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गोपालदास नीरज
Gopal Das Neeraj
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ग़ज़लें गोपालदास नीरज

अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए
एक जुग ब'अद शब-ए-ग़म की सहर देखी है
खुशबू सी आ रही है इधर ज़ाफ़रान की
गुमनामियों मे रहना, नहीं है कबूल मुझको
जब चले जाएंगे लौट के सावन की तरह
जब भी इस शहर में कमरे से मैं बाहर निकला
जितना कम सामान रहेगा
तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा
दूर से दूर तलक एक भी दरख्त न था
बदन पे जिसके शराफ़त का पैरहन देखा
हम तेरी चाह में, ऐ यार ! वहाँ तक पहुँचे
है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए
 
 
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