख़न, है मुझ को
शिकवा अल्लाह से ख़ाकुम-ब-दहन है मुझ को

है बजा शेवा-ए-तसलीम में मशहूर हैं हम
किस्सा-ए-दरद सुनाते हैं कि मज़बूर हैं हम
साज़ ख़ामोश हैं, फ़रयाद से मामूर हैं हम
नाला आता है अगर लब पे तो माज़ूर हैं हम
ऐ ख़ुदा शिकवा-ए-अरबाब-ओ-वफ़ा भी सुन ले
ख़ुगर-ए-हमद से थोड़्हा सा गिला भी सुन ले

थी तो मौजूद अज़ल से ही तेरी ज़ात कदीम
फूल था ज़ेब-ए-चमन, पर न परेशां थी शमीम
शरत इनसाफ़ है ऐ साहब-ए-अलताफ़-ए-अमीम
बू-ए-गुल फैलती इस तरह जो होती न नसीम
हम को जमियत-ए-ख़ातिर यह परेशानी थी
वरना उम्मत तेरे महबूब की दीवानी थी

हम से पहले था अजब तेरे जहां का मंज़र
कहीं मसजूद थे पत्थर, कहीं माबूद शजर
ख़ूगर-ए-पैकर-ए महसूस थी इनसां की नज़र
मानता फिर कोयी अन-देखे ख़ुदा को कयूं कर
तुझ को मालूम है लेता था कोयी नाम तेरा ?
कुव्वत-ए-बाज़ू-ए-मुसलिम ने कीया काम तेरा

87. सितारा-ए-सहर

लुतफ़ हमसायेगी शमस-ओ-कमर को छोड़ूं
और इस ख़िदमते पैग़ाम-ए-सहर को छोड़ूं

मेरे हक में तो नहीं तारों की बसती अच्छी
इस बुलन्दी से ज़मीं वालों की पसती अच्छी

आसमां कया, अदम आबाद वतन है मेरा
सुबह का दामन सद-ए-चाक कफ़न है मेरा

मेरी किसमत में हर रोज़ का मरना जीना
साकी मौत के हाथों से सबूही पीना

न ये ख़िदमत, न ये इज़्ज़त न ये रिफ़अत अच्छी
इस घड़ी भर के चमकने से तो ये ज़ुलमत अच्छी

मेरी कुदरत में जो होता न अख़तर बनता
कशतर-ए-दरीया में चमकता हुआ गौहर बनता

वां भी मौजों की कशाकश से जो दिल घबराता
छोड़ कर बहर कहीं ज़ेब गुलू हो जाता

ऐसी चीज़ों का मगर दहर में है काम शिकसत
है गुहर हाए गहरा नुमाया का अंज़ाम शिकसत

है ये अंज़ाम अगर ज़ीनत-ए-आलम हो कर
कयूं न गिर जाऊं किसी फूल पे शबनम हो कर

88. सितारों से आगे

सितारों से आगे जहां और भी हैं
अभी इशक के इमतहां और भी हैं

तही ज़िन्दगी से नहीं यह फ़िज़ाएं
यहां सैंकड़ों कारवां और भी हैं

किनायत न कर आलमे रंग-ओ-बू पर
चमन और भी आशियां और भी हैं

अगर खो गया इक नशेमन तो कया ग़म
मकामात आह-ओ-फुग़ां और भी हैं

तू शाहीं है परवाज़ है काम तेरा
तेरे सामने आसमां और भी हैं

इसी रोज़-ओ-शब में उलझ के ना रह जा
कि तेरे ज़मां-ओ-मकां और भी हैं

गए दिन के तनहा था मैं अंजुमन में
यहां अब मेरे राज़दां और भी हैं

89. तमाम आरिफ़-ओ-आमी ख़ुदी से बेगाना

तमाम आरिफ़-ओ-आमी ख़ुदी से बेगाना
कोयी बताये येह मसजिद है या कि मैख़ाना

येह राज़ हम से छुपाया है मीर वायज़ ने
कि ख़ुद हरम है चिराग़-ए-हरम का परवाना

तिलिसम-ए-बेख़बरी, काफ़िरी-ओ-दींदारी
हदीस-ए-शेख़-ओ-बरहमन फ़ुसूं-ओ-अफ़साना

नसीब-ए-खित्ता हौ या रब वोह बन्दा-ए-दरवेश
कि जिस के फ़िकर में अन्दाज़ हों कलीमाना

छुपे रहेंगे ज़माने की आंख से कब तक
गुहर हैं आब-ए-वूलर के तमाम यकदाना

90. तनहाई

तनहाई-ए-शब में हज़ीं कया ?
अंजुम नहीं तेरे हमनशीं कया ?

