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बिस्मिल अज़ीमाबादी
Bismil Azimabadi
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Ghazals Bismil Azimabadi in Hindi

ग़ज़लें बिस्मिल अज़ीमाबादी

1. सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है

ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तिरे ऊपर निसार
ले तिरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है

वाए क़िस्मत पाँव की ऐ ज़ोफ़ कुछ चलती नहीं
कारवाँ अपना अभी तक पहली ही मंज़िल में है

रहरव-ए-राह-ए-मोहब्बत रह न जाना राह में
लज़्ज़त-ए-सहरा-नवर्दी दूरी-ए-मंज़िल में है

शौक़ से राह-ए-मोहब्बत की मुसीबत झेल ले
इक ख़ुशी का राज़ पिन्हाँ जादा-ए-मंज़िल में है

आज फिर मक़्तल में क़ातिल कह रहा है बार बार
आएँ वो शौक़-ए-शहादत जिन के जिन के दिल में है

मरने वालो आओ अब गर्दन कटाओ शौक़ से
ये ग़नीमत वक़्त है ख़ंजर कफ़-ए-क़ातिल में है

माने-ए-इज़हार तुम को है हया, हम को अदब
कुछ तुम्हारे दिल के अंदर कुछ हमारे दिल में है

मय-कदा सुनसान ख़ुम उल्टे पड़े हैं जाम चूर
सर-निगूँ बैठा है साक़ी जो तिरी महफ़िल में है

वक़्त आने दे दिखा देंगे तुझे ऐ आसमाँ
हम अभी से क्यूँ बताएँ क्या हमारे दिल में है

अब न अगले वलवले हैं और न वो अरमाँ की भीड़
सिर्फ़ मिट जाने की इक हसरत दिल-ए-'बिस्मिल' में है

