Hindi Kavita
रामधारी सिंह दिनकर
Ramdhari Singh Dinkar
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Neel Kusum Ramdhari Singh Dinkar

नील कुसुम रामधारी सिंह 'दिनकर'

1. नील कुसुम

‘‘है यहाँ तिमिर, आगे भी ऐसा ही तम है,
तुम नील कुसुम के लिए कहाँ तक जाओगे ?
जो गया, आज तक नहीं कभी वह लौट सका,
नादान मर्द ! क्यों अपनी जान गँवाओगे ?

प्रेमिका ! अरे, उन शोख़ बुतों का क्या कहना !
वे तो यों ही उन्माद जगाया करती हैं;
पुतली से लेतीं बाँध प्राण की डोर प्रथम,
पीछे चुम्बन पर क़ैद लगया करती हैं।

इनमें से किसने कहा, चाँद से कम लूँगी ?
पर, चाँद तोड़ कर कौन मही पर लाया है ?
किसके मन की कल्पना गोद में बैठ सकी ?
किसकी जहाज़ फिर देश लौट कर आया है ?’’

ओ नीतिकार ! तुम झूठ नहीं कहते होगे,
बेकार मगर, पागलों को ज्ञान सिखाना है;
मरने का होगा ख़ौफ़, मौत की छाती में
जिसको अपनी ज़िन्दगी ढूँढ़ने जाना है ?

औ’ सुना कहाँ तुमने कि ज़िन्दगी कहते हैं,
सपनों ने देखा जिसे, उसे पा जाने को ?
इच्छाओं की मूर्तियाँ घूमतीं जो मन में,
उनको उतार मिट्टी पर गले लगाने को ?

ज़िन्दगी, आह ! वह एक झलक रंगीनी की,
नंगी उँगली जिसको न कभी छू पाती है,
हम जभी हाँफते हुए चोटियों पर चढ़ते,
वह खोल पंख चोटियाँ छोड़ उड़ जाती है।

रंगीनी की वह एक झलक, जिसके पीछे
है मच हुई आपा-आपी मस्तानों में,
वह एक दीप जिसके पीछे है डूब रहीं
दीवानों की किश्तियाँ कठिन तूफ़ानों में।

डूबती हुई किश्तियाँ ! और यह किलकारी !
ओ नीतिकार ! क्या मौत इसी को कहते हैं ?
है यही ख़ौफ़, जिससे डरकर जीनेवाले
पानी से अपना पाँव समेटे रहते हैं ?

ज़िन्दगी गोद में उठा-उठा हलराती है
आशाओं की भीषिका झेलनेवालों को;
औ; बड़े शौक़ से मौत पिलाती है जीवन
अपनी छाती से लिपट खेलनेवालों को।

तुम लाशें गिनते रहे खोजनेवालों की,
लेकिन, उनकी असलियत नहीं पहचान सके;
मुरदों में केवल यही ज़िन्दगीवाले थे
जो फूल उतारे बिना लौट कर आ न सके।

हो जहाँ कहीं भी नील कुसुम की फुलवारी,
मैं एक फूल तो किसी तरह ले जाऊँगा,
जूडे में जब तक भेंट नहीं यह बाँध सकूँ,
किस तरह प्राण की मणि को गले लगाऊँगा ?
(1950)

2. चाँद और कवि

रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!
उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,
और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।

जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?
मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते;
और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी
चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।

आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का
आज उठता और कल फिर फूट जाता है
किन्तु, फिर भी धन्य; ठहरा आदमी ही तो?
बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है।

मैं न बोला किन्तु मेरी रागिनी बोली,
देख फिर से चाँद! मुझको जानता है तू?
स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी?
आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?

मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,
आग में उसको गला लोहा बनाती हूँ,
और उस पर नींव रखता हूँ नये घर की,
इस तरह दीवार फौलादी उठाती हूँ।

मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी
कल्पना की जीभ में भी धार होती है,
वाण ही होते विचारों के नहीं केवल,
स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है।

स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे,
"रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,
रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,
स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।"
(1946)

3. दर्पण

जा रही देवता से मिलने ?
तो इतनी कृपा किये जाओ ।
अपनी फूलों की डाली में
दर्पण यह एक लिये जाओ ।

आरती, फूल से प्रसन्न
जैसे हों, पहले कर लेना;
जब हाल धरित्री का पूछें,
सम्मुख दर्पण यह धर देना ।

बिम्बित है इसमें पुरुष पुरातन
के मानस का घोर भँवर;
है नाच रही पृथ्वी इसमें,
है नाच रहा इसमें अम्बर ।

यह स्वयं दिखायेगा उनको
छाया मिट्टी की चाहों की,
अम्बर की घोर विकलता की,
धरती के आकुल दाहों की ।

ढहती मीनारों की छाया,
गिरती दीवारों की छाया,
बेमौत हवा के झोंके में
मरती झंकारों की छाया ।

छाया छाया-ब्रह्माणी की
जो गीतों का शव ढोती है,
भुज में वीणा की लाश लिये
आतप से बचकर सोती है ।

झांकी उस भीत पवन की जो
तूफानों से है डरा हुआ;
उस जीर्ण खमंडल की जिसमें
आतंक-रोर है भरा हुआ।

हिलती वसुन्धरा की झांकी,
बुझती परम्परा की झांकी;
अपने में सिमटी हुई, पलित
विद्या अनुर्वरा की झांकी ।

झांकी उस नयी परिधि की जो
है दीख रही कुछ थोडी-सी;
क्षितिजों के पास पडी पतली,
चमचम सोने की डोरी-सी।

छिलके उठते जा रहे, नया
अंकुर मुख दिखलाने को है;
यह जीर्ण तनोवा सिमट रहा,
आकाश नया आने को है ।

(१९४६ ई०)

4. व्याल-विजय

झूमें झर चरण के नीचे मैं उमंग में गाऊँ।
तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।

(1)
यह बाँसुरी बजी माया के मुकुलित आकुंचन में,
यह बाँसुरी बजी अविनाशी के संदेह गहन में
अस्तित्वों के अनस्तित्व में,महाशांति के तल में,
यह बाँसुरी बजी शून्यासन की समाधि निश्चल में।
कम्पहीन तेरे समुद्र में जीवन-लहर उठाऊँ
तान,तान,फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।

