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अल्लाह यार ख़ां जोगी
Allah Yar Khan Jogi
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Ganj-e-Shaheedan in Hindi Allah Yar Khan Jogi

गंज-ए-शहीदां अल्लाह यार ख़ां जोगी

1

जिस दम हुए चमकौर में सिंहों के उतारे ।
झल्लाए हुए शेर थे सब ग़ैज़ के मारे ।
आंखों से निकलते थे दिलेरों के शरारे ।
सतिगुर के सिवा और ग़ज़बनाक थे सारे ।
गुस्से से नज़र जाती थी अफवाज-ए-अदू पर ।
तेग़े से निगाह पड़ती थी दुश्मन के गलू पर ।

(ग़ैज़=गुस्सा, शरारे=शोले, ग़ज़बनाक=
गुस्से से भरे, अफवाज-ए-अदू=दुश्मन की सेना)

2

जब दूर से दरया के किनारे नज़र आए ।
डूबे हुए सरसा में प्यारे नज़र आए ।
येह देख के बिगड़े हुए सारे नज़र आए ।
बिफ़्फ़रे हुए सतिगुर के दुलारे नज़र आए ।
कहते थे इजाज़त ही नहीं है हमें रन की ।
मट्टी तक उड़ा सकते हैं दुश्मन के चमन की ।

3

तूफां-ज़दह दरिया को अभी पार करेंगे ।
ठोकर से हर इक मौज को हमवार करेंगे ।
बद-अहद सितमगारों से पैकार करेंगे ।
हम दोनों ही दस लाख को फ़िन्नार करेंगे ।
दादी है किधर, माई किधर, भाई कहां हैं ।
आंखों से कई खालसे प्यारे भी निहां हैं ।

(मौज=लहर, बद-अहद=वादा पूरा ना
करने वाले, पैकार=जंग, फ़िन्नार=आग में
फेंकना, निहां=छिपे हुए)

4

धोखा दिया हर सिंह को पैमां-शिकनों ने ।
बे-मेहरों ने बे-धर्मों ने, ईमां-शिकनों ने ।
जब इतना कहा जुल दिया अहसां-शिकनों ने ।
पेशानी पि बल डाले परीशां-शिकनों ने ।
थे चीं-ब-जबीं लहर या शीशे में पड़ी थी ।
माथे पे पशीना था या अफ़शां सी जड़ी थी ।

(पैमां-शिकन=वादा तोड़ने वाले, जुल=धोखा,
चीं-ब-जबीं=माथे पर बल, अफ़शां=
बून्दें)

5

इतने में मुख़ातिब हुए सतिगुर गुरू गोबिन्द ।
वुह साबिर-ओ-शाकिर वुह बहादुर गुरू गोबिन्द ।
रसते में गंवा आए थे दो दुर गुरू गोबिन्द ।
थे ग़म की जगह शांती से पुर गुरू गोबिन्द ।
फ़रमाए वुह सब से नहीं मौका येह ग़ज़ब का ।
पूरा यहीं कल होगा, इरादा मेरे रब का ।

(साबिर-ओ-शाकिर=सबर शुक्र करने वाले,
दुर=मोती, ग़ज़ब=गुस्सा)

6

जिस ख़ित्ते में हम कहते थे आना येह वुही है ।
कल लुट के है जिस जगह से जाना येह वुही है ।
जिस जा पि है बच्चों को कटाना येह वुही है ।
मट्टी कह देती है ठिकाना येह वुही है ।
इक मोर्चे में फिर वहीं सरकार दर आए ।
जा पहुंचे अकाली वहीं सतिगुर जिधर आए ।

(ख़ित्ते=इलाके, दर=अन्दर)

7

जब किलय में उतरी थी सतिगुर की सवारी ।
वाहगुरू की फ़तह दलेरों ने पुकारी ।
वुह हुमहुमा शेरों का वुह आवाज़ थी भारी ।
थर्रा गया चमकौर हुआ ज़लज़ला तारी ।
सक्ते में ख़ुदाई थी तो हैरत में जहां था ।
नारा से हूआ चरख़ भी साकिन येह गुमां था ।

(हुमहुमा=शेरों की ग़रज़, ज़लज़ला=भूचाल,
तारी=छा गया, सक्ते=सुन्न, चरख़=आसमान,
साकिन=ठहर गया)

