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मीर तक़ी मीर
Mir Taqi Mir
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मीर तक़ी मीर

मीर तकी मीर (१७२३-१८१०) का जन्म आगरे में हुआ। उनका बचपन उनके पिता की देख-रेख में गुज़रा। उन के पिता का मीर के चरित्र निर्माण में बहुत बड़ा योगदान है।अपने पिता की मौत के बाद वह १७३४ में दिल्ली आ गए। पढ़ाई पूरी करने के बाद वह वहाँ ही दरबारी कवि बन गए।अहमद शाह अब्दाली के हमलों की तबाही के बाद वह १७८२ में लखनऊ आ गए और अंत तक यहाँ ही रहे। उन की पूरी रचना 'कुल्लियात' में छह दीवान शामिल हैं। उन की रचना के कुल १३५८५ शेयर हैं। मीर की कविता दर्द के साथ ओतप्रोत है।


हिन्दी में कविता/शायरी मीर तकी मीर

अए हम-सफ़र न आब्ले
अपने तड़पने की
अब जो इक हसरत-ए-जवानी है
अब नहीं सीने में मेरे जा-ए-दाग़
अमीरों तक रसाई हो चुकी बस
अश्क आंखों में कब नहीं आता
अंदोह से हुई न रिहाई तमाम शब
आए हैं 'मीर' काफ़िर हो कर ख़ुदा के घर में
आए हैं मीर मुँह को बनाए
आओ कभू तो पास हमारे भी नाज़ से
आम हुक्म-ए-शराब करता हूँ
आरज़ूएं हज़ार रखते हैं
आह जिस वक़्त सर उठाती है
आ के सज्जादः नशीं क़ैस हुआ मेरे बाद
आ जायें हम नज़र जो कोई दम बहुत है याँ
आँखों में जी मेरा है इधर यार देखना
इधर से अब्र उठकर जो गया है
इब्तिदा-ऐ-इश्क है रोता है क्या
इश्क़ क्या क्या आफ़तें लाता रहा
इश्क़ में कुछ नहीं दवा से नफ़ा
इश्क़ में जी को सब्र-ओ-ताब कहाँ
इश्क़ में ज़िल्लत हुई ख़िफ़्फ़त हुई तोहमत हुई
इश्क़ हमारे ख़याल पड़ा है ख़्वाब गई आराम गया
इस अहद में इलाही मोहब्बत को क्या हुआ
उम्र भर हम रहे शराबी से
उलटी हो गई सब तदबीरें, कुछ न दवा ने काम किया
उस का ख़याल चश्म से शब ख़्वाब ले गया
ऐ हुबे-जाह वालो जो आज ताजवर है
कल शब-ए-हिज्राँ थी लब पर नाला बीमाराना था
कहते हैं बहार आई गुल फूल निकलते हैं
कहते हो इत्तिहाद है हम को
कहा मैंने कितना है गुल का सबात
काबे में जाँबलब थे हम दूरी-ए-बुताँ से
काश उठें हम भी गुनहगारों के बीच
कुछ करो फ़िक्र मुझ दीवाने की
कुछ तो कह वस्ल की फिर रात चली जाती है
कुछ मौज-ए-हवा पेचाँ ऐ 'मीर' नज़र आई
कोफ़्त से जान लब पर आई है
क्या कहिए क्या रक्खें हैं हम तुझ से यार ख़्वाहिश
क्या कहूँ तुम से मैं के क्या है इश्क़
क्या कहें आतिश-ए-हिज्राँ से गले जाते हैं
क्या मुआफ़िक़ हो दवा इश्क़ के बीमार के साथ
क्या मैं भी परेशानी-ए-ख़ातिर से क़रीं था
क्या लड़के दिल्ली के हैं अय्यार और नट-खट
क्या हक़ीक़त कहूँ कि क्या है इश्क़
ख़ातिर करे है जमा वो हर बार एक तरह
गुल को महबूब में क़यास किया
गुल ब बुलबुल बहार में देखा
ग़ज़ल 'मीर' की कब पढ़ाई नहीं
ग़म रहा जब तक कि दम में दम रहा
चमन में गुल ने जो कल दावा-ए-जमाल किया
चलते हो तो चमन को चलिये
चाक करना है इसी ग़म से
छाती जला करे है सोज़-ए-दरूँ बला है
छुटता ही नहीं हो जिसे आज़ार-ए-मोहब्बत
जफ़ाएँ देख लियाँ बेवफ़ाइयाँ देखीं
जब नाम तिरा लीजिए तब चश्म भर आवे
जब रोने बैठता हूँ तब क्या कसर रहे है
जब हम-कलाम हम से होता है पान खा कर
जिन के लिए अपने तो यूँ जान निकलते हैं
जिन जिन को था ये इश्क़ का आज़ार मर गए
जिस जगह दौर-ए-जाम होता है
जिस सर को ग़रूर आज है याँ ताजवरी का