(2)
अक्षयवट पर बजी बाँसुरी,गगन मगन लहराया
दल पर विधि को लिए जलधि में नाभि-कमल उग आया
जन्मी नव चेतना, सिहरने लगे तत्व चल-दल से,
स्वर का ले अवलम्ब भूमि निकली प्लावन के जल से।
अपने आर्द्र वसन की वसुधा को फिर याद दिलाऊँ।
तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।

(3)
फूली सृष्टि नाद-बंधन पर, अब तक फूल रही है,
वंशी के स्वर के धागे में धरती झूल रही है।
आदि-छोर पर जो स्वर फूँका,दौड़ा अंत तलक है,
तार-तार में गूँज गीत की,कण-कण-बीच झलक है।
आलापों पर उठा जगत को भर-भर पेंग झूलाऊँ।
तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।

(4)
जगमग ओस-बिंदु गुंथ जाते सांसो के तारों में,
गीत बदल जाते अनजाने मोती के हारों में।
जब-जब उठता नाद मेघ,मंडलाकार घिरते हैं,
आस-पास वंशी के गीले इंद्रधनुष तिरते है।
बाँधू मेघ कहाँ सुरधनु पर? सुरधनु कहाँ सजाऊँ?
तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।

(5)
इस वंशी के मधुर तन पर माया डोल चुकी है
पटावरण कर दूर भेद अंतर का खोल चुकी है।
झूम चुकी है प्रकृति चांदनी में मादक गानों पर,
नचा चुका है महानर्तकी को इसकी तानों पर।
विषवर्षी पर अमृतवर्षिणी का जादू आजमाऊँ,
तान,तान,फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।

(6)
उड़े नाद के जो कण ऊपर वे बन गए सितारे,
नीचे जो रह गए, कहीं है फूल, कहीं अंगारे।
भीगे अधर कभी वंशी के शीतल गंगा जल से,
कभी प्राण तक झुलस उठे हैं इसके हालाहल से।
शीतलता पीकर प्रदाह से कैसे ह्रदय चुराऊँ?
तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।

(7)
यह बाँसुरी बजी, मधु के सोते फूटे मधुबन में,
यह बाँसुरी बजी, हरियाली दौड गई कानन में।
यह बाँसुरी बजी, प्रत्यागत हुए विहंग गगन से,
यह बाँसुरी बजी, सरका विधु चरने लगा गगन से।
अमृत सरोवर में धो-धो तेरा भी जहर बहाऊँ।
तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।

(8)
यह बाँसुरी बजी, पनघट पर कालिंदी के तट में,
यह बाँसुरी बजी, मुरदों के आसन पर मरघट में।
बजी निशा के बीच आलुलायित केशों के तम में,
बजी सूर्य के साथ यही बाँसुरी रक्त-कर्दम में।
कालिय दह में मिले हुए विष को पीयूष बनाऊँ।
तान,तान,फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।
(9)
फूँक-फूँक विष लपट, उगल जितना हों जहर ह्रदय में,
वंशी यह निर्गरल बजेगी सदा शांति की लय में।
पहचाने किस तरह भला तू निज विष का मतवाला?
मैं हूँ साँपों की पीठों पर कुसुम लादने वाला।
विष दह से चल निकल फूल से तेरा अंग सजाऊँ
तान,तान,फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।

(10)
ओ शंका के व्याल! देख मत मेरे श्याम वदन को,
चक्षुःश्रवा! श्रवण कर वंशी के भीतर के स्वर को।
जिसने दिया तुझको विष उसने मुझको गान दिया है,
ईर्ष्या तुझे, उसी ने मुझको भी अभिमान दिया है।
इस आशीष के लिए भाग्य पर क्यों न अधिक इतराऊँ?
तान,तान,फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।

(11)
विषधारी! मत डोल, कि मेरा आसन बहुत कड़ा है,
कृष्ण आज लघुता में भी साँपों से बहुत बड़ा है।
आया हूँ बाँसुरी-बीच उद्धार लिए जन-गण का,
फन पर तेरे खड़ा हुआ हूँ भार लिए त्रिभुवन का।
बढ़ा, बढ़ा नासिका रंध्र में मुक्ति-सूत्र पहनाऊँ
तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।
(1949)

5. किसको नमन करूँ मैं भारत?

तुझको या तेरे नदीश, गिरि, वन को नमन करूँ, मैं ?
मेरे प्यारे देश ! देह या मन को नमन करूँ मैं ?
किसको नमन करूँ मैं भारत ? किसको नमन करूँ मैं ?

भू के मानचित्र पर अंकित त्रिभुज, यही क्या तू है ?
नर के नभश्चरण की दृढ़ कल्पना नहीं क्या तू है ?
भेदों का ज्ञाता, निगूढ़ताओं का चिर ज्ञानी है
मेरे प्यारे देश ! नहीं तू पत्थर है, पानी है
जड़ताओं में छिपे किसी चेतन को नमन करूँ मैं ?

तू वह, नर ने जिसे बहुत ऊँचा चढ़कर पाया था;
तू वह, जो संदेश भूमि को अम्बर से आया था।
तू वह, जिसका ध्यान आज भी मन सुरभित करता है;
थकी हुई आत्मा में उड़ने की उमंग भरता है ।
गन्ध -निकेतन इस अदृश्य उपवन को नमन करूँ मैं?
किसको नमन करूँ मैं भारत ! किसको नमन करूँ मैं?

वहाँ नहीं तू जहाँ जनों से ही मनुजों को भय है;
सब को सब से त्रास सदा सब पर सब का संशय है ।
जहाँ स्नेह के सहज स्रोत से हटे हुए जनगण हैं,
झंडों या नारों के नीचे बँटे हुए जनगण हैं ।
कैसे इस कुत्सित, विभक्त जीवन को नमन करूँ मैं ?
किसको नमन करूँ मैं भारत ! किसको नमन करूँ मैं ?

