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अहमद फ़राज़
Ahmad Faraz
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Khanabadosh Ahmed Faraz in Hindi

ख़ानाबदोश अहमद फ़राज़

1. हर्फ़े-ताज़ा की तरह क़िस्स-ए-पारीना कहूँ

हर्फ़े-ताज़ा की तरह क़िस्स-ए-पारीना कहूँ
कल की तारीख़ को मैं आज का आईना कहूँ

चश्मे-साफ़ी से छलकती है मये-जाँ तलबी
सब इसे ज़हर कहें मैं इसे नौशीना कहूँ

मैं कहूँ जुरअते-इज़हार हुसैनीय्यत है
मेरे यारों का ये कहना है कि ये भी न कहूँ

मैं तो जन्नत को भी जानाँ का शबिस्ताँ जानूँ
मैं तो दोज़ख़ को भी आतिशकद-ए-सीना कहूँ

ऐ ग़मे-इश्क़ सलामत तेरी साबितक़दमी
ऐ ग़मे-यार तुझे हमदमे-दैरीना कहूँ

इश्क़ की राह में जो कोहे-गराँ आता है
लोग दीवार कहें मैं तो उसे ज़ीना कहूँ

सब जिसे ताज़ा मुहब्बत का नशा कहते हैं
मैं ‘फ़राज़’ उस को ख़ुमारे-मये-दोशीना कहूँ

(क़िस्स-ए-पारीना=पुराना क़िस्सा, नौशीना=शर्बत,
शबिस्ताँ=शयनागार, आतिशकद-ए-सीना=छाती की
भट्ठी, हमदमे-दैरीना=पुराना मित्र, कोहे-गराँ=मुश्किल
पहाड़, ख़ुमारे-मये-दोशीना = ग़ुजरी रात की शराब
का ख़ुमार)

2. न कोई ख़्वाब न ताबीर ऐ मेरे मालिक

न कोई ख़्वाब न ताबीर ऐ मेरे मालिक
मुझे बता मेरी तक़सीर ऐ मेरे मालिक

न वक़्त है मेरे बस में न दिल पे क़ाबू है
है कौन किसका इनागीर ऐ मेरे मालिक

उदासियों का है मौसम तमाम बस्ती पर
बस एक मैं नहीं दिलगीर ऐ मेरे मालिक

सभी असीर हैं फिर भी अगरचे देखने हैं
है कोई तौक़ न ज़ंजीर ऐ मेरे मालिक

सो बार बार उजड़ने से ये हुआ है कि अब
रही न हसरत-ए-तामीर ऐ मेरे मालिक

मुझे बता तो सही मेहरो-माह किसके हैं
ज़मीं तो है मेरी जागीर ऐ मेरे मालिक

‘फ़राज़’ तुझसे है ख़ुश और न तू ‘फ़राज़’ से है
सो बात हो गई गंभीर ऐ मेरे मालिक

(इनागीर=लगाम थामने वाला, तौक़=गले में डाली
जाने वाली कड़ी)

3. तेरा क़ुर्ब था कि फ़िराक़ था वही तेरी जलवागरी रही

तेरा क़ुर्ब था कि फ़िराक़ था वही तेरी जलवागरी रही
कि जो रौशनी तेरे जिस्म की थी मेरे बदन में भरी रही

तेरे शहर से मैं चला था जब जो कोई भी साथ न था मेरे
तो मैं किससे महवे-कलाम था ? तो ये किसकी हमसफ़री रही ?

मुझे अपने आप पे मान था कि न जब तलक तेरा ध्यान था
तू मिसाल थी मेरी आगही तू कमाले-बेख़बरी रही

मेरे आश्ना भी अजीब थे न रफ़ीक़ थे न रक़ीब थे
मुझे जाँ से दर्द अज़ीज़ था उन्हें फ़िक्रे-चारागरी रही

मैं ये जानता था मेरा हुनर है शिकस्तो-रेख़्त से मोतबर8
जहाँ लोग संग-बदस्त थे वहीं मेरी शीशागरी रही

जहाँ नासेहों का हुजूम था वहीं आशिक़ों की भी धूम थी
जहाँ बख़्यागर थे गली-गली वहीं रस्मे-जामादरी रही

