Hindi Kavita
हरिवंशराय बच्चन
Harivansh Rai Bachchan
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Milan Yamini Harivansh Rai Bachchan

मिलन यामिनी हरिवंशराय बच्चन
पूर्व भाग

1. चाँदनी फैली गगन में, चाह मन में

चाँदनी फैली गगन में, चाह मन में।

दिवस में सबके लिए बस एक जग है
रात में हर एक की दुनिया अलग है,
कल्‍पना करने लगी अब राह मन में;
चाँदनी फैली गगन में, चाह मन में।

भूमि के उर तप्‍त करता चंद्र शीतल
व्‍योम की छाती जुड़ाती रश्मि कोमल,
किंतु भरतीं भवनाएँ दाह मन में;
चाँदनी फैली गगन में, चाह मन में।

कुछ अँधेरा, कुछ उजाला, क्‍या समा है!
कुछ करो, इस चाँदनी में सब क्षमा है;
किंतु बैठा मैं सँजोए आह मन में;
चाँदनी फैली गगन में, चाह मन में।

चाँद निखरा, चंद्रिका निखरी हुई है,
भूमि से आकाश तक बिखरी हुई है,
काश मैं भी यों बिखर सकता भुवन में;
चाँदनी फैली गगन में, चाह मन में।

2. प्यार की असमर्थता कितनी करुण है

प्यार की असमर्थता कितनी करुण है ।

चाँद कितनी दूर है, वह जानता है,
और अपनी हद्द भी पहचानता है,
हाथ इसपर भी उठाता ही वरुण है ;
प्यार की असमर्थता कितनी करुण है ।

सृष्टि के पहले दिवस से यत्न जारी,
दूर उतनी ही निशा की श्याम सारी,
किंतु पीछा ही किए जाता अरुण है;
प्यार की असमर्थता कितनी करुण है ।

कट गए शत कल्प अपलक नेत्र खोले,
कौन आया ? सुन इसे नक्षत्र बोले,
भावना तो सर्वदा रहती तरुण है;
प्यार की असमर्थता कितनी करुण है ।

जो असंभव है उसीपर आँख मेरी,
चाहती होना अमर मृत राख मेरी,
प्यास की साँसें बचीं, बस यह शकुन है;
प्यार की असमर्थता कितनी करुण है ।

3. मैं कहाँ पर, रागिनी मेरी कहाँ पर

मैं कहाँ पर, रागिनी मेरी कहाँ पर!

है मुझे संसार बाँधे, काल बाँधे,
है मुझे जंजीर औ' जंजाल बाँधे,
किंतु मेरी कल्‍पना के मुक्‍त पर-स्‍वर;
मैं कहाँ पर, रागिनी मेरी कहाँ पर!

धूलि के कण शीश पर मेरे चढ़े हैं,
अंक ही कुछ भाल के कुछ ऐसे गढ़े हैं
किंतु मेरी भावना से बद्ध अंबर;
मैं कहाँ पर, रागिनी मेरी कहाँ पर!

मैं कुसुम को प्‍यार कर सकता नहीं हूँ,
मैं काली पर हाथ धर सकता नहीं हूँ,
किंतु मेरी वासना तृण-तृण निछावर;
मैं कहाँ पर, रागिनी मेरी कहाँ पर!

मूक हूँ, जब साध है सागर उँडेलूँ,
मूर्तिजड़, जब मन लहर के साथ खेलूँ,
किंतु मेरी रागिनी निर्बंध निर्झर;
मैं कहाँ पर, रागिनी मेरी कहाँ पर!

4. प्राण, मेरा गीत दीपक-सा जला है

प्राण, मेरा गीत दीपक-सा जला है।

पाँव के नीचे पड़ी जो धूलि बिखरी,
मूर्ति बनकर ज्योति की किस भाँति निखरी,
आँसुओं में रात-दिन अंतर गला है;
प्राण, मेरा गीत दीपक-सा जला है।

यह जगत की ठोकरें खाकर न टूटा,
यह समय की आँच से निकला अनूठा,
यह हृदय के स्नेह साँचे में ढला है;
प्राण, मेरा गीत दीपक-सा जला है।

आह मेरी थी कि अंबर कंप रहा था,
अश्रु मेरे थे कि तारा झंप रहा था,
यह प्रलय के मेघ-मारुत में पला है;
प्राण, मेरा गीत दीपक-सा जला है।

जो कभी उंचास झोंकों से लड़ा था,
जो कभी तम को चुनौती दे खड़ा था,
वह तुम्हारी आरती करने चला है;
प्राण, मेरा गीत दीपक-सा जला है।

5. आज आँखों में प्रतीक्षा फिर भरो तो

आज आँखों में प्रतीक्षा फिर भरो तो ।

देखना किस ओर झुकता है ज़माना,
गूँजता संसार में किसका तराना,
प्राण, मेरी ओर पल भर तुम ढरो तो;
आज आँखों में प्रतीक्षा फिर भरो तो ।

मैं बताऊँ, शक्ति है कितनी पगों में ?
मैं बताऊँ, नाप क्या सकता दृगों में ?-
पंथ में कुछ ध्येय मेरे तुम धरो तो;
आज आँखों में प्रतीक्षा फिर भरो तो ।

चीर वन-घन, भेद मरु जलहीन आऊँ,
सात सागर सामने हों, तैर जाऊँ,
तुम तनिक संकेत नयनों से करो तो;
आज आँखों में प्रतीक्षा फिर भरो तो ।

राह अपनी मैं स्वयं पहचान लूँगा,
लालिमा उठती किधर से जान लूँगा,
कालिमा मेरे दृगों की तुम हरो तो;
आज आँखों में प्रतीक्षा फिर भरो तो ।

6. आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ

आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।

है कहाँ वह आग जो मुझको जलाए,
है कहाँ वह ज्वाल मेरे पास आए,
रागिनी, तुम आज दीपक राग गाओ;
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।

तुम नई आभा नहीं मुझमें भरोगी,
नव विभा में स्नान तुम भी तो करोगी,
आज तुम मुझको जगाकर जगमगाओ;
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।

मैं तपोमय ज्योती की, पर प्यास मुझको,
है प्रणय की शक्ति पर विश्वास मुझको,
स्नेह की दो बूंदे भी तो तुम गिराओ;
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।

कल तिमिर को भेद मैं आगे बढूंगा,
कल प्रलय की आंधियों से मैं लडूंगा,
किन्तु आज मुझको आंचल से बचाओ;
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।

7. आज मन-वीणा, प्रिये, फिर कसो तो

आज मन-वीणा, प्रिये, फिर कसो तो।

मैं नहीं पिछली अभी झंकार भूला,
मैं नहीं पहले दिनों का प्‍यार भूला,
गोद में ले, मोद से मुझको लसो तो;
आज मन-वीणा, प्रिये, फिर कसो तो।

हाथ धर दो, मैं नया वरदान पाऊँ,
फूँक दो, बिछुड़े हुए मैं प्राण,
स्‍वर्ग का उल्‍लास, पर भर तुम हँसो तो;
आज मन-वीणा, प्रिये, फिर कसो तो।

मौन के भी कंठ में मैं स्‍वर भरूँगा,
एक दुनिया ही नई मुखरित करूँगा,
तुम अकेली आज अंतर में बसो तो;
आज मन-वीणा, प्रिये, फिर कसो तो।

रात भागेगी, सुनहरा प्रात होगा,
जग उषा-मुसकान-मधु से स्‍नात होगा,
तेज शर बन तुम तिमिर घन में धँसो तो;
आज मन-वीणा, प्रिये, फिर कसो तो।

8. बाँध दो बिखरे सुरों को गान में तुम

बाँध दो बिखरे सुरों को गान में तुम।

गीत ठुकराया हुआ, उच्छ्वास-क्रंदन,
मधु मलय होता उपेक्षित हो प्रभंजन,
बाँध दो तूफान को मुसकान में तुम;
बाँध दो बिखरे सुरों को गान में तुम।

कल्पनाएँ आज पगलाई हुई हैं,
भावनाएँ आज भरमाई हुई हैं,
बाँध दो उनको करुण आह्वान में तुम;
बाँध दो बिखरे सुरों को गान में तुम।