2. अब दम-ब-ख़ुद हैं नब्ज़ की रफ़्तार देख कर

अब दम-ब-ख़ुद हैं नब्ज़ की रफ़्तार देख कर
तुम हँस रहे हो हालत-ए-बीमार देख कर

सौदा वो क्या करेगा ख़रीदार देख कर
घबरा गया जो गर्मी-ए-बाज़ार देख कर

अल्लाह तेरे हाथ है अब आबरू-ए-शौक़
दम घुट रहा है वक़्त की रफ़्तार देख कर

देता कहाँ है वक़्त पड़े पर कोई भी साथ
हम को मुसीबतों में गिरफ़्तार देख कर

आते हैं मय-कदे की तरफ़ से जनाब-ए-शैख़
सरगोशियाँ हैं लग़्ज़िश-ए-रफ़्तार देख कर

ग़ैरों ने ग़ैर जान के हम को उठा दिया
बैठे जहाँ भी साया-ए-दीवार देख कर

आते हैं बज़्म-ए-याराँ में पहचान ही गया
मय-ख़्वार की निगाह को मय-ख़्वार देख कर

इस मध-भरी निगाह की अल्लाह-रे कशिश
सौ बार देखना पड़ा इक बार देख कर

तुम रहनुमा-ए-वक़्त सही फिर भी चंद गाम
चलना पड़ेगा वक़्त की रफ़्तार देख कर

वक़्त-ए-सहर गुज़र गई क्या किया न पूछिए
गर्दन में उन की सूखे हुए हार देख कर

तलछट मिला के देता है रिंदों को साक़िया
साग़र पटक न दे कोई होश्यार देख कर

'बिस्मिल' को क्या है चादर-ए-रहमत रसूल की
साए में ले ही लेगी गुनहगार देख कर

3. अब मुलाक़ात कहाँ शीशे से पैमाने से

अब मुलाक़ात कहाँ शीशे से पैमाने से
फ़ातिहा पढ़ के चले आए हैं मय-ख़ाने से

क्या करें जाम-ओ-सुबू हाथ पकड़ लेते हैं
जी तो कहता है कि उठ जाइए मय-ख़ाने से

फूँक कर हम ने हर इक गाम पे रक्खा है क़दम
आसमाँ फिर भी न बाज़ आया सितम ढाने से

हम को जब आप बुलाते हैं चले आते हैं
आप भी तो कभी आ जाइए बुलवाने से

अरे ओ वादा-फ़रामोश पहाड़ ऐसी रात
क्या कहूँ कैसे कटी तेरे नहीं आने से

याद रख! वक़्त के अंदाज़ नहीं बदलेंगे
अरे अल्लाह के बंदे तिरे घबराने से

सर चढ़ाएँ कभी आँखों से लगाएँ साक़ी
तेरे हाथों की छलक जाए जो पैमाने से

ख़ाली रक्खी हुई बोतल ये पता देती है
कि अभी उठ के गया है कोई मय-ख़ाने से

आएगी हश्र की नासेह की समझ में क्या ख़ाक
जब समझदार समझते नहीं समझाने से

बर्क़ के डर से कलेजे से लगाए हुए है
चार तिनके जो उठा लाई है वीराने से

दिल ज़रा भी न पसीजा बुत-ए-काफ़िर तेरा
काबा अल्लाह का घर बन गया बुत-ख़ाने से

शम्अ बेचारी जो इक मूनिस-ए-तन्हाई थी
बुझ गई वो भी सर-ए-शाम हवा आने से

ग़ैर काहे को सुनेंगे तिरा दुखड़ा 'बिस्मिल'
उन को फ़ुर्सत कहाँ है अपनी ग़ज़ल गाने से

4. अब रहा क्या है जो अब आए हैं आने वाले

अब रहा क्या है जो अब आए हैं आने वाले
जान पर खेल चुके जान से जाने वाले

ये न समझे थे कि ये दिन भी हैं आने वाले
उँगलियाँ हम पे उठाएँगे उठाने वाले

कौन समझाए न इठला के सर-ए-रह चलिए
हैं ये अंदाज़ गुनहगार बनाने वाले

पूछने तक को न आया कोई अल्लाह अल्लाह
थक गए पाँव की ज़ंजीर बजाने वाले

कहीं रोना न पड़े तुझ को ज़माने के साथ
अरे ओ वक़्त की झंकार पर गाने वाले

आप अंदाज़-ए-नज़र अपना बदलते ही नहीं
और बुरे बनते हैं बेचारे ज़माने वाले

पूछती है दर-ओ-दीवार से बीमार की आँख
अब कहाँ हैं वो मिरे नाज़ उठाने वाले

ब-ख़ुदा भूल गए अपनी मुसीबत 'बिस्मिल'
याद जब आए मोहम्मद के घराने वाले

5. कहाँ आया है दीवानों को तेरा कुछ क़रार अब तक

कहाँ आया है दीवानों को तेरा कुछ क़रार अब तक
तिरे वादे पे बैठे कर रहे हैं इंतिज़ार अब तक

ख़ुदा मालूम क्यूँ लौटी नहीं जा कर बहार अब तक
चमन वाले चमन के वास्ते हैं बे-क़रार अब तक

बुरा गुलचीं को क्यूँ कहिए बुरे हैं ख़ुद चमन वाले
भले होते तो क्या मुँह देखती रहती बहार अब तक

चमन की याद आई दिल भर आया आँख भर आई
जहाँ बोला कोई गुलशन में बाक़ी है बहार अब तक

सबब जो भी हो सूरत कह रही है रात जागे हो
गवाही के लिए बाक़ी है आँखों में ख़ुमार अब तक

क़यामत आए तो उन को भी आते आते आएगा
वो जिन को तेरे वादे पर नहिं है ए'तिबार अब तक

सलामत मय-कदा थोड़ी बहुत उन को भी दे साक़ी
तकल्लुफ़ में जो बैठे रह गए कुछ बादा-ख़्वार अब तक

ख़ुदारा देख ले दुनिया कि फिर ये भी न देखेगी
चमन से जाते जाते रह गई है जो बहार अब तक

क़फ़स में रहते रहते एक मुद्दत हो गई फिर भी
चमन के वास्ते रहती है बुलबुल बे-क़रार अब तक