तेरे पास आके भी जाने क्यूँ मेरी तिश्नगी में हिरास'अ था
बमिसाले-चश्मे-ग़ज़ा जो लबे-आबजू भी डरी रही

जो हवस फ़रोश थे शहर के सभी माल बेच के जा चुके
मगर एक जिन्से-वफ़ा मेरी सरे-रह धरी की धरी रही

मेरे नाक़िदों ने फ़राज़’ जब मेरा हर्फ़-हर्फ़ परख लिया
तो कहा कि अहदे-रिया में भी जो खरी थी बात खरी रही

(आश्ना=जानकार, परिचित, रक़ीब=शत्रु, शिकस्तो-रेख़्त=टूट फूट,
संग-बदस्त=हाथ में पत्थर लिए हुए, नासेहों=उपदेश देने वाले,
बख़्यागर=कपड़ा सीने वाले, रस्मे-जामादरी=पागलपन की
अवस्था में कपड़े फाड़ने की रीत, तिश्नगी=प्यास, हिरास'अ=
आशंका,निराशा, बमिसाले-चश्मे-ग़ज़ा=हिरन की आँख की तरह,
लबे-आबजू=दरिया के किनारे, नाक़िद=आलोचक, अहदे-रिया=
झूठा ज़माना)

4. यूँ तुझे ढूँढ़ने निकले के न आए ख़ुद भी

यूँ तुझे ढूँढ़ने निकले के न आए ख़ुद भी
वो मुसाफ़िर कि जो मंज़िल थे बजाए ख़ुद भी

कितने ग़म थे कि ज़माने से छुपा रक्खे थे
इस तरह से कि हमें याद न आए खुद भी

ऐसा ज़ालिम कि अगर ज़िक्र में उसके कोई ज़ुल्म
हमसे रह जाए तो वो याद दिलाए ख़ुद भी

लुत्फ़ तो जब है तअल्लुक़ में कि वो शहरे-जमाल
कभी खींचे कभी खिंचता चला आए ख़ुद भी

ऐसा साक़ी हो तो फिर देखिए रंगे-महफ़िल
सबको मदहोश करे होश से जाए ख़ुद भी

यार से हमको तगाफ़ुल का गिला है बेजा
बारहा महफ़िले-जानाँ से उठ आए ख़ुद भी

5. आज फिर दिल ने कहा आओ भुला दें यादें

आज फिर दिल ने कहा आओ भुला दें यादें
ज़िंदगी बीत गई और वही यादें-यादें

जिस तरह आज ही बिछड़े हों बिछड़ने वाले
जैसे इक उम्र के दुःख याद दिला दें यादें

काश मुमकिन हो कि इक काग़ज़ी कश्ती की तरह
ख़ुदफरामोशी के दरिया में बहा दें यादें

वो भी रुत आए कि ऐ ज़ूद-फ़रामोश मेरे
फूल पत्ते तेरी यादों में बिछा दें यादें

जैसे चाहत भी कोई जुर्म हो और जुर्म भी वो
जिसकी पादाश में ताउम्र सज़ा दें यादें

भूल जाना भी तो इक तरह की नेअमत है ‘फ़राज़’
वरना इंसान को पागल न बना दें यादें

6. मैं दीवाना सही पर बात सुन ऐ हमनशीं मेरी

मैं दीवाना सही पर बात सुन ऐ हमनशीं मेरी
कि सबसे हाले-दिल कहता फिरूँ आदत नहीं मेरी

तअम्मुल क़त्ल में तुझको मुझे मरने की जल्दी थी
ख़ता दोनों की है उसमें, कहीं तेरी कहीं मेरी

भला क्यों रोकता है मुझको नासेह गिर्य: करने से
कि चश्मे-तर मेरा है, दिल मेरा है, आस्तीं मेरी

मुझे दुनिया के ग़म और फ़िक्र उक़बा की तुझे नासेह
चलो झगड़ा चुकाएँ आसमाँ तेरा ज़मीं मेरी

मैं सब कुछ देखते क्यों आ गया दामे-मुहब्बत में
चलो दिल हो गया था यार का, आंखें तो थीं मेरी