ये रिफ़अत-ए-आसमाने ख़ामोश
ख़ुआबीदा ज़मीं जहान-ए-ख़ामोश

ये चांद, ये दशत-ओ-दर, ये कोहसार
फ़ितरत है तमाम नशतरान-ए-ज़ार

मोती ख़ुश रंग पयारे पयारे
यानी तेरे आंसूयों के तारे

किस शै की तुझे हवस है ऐ दिल !
कुदरत तेरी हम नफ़स है ऐ दिल !

91. तसवीर-ए-दरद

नहीं मिन्नतकश-ए-ताब-ए-शनीदां दासतां मेरी
ख़ामोशी गुफ़तगू है, बे-ज़ुबानी है ज़ुबां मेरी

येह दसतूर-ए-ज़ुबां बन्दी है कैसा तेरी महफ़िल में
यहां तो बात करने को तरसती है ज़ुबां मेरी

उठाये कुछ वरक लाले ने, कुछ नरगिस ने, कुछ गुल ने
चमन में हर तरफ़ बिखरी हुयी है दासतां मेरी

उड़ा ली कुमर्यों ने, तूत्यों ने, अन्दलीबों ने
चमन वालों ने मिल कर लूट ली तरज़-ए-फ़ग़ां मेरी

टपक ऐ शमा आंसू बन कि परवाने की आंखों से
सरापा दरूं हूं, हसरत भरी है दासतां मेरी

इलाही ! फिर मज़ा कया है यहां दुनिया में रहने का
हयात-ए-जाविदां मेरी ना मरग-ए-नागहां मेरी !

मेरा रोना नहीं रोना है येह सारे गुलसितां का
वोह गुल हूं मैं, ख़िज़ां हर गुल की है गोया ख़िज़ां मेरी

"दरीं हसरत सरा उमारिसत अफ़सूं-ए-जरस दरम
ज़ा-फ़ैज़-ए-दिल तपीदां हा खरोश-ए-बे-नफ़स दरम"

मेरी बिगड़ती हुयी तकदीर को रोती है गोयाई
मैं हरफ़-ए-ज़ेर-ए-लब शरमिन्दा'ए गोश-ए-समाअत हूं

परेशां हूं मैं मुशत-ए-ख़ाक, लेकिन कुछ नहीं खुलता
सिकन्दर हूं कि आईना हूं या गरद-ए-कदूरत हूं

येह सब कुछ है मगर हसती मेरी मकसद है कुदरत का
सरापा नूर हो जिसकी हकीकत, मैं वोह ज़ुलमत हूं

ख़ज़ीना हूं छुपाया मुझ को मुशत-ए-ख़ाक-ए-सहरा ने
किसी को कया ख़बर है मैं कहां हूं किस की दौलत हूं

नज़र मेरी नहीं ममनून-ए-सैर-ए-अरसा-ए हसती
मैं वोह छोटी सी दुनिया हूं कि आप अपनी वलायात हूं

ना सहबा हूं ना साकी हूं ना मसती हूं ना पैमाना
मैं इस मैख़ाना-ए-हसती में हर शै की हकीकत हूं

मुझे राज़-ए-दो आलम दिल का आईना दिखाता है
वोही कहता हूं जो कुछ सामने आंखों के आता है

अता ऐसा बयां मुझ को हूआ रंगीं बियाबानों में
कि बाम-ए-अरश के तायर हैं मेरे हमज़ुबानों में

असर येह भी है एक मेरे जुनून-ए-फ़ितना समन का
मेरा आईना-ए-दिल है कज़ा के राज़दानों में

रुलाता है तेरा नज़ारा ऐ हिन्दुसतान मुझ को
कि इबरत ख़ेज़ है तेरा फ़साना सब फ़सानों में