ख़बर भी है तुझे मय-ख़्वार तो बदनाम है साक़ी
दबा कर कितनी बोतल ले गए परहेज़-गार अब तक

अरे दामन छुड़ा कर जाने वाले कुछ ख़बर भी है
तिरे क़दमों से है लिपटी हुई ख़ाक-ए-मज़ार अब तक

ये कहने वाले कहते हैं कि तौबा कर चुके 'बिस्मिल'
मगर देखे गए हैं मय-कदे में बार बार अब तक

6. ख़िज़ाँ के जाने से हो या बहार आने से

ख़िज़ाँ के जाने से हो या बहार आने से
चमन में फूल खिलेंगे किसी बहाने से

वो देखता रहे मुड़ मुड़ के सू-ए-दर कब तक
जो करवटें भी बदलता नहीं ठिकाने से

उगल न संग-ए-मलामत ख़ुदा से डर नासेह
मिलेगा क्या तुझे शीशों के टूट जाने से

ज़माना आप का है और आप उस के हैं
लड़ाई मोल लें हम मुफ़्त क्यूँ ज़माने से

ख़ुदा का शुक्र सवेरे ही आ गया क़ासिद
मैं बच गया शब-ए-फ़ुर्क़त के नाज़ उठाने से

मैं कुछ कहूँ न कहूँ कह रही है ख़ाक-ए-जबीं
कि इस जबीं को है निस्बत इक आस्ताने से

क़यामत आए क़यामत से मैं नहीं डरता
उठा तो दे कोई पर्दा किसी बहाने से

ख़बर भी है तुझे आईना देखने वाले
कहाँ गया है दुपट्टा सरक के शाने से

ये ज़िंदगी भी कोई ज़िंदगी हुई 'बिस्मिल'
न रो सके न कभी हँस सके ठिकाने से

7. ख़िज़ाँ जब तक चली जाती नहीं है

ख़िज़ाँ जब तक चली जाती नहीं है
चमन वालों को नींद आती नहीं है

जफ़ा जब तक कि चौंकाती नहीं है
मोहब्बत होश में आती नहीं है

जो रोता हूँ तो हँसता है ज़माना
जो सोता हूँ तो नींद आती नहीं है

तुम्हारी याद को अल्लाह रक्खे
जब आती है तो फिर जाती नहीं है

कली बुलबुल से शोख़ी कर रही है
ज़रा फूलों से शरमाती नहीं है

जहाँ मय-कश भी जाएँ डरते डरते
वहाँ वाइज़ को शर्म आती नहीं है

नहीं मिलती तो हंगामे हैं क्या क्या
जो मिलती है तो पी जाती नहीं है

जवानी की कहानी दावर-ए-हश्र
सर-ए-महफ़िल कही जाती नहीं है

कहाँ तक शैख़ को समझाइएगा
बुरी आदत कभी जाती नहीं है

घड़ी भर को जो बहलाए मिरा दिल
कोई ऐसी घड़ी आती नहीं है

हँसी 'बिस्मिल' की हालत पर किसी को
कभी आती थी अब आती नहीं है

8. चमन को लग गई किस की नज़र ख़ुदा जाने

चमन को लग गई किस की नज़र ख़ुदा जाने
चमन रहा न रहे वो चमन के अफ़्साने

सुना नहीं हमें उजड़े चमन के अफ़्साने
ये रंग हो तो सनक जाएँ क्यूँ न दीवाने

छलक रहे हैं सुराही के साथ पैमाने
बुला रहा है हरम, टोकते हैं बुत-ख़ाने

खिसक भी जाएगी बोतल तो पकड़े जाएँगे रिंद
जनाब-ए-शैख़ लगे आप क्यूँ क़सम खाने

ख़िज़ाँ में अहल-ए-नशेमन का हाल तो देखा
क़फ़स नसीब पे क्या गुज़री है ख़ुदा जाने

हुजूम-ए-हश्र में अपने गुनाहगारों को
तिरे सिवा कोई ऐसा नहीं जो पहचाने

नक़ाब रुख़ से न सरकी थी कल तलक जिन की
सभा में आज वो आए हैं नाचने-गाने

किसी की मस्त-ख़िरामी से शैख़ नालाँ हैं
क़दम क़दम पे बने जा रहे हैं मय-ख़ाने

ये इंक़लाब नहीं है तो और क्या 'बिस्मिल'
नज़र बदलने लगे अपने जाने-पहचाने

9. जब कभी नाम-ए-मोहम्मद लब पे मेरे आए है

जब कभी नाम-ए-मोहम्मद लब पे मेरे आए है
लब से लब मिलते हैं जैसे दिल से दिल मिल जाए है

