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संत रविदास
Sant Ravidas
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Poetry of Sant Ravidas Ji in Hindi

पद संत रविदास जी

1. प्रभु जी तुम चंदन हम पानी

प्रभु जी तुम चंदन हम पानी।
जाकी अंग-अंग बास समानी॥

प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा।
जैसे चितवत चंद चकोरा॥

प्रभु जी तुम दीपक हम बाती।
जाकी जोति बरै दिन राती॥

प्रभु जी तुम मोती हम धागा।
जैसे सोनहिं मिलत सोहागा।

प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा।
ऐसी भक्ति करै 'रैदासा॥

2. तब रांम रांम कहि गावैगा

तब रांम रांम कहि गावैगा।

ररंकार रहित सबहिन थैं, अंतरि मेल मिलावैगा।। टेक।।
लोहा सम करि कंचन समि करि, भेद अभेद समावैगा।
जो सुख कै पारस के परसें, तो सुख का कहि गावैगा।।१।।

गुर प्रसादि भई अनभै मति, विष अमृत समि धावैगा।
कहै रैदास मेटि आपा पर, तब वा ठौरहि पावैगा।।२।।

3. प्रभु जी तुम संगति सरन तिहारी

प्रभु जी तुम संगति सरन तिहारी।जग-जीवन राम मुरारी॥

गली-गली को जल बहि आयो, सुरसरि जाय समायो।
संगति के परताप महातम, नाम गंगोदक पायो॥

स्वाति बूँद बरसे फनि ऊपर, सोई विष होइ जाई।
ओही बूँद कै मोती निपजै, संगति की अधिकाई॥

तुम चंदन हम रेंड बापुरे, निकट तुम्हारे आसा।
संगति के परताप महातम, आवै बास सुबासा॥

जाति भी ओछी, करम भी ओछा, ओछा कसब हमारा।
नीचे से प्रभु ऊँच कियो है, कहि 'रैदास चमारा॥

4. भाई रे रांम कहाँ हैं मोहि बतावो

भाई रे रांम कहाँ हैं मोहि बतावो।
सति रांम ताकै निकटि न आवो।। टेक।।

राम कहत जगत भुलाना, सो यहु रांम न होई।
करंम अकरंम करुणांमै केसौ, करता नांउं सु कोई।।१।।

जा रामहि सब जग जानैं, भ्रमि भूले रे भाई।
आप आप थैं कोई न जांणै, कहै कौंन सू जाई।।२।।

सति तन लोभ परसि जीय तन मन, गुण परस नहीं जाई।
अखिल नांउं जाकौ ठौर न कतहूँ, क्यूं न कहै समझाई।।३।।

भयौ रैदास उदास ताही थैं, करता को है भाई।
केवल करता एक सही करि, सति रांम तिहि ठांई।।४।।

5. नरहरि चंचल मति मोरी

नरहरि चंचल मति मोरी।
कैसैं भगति करौ रांम तोरी।। टेक।।

तू कोहि देखै हूँ तोहि देखैं, प्रीती परस्पर होई।
तू मोहि देखै हौं तोहि न देखौं, इहि मति सब बुधि खोई।।१।।

सब घट अंतरि रमसि निरंतरि, मैं देखत ही नहीं जांनां।
गुन सब तोर मोर सब औगुन, क्रित उपगार न मांनां।।२।।

मैं तैं तोरि मोरी असमझ सों, कैसे करि निसतारा।
कहै रैदास कृश्न करुणांमैं, जै जै जगत अधारा।।३।।

6. साध का निंदकु कैसे तरै

साध का निंदकु कैसे तरै।
सर पर जानहु नरक ही परै।। टेक।।

जो ओहु अठिसठि तीरथ न्हावै। जे ओहु दुआदस सिला पूजावै।
जे ओहु कूप तटा देवावै। करै निंद सभ बिरथा जावै।।१।।

जे ओहु ग्रहन करै कुलखेति। अरपै नारि सीगार समेति।
सगली सिंम्रिति स्रवनी सुनै। करै निंद कवनै नही गुनै।।२।।

जो ओहु अनिक प्रसाद करावै। भूमि दान सोभा मंडपि पावै।
अपना बिगारि बिरांना साढै। करै निंद बहु जोनी हाढै।।३।।

निंदा कहा करहु संसारा। निंदक का प्ररगटि पाहारा।
निंदकु सोधि साधि बीचारिआ। कहु रविदास पापी नरकि सिधारिआ।।४।।

7. केसवे बिकट माया तोर

केसवे बिकट माया तोर।
ताथैं बिकल गति मति मोर।। टेक।।

सु विष डसन कराल अहि मुख, ग्रसित सुठल सु भेख।
निरखि माखी बकै व्याकुल, लोभ काल न देख।।१।।