तू तो है वह लोक जहाँ उन्मुक्त मनुज का मन है;
समरसता को लिये प्रवाहित शीत-स्निग्ध जीवन है।
जहाँ पहुँच मानते नहीं नर-नारी दिग्बन्धन को;
आत्म-रूप देखते प्रेम में भरकर निखिल भुवन को।
कहीं खोज इस रुचिर स्वप्न पावन को नमन करूँ मैं ?
किसको नमन करूँ मैं भारत ! किसको नमन करूँ मैं ?

भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है
एक देश का नहीं, शील यह भूमंडल भर का है
जहाँ कहीं एकता अखंडित, जहाँ प्रेम का स्वर है
देश-देश में वहाँ खड़ा भारत जीवित भास्कर है
निखिल विश्व को जन्मभूमि-वंदन को नमन करूँ मैं !

खंडित है यह मही शैल से, सरिता से सागर से
पर, जब भी दो हाथ निकल मिलते आ द्वीपांतर से
तब खाई को पाट शून्य में महामोद मचता है
दो द्वीपों के बीच सेतु यह भारत ही रचता है
मंगलमय यह महासेतु-बंधन को नमन करूँ मैं !

दो हृदय के तार जहाँ भी जो जन जोड़ रहे हैं
मित्र-भाव की ओर विश्व की गति को मोड़ रहे हैं
घोल रहे हैं जो जीवन-सरिता में प्रेम-रसायन
खोर रहे हैं देश-देश के बीच मुँदे वातायन
आत्मबंधु कहकर ऐसे जन-जन को नमन करूँ मैं !

उठे जहाँ भी घोष शांति का, भारत, स्वर तेरा है
धर्म-दीप हो जिसके भी कर में वह नर तेरा है
तेरा है वह वीर, सत्य पर जो अड़ने आता है
किसी न्याय के लिए प्राण अर्पित करने जाता है
मानवता के इस ललाट-वंदन को नमन करूँ मैं !

6. भावी पीढ़ी से

हम तुम में साकार नहीं तो छिपे हुए हैं।
तुम भी लेकर नाव हमारे उष्ण रुधिर में
घूम रहे इच्छाओं की दुनिया टटोलते,
ले जाने को उसे, तत्त्व जो अविनश्वर है,
जा सकता है जो कुम्हलाये विना वहाँ तक
जहाँ पहुँच तट छोड़ तुम्हें ऊपर आना है ।

ये कुछ भीगे कमल और ये गीली कलियाँ ?
ऐसी ही थीं, हम सब की ईजाद नहीं हैं ।
जो हम को दे गये, उन्होंने भी पाया था,
अपने पूर्व-पुरुष के हाथों से ऐसा ही।
जीत वही जो मनु के चरणों में लोटी थी;
हार वही जिसके नीचे वह काँप उठा था।
रहे धूल में पड़ा कि गंगा में नहलाओ,
आदम का बेटा आदम का ही बेटा है ।

नयी बात क्या कहें ? नया हमने क्या सीखा?
उलट-पुलट कर शब्द खेल जितने दिखलायें;
किन्तु, बात है यही कि जल ठंढा होता है,
और आग पर चढा उसे जितना खौलाओ,
किन्तु, आग उस पानी से भी बुझ जाती है ।

जिज्ञासा का धुआँ उठा जो मनु के सिर से,
सब के माथे से वह उठता ही आया है,
घटी-बढ़ी, पर, नहीं तनिक नीलिमा गगन की,
और न बरसा समाधान कोई अम्बर से ।

श्रम है केवल सार, काम करना अच्छा है,
चिंता है दुख-भार, सोचना पागलपन है ।
पियो सोम या चाय, नाम में जो अन्तर हो,
मगर, स्वाद का हाल वही खट्टा-मीठा है ।

(१९५१ ई०)

7. चंद्राह्वान

जागो हे अविनाशी !
जागो किरणपुरुष ! कुमुदासन ! विधु-मंडल के वासी !
जागो है अविनाशी !

रत्न-जड़ित-पथ-चारी, जागो,
उडू-वन-वीथि-विहारी, जागो,
जागो रसिक विराग-शोक के, मधुवन के संन्यासी !
जागो हे अविनाशी!

जागो शिल्पि अजर अम्बर के !
गायक महाकाल के घर के !
दिव के अमृतकंठ कवि, जागो, स्निग्ध-प्रकाश-प्रकाशी !
जागो हे अविनाशी !

विभा-सलिल का मीन करो हे !
निज में मुझको लीन करो हे !
विधु-मंडल में आज डूब जाने का मैं अभिलाषी !
जागो हे अविनाशी !

(१९४६ ई०)

8. ये गान बहुत रोये

तुम बसे नहीं इनमें आकर,
ये गान बहुत रोये ।

बिजली बन घन में रोज हँसा करते हो,
फूलों में बन कर गन्ध बसा करते हो,
नीलिमा नहीं सारा तन ढंक पाती है,
तारा-पथ में पग-ज्योति झलक जाती है ।
हर तरफ चमकता यह जो रूप तुम्हारा,
रह-रह उठता जगमगा जगत जो सारा,
इनको समेट मन में लाकर
ये गान बहुत रोये ।

जिस पथ पर से रथ कभी निकल जाता है,
कहते हैं, उस पर दीपक बल जाता है ।
मैं देख रहा अपनी ऊँचाई पर से,
तुम किसी रोज तो गुजरे नहीं इधर से ।
अँधियाले में स्वर वृथा टेरते फिरते,
कोने-कोने में तुम्हें हेरते फिरते ।
पर, कहीं नहीं तुमको पाकर
ये गान बहुत रोये ।

कब तक बरसेगी ज्योति बार कर मुझको ?
निकलेगा रथ किस रोज पार कर मुझको ?
किस रोज लिये प्रज्वलित बाण आओगे,
खींचते हृदय पर रेख निकल जाओगे ?
किस रोज तुम्हारी आग शीश पर लूँगा,
बाणों के आगे प्राण खोल धर दूँगा ?
यह सोच विरह में अकुला कर
ये गान बहुत रोये ।

(१९५३ ई०)

9. जीवन

पत्थरों में भी कहीं कुछ सुगबुगी है ?
दूब यह चट्टान पर कैसे उगी है ?

