Hindi Kavita
गोपालदास नीरज
Gopal Das Neeraj
 Hindi Kavita 

गीतिका गोपालदास नीरज

खुशबू सी आ रही है इधर ज़ाफ़रान की
अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई
हम तेरी चाह में, ऐ यार ! वहाँ तक पहुँचे
कि दूर-दूर तलक एक भी दरख़्त न था
कोई दरख़्त मिले या किसी का घर आये
बदन प' जिसके शराफ़त का पैरहन देखा
बात अब करते हैं क़तरे भी समन्दर की तरह
जागते रहिए ज़माने को जगाते रहिए
तेरा बाज़ार तो महँगा बहुत है
निर्धन लोगों की बस्ती में घर-घर कल ये चर्चा था
कुल शहर बदहवास है इस तेज़ धूप में
जो कलंकित कभी नहीं होते
उनका कहना है कि नीरज ये लड़कपन छोड़ो
गीत जब मर जायेंगे फिर क्या यहाँ रह जायेगा
भीतर-भीतर आग भरी है बाहर-बाहर पानी है
मुझ पे आकर जो पड़ी उनकी नज़र चुपके से
मंच बारूद का नाटक दियासलाई का
देखना है मुझ को तो नज़दीक आकर देखिये
 
 
 Hindi Kavita