8

ख़ेमे किए इसतादह वहीं उठ के किसी ने ।
खोली कमर आराम को हर एक जरी ने ।
रहरासि का दीवान सजाया गुरू जी ने ।
मिलजुल के शरे-शाम भजन गाए सभी ने ।
खाना कई वक्तों से मुयस्सर न था आया ।
इस शाम भी शेरों ने कड़ाका ही उठाया ।

(इसतादह=खड़ा करना, जरी=दलेर,
मुयस्सर=मिलना)

9

कुछ लेट गए ख़ाक पे ज़ीं-पोश बिछा कर ।
पहरा लगे देने कई तलवार उठा कर ।
गोबिन्द भी शब-बाश हुए ख़ेमा में जा कर ।
देखा तो वहां बैठे हैं गर्दन को झुका कर ।
'वाहगुरू', 'वाहगुरू' है मुंह से निकलता ।
'है तू ही तू! तू ही तू! है मुंह से निकलता ।

(ज़ीं-पोश=घोड़े की काठी का कपड़ा, शब-बाश=
रात को आराम करना)

10

जब डेढ घड़ी रात गई ज़िक्रे-ख़ुदा में ।
ख़ेमे से निकल आ गए सरकार हवा में ।
कदमों से टहलते थे मगर दिल था दुआ में ।
बोले: ए ख़ुदावन्द ! हूं ख़ुश तेरी रज़ा में ।'
करतार से कहते थे गोया रू-ब-रू हो कर ।
'कल जाऊंगा चमकौर से मैं सुरख़रू हो कर ।'

11

"मैं तेरा हूं, बच्चे भी मेरे तेरे हैं मौला !
थे तेरे ही, हैं तेरे, रहेंगे तेरे दाता !
जिस हाल में रक्खे तू, वही हाल है अच्छा !
जुज़ शुक्र के आने का ज़बां पर नहीं शिकवा !
लेटे हुए हैं खालसा जी आज ज़मीं पर ।
किस तरह से चैन आए हमें शाहे-नशीं पर !"

(जुज़=बिना, शाहे-नशीं=शाही बिस्तर)

12

येह कह के गुरू लश्कर-ए-ख़ुफ़ता में दर आए ।
पहरे पि जवां ऊंघते अक्सर नज़र आए ।
यूं हर जगह ख़ामोश गए बेख़बर आए ।
सोए हुए बच्चे के करीं जूं पिदर आए ।
ग़रज़ि कि दबे पायों टहलने लगे सतिगुर ।
भगती से मुरीदों की बहलने लगे सतिगुर ।

(ख़ुफ़ता=सोया, करीं=करीब,नज़दीक, पिदर=
पिता)

13

साफ़े कभी सिंहों के उठाते थे ज़मीं से ।
केस इस के जो झाड़े तो ली ख़ाक उस की ज़बीं से ।
सर ठीक किए, सरके हुए बालिश-ए-ज़ीं से ।
तरतीब दी हर चीज़ को ला ला के कहीं से ।
हाशा ! किसी मुर्शिद में येह ईसार नहीं है ।
येह प्यार किसी पीर में ज़िनहार नहीं है ।

(बालिश-ए-ज़ीं=काठी का तकिया, ईसार=
परोपकार, कुर्बानी, ज़िनहार=कदाचित)

14

थे देखते हर इक को गुरू दीदा-ए-तर से ।
उल्फ़त की निगाहों से मुहब्बत की नज़र से ।
बांधे हुए पटका पये-खिदमत थे कमर से ।
था जागता कोई तो सरक जाते थे सर से ।
नफ़रत थी यहां तक शहे-वाला को रिया से ।
नेकी को छुपाते थे सदा मा-ओ-शुमा से ।

(पये-खिदमत=सेवा मगन, शहे-वाला= उच्च
पातशाह, रिया=दिखावा, मा-ओ-शुमा=
आम आदमी)

15

जिन सिंहों ने कल मौत के साहिल था उतरना ।
कल सुबह था जिन खालसों ने जंग में मरना ।
बालीं से शहीदों के हुआ जबकि गुज़रना ।
मुश्किल हुआ इस जा से कदम आगे को धरना ।
चूंमां कभी हलकूम दहन चूंमने बैठे ।
जब पायती आए तो चरन चूंमने बैठे ।

(साहिल=किनारा, बालीं=सिर के पास,
हलकूम=गल, दहन=मुंह, पायती=पैंद)