ध्वंस पर जैसे मरण की दृष्टि है,
सृजन में त्यों ही लगी यह सृष्टि है ।

एक कण भी है सजल आशा जहाँ,
एक अंकुर सिर उठाता है वहाँ ।

मृत्यु का तन आग है, अंगार है;
जिन्दगी हरियालियों की धार है ।

क्षार में दो बूंद आँसू डाल कर,
और उसमें बीज कोई पाल कर,

चूम कर मृत को जिलाती जिन्दगी ।
फूल मरघट में खिलाती जिन्दगी ।

निर्झरी बन फूटती पाताल से,
कोंपलें बन नग्न, रूखी डाल से ।

खोज लेती है सुधा पाषाण में,
जिन्दगी रुकती नहीं चट्टान में ।

बाल भर अवकाश होना चाहिए,
कुछ खुला आकाश होना चाहिए,

बीज की फिर शक्ति रुकती है कहाँ ?
भाव की अभिव्यक्ति रुकती है कहाँ ?

(१९५४ ई०)

10. आनंदातिरेक

आनन्द का अतिरेक यह ।

हो मृत्यु की धारा अगर तो मुक्त बहने दो मुझे;
हो जिन्दगी की छाँह तो निस्पन्द रहने दो मुझे ।

कुछ और पाना व्यर्थ है,
अन्यत्र जाना व्यर्थ है ।

माँगा बहुत तुम से, नहीं कुछ और माँगूंगा;
अब इस महामधु-पूर्ण निद्रा से न जागूंगा ।

नींद है वह जागरण जब फूल खिलते हों;
चेतना के सिन्धु में निश्चेत प्राणों को;
ऊर्मियों में फूटते-से गान मिलते हों।

मीठा बहुत उल्लास यह, मादक बहुत अविवेक यह
निस्सीम नभ, सागर अगम आनन्द का अतिरेक यह ।

(१९५४ ई०)

11. भूदान

कौन टोकता है शंका से ? चुप रह, चुप, अपलापी !
क्रिया-हीन चिन्तन के अनुचर, केवल ज्ञान-प्रलापी !
नहीं देखता, ज्योति जगत् में नूतन उभर रही है ?
गाँधी की चोटी से गंगा आगे उतर रही है ।
अंधकार फट गया, विनोबा में धर कर आकार
घूम-घूम वेदना देश की घर-घर रही पुकार ।

ओ सिकता में चंचु गाड़ कर सुख से सोनेवालो !
चिंताएँ सब डाल भाग्य पर निर्भय होनेवालो !
पहुँच गई है घड़ी, फैसला अब करना ही होगा,
दो में एक राह पर पगले ! पग धरना ही होगा ।
गाँधी की लो शरण, बदल डालो मिलकर संसार ।
या फिर रहो कल्कि के हाथों कटने को तैयार ।

अपने को ही नहीं देख, टूक, ध्यान इधर भी देना,
भूमि-हीन कृषकों की कितनी बड़ी खड़ी है सेना ।
बाँध तोड़ जिस रोज फौज खुलकर हल्ला बोलेगी,
तुम दोगे क्या चीज ? वही जो चाहेगी, सो लेगी ।
"कृष्ण दूत बनकर आया है, सन्धि करो सम्राट ।
मच जायेगा प्रलय, कहीं वामन हो पड़ा विराट ।

पहचानो, यह कौन द्वार पर अधनंगा आया है,
किस कारण अधिकार स्वयं बन भिखमंगा आया है,
समझ सको यदि मर्म, बुलाये बिना दौड़ कर आओ,
जो समझो तुम अंश अपर का उसे स्वयं दे जाओ ।
स्वत्व छीन कर क्रान्ति छोड़ती कठिनाई से प्राण ।
बडी कृपा उसकी, भारत में माँग रही वह दान ।

(१९५२ ई०)

12. आशा की वंशी

लिख रहे गीत इस अंधकार में भी तुम
रवि से काले बरछे जब बरस रहे हैं,
सरिताएँ जम कर बर्फ हुई जाती हैं,
जब बहुत लोग पानी को तरस रहे हैं?

इन गीतों से यह तिमिर-जाल टूटेगा?
यह जमी हुई सरिता फिर धार धरेगी?
बरसेगा शीतल मेघ? लोग भीगेंगे?
यह मरी हुई हरियाली नहीं मरेगी?

तो लिखो, और मुझ में भी जो आशा है,
उसको अपने गीतों में कहीं सजा दो।
ज्योतियाँ अभी इसके भीतर बाकी हैं,
लो, अंधकार में यह बाँसुरी बजा दो।

(१९५४ ई०)

13. पावस-गीत

अम्बर के गृह गान रे, घन-पाहुन आये।

इन्द्रधनुष मेचक-रुचि-हारी,
पीत वर्ण दामिनि-द्युति न्यारी,
प्रिय की छवि पहचान रे, नीलम घन छाये।

वृष्टि-विकल घन का गुरु गर्जन,
बूँद-बूँद में स्वप्न विसर्जन,
वारिद सुकवि समान रे, बरसे कल पाये।

तृण, तरु, लता, कुसुम पर सोई,
बजने लगी सजल सुधि कोई,
सुन-सुन आकुल प्राण रे, लोचन भर आये।

(१९४७ ई०)