इन्द्रीयादिक दुख दारुन, असंख्यादिक पाप।
तोहि भजत रघुनाथ अंतरि, ताहि त्रास न ताप।।२।।

प्रतंग्या प्रतिपाल चहुँ जुगि, भगति पुरवन कांम।
आस तोर भरोस है, रैदास जै जै राम।।३।।

8. जीवत मुकंदे मरत मुकंदे

जीवत मुकंदे मरत मुकंदे।
ताके सेवक कउ सदा अनंदे।। टेक।।

मुकंद-मुकंद जपहु संसार। बिन मुकंद तनु होइ अउहार।
सोई मुकंदे मुकति का दाता। सोई मुकंदु हमरा पित माता।।१।।

मुकंद-मुकंदे हमारे प्रानं। जपि मुकंद मसतकि नीसानं।
सेव मुकंदे करै बैरागी। सोई मुकंद दुरबल धनु लाधी।।२।।

एक मुकंदु करै उपकारू। हमरा कहा करै संसारू।
मेटी जाति हूए दरबारि। तुही मुकंद जोग जुगतारि।।३।।

उपजिओ गिआनु हूआ परगास। करि किरपा लीने करि दास।
कहु रविदास अब त्रिसना चूकी। जपि मुकंद सेवा ताहू की।।४।।

9. माधौ अविद्या हित कीन्ह

माधौ अविद्या हित कीन्ह।
ताथैं मैं तोर नांव न लीन्ह।। टेक।।

मिग्र मीन भ्रिग पतंग कुंजर, एक दोस बिनास।
पंच ब्याधि असाधि इहि तन, कौंन ताकी आस।।१।।

जल थल जीव जंत जहाँ-जहाँ लौं करम पासा जाइ।
मोह पासि अबध बाधौ, करियै कौंण उपाइ।।२।।

त्रिजुग जोनि अचेत संम भूमि, पाप पुन्य न सोच।
मानिषा अवतार दुरलभ, तिहू संकुट पोच।।३।।

रैदास दास उदास बन भव, जप न तप गुरु ग्यांन।
भगत जन भौ हरन कहियत, ऐसै परंम निधांन।।४।।

