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गोपालदास नीरज
Gopal Das Neeraj
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नदी किनारे गोपालदास नीरज

निर्जन की नीरव डाली का मैं फूल
कितना एकाकी मम जीवन
अपनी कितनी परवशता है
मुझको अपने जीवन में हा ! कभी न शान्ति मिलेगी
कितनी अतृप्ति है
साथी ! सब सहना पड़ता है
क्यों उसको जीवन भार न हो
मुझको जीवन आधार नहीं मिलता है
तुमने कितनी निर्दयता की
क्यों रुदनमय हो न उसका गान
मत छुप कर वार करो
खग! उड़ते रहना जीवन-भर
चल रे! चल रे! थके बटोही! थोडी दूर और मंजिल है
मैंने बस चलना सीखा है
लहरों में हलचल
मैं क्यों प्यार किया करता हूँ
जीवन-समर, जीवन-समर
जग ने प्यार नहीं पहचाना
तब मेरी पीड़ा अकुलाई
तिमिर का छोर
इन नयनों से सदैव मैंने सिर्फ नीर झरते देखा है
कोई क्यों मुझसे प्यार करे
मधु में भी तो छुपा गरल है
रोने वाला ही गाता है
मैंने जीवन विषपान किया, मैं अमृत-मंथन क्या जानूँ
धड़क रही मेरी छाती है
टूटता सरि का किनारा!
आज आँधी आ रही है
मेरा कितना पागलपन था
अब तो मुझे न और रुलाओ
घोर तम अब छा रहा है
अब तो उठते नहीं पैर भी कैसे चलता जाऊँ पथ पर
पंथी! तू क्यों घबराता है
तेरी भारी हार हुई थी
डगमगाते पाँव मेरे आज जीवन की डगर पर
पीर मेरी, प्यार बन जा
हार न अपनी मानूँगा
नष्ट हुआ मधुवन का यौवन
आज माँझी ने विवश हो छोड़ दी पतवार
मैं रोदन ही गान समझता
तुम गए चितचोर
 
 
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