14. नींव का हाहाकार

कांपती है वज्र की दीवार।
नींव में से आ रहा है क्षीण हाहाकार।
जानते हो, कौन नीचे दब गया है?
दर्द की आवाज पहले भी सुनी थी?
या कि यह दुष्काण्ड बिलकुल ही नया है?
वस्त्र जब नूतन बदलते हो किसी दिन,
खून के छींटे पड़े भी देखते हो?
रात को सूनी, सुनहरी कोठरी में
मौन कुछ मुर्दे खड़े भी देखते हो?
रोटियों पर कौर लेते ही कहीं से
अश्रु की भी बूंद क्या चूती कभी है?
बाग़ में जब घूमते हो शाम को तब
सनसनाती चीज भी छूती कभी है?
जानते हो, यह अनोखा राज क्या है?
वज्र की दीवार यह क्यों कांपती है?
और गूंगी ईंट की आवाज़ क्या है?
तोड़ दो इसको, महल को पस्त औ"
बर्बाद कर दो।
नींव की ईंटें हटाओ।
दब गए हैं जो, अभी तक जी रहे हैं।
जीवितों को इस महल के
बोझ से आजाद कर दो।
तोड़ना है पुण्य जो तोड़ो खुशी से।
जोड़ने का मोह जी का काल होगा।
अनसुनी करते रहे इस वेदना को,
एक दिन ऐसा अचानक हाल होगा:-
वज्र की दीवार यह फट जाएगी।
लपलपाती आग या सात्विक
प्रलय का रूप धरकर
नींव की आवाज बाहर आएगी।
वज्र की दीवार जब भी टूटती है,
नींव की यह वेदना
विकराल बन कर छूटती है।
दौड़ता है दर्द की तलवार बन कर
पत्थरों के पेट से नरसिंह ले अवतार।
कांपती है वज्र की दीवार।

15. लोहे के पेड़ हरे होंगे

लोहे के पेड़ हरे होंगे,
तू गान प्रेम का गाता चल,
नम होगी यह मिट्टी ज़रूर,
आँसू के कण बरसाता चल।

(1)
सिसकियों और चीत्कारों से,
जितना भी हो आकाश भरा,
कंकालों क हो ढेर,
खप्परों से चाहे हो पटी धरा ।

आशा के स्वर का भार,
पवन को लेकिन, लेना ही होगा,
जीवित सपनों के लिए मार्ग
मुर्दों को देना ही होगा।

रंगो के सातों घट उँड़ेल,
यह अँधियारी रँग जायेगी,
ऊषा को सत्य बनाने को
जावक नभ पर छितराता चल।

(2)
आदर्शों से आदर्श भिड़े,
प्रज्ञा प्रज्ञा पर टूट रही।
प्रतिमा प्रतिमा से लड़ती है,
धरती की किस्मत फूट रही।

आवर्तों का है विषम जाल,
निरुपाय बुद्धि चकराती है,
विज्ञान-यान पर चढी हुई
सभ्यता डूबने जाती है।

जब-जब मस्तिष्क जयी होता,
संसार ज्ञान से चलता है,
शीतलता की है राह हृदय,
तू यह संवाद सुनाता चल।

(3)
सूरज है जग का बुझा-बुझा,
चन्द्रमा मलिन-सा लगता है,
सब की कोशिश बेकार हुई,
आलोक न इनका जगता है।

इन मलिन ग्रहों के प्राणों में
कोई नवीन आभा भर दे,
जादूगर! अपने दर्पण पर
घिसकर इनको ताजा कर दे।

दीपक के जलते प्राण,
दिवाली तभी सुहावन होती है,
रोशनी जगत् को देने को
अपनी अस्थियाँ जलाता चल।

(4)
क्या उन्हें देख विस्मित होना,
जो हैं अलमस्त बहारों में,
फूलों को जो हैं गूँथ रहे
सोने-चाँदी के तारों में।

मानवता का तू विप्र!
गन्ध-छाया का आदि पुजारी है,
वेदना-पुत्र! तू तो केवल
जलने भर का अधिकारी है।

ले बड़ी खुशी से उठा,
सरोवर में जो हँसता चाँद मिले,
दर्पण में रचकर फूल,
मगर उस का भी मोल चुकाता चल।

(5)
काया की कितनी धूम-धाम!
दो रोज चमक बुझ जाती है;
छाया पीती पीयुष,
मृत्यु के उपर ध्वजा उड़ाती है ।

लेने दे जग को उसे,
ताल पर जो कलहंस मचलता है,
तेरा मराल जल के दर्पण
में नीचे-नीचे चलता है।

कनकाभ धूल झर जाएगी,
वे रंग कभी उड़ जाएँगे,
सौरभ है केवल सार, उसे
तू सब के लिए जुगाता चल।

(6)
क्या अपनी उन से होड़,
अमरता की जिनको पहचान नहीं,
छाया से परिचय नहीं,
गन्ध के जग का जिन को ज्ञान नहीं?

जो चतुर चाँद का रस निचोड़
प्यालों में ढाला करते हैं,
भट्ठियाँ चढाकर फूलों से
जो इत्र निकाला करते हैं।

ये भी जाएँगे कभी, मगर,
आधी मनुष्यतावालों पर,
जैसे मुसकाता आया है,
वैसे अब भी मुसकाता चल।

(7)
सभ्यता-अंग पर क्षत कराल,
यह अर्थ-मानवों का बल है,
हम रोकर भरते उसे,
हमारी आँखों में गंगाजल है।

शूली पर चढ़ा मसीहा को
वे फूल नहीं समाते हैं
हम शव को जीवित करने को
छायापुर में ले जाते हैं।

भींगी चाँदनियों में जीता,
जो कठिन धूप में मरता है,
उजियाली से पीड़ित नर के
मन में गोधूलि बसाता चल।

(8)
यह देख नयी लीला उनकी,
फिर उनने बड़ा कमाल किया,
गाँधी के लोहू से सारे,
भारत-सागर को लाल किया।

जी उठे राम, जी उठे कृष्ण,
भारत की मिट्टी रोती है,
क्या हुआ कि प्यारे गाँधी की
यह लाश न जिन्दा होती है?

तलवार मारती जिन्हें,
बाँसुरी उन्हें नया जीवन देती,
जीवनी-शक्ति के अभिमानी!
यह भी कमाल दिखलाता चल।

(9)
धरती के भाग हरे होंगे,
भारती अमृत बरसाएगी,
दिन की कराल दाहकता पर
चाँदनी सुशीतल छाएगी।

ज्वालामुखियों के कण्ठों में
कलकण्ठी का आसन होगा,
जलदों से लदा गगन होगा,
फूलों से भरा भुवन होगा।

बेजान, यन्त्र-विरचित गूँगी,
मूर्त्तियाँ एक दिन बोलेंगी,
मुँह खोल-खोल सब के भीतर
शिल्पी! तू जीभ बिठाता चल।

(1951)

16. संस्कार

कल कहा एक साथी ने, तुम बर्बाद हुए,
ऐसे भी अपना भरम गँवाया जाता है?
जिस दर्पण में गोपन-मन की छाया पड़ती,
वह भी सब के सामने दिखाया जाता है?