16

फ़रमाए : सहर सो के येह हुश्यार न होंगे ।
अब हो के येह फिर नींद से बेदार न होंगे ।
हम होंगे मुसीबत में मगर यार न होंगे ।
येह सिंह प्यारे येह वफ़ादार न होंगे ।
सोए हुए शेरों को गले अपने लगाया ।
सतिगुर ने दलेरों को गले अपने लगाया ।

(सहर=सवेर, बेदार=जागना)

17

इन्साफ़ करे जी में ज़माना तो यकीं है ।
कह दे गुरू गोबिन्द का सानी ही नहीं है ।
येह प्यार मुरीदों से येह शफ़कत भी कहीं है ?
भगती में गुरू अर्श है संसार ज़मीं है ।
उल्फ़त के येह जज़्बे नहीं देखे कहीं हमने ।
है देखना इक बात, सुने भी नहीं हमने ।

(शफ़कत=कृपा)

18

करतार की सौगन्द है, नानक की कसम है ।
जितनी भी हो गोबिन्द की तार्रीफ़ वुह कम है ।
हरचन्द मेरे हाथ में पुर ज़ोर कलम है ।
सतिगुर के लिखूं, वसफ़, कहां ताबे-रकम है ।
इक आंख से क्या, बुलबुला कुल बहर को देखे !
साहिल को, या मंझधार को, या लहर को देखे !

(वसफ़=गुन, ताबे-रकम=लिखने की ताकत,
बहर=समन्दर)

19

मद्दाह हूं नानक का, सना-ख़वां हूं तो तेरा ।
पिनहां हूं तो तेरा हूं, नुमायां हूं तो तेरा ।
शादां हूं तो तेरा हूं, परीशां हूं तो तेरा ।
हिन्दू हूं तो तेरा हूं, मुसलमां हूं तो तेरा ।
कुर्बानियां कीं तूने बहुत राहे-हुदा में ।
दर्जा है तेरा ख़ास ही ख़ासाने-ख़ुदा में ।

(मद्दाह=बढ़ाई करने वाला, सना-ख़वां=
तारीफ़ करने वाला, पिनहां=छिपा हुया,
शादां=ख़ुश, राहे-हुदा= सच्च की राह)

20

ऐ सतिगुरू गोबिन्द तू वुह अबर-ए-करम है ।
ए सतिगुरू गोबिन्द तू वुह आली-हमम है ।
सानी तेरा दारा था सकन्दर है न जम है ।
खाता तेरे करमों की फ़रीदूं भी कसम है ।
हातिम का सख़ावत से अगर नाम भुलाया ।
जुरअत से हमें रुसतम-ओ-बहराम भुलाया ।

(अबर-ए-करम=रहमत का बादल , आली-
हमम=बहुत हिम्मत वाला, सख़ावत=दान)

21

किस शान का रुतबा तेरा अल्ल्हा-ओ-ग़नी है ।
मसकीन ग़रीबों में दलेरों में जरी है ।
'अंगद' है 'अमरदास' है 'अरजुन' भी तूही है ।
'नानक' से ले ता 'तेग़ बहादुर' तू सभी है ।
तीर्थ नहीं कोई रूए रौशन के बराबर ।
दर्शन तेरे दस गुरूयों के दर्शन के बराबर ।

(अल्ल्हा-ओ-ग़नी=बड़ा और बेप्रवाह रब्ब, मसकीन=
नंग,निताना, जरी=बहादुर, रूए=मुंह)

22

किस सबर से हर एक कड़ी तू ने उठाई ।
किस शुक्र से हर चोट कलेजे पि है खाई ।
वालिद को कटाया, कभी औलाद कटाई ।
की फ़कर में, फ़ाके में, हज़ारों से लड़ाई ।
हिम्मत से तिरी सब थे सलातीन लरज़ते ।
जुरअत से तिरी लोग थे ता चीन लरज़ते ।

(फ़कर=फ़कीरी, सलातीन=सुल्तान)

23

आद्दा ने कभी तुझ को संभलने न दिया था ।
आराम से पहलू को बदलने न दिया था ।
गुलशन को तेरे फूलने फलने न दिया था ।
कांटा दिले-पुर-ख़ूं से निकलने न दिया था ।
जिस रन में लड़ा बे-सर-ओ-सामान लड़ा तू ।
सौ सिंह लिए लाखों पि जा जा के पड़ा तू ।

(आद्दा=दुशमन, बे-सर-ओ-सामान=निहत्था)

