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सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला
Suryakant Tripathi Nirala
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Naye Patte Suryakant Tripathi Nirala

नये पत्ते सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला

1. ख़ून की होली जो खेली

रँग गये जैसे पलाश;
कुसुम किंशुक के, सुहाए,
कोकनद के पाए प्राण,
ख़ून की होली जो खेली ।

निकले क्या कोंपल लाल,
फाग की आग लगी है,
फागुन की टेढ़ी तान,
ख़ून की होली जो खेली ।

खुल गई गीतों की रात,
किरन उतरी है प्रात की;
हाथ कुसुम-वरदान,
ख़ून की होली जो खेली ।

आई सुवेश बहार,
आम-लीची की मंजरी;
कटहल की अरघान,
ख़ून की होली जो खेली ।

विकच हुए कचनार,
हार पड़े अमलतास के;
पाटल-होठों मुसकान,
ख़ून की होली जो खेली ।

2. राजे ने अपनी रखवाली की

राजे ने अपनी रखवाली की;
किला बनाकर रहा;
बड़ी-बड़ी फ़ौजें रखीं ।
चापलूस कितने सामन्त आए ।
मतलब की लकड़ी पकड़े हुए ।
कितने ब्राह्मण आए
पोथियों में जनता को बाँधे हुए ।
कवियों ने उसकी बहादुरी के गीत गाए,
लेखकों ने लेख लिखे,
ऐतिहासिकों ने इतिहास के पन्ने भरे,
नाट्य-कलाकारों ने कितने नाटक रचे
रंगमंच पर खेले ।
जनता पर जादू चला राजे के समाज का ।
लोक-नारियों के लिए रानियाँ आदर्श हुईं ।
धर्म का बढ़ावा रहा धोखे से भरा हुआ ।
लोहा बजा धर्म पर, सभ्यता के नाम पर ।
ख़ून की नदी बही ।
आँख-कान मूंदकर जनता ने डुबकियाँ लीं ।
आँख खुली--राजे ने अपनी रखवाली की ।

3. दग़ा की

चेहरा पीला पड़ा ।
रीढ़ झुकी । हाथ जोड़े ।
आंख का अन्धेरा बढ़ा ।
सैकड़ों सदियां गुज़रीं ।
बड़े-बड़े ऋषि आए, मुनि आए, कवि आए,
तरह-तरह की वाणी जनता को दे गए ।
किसी ने कहा कि एक तीन हैं,
किसी ने कहा कि तीन तीन हैं ।
किसी ने नसें टोईं, किसी ने कमल देखे ।
किसी ने विहार किया, किसी ने अंगूठे चूमे ।
लोगों ने कहा कि धन्य हो गए ।
मगर खंजड़ी न गई ।
मृदंग तबला हुआ,
वीणा सुर-बहार हुई ।
आज पियानो के गीत सुनते हैं ।
पौ फटी ।
किरनों का जाल फैला ।
दिशाओं के होंठ रंगे ।
दिन में, वेश्याएं जैसे रात में ।
दग़ा की इस सभ्यता ने दग़ा की ।

4. झींगुर डटकर बोला

गांधीवादी आये,
कांग्रेसमैन टेढ़े के;
देर तक, गांधीवाद क्या है, समझाते रहे ।
देश की भक्ती से,
निर्विरोध शक्ती से,
राज अपना होगा;
ज़मींदार, साहूकार अपने कहलाएंगे
शासन की सत्ता हिल जाएगी;
हिन्दू और मुसलमान
वैरभाव भूलकर जल्द गले लगेंगे,
जितने उत्पात हैं;

नौकरों के लिए हुए;
जब तक इनका कोई
एक आदमी भी होगा,
चूल नहीं बैठने की ।

इस प्रकार जब बघार चलती थी,
ज़मींदार का गोड़इत
दोनाली लिये हुए
एक खेत फ़ासले से
गोली चलाने लगा ।
भीड़ भगने लगी ।
कांसटेब्ल खड़ा हुआ ललकारता रहा ।

झींगुर ने कहा,
"चूंकि हम किसान-सभा के,
भाई जी के मददगार
ज़मींदार ने गोली चलवाई
पुलिस के हुक्म की तामीली की ।
ऐसा यह पेच है ।"

5. चर्ख़ा चला

वेदों का चर्ख़ा चला, सदियां गुज़रीं ।
लोग-बाग़ बसने लगे ।
फिर भी चलते रहे ।
गुफ़ायों से घर उठाये ।
भेड़ों से गायें रखीं ।
जंगल से बाग और उपवन तैयार किये ।
खुली ज़बां बंधने लगी ।
वैदिक से संवर दी भाषा संस्कृत हुई ।
नियम बने, शुद्ध रूप लाये गये,
अथवा जंगली सभ्य हुए वेशवास से ।
कड़े कोस ऐसे कटे ।
खोज हुई, सुख के साधन बढ़े-
जैसे उबटन से साबुन ।

वेदों के बाद जाति चार भागों में बंटी,
यही रामराज है ।
वाल्मीकि ने पहले वेदों की लीक छोड़ी
छन्दों में गीत रचे, मंत्रों को छोड़कर,
मानव को मान दिया,
धरती की प्यारी लड़की सीता के गाने गाये ।

कली ज्योति में खिली
मिट्टी से चढ़ती हुई ।
'वर्जिन स्वैल, 'गुड अर्थ', अब के परिणाम हैं ।
कृष्ण ने भी ज़मीं पकड़ी,
गोवर्धन को पुजाया;
मानव को, गायों और बैलों को मान दिया ।

हल को बलदेव ने हथियार बनाया,
कंधे पर डाले फिरे ।
खेती हरी-भरी हुई ।
यहां तक पहुंचते अभी दुनियां को देर है ।

 
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