व्यर्थ कोई भाग जीवन का नहीं हैं,
व्यर्थ कोई राग जीवन का नहीं हैं,
बाँध दो सबको सुरीली तान में तुम;
बाँध दो बिखरे सुरों को गान में तुम।

मैं कलह को प्रीति सिखलाने चला था,
प्रीति ने मेरे हृदय को छला था,
बाँध दो आशा पुन: मन-प्राण में तुम;
बाँध दो बिखरे सुरों को गान में तुम।

9. आज आओ चाँदनी में स्नान कर लो

आज आओ चाँदनी में स्नान कर लो।

तापमय दिन में सदा जगती रही है,
रात भी जिसके लिए तपती रही है,
प्राण, उसकी पीर का अनुमान कर लो;
आज आओ चाँदनी में स्नान कर लो।

चाँद से उन्माद टूटा पड़ रहा है,
लो, खुशी का गीत फूटा पड़ रहा है,
प्राण, तुम भी एक सुख की तान भर लो;
आज आओ चाँदनी में स्नान कर लो।

धार अमृत की गगन से आ रही है,
प्यार की छाती उमड़ती जा रही है,
आज, लो, मादक सुधा का पान कर लो;
आज आओ चाँदनी में स्नान कर लो।

अब तुम्हें डर-लाज किससे लग रही है,
आँखें केवल प्यार की अब जग रही है,
मैं मनाना जानता हूँ, मान कर लो;
आज आओ चाँदनी में स्नान कर लो।

10. आज कितनी वासनामय यामिनी है

आज कितनी वासनामय यामिनी है!

दिन गया तो ले गया बातें पुरानी,
याद मुझको अब भी नहीं रातें पुरानी,
आज भी पहली निशा मनभावनी है;
आज कितनी वासनामय यामिनी है!

घूँट मधु का है, नहीं झोंका पवन का,
कुछ नहीं आज मन को पाता है आज तन का,
रात मेरे स्‍वप्‍न की अनुगामिनी है;
आज कितनी वासनामय यामिनी है!

यह काली का हास आता है किधर से,
यह कुसुम का श्‍वास जाता है किधर से,
हर लता-तरु में प्रणय की रागिनी है;
आज कितनी वासनामय यामिनी है!

दुग्‍ध-उज्‍जवल मोतियों से युक्‍त चादर,
जो बिछी नभ के पलँग पर आज उसपर
चाँद से लिपटी लजाती चाँदनी है;
आज कितनी वासनामय यामिनी है!

11. हास में तेरे नहाई यह जुन्‍हाई

हास में तेरे नहाई यह जुन्‍हाई।

आ उजेली रात कितनी बार भागी,
सो उजेली रात कितनी बार जागी,
पर छटा उसकी कभी ऐसी न छाई;
हास में तेरे नहाई यह जुन्‍हाई।

चाँदनी तेरे बिना जलती रही है,
वह सदा संसार को छलती रही है,
आज ही अपनी तपन उसने मिटाई;
हास में तेरे नहाई यह जुन्‍हाई।

आज तेरे हास में मैं भी नहाया,
आज अपना ताप मैंने भी मिटाया,
मुसकराया मैं, प्रकृति जब मुसकराई;
हास में तेरे नहाई यह जुन्‍हाई।

ओ अँधेरे पाख, क्‍या मुझको डरता,
अब प्रणय की ज्‍योति के मैं गीत गाता,
प्राण में मेरे समाई यह जुन्‍हाई;
हास में तेरे नहाई यह जुन्‍हाई।

12. प्राण! केवल प्यार तुमको दे सकूंगा

प्राण! केवल प्यार तुमको दे सकूंगा।

कोकिला अपनी व्यथा जिससे जताए,
सुन पपीहा पीर अपनी भूल जाए,
वह करुण उदगार तुमको दे सकूंगा;
प्राण! केवल प्यार तुमको दे सकूंगा।

प्राप्त मणि—कंचन नहीं मैंने किया है,
ध्यान तुमने कब वहाँ जाने दिया है,
आंसुओ का हार तुमको दे सकूंगा;
प्राण! केवल प्यार तुमको दे सकूंगा।

सत्य ने छूने भला मुझको दिया कब,
किन्तु उसने तुष्ट ही किसको किया कब,
स्वप्न का संसार तुमको दे सकूँगा;
प्राण! केवल प्यार तुमको दे सकूंगा।

फूल ने खिल मौन माली को दिया जो,
बीन ने स्वरकार को अर्पित किया जो,
मैं वही उपहार तुमको दे सकूंगा;
प्राण! केवल प्यार तुमको दे सकूंगा।

13. स्वप्न में तुम हों, तुम्हीं हो जागरण में

स्वप्न में तुम हो, तुम्हीं हो जागरण में।

कब उजाले में मुझे कुछ और भाया,
कब अंधेरे ने तुम्हें मुझसे छिपाया,
तुम निशा में औ' तुम्हीं प्रात: किरण में;
स्वप्न में तुम हो तुम्हीं हो जागरण में।

जो कही मैंने तुम्हारी थी कहानी,
जो सुनी उसमें तुम्हीं तो थीं बखानी,
बात में तुम औ' तुम्हीं वातावरण में;
स्वप्न में तुम हो तुम्हीं हो जागरण में।

ध्यान है केवल तुम्हारी ओर जाता,
ध्येय में मेरे नहीं कुछ और आता,
चित्त में तुम हो तुम्हीं हो चिंतवन में;
स्वप्न में तुम हो तुम्ही हो जागरण में।

रूप बनकर घूमता जो वह तुम्हीं हो,
राग बन कर गूंजता जो वह तुम्हीं हो,
तुम नयन में और तुम्हीं अंतःकरण में;
स्वप्न में तुम हों तुम्हीं हो जागरण में।

14. प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो

प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।

मैं जगत के ताप से डरता नहीं अब,
मैं समय के शाप से डरता नहीं अब,
आज कुंतल छाँह मुझपर तुम किए हो;
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।

रात मेरी, रात का श्रृंगार मेरा,
आज आधे विश्‍व से अभिसार मेरा,
तुम मुझे अधिकार अधरों पर दिए हो;
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।

वह सुरा के रूप से मोहे भला क्‍या,
वह सुधा के स्‍वाद से जाए छला क्‍या,
जो तुम्‍हारे होंठ का मधु विष पिए हो;
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।

मृत-सजीवन था तुम्‍हारा तो परस ही,
पा गया मैं बाहु का बंधन सरस भी,
मैं अमर अब, मत कहो केवल जिए हो;
प्राण, कह दो, आज तुम मेरे लिए हो।

15. प्रात-मुकुलित फूल-सा है प्यार मेरा

प्रात-मुकुलित फूल-सा है प्यार मेरा।

ठीक है मैंने कभी देखा अँधेरा,
किन्तु अब तो हो गया फिर से सबेरा,
भाग्य-किरणों ने छुआ संसार मेरा;
प्रात-मुकुलित फूल-सा है प्यार मेरा।

तप्त आँसू से कभी मुख म्लान होता,
किन्तु अब तो शीत जल में स्नान होता,
राग-रस-कण से घुला संसार मेरा,
प्रात-मुकुलित फूल-सा है प्यार मेरा।

आह से मेरी कभी थे पत्र झुलसे,
किन्तु मेरी साँस पाकर आज हुलसे,
स्नेह-सौरभ से बसा संसार मेरा;
प्रात-मुकुलित फूल-सा है प्यार मेरा।

एक दिन मुझमें हुई थी मूर्त जड़ता,
किन्तु बरबस आज मैं झरता, बिखरता,
है निछावर प्रेम पर संसार मेरा;
प्रात-मुकुलित फूल-सा है प्यार मेरा।

16. प्‍यार के पल में जलन भी तो मधुर है

प्‍यार के पल में जलन भी तो मधुर है।

जानता हूँ दूर है नगरी प्रिया की,
पर परीक्षा एक दिन होनी हिया की,
प्‍यार के पथ की थकन भी तो मधुर है;
प्‍यार के पल में जलन भी तो मधुर है।