24

ज़क दी कभी नव्वाब को राजों को भगाया ।
मैदां में मुकाबिल जो हुआ मार गिराया ।
घमसान में जब आन के तेग़ों को फिराया ।
फिर कर दिया इक आन में लश्कर का सफाया ।
कल कहते हैं चमकौर में फिर खेत पड़ेगा ।
गोबिन्द सहर होते ही लाखों से लड़ेगा ।

(ज़क=नुक्सान, खेत=लड़ाई)

25

बाकी थी घड़ी रात गुरू ख़ेमे में आए ।
शाहज़ादे यहां दोनों ही सोते हुए पाए ।
दोनों के रुख़-ए-पाक से गेसू जो हटाए ।
अफ़लाक ने शर्मा के मह-ओ-मेहर छुपाए ।
सतिगुर ने दहन जब दहन-ए-पाक पि रक्खा ।
कुमला के हर इक फूल ने सर ख़ाक पि रक्खा ।

(रुख़-ए-पाक=पवित्र मुंह, गेसू=केस,
अफ़लाक=असमान ने, मह-ओ-मेहर=
चांद सूरज, दहन=मुंह)

26

मरघट की तरह इस घड़ी सुनसान ज़मीं थी ।
ख़ामोशी सी छाई हुई ता अर्श-ए-बरीं थी ।
वीरानी थी ऐसी न उदासी येह कहीं थी ।
आफ़त थी, बला थी, येह कोई रात नहीं थी ।
दुनिया पे था छाया हुआ इस तरह अंधेरा ।
लुक्क गेंद पि मट्टी की जिस तरह हो फेरा ।

(अर्श-ए-बरीं=उच्चा आकाश)

27

तारे भी चमकते थे मगर रात थी काली ।
घट घट के हुआ माहे-दो-हफ़्ता था हलाली ।
अंगुशत दहन में थी फ़लक ने गोया डाली ।
अफसोस में सतिगुर के येह सूरत थी बना ली ।
हसरत से सभी कलग़ियों वाले को थे तकते ।
आंखों में सितारों के भी आंसू थे झलकते ।

(माहे-दो-हफ़्ता=पूर्णिमा का चांद,
हलाली=नया चांद, अंगुशत=उंगली, दहन=
मुंह, फ़लक=असमान)

28

सोए हुए बच्चों को कहा सर को पकड़ कर ।
चल दोगे अब्बा को मुसीबत में जकड़ कर ।
थी ज़िन्दगी लिखी हुई किस्मत में उजड़ कर ।
फिर मिलने का वादा तो किए जायो बिछड़ कर ।
थे चार, हो अब दो ही, सहर येह भी न होंगे ।
हम सबर करेंगे जु अगर येह भी न होंगे ।

29

फ़रमाते थे : "कल दोनों ही परवान चढ़ोगे !
दुख भोगेंगे हम, ख़ुलद में तुम चैन करोगे !
होते ही सहर दाग़-ए-जुदाई हमें दोगे !
सपने में ख़बर आ के कभी बाप की लोगे !
ऐ प्यारे अजीत ! ऐ मेरे जुझार प्यारे ।
हम कहते हैं कुछ, सुनते हो दिलदार प्यारे ।

(ख़ुलद=स्वर्ग)

30

मास्सूम हो, मज़लूम हो, दुनिया से भले हो !
लख़त-ए-दिल-ए-गोबिन्द हो नाज़ों से पले हो !
दुनिया हुई अंधेर, जब आंखों से टले हो !
घर बार लुटा, बाप कटा, तुम भी चले हो !"
बच्चे इसी हालत में अभी सोए पड़े थे ।
था दीदा-ए-तर सतिगुरू, बालीं पि खड़े थे ।

(दीदा=आंखें, बालीं=सिर के पास)

31

इक बार सूए-फ़लक मुंह करके वुह बोले :-
"होनी है जो कुछ आशिके-सादिक पि वुह हो ले ।
बरछी, है इजाज़त तो सीने में गड़ो ले ।
सर काट के तन चाहे तो नेज़े में परो ले ।
है शौक शहादत का हमें सब से ज़्यादा ।
सौ सर भी हों कुरबां तो नहीं रब से ज़्यादा ।

(सूए-फ़लक=आकाश की ओर, आशिके-सादिक=
सच्चा प्रेमी)

32

"मैंने ही बरस चौदह का बनबास था झेला ।
मैं वुह हूं जसोधा की जो आग़ोश में खेला ।
मारा था कंस मैंने था अरजुन मेरा चेला ।
कैरों से लड़ा मैं महाभारत में अकेला ।
था बुद्ध भी बाद में शंकर भी बना हूं ।
नानक के भी चोले में मैं बाबर को मिला हूं ।

