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Poems on Basant/Vasant Ritu/Season

बसंत/वसंत/बहार पर कविताएँ

नज़ीर अकबराबादी

आलम में जब बहार की आकर लगंत हो
फिर आलम में तशरीफ लाई बसंत
जहां में फिर हुई ऐ यारो आश्कार बसंत
गुलशने-आलम में जब तशरीफ़ लाती है बहार
मिलकर सनम से अपने हंगाम दिल कुशाई
जब फूल का सरसों के हुआ आके खिलन्ता
जोशे निशातो ऐश है हर जा बसंत का
निकले हो किस बहार से तुम ज़र्द पोश हो
करके बसंती लिबास सबसे बरस दिन के दिन
आने को आज घूम इधर है बसंत की
चम्पे का इत्र मलकर मौके़ से फिर खुशी हो

अमीर खुसरो

सकल बन फूल रही सरसों

सुभद्राकुमारी चौहान

जलियाँवाला बाग में बसंत
वीरों का कैसा हो वसंत

सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

वसन्त की परी के प्रति
सखि, वसन्त आया
रँग गई पग-पग धन्य धरा
हँसी के तार के होते हैं ये बहार के दिन
अलि की गूँज चली द्रुम कुँजों
आज प्रथम गाई पिक पंचम
फूटे हैं आमों में बौर
वरद हुई शारदा जी हमारी
कूची तुम्हारी फिरी कानन में

सुमित्रानंदन पंत

वसन्त-श्री
वन-वन, उपवन
लाई हूँ फूलों का हास

गोपालदास नीरज

बसंत की रात

रामधारी सिंह 'दिनकर'

राजा वसन्त वर्षा ऋतुओं की रानी
वसन्त के नाम पर

भारतेंदु हरिश्चंद्र

सखि आयो बसंत रितून को कंत
कूकै लगीं कोइलैं कदंबन पै
बसंत होली

मलिक मुहम्मद जायसी

बसंत-खंड
षट्-ऋतु-वर्णन-खंड

भक्त सूरदास जी

वसंतोत्सव

महाकवि बिहारी

है यह आजु बसन्त समौ
बौरसरी मधुपान छक्यौ

दुष्यंत कुमार

वसंत आ गया

अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध'

वसंत

हरिवंशराय बच्चन

बौरे आमों पर बौराए
कोयल

जयशंकर प्रसाद

नव वसंत

महादेवी वर्मा

वसन्त

गिरिजा कुमार माथुर

आज हैं केसर रंग रंगे वन

गोपाल सिंह नेपाली

वसंत गीत

मनोहर लाल 'रत्नम' सहदेव

जब वसंत आकर मुसकाया

प्रो. अजहर हाशमी

वसंत

पूर्णिमा वर्मन

एक गीत और कहो
 
 
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