दीया रोना मुझे ऐसा कि सब कुछ दे दीया गोया
लिखा कलक-ए-अज़ल ने मुझ को तेरे नौहाख़वानों में

निशान-ए-बरग-ए-गुल तक भी ना छोड़ इस बाग़ में गुलचीं
तेरी किसमत से रज़म अरायां हैं बाग़बानों में

छुपा कर आसतीं में बिजलियां रखी हैं गरदूं ने
अनादिल बाग़ के ग़ाफ़िल न बैठें आशीयानों में

सुन ऐ ग़ाफ़िल सदा मेरी, येह ऐसी चीज़ है जिस को
वज़ीफ़ा जान कर पड़्हते है तायर बोसतानों में

वतन की फ़िकर कर नादां मुसीबत आने वाली है
तेरी बरबाद्यों के मशवरे हैं आसमानों में

ज़रा देख उस को जो कुछ हो रहा है, होने वाला है
धरा कया है भला अहद-ए-कुहन की दासतानों में

येह ख़ामोशी कहां तक ? लज़्ज़त-ए-फ़रियाद पैदा कर
ज़मीं पर तू हो और तेरी ददा हो आसमानों में

न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दुसतां वालो
तुमहारी दासतां तक भी न होगी दासतानों में

यही आईन-ए-कुदरत है, यही उसलूब-ए-फ़ितरत है
जो है राह-ए-अमल में गामज़न, महबूब-ए-फ़ितरत है

है वायदा आज अपने ज़ख़म-ए-पिनहां कर के छोड़ूंगा
लहू रो रो के महफ़िल को गुलसितां कर के छोड़ूंगा

जलाना है मुझे हर शमा-ए-दिल को सोज़-ए-पिनहां से
तेरी तरीक रातों में चराग़ां कर के छोड़ूंगा

मगर गुंचों की सूरत हों दिल-ए-दरद आशना पैदा
चमन में मुशत-ए-ख़ाक अपनी परेशां कर के छोड़ूंगा

परोना एक ही तसबीह में इन बिखरे दानों को
जो मुशकिल है, तो इस मुशकिल को आसां कर के छोड़ूंगा

मुझे ऐ हमनशीं रहने दे शुग़ल-ए-सीना कावी में
कि मैं दाग़-ए-मुहब्बत को नुमायां कर के छोड़ूंगा

दिखा दूंगा जहां को जो मेरी आंखों ने देखा है
तुझे भी सूरत-ए-आईना हैरां कर के छोड़ूंगा

जो है परदों में पिनहां, चशम-ए-बीना देख लेती है
ज़माने की तबीयत का तकाज़ा देख लेती है

कीया रिफ़अत की लज़्ज़त से न दिल को आशना तूने
गुज़ारी उमर पसती में मिसाल-ए-नकश-ए-पा तूने

रहा दिल बसता-ए-महफ़िल, मगर अपनी निगाहों को
कीया बैरून-ए-महफ़िल से न हैरत आशना तूने

फ़िदा करता रहा दिल को हसीनों की अदायों पर
मगर देखी न इस आईने में अपनी अदा तूने

ताअसुब छोड़ नादां ! दहर के आईना ख़ाने में
तसवीरें हैं तेरी जिन को समझा है बुरा तूने

सरापा नाला-ए-बेदाद-ए-सोज़-ए-ज़िन्दगी हो जा
सपन्द आसा गिरह में बांध रखी है सदा तूने

सफ़ा-ए-दिल को कीया अरायश-ए-रंग-ए-तालुक से
कफ़-ए-आईना पर बांधी है ओ नादां ! हिना तूने

ज़मीं कया आसमां भी तेरी कज बीनी पे रोता है
ग़ज़ब है सतर-ए-कुरान को चालीपा कर दीया तूने !