(आग़ोश=गोद)

33

"अकबर भी प्यादा मिरे दरबार में आया ।
बरकत ने मिरी फ़तह था आसाम कराया ।
मैंने बुत-ओ-बुतखाना ख़ुदाई को भुलाया ।
भगवान का घर मैंने ही मस्जिद था बनाया ।
बालू की तपी रेत मिरे तन पि पड़ी थी ।
मैं वुह हूं उबलने पि भी उफ़्फ़ तक नहीं की थी ।

34

"हिम्मत का मिरी आप मियां मीर है शाहिद ।
अज़मत का मिरी शाह जहांगीर है शाहिद ।
सर जिस से कटा दिल्ली में शमशीर है शाहिद ।
तो सब से ज़्यादा फ़लक-ए-पीर है शाहिद ।
जब ज़ुल्म से ज़ालिम ने जहां पीस दिया था ।
हम ने ही धर्म के लिए फिर सीस दिया था ।

(शाहिद=गवाह, फ़लक-ए-पीर=बूढ़ा आकाश)

35

"जब जब भी ज़रूरत हुई बन्दों को हम आए ।
ज़ालिम का कीया ख़ात्मा मज़लूम बचाए ।
चिड़्यों से अगर चाहा तो फिर बाज़ तुड़ाए ।
देखा जिसे हकदार उसे तख़्त दिलाए ।
काम आए फ़कीरों के तो शाहों के भी आए ।
दुश्मन के भी आए, हवा-ख़ाहों के भी आए ।

(हवा-ख़ाहों=दोस्त)

36

"लख लुट है हमेशा से ही सरकार हमारी ।
खाली नहीं जाता है जो आता है भिखारी ।
दुनिया में हैं हम, बाग़ में जूं बादे-बहारी ।
प्यारी हमें करतार की मख़लूक है सारी ।
सिक्ख जान से प्यारे हमें, बच्चों से सिवा हैं ।
तो हिन्दू-ओ-मुस्लिम पि भी दर फ़ैज़ के वा हैं ।

(बादे-बहारी=वसंत की हवा, मख़लूक=
लोकी, फ़ैज़=रहमत)

37

"मर्दाने को हम ने ही रिफ़ाकत में था रक्खा ।
कौलां को भी हम ने हिफ़ाज़त में था रक्खा ।
जिस ने भी कदम अपनी जमाअत में था रक्खा ।
महफ़ूज़ उसे हम ने हर आफ़त में था रक्खा ।
अब भी वुही आदत वुही नियत है हमारी ।
यकसां हरम-ओ-दैर से शफ़कत है हमारी ।

(रिफ़ाकत=साथ, हरम-ओ-दैर=मस्जिद
मन्दिर, शफ़कत=मुहब्बत)

38

"मिर्ज़े कई सैदे से भी कुर्बान हुए हैं ।
मामूं से तसद्दुक भी कई ख़ान हुए हैं ।
चन्दू से गंगू से भी शैतान हुए हैं ।
बाज़ीद से भी बाज़्ज़ बेईमान हुए हैं ।
हिन्दू हैं सब अच्छे न मुस्लमान हैं अच्छे ।
दिल नेक हैं जिन के, वुही इन्सान हैं अच्छे ।"

(तसद्दुक=कुर्बान)

39

तारों से था आकाश चिराग़ों भरी थाली ।
थी रुख़ पि बड़े बुत्त के पड़ी नूर की जाली ।
अब जल चुकी थी चरख़ के मन्दर में दीवाली ।
थी पूज चुकी ज़ुहरा-जबीं पूजने वाली ।
फिर शरक की जानिब से सफ़ैदी निकल आई ।
ज़ुल्मात में इक नूर की नदी उबल आई ।

(चरख़=असमान, ज़ुहरा-जबीं=शुक्र ग्रह
जैसा माथा भाव सुन्दर माथे वाली, शरक=
पूर्ब, ज़ुल्मात=अंधेरा)

40

इस ज़ोर से सैलाब हुआ नूर का जारी ।
कफ़ की तरह बहने लगी अंजुम की क्यारी ।
तारे ने सहर के अभी हिम्मत न थी हारी ।
तूफ़ान हुआ माह की कश्ती पि भी तारी ।
इस सैल से सयारे सभी औज पि टूटे ।
जिस तरह हबाब आ के सरे-मौज पि टूटे ।

