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अज्ञेय
Agyeya
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Pahle Main Sannata Bunta Hoon Agyeya

पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ अज्ञेय

एक सन्नाटा बुनता हूँ
निमाड़: चैत
तारे
खिसक गयी है धूप
खुले में खड़ा पेड़
तुम सोए
मेज़ के आर-पार
हाँ, दोस्त
कई नगर थे जो हमें
कोई हैं जो
प्राचीन ग्रंथागार में
हम घूम आए शहर
घर की याद
शिशिर का भोर
समाधि-लेख
मृत्युर्धावति
देखिए न मेरी कारगुजारी
दुःसाहसी हेमंती फूल
हरा अंधकार
विदेश में कमरे
वह नकारता रहे
बलि पुरुष
कभी-अब
उनके घुड़सवार
हीरो
जो पुल बनाएँगे
बाबू ने कहा
नन्दा देवी-1
नन्दा देवी-2
नन्दा देवी-3
नन्दा देवी-4
नन्दा देवी-5
नन्दा देवी-6
नन्दा देवी-7
नन्दा देवी-8
नन्दा देवी-9
नन्दा देवी-10
नन्दा देवी-11
नन्दा देवी-12
नन्दा देवी-13
नन्दा देवी-14
नन्दा देवी-15
वन-झरने की धार
दिन तेरा
धार पर
जियो मेरे
चले चलो, ऊधो
विदा का क्षण
वीणा
तुम्हारे गण
हँसती रहने देना
 
 
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