जीते-जी कूचा-ऐ-दिलदार से जाया न गया
जो इस शोर से 'मीर' रोता रहेगा
जो कहो तुम सो है बजा साहब
जो तू ही सनम हम से बेज़ार होगा
जोशिश-ए-अश्क से हूँ आठ पहर पानी में
ज़ख्म झेले दाग़ भी खाए बोहत
ताब-ए-दिल सर्फ़-ए-जुदाई हो चुकी
ता-ब मक़्दूर इंतिज़ार किया
तुम नहीं फ़ितना-साज़ सच साहब
तेरा रुख़-ए-मुख़त्तत क़ुरआन है हमारा
था मुस्तेआर हुस्न से उसके जो नूर था
दम-ए-सुबह बज़्म-ए-ख़ुश जहाँ शब-ए-ग़म
दामन वसीअ था तो काहे को चश्म तरसा
दिखाई दिये यूँ कि बेख़ुद किया
दिल-ए-बेताब आफ़त है बला है
दिल-ऐ-पुर-खूँ की इक गुलाबी से
दिल की बात कही नहीं जाती, चुप के रहना ठाना है
दिल गए आफ़त आई जानों पर
दिल बहम पहुँचा बदन में तब से सारा तन जला
दिल से शौक़-ए-रुख़-ए-निको न गया
दुश्मनी हमसे की ज़माने ने
देख तो दिल कि जाँ से उठता है
दो दिन से कुछ बनी थी सो फिर शब बिगड़ गई
न दिमाग है कि किसू से हम
न सोचा न समझा न सीखा न जाना
नहीं विश्वास जी गँवाने के
नाला जब गर्मकार होता है
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
फ़कीराना आए सदा कर चले
फ़लक करने के क़ाबिल आसमाँ है
फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ में सैर जो की हम ने जा-ए-गुल
ब-रंग-ए-बू-ए-गुल, इस बाग़ के हम आश्ना होते
बात क्या आदमी की बन आई
बातें हमारी याद रहें फिर बातें ऐसी न सुनिएगा
बार-हा गोर-ए-दिल झंका लाया
बारे दुनिया में रहो ग़म-ज़दा या शाद रहो
बेकली बेख़ुदी कुछ आज नहीं
बेखुदी कहाँ ले गई हमको
बे-यार शहर दिल का वीरान हो रहा है
मक्का गया मदीना गया कर्बला गया
मरते हैं हम तो आदम-ए-ख़ाकी की शान पर
मर मर गए नज़र कर उस के बरहना तन में
मर रहते जो गुल बिन तो सारा ये ख़लल जाता
मसाइब और थे पर दिल का जाना
मानिंद-ए-शमा मजलिस-ए-शब अश्कबार पाया
मामूर शराबों से कबाबों से है सब देर
मिलो इन दिनों हमसे इक रात जानी
मीर दरिया है, सुने शेर ज़बानी उस की
मुँह तका ही करे है जिस-तिस का
मेरे संग-ए-मज़ार पर फ़रहाद
मेहर की तुझसे तवक़्क़ो थी सितमगर निकला
मौसम-ए-गुल आया है यारो कुछ मेरी तदबीर करो
यही इश्क़ ही जी खपा जानता है
यार ने हम से बे-अदाई की
यार बिन तल्ख़ जिंदगानी थी
यार मेरा बहुत है यार-फ़रेब
यारो मुझे मुआफ़ करो मैं नशे में हूँ
ये 'मीर'-ए-सितम-कुश्ता किसू वक़्त जवाँ था
रही नगुफ़्ता मेरे दिल में दास्ताँ मेरी
रफ़्तगाँ में जहाँ के हम भी हैं
रंज खींचे थे दाग़ खाए थे
रात गुज़रे है मुझे नज़अ में रोते रोते
राहे-दूरे-इश्क़ से रोता है क्या
लज़्ज़त से नहीं ख़ाली जानों का खपा जाना
लड़ के फिर आए डर गए शायद
वहशत थी हमें भी वही घर-बार से अब तक
वाँ वो तो घर से अपने पी कर शराब निकला
वो देखने हमें टुक बीमारी में न आया
शब को वो पीए शराब निकला
शहर से यार सवार हुआ जो सवाद में ख़ूब ग़ुबार है आज
शायद उस सादा ने रखा है ख़त
शिकवा करूँ मैं कब तक उस अपने मेहरबाँ का
शेर के पर्दे में मैं ने ग़म सुनाया है बहुत
सहर गह-ए-ईद में दौर-ए-सुबू था
सुख़न मुश्ताक़ है आलम हमारा
हम आप ही को अपना मक़्सूद जानते हैं
हम जानते तो इश्क न करते किसू के साथ
हमारे आगे तेरा जब किसी ने नाम लिया
हर जी हयात का है
हस्ती अपनी होबाब की सी है
है ग़ज़ल 'मीर' ये 'शिफ़ाई' की
हो गई शहर शहर रुस्वाई
होती है अगर्चे कहने से यारों पराई बात