क्यों दुनिया तुमको पढ़े फकत उस शीशे में,
जिसका परदा सबके सम्मुख तुम खोल रहे?
'इसके पीछे भी एक और दर्पण होगा,'
कानाफूसी यह सुनो, लोग क्या बोल रहे?

तुम नहीं जानते बन्धु! चाहते हैं ये क्या,
इनके अपने विश्वास युगों से आते हैं,
है पास कसौटी, एक सड़ी सदियोंवाली,
क्या करें? उसी के ऊपर हमें चढ़ाते हैं।

सदियों का वह विश्वास, कभी मत क्षमा करो,
जो हृदय-कुंज में बैठ तुम्हीं को छलता है,
वह एक कसौटी, लीक पुरानी है जिस पर,
मारो उसको जो डंक मारते चलता है।

जब डंकों के बदले न डंक हम दे सकते,
इनके अपने विश्वास मूक हो जाते हैं,
काटता, असल में, प्रेत इन्हें अपने मन का,
मेरी निर्विषता से नाहक घबराते हैं।

(१९५० ई०)

17. जनतन्त्र का जन्म

(२६ जनवरी, १९५०)
सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

जनता?हां,मिट्टी की अबोध मूरतें वही,
जाडे-पाले की कसक सदा सहनेवाली,
जब अंग-अंग में लगे सांप हो चुस रहे
तब भी न कभी मुंह खोल दर्द कहनेवाली।

जनता?हां,लंबी - बडी जीभ की वही कसम,
"जनता,सचमुच ही, बडी वेदना सहती है।"
"सो ठीक,मगर,आखिर,इस पर जनमत क्या है?"
'है प्रश्न गूढ़ जनता इस पर क्या कहती है?"

मानो,जनता ही फूल जिसे अहसास नहीं,
जब चाहो तभी उतार सजा लो दोनों में;
अथवा कोई दूधमुंही जिसे बहलाने के
जन्तर-मन्तर सीमित हों चार खिलौनों में।

लेकिन होता भूडोल, बवंडर उठते हैं,
जनता जब कोपाकुल हो भृकुटि चढाती है;
दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

हुंकारों से महलों की नींव उखड़ जाती,
सांसों के बल से ताज हवा में उड़ता है,
जनता की रोके राह,समय में ताव कहां?
वह जिधर चाहती,काल उधर ही मुड़ता है।

अब्दों, शताब्दियों, सहस्त्राब्द का अंधकार
बीता;गवाक्ष अंबर के दहके जाते हैं;
यह और नहीं कोई,जनता के स्वप्न अजय
चीरते तिमिर का वक्ष उमड़ते जाते हैं।

सब से विराट जनतंत्र जगत का आ पहुंचा,
तैंतीस कोटि-हित सिंहासन तय करो
अभिषेक आज राजा का नहीं,प्रजा का है,
तैंतीस कोटि जनता के सिर पर मुकुट धरो।

आरती लिये तू किसे ढूंढता है मूरख,
मन्दिरों, राजप्रासादों में, तहखानों में?
देवता कहीं सड़कों पर गिट्टी तोड़ रहे,
देवता मिलेंगे खेतों में, खलिहानों में।

फावड़े और हल राजदण्ड बनने को हैं,
धूसरता सोने से श्रृंगार सजाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।

(1950)

18. नयी आवाज

कभी की जा चुकीं नीचे यहाँ की वेदनाएँ,
नए स्वर के लिए तू क्या गगन को छानता है?

[1]

बताएँ भेद क्या तारे? उन्हें कुछ ज्ञात भी हो,
कहे क्या चाँद? उसके पास कोई बात भी हो।
निशानी तो घटा पर है, मगर, किसके चरण की?
यहाँ पर भी नहीं यह राज़ कोई जानता है।

[2]

सनातन है, अचल है, स्वर्ग चलता ही नहीं है;
तृषा की आग में पड़कर पिघलता ही नहीं है।
मजे मालूम ही जिसको नहीं बेताबियों के,
नई आवाज की दुनिया उसे क्यों मानता है?

[3]

धुओं का देश है नादान! यह छलना बड़ी है,
नई अनुभूतियों की खान वह नीचे पड़ी है।
मुसीबत से बिंधी जो जिन्दगी, रौशन हुई वह,
किरण को ढूँढता लेकिन, नहीं पहचानता है।

[4]

गगन में तो नहीं बाकी, जरा कुछ है असल में,
नए स्वर का भरा है कोष पर, अब तक अतल में।
कढ़ेगी तोड़कर कारा अभी धारा सुधा की,
शरासन को श्रवण तक तू नहीं क्यों तानता है?

[5]

नया स्वर खोजनेवाले! तलातल तोड़ता जा,
कदम जिस पर पड़े तेरे, सतह वह छोड़ते जा;
नई झंकार की दुनिया खत्म होती कहाँ पर?
वही कुछ जानता, सीमा नहीं जो मानता है।

[6]

वहाँ क्या है कि फव्वारे जहाँ से छूटते हैं,
जरा-सी नम हुई मिट्टी कि अंकुर फूटते हैं?
बरसता जो गगन से वह जमा होता मही में,
उतरने को अतल में क्यों नहीं हठ ठानता है?

[7]

हृदय-जल में सिमट कर डूब, इसकी थाह तो ले,
रसों के ताल में नीचे उतर अवगाह तो ले।
सरोवर छोड़ कर तू बूँद पीने की खुशी में,
गगन के फूल पर शायक वृथा संधानता है।

19. स्वर्ग के दीपक

[उनके लिए जो हमारी कतार में आने से इनकार करते हैं]

कहता हूँ, मौसिम फिरा, सितारो ! होश करो,
कतरा कर टेढी चाल भला अब क्या चलना ?
माना, दीपक हो बड़े दिव्य, ऊंचे कुल के,
लेकिन, मस्ती में अकड़-अकड़ कर क्या जलना ?

सब है परेड में खड़े, जरा तुम भी तनकर,
सिलसिला बाँध हो जाओ खडे कतारों में,
कसे लगता है भला तुम्हें गृम्फित रहना
इस तरह, तिमिर के टेढ़े-मेढ़े तारों में ?