आग ने मानी न बाधा शैल-वन की,
गल रही भुजपाश में दीवार तन की,
प्‍यार के दर पर दहन भी तो मधुर है;
प्‍यार के पल में जलन भी तो मधुर है।

साँस में उत्‍तप्‍त आँधी चल रही है,
किंतु मुझको आज मलयानिल यही है,
प्‍यार के शर की शरण भी तो मधुर है;
प्‍यार के पल में जलन भी तो मधुर है।

तृप्‍त क्‍या होगी उधर के रस कणों से,
खींच लो तुम प्राण ही इन चुंबनों से,
प्‍यार के क्षण में मरण भी तो मधुर है;
प्‍यार के पल में जलन भी तो मधुर है।

17. इस पुरातन प्रीति को नूतन कहो मत

इस पुरातन प्रीति को नूतन कहो मत।

की कमल ने सूर्य—किरणों की प्रतीक्षा,
ली कुमुद की चांद ने रातों परीक्षा,
इस लगन को प्राण, पागलपन कहो मत;
इस पुरातन प्रीति को नूतन कहो मत।

मेह तो प्रत्येक पावस में बरसता,
पर पपीहा आ रहा युग—युग तरसता,
प्यार का है, प्यास का क्रंदन कहो मत;
इस पुरातन प्रीति को नूतन कहो मत।

कूक कोयल पूछती किसका पता है,
वह बहारों की सदा से परिचिता है,
इस रटन को मौसमी गायन कहो मत;
इस पुरातन प्रीति को नूतन कहो मत।

विश्व की दो कामनाएँ थीं विचरतीं,
एक थी बस दूसरे की खोज करती,
इस मिलन को सिर्फ़ भुजबंधन कहो मत;
इस पुरातन प्रीति को नूतन कहो मत।

18. मैं प्रतिध्‍वनि सुन चुका, ध्‍वनि खोजता हूँ

मैं प्रतिध्‍वनि सुन चुका, ध्‍वनि खोजता हूँ।

मौन मुखरित हो गया, जय हो प्रणय की,
पर नहीं परितृप्‍त है तृष्‍णा हृदय की,
पा चुका स्‍वर, आज गायन खोजता हूँ;
मैं प्रतिध्‍वनि सुन चुका, ध्‍वनि खोजता हूँ।

तुम समर्पण बन भुजाओं में पड़ी हो,
उम्र इन उद्भ्रांत घड़ियों की बड़ी हो,
पा गया तन, आज मैं मन खोजता हूँ;
मैं प्रतिध्‍वनि सुन चुका, ध्‍वनि खोजता हूँ।

है अधर में रस, मुझे मदहोश कर दो,
किंतु मेरे प्राण में संतोष भर दो,
मधु मिला है, मैं अमृतकण खोजता हूँ;
मैं प्रतिध्‍वनि सुन चुका, ध्‍वनि खोजता हूँ।

जी उठा मैं, और जीना प्रिय बड़ा है,
सामने, पर, ढेर मुरदों का पड़ा,
पा गया जीवन, पर सजीवन खोजता हूँ;
मैं प्रतिध्‍वनि सुन चुका, ध्‍वनि खोजता हूँ।

19. जानता हूँ प्यार, उसकी पीर को भी

जानता हूँ प्यार, उसकी पीर को भी।

बाँह तुमने डाल दी ज्यों फूल माला,
संग में, पर, नाग का भी पाश डाला,
जानता गलहार हूँ, ज़ंजीर को भी;
जानता हूँ प्यार, उसकी पीर को भी।

है अधर से कुछ नहीं कोमल कहीं पर,
किन्तु इनकी कोर से घायल जगत भर,
जानता हूँ पंखुरी, शमशीर को भी;
जानता हूँ प्यार, उसकी पीर को भी।

कौन आया है सुरा का स्वाद लेने,
जोकि आया है हृदय का रक्त देने,
जानता मधुरस, गरल के तीर को भी;
जानता हूँ प्यार, उसकी पीर को भी।

तीर पर जो उठ लहर मोती उगलती,
बीच में वह फाड़कर जबड़े निगलती,
जानता हूँ तट, उदधि गंभीर को भी;
जानता हूँ प्यार, उसकी पीर को भी।

20. शूल तो जैसे विरह वैसे मिलन में

शूल तो जैसे विरह वैसे मिलन में।

थी मुझे घेरे बनी जो कल निराशा,
आज आशंका बनी, कैसा तमाशा,
एक से हैं एक बढ़ कर पर चुभन में;
शूल तो जैसे विरह वैसे मिलन में।

देखकर नीरस गगन रोया पपीहा,
मेह में भी तो कहीं खोया पपीहा,
फ़र्क पानी से नहीं गड़ता लगन में;
शूल तो जैसे विरह वैसे मिलन में।

आम पर तो मंजरी पर मंजरी है,
दर्द से आवाज़ कोयल की भरी है,
कब समाए स्वप्न मधुॠतु के सेहन में;
शूल तो जैसे विरह वैसे मिलन में।

फूल को ले चोंच में बुलबुल बिलखती,
एक अचरज से उसे दुनिया निरखती,
वह बदल पाई नहीं अब तक सुमन में;
शूल तो जैसे विरह वैसे मिलन में।

21. प्यार से, प्रिय, जी नहीं भरता किसी का

प्यार से, प्रिय, जी नहीं भरता किसी का।

प्यास होती तो सलिल में डूब जाती,
वासना मिटती न तो मुझको मिटाती,
पर नहीं अनुराग है मरता किसी का;
प्यार से, प्रिय, जी नहीं भरता किसी का।

तुम मिलीं तो प्यार की कुछ पीर जानी,
और ही मशहूर दुनिया में कहानी,
दर्द कोई भी नहीं हरता किसी का;
प्यार से, प्रिय, जी नहीं भरता किसी का।

पाँव बढ़ते, लक्ष्य उनके साथ बढ़ता,
और पल को भी नहीं यह क्रम ठहरता,
पाँव मंजिल पर नहीं पड़ता किसी का;
प्यार से, प्रिय, जी नहीं भरता किसी का।

स्वप्न से उलझा हुआ रहता सदा मन,
एक ही इसका मुझे मालूम कारण,
विश्व सपना सच नहीं करता किसी का;
प्यार से, प्रिय, जी नहीं भरता किसी का।

22. गीत मेरे, देहरी का दीप-सा बन

गीत मेरे, देहरी का दीप-सा बन।

एक दुनिया है हृदय में, मानता हूँ,
वह घिरी तम से, इसे भी जानता हूँ,
छा रहा है किंतु बाहर भी तिमिर-घन,
गीत मेरे, देहरी का दीप-सा बन।

प्राण की लौ से तुझे जिस काल बारुँ,
और अपने कंठ पर तुझको सँवारूँ,
कह उठे संसार, आया ज्‍योति का क्षण,
गीत मेरे, देहरी का दीप-सा बन।

दूर कर मुझमें भरी तू कालिमा जब,
फैल जाए विश्‍व में भी लालिमा तब,
जानता सीमा नहीं है अग्नि का कण,
गीत मेरे, देहरी का दीप-सा बन।

जग विभामय न तो काली रात मेरी,
मैं विभामय तो नहीं जगती अँधेरी,
यह रहे विश्‍वास मेरा यह रहे प्रण,
गीत मेरे, देहरी का दीप-सा बन।

मध्य भाग

1. मैं गाता हूँ इसलिए कि पूरब से सुरभित

मैं गाता हूँ इसलिए कि पूरब से सुरभित
जो सोना शुभ्र-सलोना नित्य बरसता है,
उसको कोई बस प्रात किरण मत कह बैठे ।

1
जन कोई अपने कोटि करों को कर बाहर
अपने तप का चिर संचित कोष लुटाता है,
जब उसका सौरभ-यश कलि-कुसुमों के मुख से
विस्तृत वसुधा के कण-कण में छा जाता है,

तब जाकर तम का काला, भारी, भयकारी
पर्दा ऊपर को उठता और सिमटता है;
इतने उत्सर्गों, उल्लासों का यह अवसर,
अचरज है मुझको, कैसे प्रति दिन आता है ।

