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गोपालदास नीरज
Gopal Das Neeraj
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गीतिका गोपालदास नीरज

खुशबू सी आ रही है इधर ज़ाफ़रान की
अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई
बदन प' जिसके शराफ़त का पैरहन देखा
बात अब करते हैं क़तरे भी समन्दर की तरह
जागते रहिए ज़माने को जगाते रहिए
तेरा बाज़ार तो महँगा बहुत है
निर्धन लोगों की बस्ती में घर-घर कल ये चर्चा था
कुल शहर बदहवास है इस तेज़ धूप में
जो कलंकित कभी नहीं होते
गीत जब मर जायेंगे फिर क्या यहाँ रह जायेगा
भीतर-भीतर आग भरी है बाहर-बाहर पानी है
मुझ पे आकर जो पड़ी उनकी नज़र चुपके से
मंच बारूद का नाटक दियासलाई का
देखना है मुझ को तो नज़दीक आकर देखिये
 
 
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