‘फ़राज़’ ऐसी ग़ज़ल पहले कभी मैंने न लिक्खी थी
मुझे ख़ुद पढ़के लगता है कि ये काविश नहीं मेरी

7. ना दिल से आह ना लब से सदा निकलती है

ना दिल से आह ना लब से सदा निकलती है
मगर ये बात बड़ी दूर जा निकलती है

सितम तो ये है अहदे सितम के जाते ही
तमाम खल्क मेरी हमनवां निकलती है

विसाले बहर की हसरत में ज़ूए-कम-मायः
कभी कभी किसी सहरा में जा निकलती है

मैं क्या करूं मेरे कातिल ना चाहने पर भी
तेरे लिये मेरे दिल से दुआ निकलती है

वो ज़िन्दगी हो कि दुनिया "फ़राज़" क्या कीजे
कि जिससे इश्क करो बेवफ़ा निकलती है

(खल्क=दुनिया, हमनवां=सहमत, विसाले-बहर=
समन्दर से मिलने कि चाहत, जूए-कम-मायः=
कम पानी की नदी)

8. तेरी बातें ही सुनाने आये

तेरी बातें ही सुनाने आये
दोस्त भी दिल ही दुखाने आये

फूल खिलते हैं तो हम सोचते हैं
तेरे आने के ज़माने आये

ऐसी कुछ चुप सी लगी है जैसे
हम तुझे हाल सुनाने आये

इश्क़ तन्हा है सर-ए-मंज़िल-ए-ग़म
कौन ये बोझ उठाने आये

अजनबी दोस्त हमें देख के हम
कुछ तुझे याद दिलाने आये

दिल धड़कता है सफ़र के हंगाम
काश फिर कोई बुलाने आये

अब तो रोने से भी दिल दुखता है
शायद अब होश ठिकाने आये

क्या कहीं फिर कोई बस्ती उजड़ी
लोग क्यूँ जश्न मनाने आये

आ ना जाए कहीं फिर लौट के जाँ
मेरी मय्यत वो सझाने आये

सो रहो मौत के पहलू में "फ़राज़"
नींद किस वक़्त न जाने आये

9. ज़िन्दगी से यही गिला है मुझे

ज़िन्दगी से यही गिला है मुझे
तू बहुत देर से मिला है मुझे

हमसफ़र चाहिये हुजूम नहीं
इक मुसाफ़िर भी काफ़िला है मुझे

तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल
हार जाने का हौसला है मुझे

