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हरिवंशराय बच्चन
Harivansh Rai Bachchan
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हलाहल हरिवंशराय बच्चन

जगत-घट को विष से कर पूर्ण
जगत-घट, तुझको दूँ यदि फोड़
हिचकते औ' होते भयभीत
हुई थी मदिरा मुझको प्राप्‍त
कि जीवन आशा का उल्‍लास
जगत है चक्‍की एक विराट
रहे गुंजित सब दिन, सब काल
नहीं है यह मानव का हार
हलाहल और अमिय, मद एक
सुरा पी थी मैंने दिन चार
देखने को मुट्ठीभर धूलि
उपेक्षित हो क्षिति के दिन रात
आसरा मत ऊपर का देख
कहीं मैं हो जाऊँ लयमान
और यह मिट्टी है हैरान
पहुँच तेरे अधरों के पास
 
 
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