Mir Taqi Mir


Poetry in Hindi Mir Taqi Mir

Aah Jis Waqt Sar Uthati Hai
Aa Jaayen Ham Nazar Jo Koi Dam Bahut Hai Yaan
Aa Ke Sajjad: Nashin Qais Hua
Aam Huqm-e-Sharab Karta Hoon
Aankhon Mein Jee Mera Hai Idhar Yaar Dekhna
Aao Kabhu To Paas Hamare
Aarzuen Hazaar Rakhte Hain
Aaye Hain Mir Kafir Ho Kar
Aaye Hain Mir Munh Ko Banaye
Ab Jo Ik Hasrat-e-Jawani Hai
Ab Nahin Seene Mein Mere Ja-e-Dagh
Ai Hub-e-Jaah Walo Jo Aaj Taajwar Hai
Ameeron Tak Rasaai Ho Chuki Bas
Andoh Se Hui Na Rihai Tamam Shab
Apne Tarpane Ki
Ashq Aankhon Mein Kab Nahin Aata
Aye Ham-Safar Na Aable
Baare Duniya Mein Raho Gham-Zada
Baar-Ha Gor-e-Dil Jhanka Laya
Baatein Hamari Yaad Rahein Phir
Baat Kya Aadmi Ki Ban Aayi
Ba-Rang-e-Boo-e-Gul Is Baagh Ke Ham Aashna Hote
Bekali Bekhudi Kuchh Aaj Nahin
Bekhudi Kahan Le Gayi Hamko
Be-Yaar Shahar Dil Ka Veeran Ho Raha Hai
Chaak Karna Hai Isi Gham Se
Chalte Ho To Chaman Ko Chaliye
Chaman Mein Gul Ne Jo Kal
Chhati Jala Kare Hai
Chhut Ta Nahin Ho Jise Aazar-e-Mohabbat
Daman Vaseea Tha To Kahe Ko Chashm Tarsa
Dam-e-Subah Bazm-e-Khush Jahan
Dekh To Dil Ke Jaan Se Uthta Hai
Dikhayi Diye Yun Ke Bekhud Kiya
Dil Baham Pahuncha Badan Mein
Dil-e-Betab Aafat Hai Bala Hai
Dil-e-Pur-Khoon Ki Ik Gulabi Se
Dil Gaye Aafat Aai Jano Par
Dil Ki Baat Kahi Nahin Jaati
Dil Se Shauq-e-Rukh Naku Na Gaya
Do Din Se Kuchh Bani Thi
Dushmani Hamse Ki Zamae Ne
Falak Karne Ke Qabil Aasman Hai
Faqeerana Aaye Sada Kar Chale
Fasl-e-Khijan Mein Sair Jo Ki Ham Ne
Gham Raha Jab Tak Ke Dam Mein Dam Raha
Ghazal 'Mir' Ki Kab Parhai Nahin
Gul Ba Bulbul Bahar Mein Dekha
Gul Ko Mehboob Mein Qayaas Kiya
Hai Ghazal 'Mir' Ye 'Shifai' Ki
Ham Aap Hi Ko Apna Maqsood Jaante Hain
Hamare Aage Jab Kisi Ne Tera Naam Liya
Ham Jaante To Ishq Na Karte Kisoo Ke Saath
Har Jee Hayaat Ka Hai Sabab Jo Hayaat Ka
Hasti Apni Habab Ki Si Hai
Ho Gayi Shahar Shahar Ruswai
Hoti Hai Garche Kehne Se Yaaro Parayi Baat
Ibtada-e-Ishq Hai Rota Hai Kya
Idhar Se Abar Uthkar Jo gaya Hai
Is Ahd Mein Ilaahi Muhabbat Ko Kya Hua
Ishq Hamare Khayal Para Hai
Ishq Kya Kya Aaftein Lata Raha
Ishq Mein Jee Ko Sabr-o-Taab Kahan
Ishq Mein Kuchh Nahin Dawa Se Nafa
Ishq Mein Zillat Hui Khiffat Hui Tohmat Hui
Jab Ham-Kalam Ham Se Hota Hai
Jab Naam Tira Leejiye
Jab Rone Baithta Hoon
Jafayen Dekh Liyan Bewafayian Dekhin
Jeete Jee Koocha-e-Yaar Se Jaya Na Gaya
Jin Jin Ko Tha Ye Ishq Ka Aazar Mar Gaye
Jin Ke Liye Apne To Yoon Jaan Nikalte Hain
Jis Jagah Daur-e-Jaam Hota Hai
Jis Sar Ko Garur Aaj Hai Yan Tajawari Ka
Jo Is Shor Se Mir Rota Rahega