ज़ुबां से गर कीया तौहीद का दावा तो कया हासिल !
बनाया है बुत्त-ए-पिन्दार को अपना ख़ुदा तूने

कुनवैन में तूने युसफ़ को जो देखा भी तो कया देखा
अरे ग़ाफ़िल ! जो मुतलिक था मुकय्यद कर दीया तूने

हवस बाला-ए-मनबर है तुझे रंगीं बयानी की
नसीहत भी तेरी सूरत है एक अफ़साना ख़वानी का

दिखा वोह हुस्न-ए-आलम सोज़ अपनी चशम-ए-पुरनम को
जो तड़पाता है परवाने को रुलाता है शबनम को

निरा नज़ारा ही ऐ बू-अल-होस मकसद नहीं इस का
बनाया है किसी ने कुछ समझ कर चशम-ए-आदम को

अगर देखा भी उस ने सरे आलम को तो कया देखा
नज़र आयी न कुछ अपनी हकीकत जाम से जम को

शज़र है फ़िरका आरायी ताअसुफ है समर इसका
ये वोह फल है कि जन्नत से निकलवाता है आदम को

न उठा जज़बा-ए-ख़ुरशीद से एक बरग-ए-गुल तक भी
ये रिफ़अत की तमन्ना है कि ले उड़ती है शबनम को

फिरा करते नहीं मजरूह-ए-उलफ़त फ़िकर-ए-दरमां में
ये ज़ख़मी आप कर लेते हैं पैदा अपने मरहम को

मुहब्बत के शहर से दिल सरापा नूर होता है
ज़रा से बीज़ से पैदा रियाज़-ए-तूर होता है

दवा हर दुख की है मजरूह-ए-तेग़-ए आरज़ू रहना
इलाज-ए-ज़ख़म आज़ाद-ए-अहसां-ए-रफ़ू रहना

शराब-ए-बेख़ुदी से ता फ़लक परवाज़ है मेरी
शिकसत-ए-रंग से सीखा है मैंने बन के बू रहना

थामे कया दीदा'ए गिरीयां वतन की नौहा ख़वानी में
इबादत चशम-ए-शायर की है हर दम बा-वज़ू रहना

बनायें कया समझ कर शाख़-ए-गुल पर आशीयां अपना
चमन में आह ! कया रहना जो हो बेआबरू रहना

जो तू समझे तो आज़ादी है पोशीदा मुहब्बत में
ग़ुलामी है असीर-ए-इमतियाज़-ए-मा-ओ-तू रहना

ये असतागना है, पानी में निगूं रखता है साग़र को
तुझे भी चाहीये मिसल-ए-हबाब-ए-आबजू रहना

न रह अपनों से बेपरवाह इसी में ख़ैर है तेरी
अगर मंज़ूर है दुनिया में आओ बेगाना-खोर ! रहना

शराब-ए-रूह परवर है मुहब्बत नू-ए-इनसां की
सिखाया इस ने मुझ को मसत बेजाम-ओ-सबू रहना

मुहब्बत ही से पायी है शफ़ा बीमार कौमों ने
कीया है अपने बख़त-ए-ख़ुफ़ता को बेदार कौमों ने

बयाबां-ए-मुहब्बत दशत-ए-ग़ुरबत भी, वतन भी है
ये वीराना कफ़स भी, आशीयाना भी, चमन भी है

मुहब्बत ही वोह मंज़िल है कि मंज़िल भी है सहरा भी
जरस भी, कारवां भी, रहबर भी, रहज़न भी है

मरज़ कहते हैं सब इस को, ये है लेकिन मरज़ ऐसा
छुपा जिस में इलाज-ए-गरदिश-ए-चरख़-ए-कुहन भी है

जलाना दिल का है गोया सरापा नूर हो जाना
ये परवाना जो सोज़ां हो तो शमा-ए-अंजुमन भी है

वही एक हुस्न है, लेकिन नज़र आता है हर शैय में
ये शीरीं भी है गोया, बेसतूं भी, कोहकन भी है

उजाड़ा है तमीज़-ए-मिल्लत-ओ-आईन ने कौमों को
मेरे अहल-ए-वतन के दिल में कुछ फ़िकर-ए-वतन भी है ?

सकूत आमोज़ तूल-ए-दासतां-ए-दरद है वरना
ज़ुबां भी है हमारे मूंह में और ताब-ए-सुख़न भी है

"नामीगर दीद को थे रिशता'ए माअनी रहा करदम
हकायत-ए-बूद बे पायां, बाख़ामोशी अदा करदम"

92. तेरे इशक की इंतहा चाहता हूं

तेरे इशक की इंतहा चाहता हूं
मेरी सादगी देख, कया चाहता हूं ?