कवि वह है जिसके मन को चोट पहुँचती है
जब होती जग में सुन्दरता की अवहेला,
अनजाने भी अपमान किसीका हो जाता,
अनजाने भी अपराध कभी हो जाते हैं;

मैं गाता हूँ इसलिए कि पूरब से सुरभित
जो सोना शुभ्र-सलोना नित्य बरसता है,
उसको कोई बस प्रात किरण मत कह बैठे ।

2
रजनी में आँखें सपनों से बहला भी लो,
दिन देन दूसरी ही कुछ माँगा करता है,
देखें अँधियारा चीर निकलता है कोई,
देखें कोई अंतर की पीड़ा हरता है,

सारी आशा-प्रत्याशाओं की परवशता
में मन गलकर निर्मम बूंदों में ढल जाता,
देखें मिलकर क्या देता जबकि प्रतीक्षा में
पलकों का आँचल मुक्ताहल से भरता है,

कवि वह है जिसके उर में आहें उठती हैं
जब होती मिलनातुर घड़ियों की अवहेला,
आँसू का कुछ भी मोल नहीं बाज़ारों में,
क्यों इस कारण कोई उसका उपहास करे;

मैं गाता हूँ इसलिए कि विरही के दृग में
जो बिंदु सुधा का सिंधु समेट छलकता है,
उसको कोई खारा जलकण मत कह बैठे ।

मैं गाता हूँ इसलिए कि पूरब से सुरभित
जो सोना शुभ्र-सलोना नित्य बरसता है,
उसको कोई बस प्रात किरण मत कह बैठे ।

3
जब जगती छाती में अभाव की चेतनता
तब निखिल सृष्टि का मूल केंद्र ही हिलता है,
वह ठंडी साँसें खींच बिलख तब उठती है
जब एकाकी को अपना संगी मिलता है,

जलते अधरों कुछ खोज रही-सी बाँहों में
धरती की सारी बेचैनी जाहिर होती,
जब प्राणों का विनिमय प्राणी से होता है
अंबर के दिल का पंकज ही तब खिलता है,

कवि वह है जिसका अंतर विगलित होता है
जब होती जग में प्यास-प्रणय की अवहेला,
शब्दों की निर्धन दुनिया में अक्सर होता
कुछ कहते हैं पर मतलब कुछ से होता है,

मैं गाता हूँ इसलिए कि प्रेमी के मन में
जो प्यार अनंत, अपार, अगाध उमड़ता है,
उसको कोई व्यामोह-व्यसन मत कह बैठे ।

मैं गाता हूँ इसलिए कि पूरब से सुरभित
जो सोना शुभ्र-सलोना नित्य बरसता है,
उसको कोई बस प्रात किरण मत कह बैठे ।

2. मैं रखता हूँ हर पाँव सुदृढ़ विश्वास लिए

मैं रखता हूँ हर पाँव सुदृढ़ विश्वास लिए,
ऊबड़-खाबड़ तम की ठोकर खाते-खाते
इनसे कोई रक्ताभ किरण फूटेगी ही ।

1
तम कहता है मुझ महानिशा
की दिशा नहीं तुम पाओगे,
ज्यादा संभव है भूल-भटक
फिर उसी जगह आ जाओगे,

थे चले जहाँ से पहले दिन
मन में तूफ़ानी जोश लिए-
कंचन की नगरी में जाकर
माणिक के दीप जलाओगे ।

है बहुत सिखाया जगती के
कड़ुए अनुभव ने पर अब भी-

मैं रखता हूँ हर पाँव सुदृढ़ विश्वास लिए,
ऊबड़-खाबड़ तम की ठोकर खाते-खाते
इनसे कोई रक्ताभ किरण फूटेगी ही ।

2
जो भेंट चला था मैं लेकर
हाथों में कब की कुम्हलाई,
नयनों ने सींचा उसे बहुत
लेकिन वह फिर भी मुरझाई,

तब से पथ-पुष्पों से निर्मित
कितनी मालाएँ सूख चुकीं,
जिस मग से मैं आया उसपर
पाओगे बिखरी-बिखराई;

कुम्हला न सकी, मुरझा न सकी
लेकिन अर्चन की अभिलाषा,

मैं चुनता हूँ हर फूल अटल विश्वास लिए,
ये पूज न पाएँ प्रेय चरण लेकिन दुनिया
इनकी श्रद्धा को एक समय पूजेगी ही ।

मैं रखता हूँ हर पाँव सुदृढ़ विश्वास लिए,
ऊबड़-खाबड़ तम की ठोकर खाते-खाते
इनसे कोई रक्ताभ किरण फूटेगी ही ।

3
जब इस पथ पर थे पाँव दिए
तब चीख पड़ा था यों अंबर--
इसकी मंज़िल पाई जाती
केवल मरकर, केवल मिटकर !

फिर भी न डरा, हिचका, झिझका,
मेरा मन बंदा सैलानी;
ज़िंदा रहना क्या इतना ही
बस डोले साँसों का लंगर ।

है मेरा पूरा सफ़र नपा

मेरी छाती की धड़कन से-

मैं लेता हूँ हर साँस अमर विश्वास लिए,
मैं पहुँच न पाऊँ जीते जी अपनी मंज़िल,
पर मरने पर मंज़िल मुझ तक पहुँचेगी ही ।

मैं रखता हूँ हर पाँव सुदृढ़ विश्वास लिए,
ऊबड़-खाबड़ तम की ठोकर खाते-खाते
इनसे कोई रक्ताभ किरण फूटेगी ही ।

4
अज्ञात नहीं है यह मुझको
गाया करता निशि-दिन सागर,
गाया करता दिन-रात अनिल
हरहर-हरहर, मरमर, मरमर,

जो मौन महा संगीत गगन
को पुलकाकुल नित रखता है,
उससे भी मैं चिर परिचित हूँ--
लेकिन मेरा भी अपना स्वर ।

मेरी सता का अंश अमर
यह क्षीण सबों से होकर भी ।

मैं गाता हूँ हर गीत मधुर विश्वास लिए,
लहराती अंबर पर, तारों से टकराती
ध्वनि पास तुम्हारे एक समय गूँजेगी ही ।

मैं रखता हूँ हर पाँव सुदृढ़ विश्वास लिए,
ऊबड़-खाबड़ तम की ठोकर खाते-खाते
इनसे कोई रक्ताभ किरण फूटेगी ही ।

3. प्‍यार, जवानी, जीवन इनका

प्‍यार, जवानी, जीवन इनका
जादू मैंने सब दिन माना।

1
यह वह पाप जिसे करने से
भेद भरा परलोक डराता,
यह वह पाप जिसे कर कोई
कब जग के दृग से बच पाता,

यह वह पाप झगड़ती आई
जिससे बुद्धि सदा मानव की,
यह वह पाप मनन भी जिसका
कर लेने से मन शरमाता;

तन सुलगा, मन द्रवित, भ्रमित कर
बुद्धि, लोक, युग, सब पर छाता,
हार नहीं स्‍वीकार हुआ तो
प्‍यार रहेगा ही अनजाना।

प्‍यार, जवानी, जीवन इनका
जादू मैंने सब दिन माना।

2
डूब किनारे जाते हैं जब
नदी में जोबन आता है,
कूल-तटों में बंदी होकर
लहरों का दम घुट जाता है,

नाम दूसरा केवल जगती
जंग लगी कुछ ज़ंजीरों का,
जिसके अंदर तान-तरंगें
उनका जग से क्‍या नाता है;

मन के राजा हो तो मुझसे
लो वरदान अमर यौवन का,
नहीं जवानी उसने जानी
जिसने पर का वंधन जाना।

प्‍यार, जवानी, जीवन इनका
जादू मैंने सब दिन माना।

3
फूलों से, चाहे आँसु से
मैंने अपनी माला पोही,
किंतु उसे अर्पित करने को
बाट सदा जीवन की जोही,

गई मुझे ले भुलावा
दे अपनी दुर्गम घाटी में,
किंतु वहाँ पर भूल-भटककर
खोजा मैंने जीवन को ही;

