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गोपालदास नीरज
Gopal Das Neeraj
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'गीत जो गाए नहीं' काव्य-संग्रह में 'नदी किनारे', 'लहर पुकारे'
और 'बादर बरस गयो' में से चुनी हुई रचनाएं शामिल हैं

मानव कवि बन जाता है
जीवन जहाँ
अब तुम्हारा प्यार भी
नींद भी मेरे नयन की
कितनी अतृप्ति है
तुमने कितनी निर्दयता की
कितने दिन चलेगा
दिया जलता रहा
मरण-त्योहार
क्यों उसको जीवन भार ना हो
लहरों में हलचल
पिया दूर है न पास है
मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं
खग उड़ते रहना
जीवन आधार नहीं मिलता है
यह संभव नहीं
मधु पीते-पीते थके नयन
आँधी आ रही है
साथी सब सहना पड़ता है
उसकी प्यास प्रबल कितनी थी?
छोड़ दी पतवार
कफ़न है आसमान
क्यों मन आज उदास है
मेरा इतिहास नहीं है
आ गई थी याद तब
सूनी-सूनी साँस की सितार पर
अब तुम रूठो
व्यंग्य यह निष्ठुर समय का
प्यार बन जा
डगमगाते पाँव
मधुवन का यौवन
बन्द कूलों में
खेल यह जीवन-मरण का
मैं तुम्हें अपना
रूके न जब तक साँस
अब न आउँगा
मुस्कुराकर चल मुसाफिर
भूल जाना
मैं तुम्हारी, तुम हमारे
तब किसी की याद आती
क्यों रुदनमय हो न उसका गान
तब याद किसी की
तिमिर का छोर
रोने वाला ही गाता है
गान समझता
क्यों कोई मुझसे प्यार करे
अब तो मुझे
बन्द करो मधु की
हार न अपनी मानूँगा
निभाना ही कठिन है
तुम गए चितचोर
मैं क्यों प्यार किया करता हूँ?
मेरा कितना पागलपन था
कल का करो न ध्यान
आज मेरी गोद में
मैं अमृत-मंथन क्या जानूँ
इतना तो बतलाते
टूटता सरि का किनारा
अभी न जाओ प्राण!
नारी
यदि मैं होता घन सावन का
चल रे, थके बटोही
धड़क रही मेरी छाती
कैसे चलता जाऊँ पथ पर
अंतिम बूँद
मैंने बस चलना सीखा
घोर तम अब छा रहा है
ऐसे भी क्षण आते
पराजय भी फिर जय है
जीवन-समर
मगर निष्ठुर न तुम रुके
तू क्यों घबराता है?
मत छुपकर वार करो
तेरी भारी हार हुई थी
मधु में भी तो
 
 
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