सितम हो के हो वादा-ए-बेहजाबी
कोयी बात सबर-आज़मा चाहता हूं

येह जन्नत मुबारिक रहे ज़ाहदों को
कि मैं आपका सामना चाहता हूं

ज़रा-सा तो दिल हूं, मगर शोख़ इतना
वही 'लनतरानी' सुना चाहता हूं

कोयी दम का मेहमां हूं ऐ अहले-महफ़िल !
चराग़े-सहर हूं, बुझा चाहता हूं

भरी बज़म में राज़ की बात कह दी
बड़ा बेअदब हूं, सज़ा चाहता हूं

93. तेरे शीशे में मय बाकी नहीं है

तेरे शीशे में मय बाकी नहीं है
बता, कया तू मेरा साकी नहीं है
समन्दर से मिले पयासे को शबनम
बखीली है रज़्ज़ाकी नहीं है

94. तेरी दुआ से कज़ा तो बदल नहीं सकती

तेरी दुआ से कज़ा तो बदल नहीं सकती
मगर है इस से ये मुमकिन के तू बदल जाए

तेरी ख़ुदी में अगर इनकलाब हो पैदा
अजब नहीं के ये चार सू बदल जाए

वही शराब, वही हाए वह हो रहे बाकी
तरीके साकी-ओ-रसमे कदू बदल जाए

तेरी दुआ है कि हो तेरी आरज़ू पूरी
मेरी दुआ है तेरी आरज़ू बदल जाए

95. तेरी दुनिया जहान-ए-मुरग-ओ-माही

तेरी दुनिया जहान-ए-मुरग-ओ-माही
मेरी दुनिया फ़ुग़ां-ए-सुबहगाही
तेरी दुनिया में मैं महकूम-ओ-मजबूर
मेरी दुनिया में तेरी पादशाही

96. तू अभी रहगुज़र में है कैद-ए-मकाम से गुज़र

तू अभी रहगुज़र में है कैद-ए-मकाम से गुज़र
मिसर-ओ-हजाज़ से गुज़र, पारस-ओ-शाम से गुज़र

जिस का अमाल है बे-ग़रज़, उस की जज़ा कुछ और है
हूर-ओ-ख़याम से गुज़र, बादा-ओ-जाम से गुज़र

गरचे है दिलकुशा बहुत हुस्न-ए-फ़िरंग की बहार
तायरेक बुलन्द बाल, दाना-ओ-दाम से गुज़र

कोह-ए-शिगाफ़ तेरी ज़रब, तुझ से कुशाद शरक-ओ-ग़रब
तेज़े-ए-हलाहल की तरह ऐश-ओ-नयाम से गुज़र

तेरा इमाम बे-हुज़ूर, तेरी नमाज़ बे-सुरूर
ऐसी नमाज़ से गुज़र ऐसे इमाम से गुज़र

97. तुझे याद कया नहीं है मेरे दिल का वोह ज़माना

तुझे याद कया नहीं है मेरे दिल का वोह ज़माना
वोह अदब गह-ए-मुहब्बत, वोह निगह का ताज़ियाना

येह बुतान-ए-असर-ए-हाज़िर कि बने हैं मदरसे में
न अदाए काफ़िराना न तराश-ए-आज़राना

नहीं इस खुली फ़ज़ा में कोयी गोशा-ए-फ़राग़त
येह जहां अजब जहां है न कफ़स न आशीयाना

रग-ए-ताक मुंतज़िर है तेरी बारिश-ए-करम की
कि अज़म के मैकदों में न रही मैए मुग़ाना

मेरे हम सफ़र इसे भी असर-ए-बहार समझे
उनहें कया ख़बर कि कया है येह नवाए आशिकाना

मेरे ख़ाक-ओ-ख़ूं से तूने येह जहां कीया है पैदा
सिला-ए-शहीद कया है तब-ओ-ताब-ए-जाविदाना

तेरी बन्दा परवरी से, मेरे दिन गुज़र रहे हैं
न गिला है दोसतों का न शिकायत-ए-ज़माना

98. उकाबी शान से जो झपटे थे जो बे-बालो-पर निकले

उकाबी शान से जो झपटे थे जो बे-बालो-पर निकले
सितारे शाम को ख़ूने-फ़लक में डूब कर निकले