लब कुशां हूं तो इस यकीन के साथ
कत्ल होने का हौसला है मुझे

दिल धडकता नहीं सुलगता है
वो जो ख्वाहिश थी, आबला है मुझे

कौन जाने कि चाहतो में फ़राज़
क्या गंवाया है क्या मिला है मुझे

10. दुख फ़साना नहीं के तुझसे कहें

दुख फ़साना नहीं के तुझसे कहें
दिल भी माना नहीं के तुझसे कहें

आज तक अपनी बेकली का सबब
ख़ुद भी जाना नहीं के तुझसे कहें

एक तू हर्फ़आश्ना था मगर
अब ज़माना नहीं के तुझसे कहें

बे-तरह दिल है और तुझसे
दोस्ताना नहीं के तुझसे कहें

ऐ ख़ुदा दर्द-ए-दिल है बख़्शिश-ए-दोस्त
आब-ओ-दाना नहीं के तुझसे कहें

11. तुझसे बिछड़ के हम भी मुकद्दर के हो गये

तुझसे बिछड़ के हम भी मुकद्दर के हो गये
फिर जो भी दर मिला है उसी दर के हो गये

फिर यूँ हुआ के गैर को दिल से लगा लिया
अंदर वो नफरतें थीं के बाहर के हो गये

क्या लोग थे के जान से बढ़ कर अजीज थे
अब दिल से मेह नाम भी अक्सर के हो गये

ऐ याद-ए-यार तुझ से करें क्या शिकायतें
ऐ दर्द-ए-हिज्र हम भी तो पत्थर के हो गये

समझा रहे थे मुझ को सभी नसेहान-ए-शहर
फिर रफ्ता रफ्ता ख़ुद उसी काफिर के हो गये

अब के ना इंतेज़ार करें चारगर का हम
अब के गये तो कू-ए-सितमगर के हो गये

रोते हो एक जजीरा-ए-जाँ को "फ़राज़" तुम
देखो तो कितने शहर समंदर के हो गये

12. गनीम से भी अदावत में हद नहीं माँगी

गनीम से भी अदावत में हद नहीं माँगी
कि हार मान ली, लेकिन मदद नहीं माँगी

हजार शुक्र कि हम अहले-हर्फ़-जिन्दा ने
मुजाविराने-अदब से सनद नहीं माँगी

बहुत है लम्हा-ए-मौजूद का शरफ़ भी मुझे
सो अपने फ़न से बकाये-अबद नहीं माँगी

क़बूल वो जिसे करता वो इल्तिजा नहीं की
दुआ जो वो न करे मुस्तरद, नहीं माँगी

मैं अपने जाम-ए-सद-चाक से बहुत खुश हूँ
कभी अबा-ओ-क़बा-ए-ख़िरद नहीं माँगी

शहीद जिस्म सलामत उठाये जाते हैं
तभी तो गोरकनों से लहद नहीं माँगी

मैं सर-बरहना रहा फिर भी सर कशीदा रहा
कभी कुलाह से तौक़ीद-ए- सर नहीं माँगी

अता-ए-दर्द में वो भी नहीं था दिल का ग़रीब
`फ़राज' मैंने भी बख़्शिश में हद नहीं माँगी

13. ज़ख़्म को फ़ूल तो सर-सर को सबा कहते हैं

ज़ख़्म को फ़ूल तो सर-सर को सबा कहते हैं
जाने क्या दर्द है, क्या लोभ है, क्या कहते हैं

क्या कयामत है कि जिनके लिये रुक रुक के चले
अब वही लोग हमें आबला-पा कहते हैं

कोई बतलाओ कि इक उम्र का बिछुडा महबूब
इत्तेफ़ाकन कहीं मिल जाये तो क्या कहते हैं

ये भी अन्दाज़े सुखन है कि खता को तेरी
ग़मज़-ओ-इश्वः-ओ-अन्दाज-ओ-अदा कहते हैं

जब तलक दूर है तू तेरी परस्तिश कर लें
हम जिसे छू ना सकें, उसको खुदा कहते हैं

क्या त़अज्जुब है कि हम अहले-तमऩ्ना को फ़राज़
वो जो महरूम-ए-तमऩ्ना हैं बुरा कहते हैं