10. देहु कलाली एक पियाला

देहु कलाली एक पियाला।
ऐसा अवधू है मतिवाला।। टेक।।

ए रे कलाली तैं क्या कीया,
सिरकै सा तैं प्याला दीया।।१।।

कहै कलाली प्याला देऊँ,
पीवनहारे का सिर लेऊँ।।२।।

चंद सूर दोऊ सनमुख होई,
पीवै पियाला मरै न कोई।।३।।

सहज सुनि मैं भाठी सरवै,
पीवै रैदास गुर मुखि दरवै।।४।।

11. संत ची संगति संत कथा रसु

संत ची संगति संत कथा रसु।
संत प्रेम माझै दीजै देवा देव।। टेक।।

संत तुझी तनु संगति प्रान।
सतिगुर गिआन जानै संत देवा देव।।१।।

संत आचरण संत चो मारगु।
संत च ओल्हग ओल्हगणी।।२।।

अउर इक मागउ भगति चिंतामणि।
जणी लखावहु असंत पापी सणि।।३।।

रविदास भणै जो जाणै सो जाणु।
संत अनंतहि अंतरु नाही।।४।।

12. तुझहि चरन अरबिंद भँवर मनु

तुझहि चरन अरबिंद भँवर मनु।
पान करत पाइओ, पाइओ रामईआ धनु।। टेक।।

कहा भइओ जउ तनु भइओ छिनु छिनु।
प्रेम जाइ तउ डरपै तेरो जनु।।१।।

संपति बिपति पटल माइआ धनु।
ता महि भगत होत न तेरो जनु।।२।।

प्रेम की जेवरी बाधिओ तेरो जन।
कहि रविदास छूटिबो कवन गुनै।।३।।

13. माटी को पुतरा कैसे नचतु है

माटी को पुतरा कैसे नचतु है।
देखै देखै सुनै बोलै दउरिओ फिरतु है।। टेक।।

जब कुछ पावै तब गरबु करतु है।
माइआ गई तब रोवनु लगतु है।।१।।

मन बच क्रम रस कसहि लुभाना।
बिनसि गइआ जाइ कहूँ समाना।।२।।

कहि रविदास बाजी जगु भाई।
बाजीगर सउ मोहि प्रीति बनि आई।।३।।

14. पार गया चाहै सब कोई

पार गया चाहै सब कोई।
रहि उर वार पार नहीं होई।। टेक।।

पार कहैं उर वार सूँ पारा,
बिन पद परचै भ्रमहि गवारा।।१।।

पार परंम पद मंझि मुरारी,
तामैं आप रमैं बनवारी।।२।।

पूरन ब्रह्म बसै सब ठाइंर्,
कहै रैदास मिले सुख सांइंर्।।३।।

15. इहै अंदेसा सोचि जिय मेरे

इहै अंदेसा सोचि जिय मेरे।
निस बासुरि गुन गाँऊँ रांम तेरे।। टेक।।

तुम्ह च्यतंत मेरी च्यंता हो न जाई,
तुम्ह च्यंतामनि होऊ कि नांहीं।।१।।

भगति हेत का का नहीं कीन्हा,
हमारी बेर भये बल हीनां।।२।।

कहै रैदास दास अपराधी,
जिहि तुम्ह ढरवौ सो मैं भगति न साधी।।३।।

16. माधवे तुम न तोरहु तउ हम नहीं तोरहि

माधवे तुम न तोरहु तउ हम नहीं तोरहि।
तुम सिउ तोरि कवन सिउ जोरहि।।टेक।।

जउ तुम गिरिवर तउ हम मोरा।
जउ तुम चंद तउ हम भए है चकोरा।।१।।

जउ तुम दीवरा तउ हम बाती।
जउ तुम तीरथ तउ हम जाती।।२।।

साची प्रीति हम तुम सिउ जोरी।
तुम सिउ जोरि अवर संगि तोरी।।३।।

जह जह जाउ तहा तेरी सेवा।
तुम सो ठाकुरु अउरु न देवा।।४।।

तुमरे भजन कटहि जम फाँसा।
भगति हेत गावै रविदासा।।५।।

17. प्रानी किआ मेरा किआ तेरा

प्रानी किआ मेरा किआ तेरा।
तैसे तरवर पंखि बसेरा।।टेक।।

जल की भीति पवन का थंभा।
रकत बंुद का गारा।
हाड़ मास नाड़ी को पिंजरू।
पंखी बसै बिचारा।।१।।

राखहु कंध उसारहु नीवां।
साढ़े तीनि हाथ तेरी सीवां।।२।।

बंके बाल पाग सिर डेरी।
इहु तनु होइगो भसम की ढेरी।।३।।

ऊचे मंदर सुंदर नारी।
राम नाम बिनु बाजी हारी।।४।।

मेरी जाति कमीनी पांति कमीनी।
ओछा जनमु हमारा।
तुम सरनागति राजा रामचंद।
कहि रविदास चमारा।।५।।

18. चमरटा गाँठि न जनई

चमरटा गाँठि न जनई।
लोग गठावै पनही।।टेक।।

आर नहीं जिह तोपउ।
नहीं रांबी ठाउ रोपउ।।१।।

लोग गंठि गंठि खरा बिगूचा।
हउ बिनु गांठे जाइ पहूचा।।२।।

रविदासु जपै राम नामा,
मोहि जम सिउ नाही कामा।।३।।

19. त्राहि त्राहि त्रिभवन पति पावन

त्राहि त्राहि त्रिभवन पति पावन।
अतिसै सूल सकल बलि जांवन।।टेक।।

कांम क्रोध लंपट मन मोर,
कैसैं भजन करौं रांम तोर।।१।।

विषम विष्याधि बिहंडनकारी,
असरन सरन सरन भौ हारी।।२।।

देव देव दरबार दुवारै,
रांम रांम रैदास पुकारै।।३।।

20. नामु तेरो आरती मजनु मुरारे

नामु तेरो आरती मजनु मुरारे।
हरि के नाम बिनु झूठे सगल पसारे।।टेक।।

नामु तेरो आसनो नामु तेरो उरसा नामु तेरा केसरो ले छिड़का रे।
नामु तेरा अंमुला नामु तेरो चंदनों, घसि जपे नामु ले तुझहि का उचारे।।१।।

नामु तेरा दीवा नामु तेरो बाती नामु तेरो तेलु ले माहि पसारे।
नाम तेरे की जोति लगाई भइआे उजिआरो भवन सगला रे।।२।।

नामु तेरो तागा नामु फूल माला, भार अठारह सगल जूठा रे।
तेरो कीआ तुझहि किआ अरपउ नामु तेरा तुही चवर ढोला रे।।३।।

दसअठा अठसठे चारे खाणी इहै वरतणि है सगल संसारे।
कहै रविदासु नाम तेरो आरती सतिनामु है हरि भोग तुहारे।।४।।

 
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