हुए मदफ़ूने-दरीया ज़ेरे-दरीया तैरने वाले
तमांचे मौज के खाते थे जो बनकर गुहर निकले

ग़ुबारे-रहगुज़र हैं कीमीया पर नाज़ था जिनको
जबीनें ख़ाक पर रखते थे जो अकसीरगर निकले

हमारा नरम-रौ कासिद पयामे-ज़िन्दगी लाया
ख़बर देती थीं जिनको बिजलीयां वो बेख़बर निकले

जहां में अहले-ईमां सूरते-ख़ुरशीद जीते हैं
इधर डूबे उधर निकले, उधर डूबे इधर निकले

99. वही मेरी कम नसीबी वही तेरी बेन्याज़ी

वही मेरी कम नसीबी वही तेरी बेन्याज़ी
मेरे काम कुछ न आया ये कमाल-ए-नै नवाज़ी

मैं कहां हूं तू कहां है, ये मकां कि ला-मकां है ?
ये जहां मेरा जहां है कि तेरी करिशमा साज़ी

इसी कशमकश में गुज़रीं मेरी ज़िन्दगी की रातें
कभी सोज़-ओ-साज़-ए-रूमी, कभी पेच-ओ-ताब-ए-राज़ी

वोह फ़रेब खुरदा शाहीं कि पला हो करगसों में
उसे कया ख़बर कि कया है रह-ओ-रसम-ए-शाहबाज़ी

न ज़ुबां कोयी ग़ज़ल की न ज़ुबां से बा-ख़बर मैं
कोयी दिल कुशा सदा हो अजमी हो या कि ताज़ी

नहीं फ़कर-ओ-सलतनत में कोयी इमत्याज़ ऐसा
ये सिपह की तेग़ बाज़ी वोह निगाह की तेग़ बाज़ी

कोयी कारवां से टूटा, कोयी बदग़ुमां हरम से
कि अमीर-ए-कारवां में नहीं खू-ए-दिल नवाज़ी

100. येह पयाम दे गई है मुझे बाद-ए-सुबहगाही

येह पयाम दे गई है मुझे बाद-ए-सुबहगाही
कि ख़ुदी के आरिफ़ों का है मकाम बादशाही

तेरी ज़िन्दगी इसी से, तेरी आबरू इसी से
जो रही ख़ुदी तो शाही न रही तो रूस्याही

ना दीया निशान-ए-मंज़िल मुझे ऐ हकीम तूने
मुझे कया गिला हो तुझ से तू न रहनशीं न राही

मेरे हलका-ए-सुख़न में अभी ज़ेरे तरबियत हैं
वोह गदा कि जानते हैं रह-ओ-रसम-ए-कजकलाही

येह मआमले हैं नाज़ुक जो तेरी रज़ा हो तू कर
कि मुझे तो ख़ुश न आया येह तरीक-ए-ख़ानकाही

तू हुमा का है शिकारी अभी इबतदा है तेरी
नहीं मसलेहत से ख़ाली येह जहान-ए-मुरग़-ओ-माही

तू अरब हो या अजम हो तेरा लायलाहा इल्ला
लुग़त-ए-ग़रीब जब तक तेरा दिल न दे गवाही

101. ज़ाहर की आंख से न तमाशा करे कोई

ज़ाहर की आंख से न तमाशा करे कोई
हो देखना तो दीदा-ए-दिल वा करे कोई

मंसूर को हुआ लबे-गोया पयाम-ए-मौत
अब कया किसी के इशक का दावा करे कोयी ?

हो दीद का जो शौक तो आंखों को बन्द कर
है देखना यही कि न देखा करे कोई

मैं इंतहा-ए-इशक हूं, तू इंतहा-ए-हुस्न
देखे मुझे कि तुझ को तमाशा करे कोयी ?

उज़र-आफ़रीन ज़ुरमे-मुहब्बत है हुस्ने-दोसत
महशर में उज़रे-ताज़ा न पैदा करे कोई

छुपती नहीं है ये निगह-ए-शौक हम-नशीं
फिर और किस तरह उनहें देखा करे कोयी ?