जब कोई ग़ुंचा चमन का बिन खिले मुरझाए है
क्या कहें क्या क्या चमन वालों को रोना आए है

कोई कह देता कि अब काहे को क़ासिद आए है
ज़ोफ़ से बीमार को उट्ठा न बैठा जाए है

हो न हो कुछ बात है तब जी मिरा घबराए है
आप आए हैं न ख़त ही भेज कर बुलवाए है

रात भी रोते कटी है दिन भी गुज़रा जाए है
आने वाले कुछ नहीं मालूम कब से आए है

तेरे दीवाने पे ऐसी भी घड़ी आ जाए है
दम-ब-ख़ुद रह जाए है सोचा न समझा जाए है

एक दिन वो दिन थे रोने पे हँसा करते थे हम
एक ये दिन हैं कि अब हँसने पे रोना आए है

बर्क़ को क्या जाने क्या ज़िद है नशेमन से मिरे
चार तिनकों की क़सम वो भी न देखा जाए है

हिज्र की रातों में भी तन्हा कहाँ रहता है ज़ेहन
तुम कभी आ जाओ हो, दुश्मन कभी आ जाए है

जी में रखते हैं कहें भी तो किसी से क्या कहें
शिकवा उन का यूँ तो लब पर बार बार आ जाए है

बिगड़ी बन जाती है, ये सच है मगर ऐ हम-नशीं
ना-मुरादी का बुरा हो, जी ही बैठा जाए है

इक ग़लत सज्दे से क्या होता है वाइज़ कुछ न पूछ
उम्र भर की सब रियाज़त ख़ाक में मिल जाए है

आप की इक ज़ुल्फ़ सुलझाने को लाखों हाथ हैं
मेरी गुत्थी भी कोई आ कर कभी सुलझाए है

10. तंग आ गए हैं क्या करें इस ज़िंदगी से हम

तंग आ गए हैं क्या करें इस ज़िंदगी से हम
घबरा के पूछते हैं अकेले में जी से हम

मजबूरियों को अपनी कहें क्या किसी से हम
लाए गए हैं, आए नहीं हैं ख़ुशी से हम

कम-बख़्त दिल की मान गए, बैठना पड़ा
यूँ तो हज़ार बार उठे उस गली से हम

यारब! बुरा भी हो दिल-ए-ख़ाना-ख़राब का
शर्मा रहे हैं इस की बदौलत किसी से हम

दिन ही पहाड़ है शब-ए-ग़म क्या हो क्या न हो
घबरा रहे हैं आज सर-ए-शाम ही से हम

देखा न तुम ने आँख उठा कर भी एक बार
गुज़रे हज़ार बार तुम्हारी गली से हम

मतलब यही नहीं दिल-ए-ख़ाना-ख़राब का
कहने में उस के आएँ गुज़र जाएँ जी से हम

छेड़ा अदू ने रूठ गए सारी बज़्म से
बोले कि अब न बात करेंगे किसी से हम

तुम सुन के क्या करोगे कहानी ग़रीब की
जो सब की सुन रहा है कहेंगे उसी से हम

महफ़िल में उस ने ग़ैर को पहलू में दी जगह
गुज़री जो दिल पे क्या कहें 'बिस्मिल' किसी से हम