Jo Kaho Tum So Hai Baja Sahib
Joshish-e-Ashq Se Hoon Aath Pahar Pani Mein
Jo Tu Hi Sanam Humse Be-Zar Hoga
Kaabe Mein Jaan-ba-Lab The
Kaha Maine Kitna Hai Gul Ka Sabat
Kal Shab-e-Hizran Thi
Kahte Hain Bahar Aai Gul Phool Nikalte Hain
Kahte Ho Ittihad Hai Ham Ko
Kash Uthein Ham Bhi Gunahgaron Ke Beech
Khatir Karei Hai Jama Vo
Koft Se Jaan Lab Pe Aai Hai
Kuchh Karo Fikr Mujh Deewane Ki
Kuchh Mauj-e-Hawa Pechan Ai 'Mir' Nazar Aai
Kuchh To Kah Vasal Ki Phir Raat Chali Jaati Hai
Kya Haqiqat Kahoon Ki Kya Hai Ishq
Kya Kahein Aatish-e-Hizran Se
Kya Kahiye Kya Rakhein Hain Ham
Kya Kahun Tum Se Main Ke Kya Hai Ishq
Kya Larke Dilli Ke Hain Ayaar Aur Nat-Khat
Kya Main Bhi Preshani-e-Khatir Se Kareen Tha
Kya Muafik Ho Dawa Ishq Ke Bimar Ke Sath
Lar Ke Phir Aaye Dar Gaye Shayad
Lazzat Se Nahin Khali Jano Ka Khapa Jana
Mamoor Sharabon Se Kababon Se Hai
Manind-e-Shama-Majlis Shab Ashk-Bar Paya
Mar Mar Gaye Nazar Kar Us Ke Barahna Tan Mein
Mar Rahte Jo Gul Bin To
Marte Hain Ham To Aadam-e-Khaki Ki Shan Par
Masaaib Aur The Par Dil Ka Jana
Mausam-e-Gul Aaya Hai Yaaro
Mecca Gaya Madeena Gaya
Mehar Ki Tujhse Tavaqqo Thi
Mere Sang-e-Mazar Par Farhad
Milo In Dino Hamse Ik Raat Jani
Mir Dariya Hai Sune Sher Zabani Uski
Munh Taka Hi Kare Hai Jis Tis Ka
Na Dimag Hai Ki Kisu Se Ham
Nahin Vishwas Ji Ganwane Ke
Nala Jab Garmkar Hota Hai
Na Socha Na Samjha Na Seekha Na Jaana
Patta Patta Buta Buta Haal Hamara Jaane Hai
Raat Guzre Hai Mujhe Naza Mein Rote Rote
Raftgaan Mein Jahan Ke Ham Bhi Hain
Rahe-Door-e-Ishq Se Rota Hai Kya
Rahi Nagufta Mere Dil Mein Dastan Meri
Ranj Kheenche The Dagh Khaye The
Sahar Gah-e-Id Mein Daur-e-Subu Tha
Shab Ko Voh Piye Sharab Nikla
Shahar Se Yaar Sawar Hua Jo Sawad Mein
Shayad Us Sada Ne Rakha Hai Khat
Sher Ke Parde Mein Maine Gham Sunaya Hai Bahut
Shikwa Karun Main Kab Tak Us Apne Mehrban Ka
Sukhan Mushtaq Hai Aalam Hamara
Taab-e-Dil Sarf-e-Judai Ho Chuki
Ta-Ba Maqdoor Intezar Kiya
Tera Rukh-e-Mukhattat Kuraan Hai Hamara
Tha Musteaar Husn Se Uske Jo Noor Tha
Tu Nahin Fitna-Saaz Sach Sahib
Ulti Ho Gayin Sab Tadbeerein
Umar Bhar Ham Rahe Sharabi Se
Us Ka Khayal Chashm Se Shab
Vaan Vo To Ghar Se Apne Pi Kar Sharab Nikla
Vahshat Thi Hamein Bhi Vahi
Vo Dekhne Hamein Tuk Bimari Mein Na Aaya
Yaar Bin Talkh Zindgani Thi
Yaar Mera Bahut Hai Yaar-Fareb
Yaar Ne Ham Se Be-Adaai Ki
Yaaro Mujhe Muaf Rakho Main Nashe Mein Hoon
Yehi Ishq Hi Ji Khapa Janta Hai
Yeh 'Mir'-e-Sitam-Kushta Kisu Waqt Jawan Tha
Zakham Jhele Daagh Bhi Khaye Bohat
 
 
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