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हरिवंशराय बच्चन
Harivansh Rai Bachchan
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मिलन यामिनी हरिवंशराय बच्चन

चाँदनी फैली गगन में, चाह मन में
प्यार की असमर्थता कितनी करुण है
मैं कहाँ पर, रागिनी मेरी कहाँ पर
प्राण, मेरा गीत दीपक-सा जला है
आज आँखों में प्रतीक्षा फिर भरो तो
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ
आज मन-वीणा, प्रिये, फिर कसो तो
आज कितनी वासनामय यामिनी है
हास में तेरे नहाई यह जुन्‍हाई
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो
प्‍यार के पल में जलन भी तो मधुर है
मैं प्रतिध्‍वनि सुन चुका, ध्‍वनि खोजता हूँ
मैं गाता हूँ इसलिए कि पूरब से सुरभित
मैं रखता हूँ हर पाँव सुदृढ़ विश्वास लिए
प्‍यार, जवानी, जीवन इनका
बहती है मधुवन में अब पतझर की बयार
गरमी में प्रात: काल पवन
ओ पावस के पहले बादल
खींचतीं तुम कौन ऐसे बंधनों से
तुमको मेरे प्रिय प्राण निमंत्रण देते
प्राण, संध्‍या झुक गई गिरि, ग्राम, तरु पर
सखि‍, अखिल प्रकृति की प्‍यास
सखि, यह रागों की रात नहीं सोने की
प्रिय, शेष बहुत है रात अभी मत जाओ
सुधि में संचित वह साँझ
जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुदिन लगा, सरोजिनी सजा न सर
सुवर्ण मेघ युक्त पच्छिमी गगन
निशा, मगर बिना निशा सिंगार के
दिवस गया विवश थका हुआ शिथिल
शिशिर समीर वन झकोर कर गया
समेट ली किरण कठिन दिनेश ने
समीर स्‍नेह-रागिनी सुना गया
पुकारता पपीहरा पि...या, पि...या
सुना कि एक स्‍वर्ग शोधता रहा
उसे न विश्‍व की विभूतियाँ दिखीं
 
 
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