11. न अपने ज़ब्त को रुस्वा करो सता के मुझे

न अपने ज़ब्त को रुस्वा करो सता के मुझे
ख़ुदा के वास्ते देखो न मुस्कुरा के मुझे

सिवाए दाग़ मिला क्या चमन में आ के मुझे
क़फ़स नसीब हुआ आशियाँ बना के मुझे

अदब है मैं जो झुकाए हुए हूँ आँख अपनी
ग़ज़ब है तुम जो न देखो नज़र उठा के मुझे

इलाही कुछ तो हो आसान नज़'अ की मुश्किल
दम-ए-अख़ीर तो तस्कीन दे वो आ के मुझे

ख़ुदा की शान है मैं जिन को दोस्त रखता था
वो देखते भी नहीं अब नज़र उठा के मुझे

मिरी क़सम है तुम्हें रहरवान-ए-मुल्क-ए-अदम
ख़ुदा के वास्ते तुम भूलना न जा के मुझे

हमारा कौन ठिकाना है हम तो 'बिस्मिल' हैं
न अपने आप को रुस्वा करो सता के मुझे

12. निगाह-ए-क़हर होगी या मोहब्बत की नज़र होगी

निगाह-ए-क़हर होगी या मोहब्बत की नज़र होगी
मज़ा दे जाएगी दिल से अगर ऐ सीम-बर होगी

तुम्हें जल्दी है क्या जाना अभी तो रात बाक़ी है
न घबराओ ज़रा ठहरो कोई दम में सहर होगी

अभी से सारे आलम में तो इक अंधेर बरपा है
न जाने क्या ग़ज़ब ढाएगी जब ये ता-कमर होगी

न लाएगी तो क्या बेचैन भी उन को न कर देगी
हमारी आह क्या कम-बख़्त इतनी बे-असर होगी

हम उस को देख लेंगे और वो हम को न देखेगी
निगाह-ए-यार क्या महफ़िल में इतनी बे-ख़बर होगी

चला जाता तो हूँ मैं बहरूप बन कर उन की महफ़िल में
कहूँगा क्या रसाई गर कहीं मुँह देख कर होगी

निगाह-ए-लुत्फ़ से देखेगा मुझ को इक जहाँ तो क्या
अगर तुम देख लोगे मेरी क़िस्मत अर्श पर होगी

असीरी में भी याद-ए-गुल करेगी इस तरह बुलबुल
क़फ़स के दर पे सर होगा, सु-ए-गुलशन नज़र होगी

जो बे-जुर्मी पे भी 'बिस्मिल' को तुम ने कर दिया 'बिस्मिल'
बताओगे भला क्या हश्र में पुर्सिश अगर होगी

13. मेरी दुआ कि ग़ैर पे उन की नज़र न हो

मेरी दुआ कि ग़ैर पे उन की नज़र न हो
वो हाथ उठा रहे हैं कि यारब असर न हो

हम को भी ज़िद यही है कि तेरी सहर न हो
ऐ शब तुझे ख़ुदा की क़सम मुख़्तसर न हो

तुम इक तरफ़ तुम्हारी ख़ुदाई है इक तरफ़
हैरत-ज़दा है दिल कि किधर हो किधर न हो

दुश्वार-तर भी सहल है हिम्मत के सामने
ये हो तो कोई ऐसी मुहिम है कि सर न हो

जब वो न आए फ़ातिहा पढ़ने तो ऐ सबा
बाज़ आ गया मैं शम्अ भी अब नौहागर न हो

ये कह के देती जाती है तस्कीं शब-ए-फ़िराक़
वो कौन सी है रात कि जिस की सहर न हो

'बिस्मिल' बुतों का इश्क़ मुबारक तुम्हें मगर
इतने निडर न हो कि ख़ुदा का भी डर न हो

14. ये बुत फिर अब के बहुत सर उठा के बैठे हैं

ये बुत फिर अब के बहुत सर उठा के बैठे हैं
ख़ुदा के बंदों को अपना बना के बैठे हैं

हमारे सामने जब भी वो आ के बैठे हैं
तो मुस्कुरा के निगाहें चुरा के बैठे हैं

कलेजा हो गया ज़ख़्मी फ़िराक़-ए-जानाँ में
हज़ारों तीर-ए-सितम दिल पे खा के बैठे हैं