जीने की उत्‍कट इच्‍छा में
था मैंने, ‘आ मौत’ पुकारा।
वर्ना मुझको मिल सकता था
मरने का सौ बार बहाना।

प्‍यार, जवानी, जीवन इनका
जादू मैंने सब दिन माना।

4. बहती है मधुवन में अब पतझर की बयार

बहती है मधुवन में अब पतझर की बयार ।

(१)
जिनकी छाया में काट दिए थे दिन दुख के,
जिनकी छाया में देखे थे सपने सुख के,
अब इने-गिने उन पत्रों के हैं दिवस चार ।
बहती है मधुवन में अब पतझर की बयार ।

(२)
देखो पीलापन इनपर छाया जाता है,
मधुवन का मधुवन, लो, मुरझाया बजाता है,
ले गया काल इनकी सब श्री-सुषमा उतार,
बहती है मधुवन में अब पतझर की बयार ।

(३)
जो एक डाल पर एक साथ झूले-डोले,
जो एक साथ प्रात: किरणों की जय बोले,
ये अलग-थलग गिरते अपनी सुधबुध विसार,
बहती है मधुवन में अब पतझर की बयार ।

(४)
पीले पत्तों के नीचे अंकुर की लाली,
नूतन जीवन का चिह्न लिए डाली-डाली,
तरुवर-तरुवर पर लक्षित यौवन का उभार,
बहती है मधुवन में अब पतझर की बयार ।

(५)
जिन झोंकों से कुम्हलाए पत्ते झरते हैं,
उनसे ही बल नव पल्लव संचित करते हैं,
जिनसे लुटता, उनसे ही बंटता भी सिंगार,
बहती है मधुवन में अब पतझर की बयार ।

(६)
सौ बार शिशिर मधुवन के आँगन में आए,
पर वह जादू की शक्ति न मधुवन से जाए,
जो नूतन से करती पुराण का परिष्कार,
बहती है मधुवन में अब पतझर की बयार ।

5. गरमी में प्रात: काल पवन

गरमी में प्रात: काल पवन
बेला से खेला करता जब
तब याद तुम्‍हारी आती है।

1
जब मन में लाखों बार गया-
आया सुख सपनों का मेला,
जब मैंने घोर प्रतीक्षा के
युग का पल-पल जल-जल झेला,

मिलने के उन दो यामों ने
दिखलाई अपनी परछाईं,
वह दिन ही था बस दिन मुझको
वह बेला थी मुझको बेला;

उड़ती छाया-सी वे घड़ि‍याँ
बीतीं कब की लेकिन तब से,

गरमी में प्रात:काल पवन
बेला से खेला करता जब
तब याद तुम्‍हारी आती है।

2
तुमने जिन सुमनों से उस दिन
केशों का रूप सजाया था,
उनका सौरभ तुमसे पहले
मुझसे मिलने को आया था,

बह गंध गई गठबंध करा
तुमसे, उन चंचल घड़ि‍यों से,
उस सुख से जो उस दिन मेरे
प्राणों के बीच समाया था;

वह गंध उठा जब करती है
दिल बैठ न जाने जाता क्‍यों;

गरमी में प्रात:काल पवन,
प्रिय, ठंडी आहें भरता जब
तब याद तुम्‍हारी आती है।

गरमी में प्रात:काल पवन
बेला से खेला करता जब
तब याद तुम्‍हारी आती है।

3
चितवन जिस ओर गई उसने
मृदु फूलों की वर्षा कर दी,
मादक मुसकानों ने मेरी
गोदी पंखुरियों से भर दी

हाथों में हाथ लिए, आए
अंजली में पुष्‍पों के गुच्‍छे,
जब तुमने मेरी अधरों पर
अधरों की कोमलता धर दी,

कुसुमायुध का शर ही मानो
मेरे अंतर में पैठ गया!

गरमी में प्रात: काल पवन
कलियों को चूम सिहरता जब
तब याद तुम्‍हारी आती है।
गरमी में प्रात: काल पवन
बेला से खेला करता जब
तब याद तुम्‍हारी आती है।

6. ओ पावस के पहले बादल

ओ पावस के पहले बादल,
उठ उमड़-गरज, घिर घुमड़-चमक
मेरे मन-प्राणों पर बरसो।

1
यह आशा की लतिकाएँ थीं
जो बिखरीं आकुल-व्‍याकुल-सी,
यह स्‍वप्‍नों की कलिकाएँ थीं
जो खिलने से पहले झुलसीं,

यह मधुवन था, जो सुना-सा
मरुथल दिखलाई पड़ता है,
इन सुखे कूल-किनारों में
थी एक समय सरिता हुलसी;

आँसू की बूँदें चाट कहीं
अंतर की तृष्‍णा मिटती है;

ओ पावस के पहले बादल,
उठ उमड़-गरज, घिर घुमड़-चमक
मेरे मन-प्राणों पर बरसो।

2
मेरे उच्‍छ्वास बनें शीतल
तो जग में मलयानिल डोले,
मेरा अंतर लहराएँ तो
जगती अपना कल्‍मष धो ले,

सतरंगा इंद्रधनुष निकले
मेरे मन के धुँधले पट पर,
तो दुनिया सुख की, सुखमा की,
मंगल वेला की जय बोले;

सुख है तो औरों को छूकर
अपने से सुखमय कर देगा,

ओ वर्षा के हर्षित बादल,
उठ उमड़-गरज, घिर घुमड़-चमक
मेरे अरमानों पर बरसो।

ओ पावस के पहले बादल,
उठ उमड़-गरज, घिर घुमड़-चमक
मेरे मन-प्राणों पर बरसो।

3
सुख की घड़ियों के स्‍वागत में
छंदों पर छंद सजाता हूँ,
पर अपने दुख के दर्द भरे
गीतों पर कब पछताता हूँ,

जो औरों का आनंद बना
वह दुख मुझपर फिर-फिर आए,
रस में भीगे दुख के ऊपर
मैं सुख का स्‍वर्ग लुटाता हूँ;

कंठों से फूट न जो निकले
कवि को क्‍या उस दुख से, सुख से;

ओ बारिश के बेख़ुद बादल,
उठ उमड़-गरज, घिर घुमड़-चमक
मेरे स्‍वर-गानों पर बरसो।

ओ पावस के पहले बादल,
उठ उमड़-गरज, घिर घुमड़-चमक
मेरे मन-प्राणों पर बरसो।

7. खींचतीं तुम कौन ऐसे बंधनों से

खींचतीं तुम कौन ऐसे बंधनों से
जो कि रुक सकता नहीं मैं--

1
काम ऐसा कौन जिसको
छोड़ मैं सकता नहीं हूँ,
कौन ऐसा मुँह कि जिससे
मोड़ मैं सकता नहीं हूँ?

आज रिश्‍ता और नाता
जोड़ने का अर्थ क्‍या है?
श्रृंखला का कौन जिसको
तोड़ मैं सकता नहीं हूँ?

चाँद, सूरज भी पकड़
मुझको नहीं बिठला सकेंगे,
क्‍या प्रलोभन दे मुझे वे
एक पल बहला सकेंगे?

जब कि मेरा वश नही
मुझ पर रहा, किसका होगा?