14. तुझे उदास किया खुद भी सोगवार हुए

तुझे उदास किया खुद भी सोगवार हुए
हम आप अपनी मोहब्बत से शर्मसार हुए

बला की रौ थी नदीमाने-आबला-पा को
पलट के देखना चाहा कि खुद गुबार हुए

गिला उसी का किया जिससे तुझपे हर्फ़ आया
वरना यूँ तो सितम हम पे बेशुमार हुए

ये इन्तकाम भी लेना था ज़िन्दगी को अभी
जो लोग दुश्मने-जाँ थे, वो गम-गुसार हुए

हजार बार किया तर्के-दोस्ती का ख्याल
मगर फ़राज़ पशेमाँ हर एक बार हुए

15. बुझा है दिल तो ग़मे-यार अब कहाँ तू भी

बुझा है दिल तो ग़मे-यार अब कहाँ तू भी
मिसाले साया-ए-दीवार अब कहाँ तू भी

बजा कि चश्मे-तलब भी हुई तही कीस
मगर है रौनक़े-बाज़ार अब कहाँ तू भी

हमें भी कारे-जहाँ ले गया है दूर बहुत
रहा है दर-पए आज़ार अब कहाँ तू भी

हज़ार सूरतें आंखों में फिरती रहती हैं
मेरी निगाह में हर बार अब कहाँ तू भी

उसी को अहद फ़रामोश क्यों कहें ऐ दिल
रहा है इतना वफ़ादार अब कहाँ तू भी

मेरी गज़ल में कोई और कैसे दर आए
सितम तो ये है कि ऐ यार अब कहाँ तू भी

जो तुझसे प्यार करे तेरी नफ़रतों के सबब
‘फ़राज़’ ऐसा गुनहगार अब कहाँ तू भी

16. अच्छा था अगर ज़ख्म न भरते कोई दिन और

अच्छा था अगर ज़ख्म न भरते कोई दिन और
उस कू-ए-मलामत में गुजरते कोई दिन और

रातों के तेरी यादों के खुर्शीद उभरते
आँखों में सितारे से उभरते कोई दिन और

हमने तुझे देखा तो किसी और को ना देखा
ए काश तेरे बाद गुजरते कोई दिन और

राहत थी बहुत रंज में हम गमतलबों को
तुम और बिगड़ते तो संवरते कोई दिन और

गो तर्के-तअल्लुक था मगर जाँ पे बनी थी
मरते जो तुझे याद ना करते कोई दिन और

उस शहरे-तमन्ना से फ़राज़ आये ही क्यों थे
ये हाल अगर था तो ठहरते कोई दिन और

(कू-ए-मलामत=ऐसी गली जहाँ व्यंग्य किया
जाता हो, खुर्शीद=सूर्य, रंज= तकलीफ़, गमतलब=
दुख पसन्द करने वाले, तर्के-तअल्लुक=रिश्ता
टूटना)

17. जो चल सको तो कोई ऐसी चाल चल जाना

जो चल सको तो कोई ऐसी चाल चल जाना
मुझे गुमाँ भी ना हो और तुम बदल जाना

ये शोलगी हो बदन की तो क्या किया जाये
सो लाजमी है तेरे पैरहन का जल जाना

तुम्हीं करो कोई दरमाँ, ये वक्त आ पहुँचा
कि अब तो चारागरों का भी हाथ मल जाना

अभी अभी जो जुदाई की शाम आई थी
हमें अजीब लगा ज़िन्दगी का ढल जाना

सजी सजाई हुई मौत ज़िन्दगी तो नहीं
मुअर्रिखों ने मकाबिर को भी महल जाना

ये क्या कि तू भी इसी साअते-जवाल में है
कि जिस तरह है सभी सूरजों को ढल जाना

हर इक इश्क के बाद और उसके इश्क के बाद
फ़राज़ इतना आसाँ भी ना था संभल जाना

(शोलगी=अग्नि ज्वाला, मुअर्रिख= इतिहास कार,
मकाबिर=कब्र का बहुवचन, साअते-जवाल= ढलान
का क्षण)

18. हम सुनायें तो कहानी और है

हम सुनायें तो कहानी और है
यार लोगों की जुबानी और है

चारागर रोते हैं ताज़ा ज़ख्म को
दिल की बीमारी पुरानी और है

जो कहा हमने वो मजमूँ और था
तर्जुमाँ की तर्जुमानी और है

है बिसाते-दिल लहू की एक बूंद
चश्मे-पुर-खूं की रवानी और है

नामाबर को कुछ भी हम पैगाम दें
दास्ताँ उसने सुनानी और है

आबे-जमजम दोस्त लायें हैं अबस
हम जो पीते हैं वो पानी और है

सब कयामत कामतों को देख लो
क्या मेरे जानाँ का सानी और है

अहले-दिल के अन्जुमन में आ कभी
उसकी दुनिया यार जानी और है

शाइरी करती है इक दुनिया फ़राज़
पर तेरी सादा बयानी और है

(चश्मे-पुर-खूं=खून से भरी हुई आँख,
आबे-जमजम=मक्के का पवित्र पानी,
अबस=बेकार, सानी=बराबर,दूसरा, कामत=
लम्बे शरीर वाला)

19. संगदिल है वो तो क्यूं इसका गिला मैंने किया

संगदिल है वो तो क्यूं इसका गिला मैंने किया
जब कि खुद पत्थर को बुत, बुत को खुदा मैंने किया

कैसे नामानूस लफ़्ज़ों कि कहानी था वो शख्स
उसको कितनी मुश्किलों से तर्जुमा मैंने किया

