Hindi Kavita
अज्ञेय
Agyeya
 Hindi Kavita 

Hari Ghaas Par Kshan Bhar Agyeya

हरी घास पर क्षण भर अज्ञेय

देखती है दीठ
क्षमा की वेला
एक आटोग्रॉफ़
तुम्हीं हो क्या बन्धु वह
प्रणति
राह बदलती नहीं
विश्वास का वारिद
किरण मर जाएगी
शक्ति का उत्पाद
पराजय है याद
दीप थे अगणित
खुलती आँख का सपना
पावस-प्रात
सागर के किनारे
दूर्वांचल
कितनी शान्ति ! कितनी शान्ति !
कतकी पूनो
वसंत की बदली
मुझे सब कुछ याद है
अकेली न जैयो राधे जमुना के तीर
जब पपीहे ने पुकारा
माहीवाल से
शरद
क्वाँर की बयार
सो रहा है झोंप
उनींदी चाँदनी
सवेरे सवेरे
सपने मैंने भी देखे हैं
पुनराविष्कार
हमारा देश
जीवन
नई व्यंजना
कवि, हुआ क्या फिर
बंधु हैं नदियाँ
हरी घास पर क्षण भर
पहला दौंगरा
मेरा तारा
आत्मा बोली
कलगी बाजरे की
नदी के द्वीप
छंद है यह फूल
बने मंजूष यह अंतस्
 
 
 Hindi Kavita