खींचतीं तुम कौन ऐसे बंधनों से
जो कि रुक सकता नहीं मैं--

2
उठ रहा है शोर-गुल
जग में, ज़माने में, सही है,
किंतु मुझको तो सुनाई
आज कुछ देता नहीं है,

कोकिलो, तुमको नई ऋतु
के नए नग़मे मुबारक,
और ही आवाज़ मेरे
वास्‍ते अब आ रही है;

स्‍वर्ग परियों के स्‍वरों के
भी लिए मैं आज बहरा,
गीत मेरा मौन सागर
में गया है डूब गहरा;

साँस भी थम जाए जिससे
साफ़ तुमको सुन सकूँ मै---
खींचतीं किन पीर-भींगे गायनों से
जो कि रुक सकता नहीं मैं---

खींचतीं तुम कौन ऐसे बंधनों से
जो कि रुक सकता नहीं मैं--

3
है समय किसको कि सोचे
बात वादों की, प्रणों की,
मान के, अपमान के,
अभिमान के बीते क्षणों की,

फूल यश के, शूल अपयश
के बिछा दो रास्‍ते में,
घाव का भय, चाह किसको
पंखुरी के चुंबनों की;

मैं बुझाता हूँ पगों से
आज अंतर के अँगारे,
और वे सपने के जिनको
कवि करों ने थे सँवारे,

आज उनकी लाश पर मैं
पाँव धरता आ रहा हूँ---
खींचतीं किन मैन दृग से जलकणों से
जो कि रुक सकता नहीं मैं---

खींचतीं तुम कौन ऐसे बंधनों से
जो कि रुक सकता नहीं मैं--

8. तुमको मेरे प्रिय प्राण निमंत्रण देते

1
तुमको मेरे प्रिय प्राण निमंत्रण देते।

अंतस्‍तल के भाव बदलते
कंठस्‍थल के स्‍वर में,
लो, मेरी वाणी उठती है
धरती से अंबर में,

अर्थ और आखर के बल का
कुछ मैं भी अधिकारी,
तुमको मेरे मधुगान निमंत्रण देते;
तुमको मेरे प्रिय प्राण निमंत्रण देते।

2
अब मुझको मालूम हुई है
शब्‍दों की भी सीमा,
गीत हुआ जाता है मेरे
रुद्ध गले में धीमा,

आज उदार दृगों ने रख ली
लाज हृदय की जाती,
तुमको नयनों के दान निमंत्रण दान देते;
तुमको मेरे प्रिय प्राण निमंत्रण देते।

3
आँख सुने तो आँख भरे दिल
के सौ भेद बताए,
दूर बसे प्रियतम को आँसू
क्‍या संदेश सुनाए,

भि‍गा सकोगी इनसे अपने
मन का कोई कोना?
तुमको मेरे अरमान निमंत्रण देते;
तुमको मेरे प्रिय प्राण निमंत्रण देते।

4
कवियों की सूची से अब से
मेरा नाम हटा दो,
मेरी कृतियों के पृष्‍ठों को
मरुथल में बिखरा दो,

मौन बिछी है पथ में मेरी
सत्‍ता, बस तुम आओ,
तुमको कवि के बलिदान निमंत्रण देते;
तुमको मेरे प्रिय प्राण निमंत्रण देते।

9. प्राण, संध्‍या झुक गई गिरि, ग्राम, तरु पर

प्राण, संध्‍या झुक गई गिरि, ग्राम, तरु पर,
उठ रहा है क्षिति‍ज के ऊपर सिंदूरी चाँद
मेरा प्‍यार पहली बार लो तुम।

1
सूर्य जब ढलने लगा था कह गया था,
मानवो, खुश हो कि दिन अब जा रहा है,
जा रही है स्‍वेद, श्रम की क्रूर घड़ियाँ,
औ' समय सुंदर, सुहाना आ रहा है,

छा गई है, शांति खेतों में, वनों में
पर प्रकृति के वक्ष की धड़कन बना-सा,
दूर, अनजानी जगह पर एक पंछी
मंद लेकिन मस्‍त स्‍वर से गा रहा है,

औ' धरा की पीन पलकों पर विनिद्रित
एक सपने-सा मिलन का क्षण हमारा,
स्‍नेह के कंधे प्रतीक्षा कर रहे हैं;
झुक न जाओ और देखो उस तरफ़ भी-

प्राण, संध्‍या झुक गई गिरि, ग्राम, तरु पर,
उठ रहा है क्षिति‍ज के ऊपर सिंदूरी चाँद
मेरा प्‍यार पहली बार लो तुम।

2
इस समय हिलती नहीं है एक डाली,
इस समय हिलता नहीं है एक पत्‍ता,
यदि प्रणय जागा न होता इस निशा में
सुप्‍त होती विश्‍व के संपूर्ण सत्‍ता,

वह मरण की नींद होती जड़-भयंकर
और उसका टूटना होता असंभव,
प्‍यार से संसार सोकर जागता है,
इसलिए है प्‍यार की जग में महत्‍ता,

हम किसी के हाथ में साधन बने हैं,
सृष्टि की कुछ माँग पूरी हो रही है,
हम नहीं कोई अपराध कर रहे हैं,
मत लजाओ और देखो उस तरु भी-

प्राण, रजनी भिंच गई नभ के भुजों में,
थम गया है शीश पर निरुपम रुपहरा चाँद
मेरा प्‍यार बारंबार लो तुम।

प्राण, संध्‍या झुक गई गिरि, ग्राम, तरु पर,
उठ रहा है क्षिति‍ज के ऊपर सिंदूरी चाँद
मेरा प्‍यार पहली बार लो तुम।

3
पूर्व से पच्छिम तलक फैले गगन के
मन-फलक पर अनगिनत अपने करों से
चाँद सारी रात लिखने में लगा था
'प्रेम' जिसके सिर्फ़ ढाई अक्षरों से

हो अलंकृत आज नभ कुछ दूसरा ही
लग रहा है और लो जग-जग विहग दल
पढ़ इसे, जैसे नया है यह मंत्र कोई,
हर्ष करते व्‍यक्‍त पुलकित पर, स्‍वरों से;

किंतु तृण-तृण ओस छन-छन कह रही है,
आ गया वेला विदा के आँसुओं की,
यह विचित्र विडंबना पर कौन चारा,
हो न कातर और देखो उस तरु भी-

प्राण, राका उड़ गई प्रात: पवन में,
ढल रहा है क्षितिज के नीचे शिथिल-तन चाँद,
मेरा प्‍यार अंतिम बार लो तुम।

प्राण, संध्‍या झुक गई गिरि, ग्राम, तरु पर,
उठ रहा है क्षिति‍ज के ऊपर सिंदूरी चाँद
मेरा प्‍यार पहली बार लो तुम।

10. सखि‍, अखिल प्रकृति की प्‍यास

1
सखि‍, अखिल प्रकृति की प्‍यास कि हम तुम-तुम भीगें।

अकस्‍मात यह बात हुई क्‍यों
जब हम-तुम मिल पाए,
तभी उठी आँधी अंबर में
सजल जलद घिर आए

यह रिमझिम संकेत गगन का
समझो या मत समझो,
सखि, भीग रहा आकाश कि हम-तुम भीगें;
सखि‍, अखिल प्रकृति की प्‍यास कि हम तुम-तुम भीगें।

2
इन ठंडे-ठंडे झोंकों से
मैं काँपा, तुम काँपीं,
एक भावना बिजली बनकर
हो हृदयों में व्‍यापी,

आज उपेक्षित हो न सकेगा
रसमय पवन-सँदेसा,
सखि, भीग रही वातास कि हम-तुम भीगें;
सखि‍, अखिल प्रकृति की प्‍यास कि हम तुम-तुम भीगें।

3
मधुवन के तरुवर से मिलकर
भीगी लतर सलोनी,
साथ कुसुम की कलिका भीगी
कौन हुई अनहोनी,

भीग-भीग, पी-पीकर चातक
का स्‍वर कातर भारी,
सखि, भीग रही है रात कि हम-तुम भीगें;
सखि‍, अखिल प्रकृति की प्‍यास कि हम तुम-तुम भीगें।

3
इस दूरी की मजबूरी पर
आँसू नयन गिराते,
आज समय तो था अधरों से
हम मधुरस बरसाते,

मेरी गीली साँस तुम्‍हारी
साँसों को छू आती,
सखि, भीग रहे उच्‍छवास कि हम तुम भीगें;
सखि‍, अखिल प्रकृति की प्‍यास कि हम तुम-तुम भीगें।

11. सखि, यह रागों की रात नहीं सोने की

1
सखि, यह रागों की रात नहीं सोने की।

अंबर-अंतर गल धरती का
अंचल आज भिगोता,
प्यार पपीहे का पुलकि‍त स्वर
दिशि-दिशि मुखरित होता,

और प्रकृति-पल्लव अवगुंठन
फिर-फिर पवन उठाता,
यह मदमातों की रात नहीं सोने की;
सखि, यह रागों की रात नहीं सोने की।