वो मेरी पहली मोहब्बत, वो मेरी पहली शिकस्त
फिर तो पैमाने-वफ़ा सौ मर्तबा मैंने किया

हो सजावारे-सजा क्यों जब मुकद्दर में मेरे
जो भी उस जाने-जहाँ ने लिख दिया, मैंने किया

वो ठहरता क्या कि गुजरा तक नहीं जिसके लिया
घर तो घर, हर रास्ता, आरास्ता मैंने किया

मुझपे अपना जुर्म साबित हो न हो लेकिन मैंने
लोग कहते हैं कि उसको बेवफ़ा मैंने किया

(नामानूस=अजनबी, आरास्ता=सजाया)

20. अब वो मंजर, ना वो चेहरे ही नजर आते हैं

अब वो मंजर, ना वो चेहरे ही नजर आते हैं
मुझको मालूम ना था ख्वाब भी मर जाते हैं

जाने किस हाल में हम हैं कि हमें देख के सब
एक पल के लिये रुकते हैं गुजर जाते हैं

साकिया तूने तो मयखाने का ये हाल किया
रिन्द अब मोहतसिबे-शहर के गुण गाते हैं

ताना-ए-नशा ना दो सबको कि कुछ सोख्त-जाँ
शिद्दते-तिश्नालबी से भी बहक जाते हैं

जैसे तजदीदे-तअल्लुक की भी रुत हो कोई
ज़ख्म भरते हैं तो गम-ख्वार भी आ जाते हैं

एहतियात अहले-मोहब्बत कि इसी शहर में लोग
गुल-बदस्त आते हैं और पा-ब-रसन जाते हैं

(मोहतसिबे-शहर=धर्माधिकारी, सोख्त-जाँ=दिल जले,
शिद्दते-तिश्नालबी=प्यास की अधिकता, तजदीदे-
तअल्लुक=रिश्तों का नवीनीकरण)

21. अव्वल अव्वल की दोस्ती है अभी

अव्वल अव्वल की दोस्ती है अभी
इक ग़ज़ल है कि हो रही है अभी

मैं भी शहरे-वफ़ा में नौवारिद
वो भी रुक रुक के चल रही है अभी

मैं भी ऐसा कहाँ का ज़ूद शनास
वो भी लगता है सोचती है अभी

दिल की वारफ़तगी है अपनी जगह
फिर भी कुछ एहतियात सी है अभी

गरचे पहला सा इज्तिनाब नहीं
फिर भी कम कम सुपुर्दगी है अभी

कैसा मौसम है कुछ नहीं खुलता
बूंदा-बांदी भी धूप भी है अभी

ख़ुद-कलामी में कब ये नशा था
जिस तरह रु-ब-रू कोई है अभी

क़ुरबतें लाख खूबसूरत हों
दूरियों में भी दिलकशी है अभी

फ़सले-गुल में बहार पहला गुलाब
किस की ज़ुल्फ़ों में टांकती है अभी

सुबह नारंज के शिगूफ़ों की
किसको सौगात भेजती है अभी

रात किस माह -वश की चाहत में
शब्नमिस्तान सजा रही है अभी

मैं भी किस वादी-ए-ख़याल में था
बर्फ़ सी दिल पे गिर रही है अभी

मैं तो समझा था भर चुके सब ज़ख़्म
दाग़ शायद कोई कोई है अभी

दूर देशों से काले कोसों से
कोई आवाज़ आ रही है अभी

ज़िन्दगी कु-ए-ना-मुरादी से
किसको मुड़ मुड़ के देखती है अभी

इस क़दर खीच गयी है जान की कमान
ऐसा लगता है टूटती है अभी

ऐसा लगता है ख़ल्वत-ए-जान में
वो जो इक शख़्स था वोही है अभी

मुद्दतें हो गईं 'फ़राज़' मगर
वो जो दीवानगी थी, वही है अभी

(नौवारिद=नया आने वाला, ज़ूद-शनास=
जल्दी पहचानने वाला, वारफतगी=खोयापन,
इज्तिनाब=घृणा,अलगाव, सुपुर्दगी=सौंपना,
खुदकलामी=खुद से बातचीत, शिगूफ़े= फूल,
कलियां)
 
 
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