अड़ बैठे कया समझ के भला तूर पर कलीम
ताकत हो दीद की तो तकाज़ा करे कोई

नज़ारे को ये ज़ुम्बिशे मिज़गां भी बार है
नरगिस की आंख से तुझे देखा करे कोई

खुल जाएं, कया मज़े हैं तमन्ना-ए-शौक में
दो चार दिन जो मेरी तमन्ना करे कोई

102. ज़माना आया है बे-हजाबी का, आम दीदार-ए-यार होगा

ज़माना आया है बे-हजाबी का, आम दीदार-ए-यार होगा
सकूत था परदादार जिस का वो राज़ अब आशकार होगा

गुज़र गया है अब वो दौर साकी कि छुप छुप के पीते थे पीने वाले
बनेगा सारा जहां मयख़ाना हर कोयी बादाख़वार होगा

कभी जो आवारा-ए-जुनूं थे वो बसत्यों में फिर आ बसेंगे
बरहनापायी वही रहेगी मगर नया ख़ार-ज़ाड़ होगा

सुना दीया गोश-ए-मुंतज़िर को हिजाज़ की ख़ामोशी ने आख़िर
जो अहद सहराईयों से बांधा गया था फिर उसतवार होगा

निकल के सहरा से जिसने रूमा की सलतनत को उलट दीया था
सुना है येह कुदस्यों से मैंने वो शेर फिर होशियार होगा

कीया मेरा तज़किरा जो साकी ने बादाख़वारों की अंजुमन में
तो पीर-ए-मैख़ाना सुन के कहने लगा कि मूंह फट है ख़वार होगा

दयार-ए-मग़रिब के रहने वालो, ख़ुदा की बसती दुकां नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो वो अब ज़र-ए-कम अय्यार होगा

तुमहारी तहज़ीब अपने ख़ंज़र से आप ही खुदकशी करेगी
जो शाख़-ए-नाज़ुक पे आशीयाना बनेगा ना-पायेदार होगा

चमन में लाला दिखाता फिरता है दाग़ अपना कली कली को
येह जानता है इस दिखावे से दिलजलों में शुमार होगा

जो एक था ऐ निगाह तूने हज़ार करके हमें दिखाया
यही अगर कैफ़ीयत है तेरी तो फिर किसे ऐतबार होगा

ख़ुदा के आशिक तो हैं हज़ारों बनों में फिरते हैं मारे मारे
मैं उसका बन्दा बनूंगा जिस को ख़ुदा के बन्दों से पयार होगा

येह रसम-ए-बज़म-ए-फ़ना है ऐ दिल गुनाह है जुम्बिश-ए-नज़र भी
रहेगी कया आबरू हमारी जो तू यहां बेकरार होगा

मैं ज़ुलमत-ए-शब में ले के निकलूंगा अपने दरमांदा कारवां को
शरर फ़िसां होगी आह मेरी, नफ़स मेरा शोलाबार होगा

ना पूछ इकबाल का ठिकाना अभी वही कैफ़ीयत है उसकी
कहीं सर-ए-राह गुज़ार बैठा सितम कश-ए-इंतेज़ार होगा

103. ज़माना देखेगा जब मेरे दिल से महशर उठेगा गुफ़तगू का

ज़माना देखेगा जब मेरे दिल से महशर उठेगा गुफ़तगू का
मेरी ख़ामोशी नहीं है, गोया मज़ार है हरफ़े आरज़ू का

जो मौज-ए-दरीया लगी यह कहने सफ़र से कायम है शान मेरी
गौहर यह बोला सदफ़ नशीनी है मुझ को सामान आबरू का

कोयी दिल ऐसा नज़र न आया, न जिस में ख़वाबीदा हो तमन्ना
इलाही तेरा जहान कया है, निगाहख़ाना है आरज़ू का

अगर कोयी शै नहीं है पिनहां तो कयों सरापा तलाश हूं मैं
निगाह को नज़ारे की है तमन्ना, दिल को सौदा है जुसतजू का

र्याज़-ए-हसती के ज़र्रे-ज़र्रे से है मोहब्बत का जलवा पैदा
हकीकते-गुल को तू जो समझे, तो यह भी पैमां है रंग-ओ-बू का

तमाम मज़मून मेरे पुराने, कलाम मेरा ख़ता सरापा
हुनर कोयी देखता है मुझ में तो ऐब है मेरे ऐब-जू का

