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गोपालदास नीरज
Gopal Das Neeraj
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लहर पुकारे गोपालदास नीरज

पूर्ण होकर रुदन भी युग-गान बनता है
जय जय जय जयति हिन्द
तब मानव कवि बन जाता है
मधु पीते-पीते थके नयन, फ़िर भी प्यासे अरमान
जीवन जहाँ
उसकी प्यास प्रबल कितनी थी
तुम और मैं
क्या हुआ जो साथ छूटा
दूर मत करना चरण से
अब तुम्हारे ही सहारे
मैं तुम्हारी तुम हमारे
प्राण ! परीक्षा बहुत कठिन है
अब तो ले लो प्राण ! शरण में
पेम-पथ
तब किसी की याद आती
रेखाएँ
नर होकर कर फैलाता है
चलते-चलते थक गए पैर
सजल-सजल निज नील नयन-घन
आज वेदना सुख पाती है
एक दिन भी जी मगर
 
 
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