2
हैं अनगिन अरमान मिलन की
ले दे के दो घड़ियाँ,
झूल रही पलकों पर कितने
सुख सपनों की लड़ियाँ,

एक-एक पल में भरना है
युग-युग की चाहों को,
सखि, यह साधों की रात नहीं सोने की;
सखि, यह रागों की रात नहीं सोने की।

3
बाट जोहते इस रजनी की
वज्र कठिन दिन बीते,
किंतु अंत में दुनिया हारी
और हमीं तुम जीते,

नर्म नींद के आगे अब क्यों
आँखें पाँख झुकाएँ,
सखि, यह रातों की रात नहीं सोने की;
सखि, यह रागों की रात नहीं सोने की।

4
वही समय जिसकी दो जीवन
करते थे प्रत्याशा,
वही समय जिस पर अटकी थी
यौवन की सब आशा,

इस वेला में क्या-क्या करने
को हम सोच रहे थे,
सखि, यह वादों की रात नहीं सोने की;
सखि, यह रागों की रात नहीं सोने की।

12. प्रिय, शेष बहुत है रात अभी मत जाओ

1
प्रिय, शेष बहुत है रात अभी मत जाओ।

अरमानों की एक निशा में
होती हैं कै घड़ियाँ,
आग दबा रक्खी है मैंने
जो छूटीं फुलझड़ियाँ,

मेरी सीमित भाग्य परिधि को
और करो मत छोटी,
प्रिय, शेष बहुत है रात अभी मत जाओ।

2
अधर पुटों में बंद अभी तक
थी अधरों की वाणी,
'हाँ-ना' से मुखरित हो पाई
किसकी प्रणय कहानी,

सिर्फ भूमिका थी जो कुछ
संकोच भरे पल बोले,
प्रिय, शेष बहुत है बात अभी मत जाओ;
प्रिय, शेष बहुत है रात अभी मत जाओ।

3
शिथिल पड़ी है नभ की बाँहों
में रजनी की काया,
चांद चांदनी की मदिरा में
है डूबा, भरमाया,

अलि अब तक भूले-भूले-से
रस-भीनी गलियों में,
प्रिय, मौन खड़े जलजात अभी मत जाओ;
प्रिय, शेष बहुत है रात अभी मत जाओ।

4
रात बुझाएगी सच-सपने
की अनबूझ पहेली,
किसी तरह दिन बहलाता है
सबके प्राण, सहेली,

तारों के झँपने तक अपने
मन को दृढ़ कर लूंगा,
प्रिय, दूर बहुत है प्रात अभी मत जाओ;
प्रिय, शेष बहुत है रात अभी मत जाओ।

13. सुधि में संचित वह साँझ

सुधि में संचित वह साँझ कि जब
रतनारी प्‍यारी सारी में, तुम, प्राण, मिलीं नत, लाज-भरी
मधुऋतु-मुकुलित गुलमुहर तले।

1
सिंदूर लुटाया था रवि ने,
संध्‍या ने स्‍वर्ण लुटाया था,
थे गाल गगन के लाल हुए,
धरती का दिल भर आया था,

लहराया था भरमाया-सा
डाली-डाली पर गंध पवन
जब मैंने तुमको औ' तुमने
मुझको अनजाने पाया था;

है धन्‍य धरा जिस पर मन का
धन धोखे से मिल जाता है;
पल अचरज और अनिश्‍चय के
पलकों पर आते ही पिघले,

पर सुधि में संचित साँझ कि जब
रतनारी प्‍यारी सारी में, तुम, प्राण, मिलीं नत, लाज-भरी
मधुऋतु-मुकुलित गुलमुहर तले।

2
सायं-प्रात: का कंचन क्या
यदि अधरों का अंगार मिले,
तारकमणियों की संपत्ति क्‍या
यदि बाँहों का गलहार मिले,

संसार मिले भी तो क्‍या जब
अपना अंतर ही सूना हो,
पाना फिर क्‍या शेष रहे जब
मन को मन का उपहार मिले;

है धन्‍य प्रणय जिसको पाकर
मानव स्‍वर्गों को ठुकराता;
ऐसे पागलपन का अवसर
कब जीवन में दो बार मिले;

है याद मुझे वह शाम कि जब
नीलम सी सारी में, तुम, प्राण, मिलीं उन्‍माद भरी
खुलकर फूले गुलमुहर तले।

सुधि में संचित वह साँझ कि जब
रतनारी प्‍यारी सारी में, तुम, प्राण, मिलीं नत, लाज-भरी
मधुऋतु-मुकुलित गुलमुहर तले।

आभास बिरह का आया था
मुझको मिलने की घड़ि‍यों में,
आहों की आहट आई थी
मुझको हँसती फुलझड़ि‍यों में,

मानव के सुख में दुख ऐसे
चुपचाप उतरकर आ जाता,
है ओस ढुलक पड़ती जैसे
मकरंदमयी पंखुरियों में;

है धन्‍य समय जिससे सपना
सच होता, सच सपना होता;
अंकित सबके अंतरपट पर
कुछ बीती बातें, दिन पिछले;

कब भूल सका गोधूली की जब
सित-सेमल सादी सारी में, तुम, प्राण, मिली अवसाद-भरी
कलि-पुहुप झरे गुलमुहर तले।

सुधि में संचित वह साँझ कि जब
रतनारी प्‍यारी सारी में, तुम, प्राण, मिलीं नत, लाज-भरी
मधुऋतु-मुकुलित गुलमुहर तले।

14. जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला

जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूं,
जो किया, कहा, माना उसमें क्या भला-बुरा ।

1
जिस दिन मेरी चेतना जगी मैनें देखा,
मैं खड़ा हुआ हूँ दुनिया के इस मेले में,
हर एक यहां पर एक भुलावे में भूला,
हर एक लगा है अपनी अपनी दे-ले में,

कुछ देर रहा हक्का-बक्का, भौंचक्का सा,
आ गया कहाँ, क्या करूँ यहाँ, जाऊँ किस जगह?
फ़िर एक तरफ़ से आया ही तो धक्का सा,
मैनें भी बहना शुरु किया उस रेले में,

क्या बाहर की ठेला-पेली ही कुछ कम थी,
जो भीतर भी भावों का ऊहापोह मचा,
जो किया, उसी को करने की मजबूरी थी,
जो कहा, वही मन के अंदर से उबल चला,

जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूं,
जो किया, कहा, माना उसमें क्या भला-बुरा ।

2
मेला जितना भडकीला रंग-रंगीला था,
मानस के अंदर उतनी ही कमज़ोरी थी,
जितना ज़्यादा संचित करने की ख्वाहिश थी,
उतनी ही छोटी अपने कर की झोरी थी,

जितनी ही बिरमे रहने की थी अभिलाषा,
उतना ही रेले तेज़ ढकेले जाते थे,
क्रय-विक्रय तो ठंडे दिल से हो सकता है,
यह तो भागा-भागी की छीना-छोरी थी;

अब मुझसे पूछा जाता है क्या बतलाऊं,
क्या मान अकिंचन पथ पर बिखरता आया,
वह कौन रतन अनमोल मिला मुझको
जिस पर अपना मन प्राण निछावर कर आया,

यह थी तक़दीरी बात, मुझे गुण-दोष ना दो
जिसको समझा था सोना, वह मिट्टी निकली,
जिसको समझा था आंसू, वह मोती निकला

जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूं,
जो किया, कहा, माना उसमें क्या भला-बुरा ।

3
मैं कितना ही भूलूं, भटकूं या भरमाऊं,
है एक कहीं मंज़िल जो मुझे बुलाती है,
कितने ही मेरे पांव पड़ें, ऊंचे-नीचे,
प्रतिपल वह मेरे पास चली ही आती है,

मुझ पर विधि का आभार बहुत सी बातों का,
पर मैं कृतज्ञ उसका इस पर सबसे ज़्यादा -
नभ ओले बरसाए, धरती शोले उगले,
अनवरत समय की चक्की चलती जाती है,

मैं जहां खडा था कल, उस थल पर आज नही,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है,
ले मापदंड जिसको परिवर्तित कर देतीं,
वे छू कर ही काल-देश की सीमाएं,

जग दे मुझ पर फ़ैसला जैसा उसे भाए,
लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के,
इस एक और पहलू से होकर निकल चला।

जीवन की आपाधापी में कब वक़्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूं,
जो किया, कहा, माना उसमें क्या भला-बुरा ।

उत्तर भाग

1. कुदिन लगा, सरोजिनी सजा न सर

कुदिन लगा, सरोजिनी सजा न सर,
सुदिन भगा, न कंज पर ठहर भ्रमर,
अनय जगा, न रस विमुग्‍ध अधर,
---सदैव स्‍नेह
के लिए
विफल हृदय!