आगाही सुनते नहीं, सितारे हँसते हैं,
कहते कवि की कथा निराली होती है;
देखती कला विधि के विधान में भी त्रुटियाँ;
कल्पना, सत्य ही, खाम-खयाली होती है ।

मिट्टीवाले बँधकर कतार में चला करें,
हमको क्या ? हम तो अमरलोक के वासी है;
अम्बर पर कब मरनेवालों की रीति चली ?
सुरपति होकर भी इन्द्र प्रसिद्ध विलासी हैं ।

अच्छा, तब प्यारे ! और चार दिन मौज करो,
भूडोल नहीं नीचे मिट्टी पर दम लेगा;
लीलेगा सारा व्योम और पूर्णहुति में
वह नहीं स्वर्ग से कभी ग्रास कुछ कम लेगा ।

मैं देख रहा हूँ साफ, कौंधती है बिजली
अँधियाली में भावी की घोर घटाओं पर,
औ' मृत्ति वज्र बनकर अमोघ-सी टूट रही
नीचे से उड़ ऊपर की बडी अटाओं पर ।

मत हँसो कि मन में छिपी हमारी आँखों पर
जादू-टोने का धुआँ न छाया करता है,
देखता नियन्ता जो कुछ भी जग से छिपकर,
सबसे पहले वह हमें दिखाया करता है ।

मैं देख रहा हूँ, शैल उलटकर गिरते हैं,
सागर का जल ऊपर को भागा जाता है;
है नाच रहा घिरनी होकर अम्बर सारा,
नक्षत्रपुंज पत्तों-सा चक्कर खाता है ।

क्या तुम संभाल लोगे इस व्योम-विवर्तन को ?
जादू-टोने से हवा न बाँधी जायेगी ।
लाकर कतार के भीतर तुम्हें खड़ा करने
रूई के पुतलो ! निश्चय, आँधी आयेगी ।
(1951)

20. शबनम की जंजीर

रचना तो पूरी हुई. जान भी है इसमें?
पूछूं जो कोई बात, मूर्ति बतलायेगी ?
लग जाय आग यदि किसी रोज देवालय में,
चौंकेगी या यह खड़ी-खड़ी जल जायेगी ?

ढाँचे में तो सब ठीक-ठीक उतरा, लेकिन,
बेजान बुतों के कारीगर, कुछ होश करो;
जब तक पत्थर के भीतर सांस नहीं चलती,
सौगंध इसी की तुम्हें, न तुम संतोष करो।

भर सको अगर तो प्रतिमा में चेतना भरो,
यदि नहीं, निमंत्रण दो जीवन के दानी को।
विभ्राट महाबल जहाँ थके से दीख रहे,
आगे आने दो वहाँ क्षीणबल प्राणी को।

तैरता हवा में जो, वह क्या भारी होगा?
सपनों के तो सारथी क्षीणबल होते हैं;
संसार पुष्प से अपने को भूषित करता,
ये गंधभार अपनी आत्मा में ढोते हैं।

सपनों का वह सारथी, यान जिसका कोमल,
आँखों से ओझल ह्रदय-ह्रदय में चलता है,
जिसके छूते ही मन की पलक उधर जाती,
विश्वास भ्रान्ति को भेद दीप सा बलता है।

सपनों का वह सारथी, रात की छाया में,
आते जिस की श्रुति में संवाद सितारों से,
सरिताएं जिस से अपना हाल कहा करतीं,
बातें करता जो फूलों और पहाड़ों से।

पपड़ियाँ तोड़ फूटते जिंदगी के सोते,
रथ के चक्के की लीक जहाँ भी पड़ती है।
प्रतिमा सजीव होकर चलने-फिरने लगतीं,
मिटटी की छाती में चेतना उमड़ती है।

छेनी-टांकी क्या करें? जिंदगी की साँसें,
लोहे पर धरकर नहीं बनाई जाती हैं,
धाराएं जो मानव को उद्वेलित करतीं,
यंत्रों के बल से नहीं बहाई जाती हैं।

विज्ञान काम कर चुका; हाथ उसका रोको;
आगे आने दो गुणी! कला कल्याणी को।
जो भार नहीं विभ्राट, महाबल उठा सके,
दो उसे उठाने किसी क्षीणबल प्राणी को।

मानव-मन को बेधते फूल के दल केवल,
आदमी नहीं कटता बरछों से, तीरों से;
लोहे की कड़ियों की साज़िश बेकार हुई,
बांधों मनुष्य को शबनम की जंजीरों से।

(1950)

21. तुम क्यों लिखते हो

तुम क्यों लिखते हो? क्या अपने अंतरतम को
औरों के अंतरतम के साथ मिलाने को?
अथवा शब्दों की तह पर पोशाक पहन
जग की आँखों से अपना रूप छिपाने को?

यदि छिपा चाहते हो दुनिया की आँखों से
तब तो मेरे भाई! तुमने यह बुरा किया।
है किसे फिक्र कि यहाँ कौन क्या लाया है?
तुमने ही क्यों अपने को अदभुत मान लिया?

कहनेवाले जाने क्या-क्या कहते आए,
सुनने वालों ने मगर कहो क्या पाया है?
मथ रही मनुज को जो अनंत जिज्ञासाएं,
उत्तर क्या उनका कभी जगत में आया है?

अच्छा बोलो, आदमी एक मैं भी ठहरा,
अम्बर से मेरे लिए चीज़ क्या लाए हो?
मिटटी पर हूँ मैं खड़ा ज़रा नीचे देखो,
ऊपर क्या है जिस पर टकटकी लगाए हो?

तारों में है संकेत? चाँदनी में छाया?
बस यही बात हो गई सदा दुहराने की?
सनसनी, फेन, बुदबुद, सब कुछ सोपान बना,
अच्छी निकली यह राह सत्य तक जाने की।

दावा करते हैं शब्द जिसे छू लेने का,
क्या कभी उसे तुमने देखा या जाना है?
तुतले कंपन उठते हैं जिस गहराई से,
अपने भीतर क्या कभी उसे पहचाना है?

