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कर्मजीत सिंह गठवाला
Karamjit Singh Gathwala
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Hindi Kavita Karamjit Singh Gathwala

कर्मजीत सिंह गठवाला की हिन्दी कविता

बैसाखी

ज़ुल्म की बाढ़ में धर्म जब ज़ोरों से बहता था ।
उठे अब सूरमा कोई सभी को रो-रो कहता था ।
धर्म की बात जो करता भय मन में रहता था ।

बुद्ध-भूमि से कोई आया पंजाब जिसकी थी समर-भूमि ।
ज़ुल्म के रोकने को उसने अपनी तलवार थी चूमी ।
बन गए सिंह सयारों से जिधर भी निगाह थी घूमी ।

बाग़ तो बहुत दुनिया में परंतु एक बाग़ अमृतसर में ।
पूजा-वेदि बनी हुई जिसकी हिन्द के हर एक घर में ।
लोग जहां आज़ादी मांगने पहुंचे तो दी मौत डायर ने ।

तेरी पद-चाप सुनकर कृषक में उमंग जगती है ।
स्वप्न वह मन में बुनता जो तू उनमें रंग भरती है ।
सुनहरी रंग में डूबी धरा सब हंसती सी लगती है ।

हम ये चाहते हैं तू आए सदा ढोल औ’ नगाड़ों से ।
दुश्मनों के दिल कांपें हमारे सिंहों की दहाड़ों से ।
ज़रूरत जब पड़े इसकी नहर खोद लाएं पहाड़ों से ।

 
 
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