तुम एक बार तो रुख़ से नक़ाब सरका दो
हज़ारों तालिब-ए-दीदार आ के बैठे हैं

उभर जो आती है हर बार मौसम-ए-गुल में
इक ऐसी चोट कलेजे में खा के बैठे हैं

ये बुत-कदा है इधर आइए ज़रा 'बिस्मिल'
बुतों की याद में बंदे ख़ुदा के बैठे हैं

पसंद आएगी अब किस की शक्ल 'बिस्मिल' को
नज़र में आप जो उस की समा के बैठे हैं

15. रुख़ पे गेसू जो बिखर जाएँगे

रुख़ पे गेसू जो बिखर जाएँगे
हम अँधेरे में किधर जाएँगे

अपने शाने पे न ज़ुल्फ़ें छोड़ो
दिल के शीराज़े बिखर जाएँगे

यार आया न अगर वादे पर
हम तो बे-मौत के मर जाएँगे

अपने हाथों से पिला दे साक़ी
रिंद इक घूँट में तर जाएँगे

क़ाफ़िले वक़्त के रफ़्ता रफ़्ता
किसी मंज़िल पे ठहर जाएँगे

मुस्कुराने की ज़रूरत क्या है
मरने वाले यूँही मर जाएँगे

हो न मायूस ख़ुदा से 'बिस्मिल'
ये बुरे दिन भी गुज़र जाएँगे

16. सारी उम्मीद रही जाती है

सारी उम्मीद रही जाती है
हाए फिर सुब्ह हुई जाती है

नींद आती है न वो आते हैं
रात गुज़री ही चली जाती है

मजमा-ए-हश्र में रूदाद-ए-शबाब
वो सुने भी तो कही जाती है

दास्ताँ पूरी न होने पाई
ज़िंदगी ख़त्म हुई जाती है

वो न आए हैं तो बेचैन है रूह
अभी आती है अभी जाती है

ज़िंदगी आप के दीवाने की
किसी सूरत से कटी जाती है

ग़म में परवानों के इक मुद्दत से
शम्अ घुलती ही चली जाती है

आप महफ़िल से चले जाते हैं
दास्ताँ बाक़ी रही जाती है

हम तो 'बिस्मिल' ही रहे ख़ैर हुई
इश्क़ में जान चली जाती है

17. सोचने का भी नहीं वक़्त मयस्सर मुझ को

सोचने का भी नहीं वक़्त मयस्सर मुझ को
इक कशिश है जो लिए फिरती है दर दर मुझ को

अपना तूफ़ाँ न दिखाए वो समुंदर मुझ को
चार क़तरे न हुए जिस से मयस्सर मुझ को

उम्र भर दैर-ओ-हरम ने दिए चक्कर मुझ को
बे-कसी का हो बुरा ले गई घर घर मुझ को

शुक्र है रह गया पर्दा मिरी उर्यानी का
ख़ाक कूचे की तिरे बन गई चादर मुझ को

चुप रहूँ मैं तो ख़मोशी भी गिला हो जाए
आप जो चाहें वो कह दें मिरे मुँह पर मुझ को

ख़ाक छाना किए हम क़ाफ़िले वालों के लिए
क़ाफ़िले वालों ने देखा भी न मुड़ कर मुझ को

आप ज़ालिम नहीं, ज़ालिम है मगर आप की याद
वही कम-बख़्त सताती है बराबर मुझ को

इन्क़िलाबात ने कुछ ऐसा परेशान किया
कि सुझाई नहीं देता है तिरा दर मुझ को

जुरअत-ए-शौक़ तो क्या कुछ नहीं कहती लेकिन
पाँव फैलाने नहीं देती है चादर मुझ को

मिल गई तिश्नगी-ए-शौक़ से फ़ुर्सत ता-उम्र
अपने हाथों से दिया आप ने साग़र मुझ को

अब मिरा जज़्बा-ए-तौफ़ीक़ है और मैं 'बिस्मिल'
ख़िज़्र गुम हो गए रस्ते पे लगा कर मुझ को

 
 
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