जो कुछ खुलता सामने, समस्या है केवल,
असली निदान पर जड़े वज्र के ताले हैं,
उत्तर शायद हो छिपा मूकता के भीतर
हम तो प्रश्नों का रूप सजाने वाले हैं।

तब क्यों रचते हो वृथा स्वांग मानो सारा,
आकाश और पाताल तुम्हारे कर में हों?
मानो मनुष्य नीचे हो तुमसे बहुत दूर,
मानो कोई देवता तुम्हारे स्वर में हो।

मिहिका रचते हो? रचो; किन्तु क्या फल इसका?
खुलने की जोखिम से वह तुम्हें बचाती है?
लेकिन मनुष्य की आभा और सघन होती,
धरती की किस्मत और भरमती जाती है।

धो डालो फूलों का पराग गालों पर से,
आनन पर से यह आनन अपर हटाओ तो
कितने पानी में हो? इसको जग भी देखे,
तुम पल भर को केवल मनुष्य बन जाओ तो।

सच्चाई की पहचान कि पानी साफ़ रहे
जो भी चाहे, ले परख जलाशय के तल को।
गहराई का वे भेद छिपाते हैं केवल
जो जान बूझ गंदला करते अपने जल को।

(1950)

22. इच्छा-हरण

धरती ने भेजा था सूरज-चाँद स्वर्ग से लाने,
भला दीप लेकर लौटूं किसको क्या मुख दिखलाने?
भर न सका अंजलि, तू पूरी कर न सका यह आशा,
उलटे, छीन रहा है मुझसे मेरी चिर-अभिलाषा ।
रहने दे निज कृपा, हुआ यदि तू ऐसा कंगाल,
मनसूबे मत छीन, कलेजे से मत कसक निकाल ।

माना, है अधिकार तुझे दानी सब कुछ देने का,
मगर, निराला खेल कौन इच्छाएँ हर लेने का ?
अचल साध्य-साधक हम दोनों, अचल कामना-कामी,
इतनी सीधी बात तुझे ही ज्ञात न अन्तर्यामी !
माँग रहा चन्द्रमा स्वर्ग का, मांग रहा दिनमान,
नहीं माँगने मैं आया इच्छाओं का अवसान !

(क्रमांक १५-२२ तक रचनायें पहली बार 'धूप और धुआँ'
में प्रकाशित हुई थीं)

23. कवि की मृत्यु

जब गीतकार मर गया, चाँद रोने आया,
चांदनी मचलने लगी कफ़न बन जाने को
मलयानिल ने शव को कन्धों पर उठा लिया,
वन ने भेजे चन्दन श्री-खंड जलाने को !

सूरज बोला, यह बड़ी रोशनीवाला था,
मैं भी न जिसे भर सका कभी उजियाली से,
रंग दिया आदमी के भीतर की दुनियां को,
इस गायक ने अपने गीतों की लाली से !

बोला बूढा आकाश, ध्यान जब यह धरता,
मुझमे यौवन का नया वेग जम जाता था।
इसके चिंतन में डुबकी एक लगाते ही,
तन कौन कहे,मन भी मेरा रंग जाता था।

देवों ने कहा, बड़ा सुख था इसके मन की
गहराई में डूबने और उतराने में।
माया बोली, मैं कई बार थी भूल गयी,
अपने ही गोपन भेद इसे बतलाने में !

योगी था, बोला सत्य, भागता मैं फिरता,
वह जान बढ़ाये हुए दौड़ता चलता था,
जब-तब लेता यह पकड़ और हंसने लगता,
धोखा देकर मैं अपना रूप बदलता था !

मर्दों को आई याद बांकपन की बातें,
बोले, जो हो, आदमी बड़ा अलबेला था।
जिसके आगे तूफ़ान अदब से झुकते हैं,
उसको भी इसने अहंकार से झेला था !

नारियां बिलखने लगीं, बांसुरी के भीतर
जादू था कोई अदा बड़ी मतवाली थी।
गर्जन में भी थी नमी, आग से भरे हुए,
गीतों में भी कुछ चीज रुलाने वाली थी !

वे बड़ी बड़ी आँखें आंसू से भरी हुई,
पानी में जैसे कमल डूब उतराता हो,
वह मस्ती में झूमते हुए उसका आना,
मानो, अपना ही तनय झूमता आता हो !

चिंतन में डूबा हुआ सरल भोला-भाला,
बालक था, कोई दिव्य पुरुष अवतारी था,
तुम तो कहते हो मर्द, मगर, मन के भीतर,
यह कलावंत हमसे भी बढ़कर नारी था।

चुपचाप जिन्दगी भर इसने जो जुल्म सहे,
उतना नारी भी कहाँ मौन हो सकती है ?
आँखों के आंसू मन के भेद जता जाते,
कुछ सोच समझ जिह्वा चाहे चुप रहती है !

पर, इसे नहीं रोने का भी अवकाश मिला,
सारा जीवन कट गया आग सुलगाने में,
आखिर,वह भी सो गया जिन्दगी ने जिसको,
था लगा रखा सोतों को छेड़ जगाने में !

बेबसी बड़ी उन बेचारों की क्या कहिये ?
चुपचाप जिन्हें जीवन भर जलना होता है,
ऊपर नीचे द्वेषों के कुंत तने होते,
बचकर उनको बेदाग़ निकलना होता है !

जाओ, कवि, जाओ मिला तुम्हे जो कुछ हमसे
दानी को उसके सिवा नहीं कुछ मिलता है,
चुन-चुन कर हम तोड़ते वही टहनी केवल,
जिस पर कोई अपरूप कुसुम आ खिलता है !

विष के प्याले का मोल और क्या हो सकता ?
प्रेमी तो केवल मधुर प्रीत ही देता है,
कवि को चाहे संसार भेंट दे जो, लेकिन,
बदले में वह निष्कपट गीत ही देता है !

आवरण गिरा, जगती की सीमा शेष हुई,
अब पहुँच नहीं तुम तक इन हा-हाकारों की,
नीचे की महफ़िल उजड़ गयी, ऊपर कल से
कुछ और चमक उठेगी सभा सितारों की।

(1952)

 
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