कटक चला, निकुंज में हवा न चला,
नगर हिला, न फूल-फूल पर मचल,
ग़दर हुया, सुरभि समीर से न रल,
---सदैव मस्‍त
चाल से
चला प्रणय!

समर छिड़ा, न आज बोल, कोकिला,
क़हत पड़ा, न कंठ खोल कोकिला,
प्रलय खड़ा, न कर ठठोल कोकिला,
---सदैव प्रीति-
गीत के
लिए समय!

2. सुवर्ण मेघ युक्त पच्छिमी गगन

सुवर्ण मेघ युक्त पच्छिमी गगन,
विषाद से विमुक्त पच्छिमी गगन,
प्रसाद से प्रबुद्ध पच्छिमी हवा,
धरा सजग
अतीत को
बिसार फिर !

न ग्रीष्म के उसाँस का पता कहीं,
न अश्रुसिक्त वृक्ष औ' लता कहीं,
न प्राणहीन हो कहीं थमी हवा,
निशा रही
स्वरूप को
संवार फिर !

मयँक-रश्मि पूर्व से लहक रही,
असुप्त नीड़-वासिनी चहक रही,
शरद प्रफुल्ल मल्लिका महक रही,
दहक रहा
बुझा हआ
अँगार फिर !

3. निशा, मगर बिना निशा सिंगार के

निशा, मगर बिना निशा सिंगार के,
नखत थकिन अनिंद्र नभ निहार के,
क्षितिज-परिधि निराश, कालिमामयी,
परंतु
आसमान
इंतज़ार में!

घड़ी हरेक वर्ष-सी बड़ी हुई,
निशा पहाड़ की तरह खड़ी हुई,
नछत्र-माल चाल भूल-सी गई,
परंतु
कब थकान
इंतज़ार में!

प्रभात-भाल-चंद्र पूर्व में उगा,
प्रभात-बालचंद्र पूर्व में उगा,
प्रभान-लालचंद्र पूर्व में उगा,
परंतु
सुख महान
इंतज़ार में!

4. दिवस गया विवश थका हुआ शिथिल

दिवस गया विवश थका हुआ शिथिल,
तिमिरमयी हुई वसुंधरा निखिल,
ज़मीन-आसमान में दिए जले,
मगर जगत
हुआ नहीं
प्रकाशमय !

सभी तरफ़ विभा बिखर गई तरुण,
कलित-ललित हुआ, सभी कलुष-करुण,
किसी समय बुझे हुए दिए जले,
किन्हीं नयन
प्रदीप में
जगा प्रणय!

चढ़ा मुंडेर मुर्ग़ सिर उठा रहा,
पुकार बारबार यह बता रहा,
सुभग, सजग, सजीव प्रात आ रहा;
नई नज़र,
नई लहर,
नया समय !

5. शिशिर समीर वन झकोर कर गया

शिशिर समीर वन झकोर कर गया,
सिंगार वृक्ष-वेलि का किधर गया,
ज़मीन पीत पत्र-पुंज से भरी;
प्रकृति खड़ी
हुई, ठगी
हुई, अचित !

उठी पुकार एक शांति भंग कर,
उठा गगन सिहर, उठी अवनि सिहर,
'बिसार दो विषाद की गई घड़ी;'
प्रकृति खड़ी
हुई, जगी
हुई, भ्रमित !

शिशिर समीर बन गया मलय पवन,
नवीन गीत-प्राण से गुंजा गगन,
नवीन रक्त-राग से रंजी अवनि,
प्रकृति खड़ी
सुरस पगी,
सुअंकुरित !

6. समेट ली किरण कठिन दिनेश ने

समेट ली किरण कठिन दिनेश ने,
सभा बादल दिया तिमिर-प्रवेश ने,
सिंगार कर लिया गगन प्रदेश ने;
---नटी निशीथ
का पुलक
उठा हिया!

समीर कह चला कि प्‍यार का प्रहरे,
मिली भुजा-भुजा, मिले अधर-अधर,
प्रणय प्रसून गया सेज पर गया बिखर;
निशा सभीत
ने कहा कि
क्‍या किया!

अशंक शुक्र पूर्व में उवा हुआ,
क्षितिज अरुण प्रकाश से छुआ हुआ,
समीर है कि सृष्‍ट‍िकार की दुआ;
निशा बिनीत
ने कहा कि
शुक्रिया!

7. समीर स्‍नेह-रागिनी सुना गया

समीर स्‍नेह-रागिनी सुना गया,
तड़ाग में उफान-सा उठा गया,
तरंग में तरंग लीन हो गई;
झुकी निशा,
झँपी दिशा,
झुके नयन!

बयार सो गई अडोल डाल पर,
शिथिल हुआ सुनिल ताल पर,
प्रकृति सुरम्‍य स्‍वप्‍न बीच खो गई;
गई कसक,
गिरी पल‍क,
मुँदे नयन!

विहंग प्रात गीत गा उठा अभय,
उड़ा अलक चला ललक पवन मलय,
सुहाग नेत्र चुमने चला प्रणय;
खुला गगन,
खिले सुमन,
खुले नयन!

8. पुकारता पपीहरा पि...या, पि...या

पुकारता पपीहरा पि...या, पि...या,
प्रतिध्‍वनित निनाद से हिया-हिया;
हरेक प्‍यार की पुकार में असर,
कहाँ उठी,
कहाँ सुनी गई
मगर!

घटा अखंड आसमान में घिरी,
लगी हुई अखंड भूमि पर झरी,
नहा रहा पपीहरा सिहर-सिहर;
अधर---सुधा
निमग्‍न हो रहे
अधर!

सुनील मेघहीन हो गया गगन,
बसुंधरा पड़ी हरित बसन,
पपीहरा लगा रहा वह रटन;
प्रणय तृषा
अतृप्‍त सर्वदा
अमर!

9. सुना कि एक स्‍वर्ग शोधता रहा

सुना कि एक स्‍वर्ग शोधता रहा,
सुना कि एक स्‍वप्‍न खोजता रहा,
सुना कि एक लोक भोगता रहा,
मुझे हरेक
शक्‍ति का
प्रमाण है!

सुना कि सत्‍या से न भक्‍ति हो सकी,
सुना कि स्‍वप्‍न से न मुक्‍ति हो सकी,
सुना कि भोग से न तृप्‍ति हो सकी,
विफल मनुष्‍य
सब तरफ़
समान है!

विराग मग्‍न हो कि राग रत रहे,
विलीन कल्‍पना कि सत्‍य में दहे,
धुरीण पुण्‍य का कि पाप में बहे,
मुझे मनुष्‍य
सब जगह
महान है!

10. उसे न विश्‍व की विभूतियाँ दिखीं

उसे न विश्‍व की विभूतियाँ दिखीं,
उसे मनुष्‍य की न खूबियाँ दिखीं,
मिलीं हृदय-रहस्‍य की न झाँकियाँ,
सका न खेल
जो कि प्राण
का जुआ!

सजीव है गगन किरण-पुलक भरा,
सजीव गंध से बसी वसुंधरा,
पवन अभय लिए प्रणय कहानियाँ,
डरा-मरा
न स्‍नेह ने
जिसे छुआ!

गगन घृणित अगर न गीत गूंजता,
अवनि घृणित अगर न फूल फूलता,
हृदय घृणित अगर न स्‍वप्‍न झूलता,
जहाँ वहा
न रस वहीं
नरक हुआ!

 
 
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