सपास शरते अदब है वरना करम तेरा है सितम से बड़्हकर
ज़रा सा एक दिल दीया है वो भी फ़रेब खुरदा है आरज़ू का

कमाल वहदत अयां है ऐसा कि नोक-ए-नशतर से तू जो छेड़े
यकीं है मुझ को गिरेगा रगे-गुल से कतरा इनसां के लहू का

104. ज़माना

जो था नहीं है जो है न होगा यही है इक हरफ़-ए-मेहरमाना
करीब तर है नमूद जिस की उसी का मुशताक है ज़माना

मेरी सुराही से कतरा कतरा नये हवादिस टपक रहे हैं
मैं अपनी तसबीह-ए-रोज़ का शुमार करता हूं दाना दाना

हर एक से आशना हूं लेकिन, जुदा जुदा रसम-ओ-राह मेरी
किसी का राकिब किसी का मरकब किसी को इबरत का ताज़ियाना

न था अगर तू शरीक-ए-महफ़िल कसूर मेरा है या कि तेरा
मेरा तरीका नहीं कि रख लूं किसी की ख़ातिर मय शबाना

मेरे ख़म-ओ-पेच को नज़ूमी की आंख पहचानती नहीं है
हदफ़ से बेगाना तीर उस का, नज़र नहीं जिस की आरफ़ाना

शफ़क नहीं मग़रबी उफ़क पर येह जू-ए-खूं है, येह जू-ए-खूं है

तुलू-ए-फ़रदा का मुंतज़िर रह के दोश-ओ-इमरोज़ है फ़साना

वोह फ़िकर-ए-ग़ुसताख़ जिस ने उरीयां कीया था फ़ितरत की ताकतों को
उसी की बेताब बिजल्यों से ख़तर में है उसका आशीयाना

हवाएं उनकी फ़जाएं उनकी समुन्दर उनके जहाज़ उनके
गिरह भंवर की खुले तो क्युंकर भंवर है तकदीर का बहाना

जहां-ए-नौ हो रहा है पैदा वोह आलम-ए-पीर मर रहा है
जिसे फ़रंगी मुकामिरों ने बना दीया है किमर ख़ाना

हवा है गो तुन्द-ओ-तेज़ लेकिन चिराग़ अपना जल रहा है
वोह मरद-ए-दरवेश जिसको हक ने दीये हैं अन्दाज़-ए-खुसरवाना

105. ज़िन्दगी

बरतर अज़-अन्देशा सूद-ओ-ज़ियां है ज़िन्दगी
है कभी जां और कभी तसलीम-ए-जां है ज़िन्दगी

तू उस पैमाना-ए-इमरोज़ वह फ़रदा से ना नाप
जाविदां, पैहम दवां, हर दम जवां है ज़िन्दगी

अपनी दुनियां आप पैदा कर अगर ज़िन्दों में है
सर आदम है ज़मीर कुन फुकां है ज़िन्दगी

ज़िन्दगानी की हकीकत कोहकन के दिल से पूछ
जू-ए-शेर वह तेशा व संग-ए-गिरां है ज़िन्दगी

बन्दगी में घट के रह जाती है इक जू-ए कम आब
और आज़ादी में बह-ए-बेकरां है ज़िन्दगी

आशकारा है यह अपनी कुव्वत-ए-तसफ़ीर से
गरचे इक मिट्टी के पैकर में नेहां है है ज़िन्दगी

कुलज़ुम-ए-हसती से तू उभरा है मानन्द-ए-हबाब
इस ज़ियां ख़ाने में तेरा इमतहां है ज़िन्दगी

106. ज़िन्दगी इनसान की एक दम के सिवा कुछ भी नहीं

ज़िन्दगी इनसान की एक दम के सिवा कुछ भी नहीं
दम हवा की मौज है, रम के सिवा कुछ भी नहीं

गुल तबस्सुम कह रहा था ज़िन्दगानी की, मगर
शमा बोली, गिरया-ए-ग़म के सिवा कुछ भी नहीं

राज़े हसती राज़ है जब तक कोयी महरम न हो
खुल गया जिस दम तो महरम के सिवा कुछ भी नहीं

ज़ाईरान-ए-काबा से इकबाल यह पूछे कोई
कया हरम का तोहफ़ा ज़मज़म के सिवा कुछ भी नहीं

 
 
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