(कफ़=झाग, अंजुम=तारे, माह=चांद, सैल=
बाढ़, सयारे=सितारे, औज=उचाई, हबाब=
बुलबुला, सरे-मौज=लहर उत्ते)

41

जितनी थी कमां नूर की खिंचती चली आती ।
थी उतनी सियाही पे सफ़ैदी मिली जाती ।
हर एक किरन तीर की तेज़ी थी दिखाती ।
नेज़ों से शुआयों के छने चरख़ की छाती ।
ख़ुरशीद निकलने को ही था अब कोई दम में ।
होने को था फिर हशर बपा अरबो-अज़म में ।

(ख़ुरशीद=सूरज, हशर=क्यामत, अरबो-
अज़म=अरब-ईरान)

42

बेदार थे सब खालसा जी हो चुके कब के ।
न्हा धो के थे बैठे हुए ध्यान में रब्ब के ।
दीवान बड़ी शान का जलवे थे ग़ज़ब के ।
ख़ुद रखते थे तशरीफ़ गुरू सामने सब के ।
थे पास अजीत और थे जुझार प्यारे ।
गुर्याई के चढ़ते हुए दरिया के किनारे ।

43

गद्दी पे पिता बेटे भी मसनद के करीं थे ।
दो चांद के टुकड़ों में गुरू माह-ए-मुबीं थे ।
थे नूर से तन पैकर-ए-ख़ाकी नहीं थे ।
शाहज़ादों से शह-शाह से शहज़ादे हसीं थे ।
अम्मामो पि कलग़ी का अजब तुर्रा सज़ा था ।
ੴ साफ़ गुरमुखी में लिखा था ।

(मसनद=गद्दी, माह-ए-मुबीं=प्रत्यक्ष चांद,
पैकर-ए-ख़ाकी=मिट्टी के तन, अम्माम=
दस्तार)

44

पेशानी-ए-पुर-आब पि यूं केस थे कारे ।
सुम्बल का गोया खेत था दरिया के किनारे ।
अबरू तले आंखें थीं या जंगल में चिकारे ।
वुह नाक का नक्शा जु न मानी भी उतारे ।
इन कानों की ख़ूबी उसे हैरत में जकड़ ले ।
देखे उन्हें बहज़ाद तो कान अपना पकड़ ले ।

(पेशानी-ए-पुर-आब=रौनक वाला माथा,
सुम्बल=बालछड़ घाह, चिकारे=बारां सिंगे,
मानी ते बहज़ाद=मशहूर चित्रकार)

45

दो चांद के टुकड़े हैं येह रुख़सार नहीं हैं ।
सुर्ख़ होने पि भी नूर हैं येह नार नहीं हैं ।
अब आगे दहन मिलने के आसार नहीं हैं ।
जोगी जिसे पा ले येह वुह असरार नहीं हैं ।
होटों के मुकाबिल में निबात हो नहीं सकती ।
लब मिलते हैं शीरीनी से बात हो नहीं सकती ।

(रुख़सार=गाल, नार=आग, आसार=लक्षण,
असरार=भेद, निबात=मिशरी, शीरीनी=
मिठास)

46

चेहरा था महे-चार-दहम रीश थी हाला ।
मूछें थीं या ख़त नूर की मिसतर पि था काला ।
कहता लब-ए-लाल्ली को था हर देखने वाला ।
कसतूरी के जंगल में खिला है गुले-लाला ।
गर्दन पि रूए-शाह की तमसील क्या लिखूं ।
था पीढ़े पि गरंथे-मुकद्दस खुला लिखूं ।

(महे-चार-दहम=चौदवीं का चांद, रीश=दाढ़ा,
हाला=परवार,रौशनी का चक्कर, ख़त=लकीर,
मिसतर=पैमाना, गुले-लाला=फूल का नाम,पोस्त,
रूए=मुंह, तमसील=उपमा, मुकद्दस=पवित्र)

47

दाढ़ी थी या कि मुसहफ़े रुख़ का ग़िलाफ़ था ।
काले उछाड़ पर जु खिला साफ़ साफ़ था ।
शानों की सज का ग़ैर को भी एतराफ़ था ।
बाज़ू के बल का ग़लग़ला जा पहुंचा काफ़ था ।
कुव्वत में देव जचते न जिन थे निगाह में ।
बख़्शा था हक्क ने ज़ोर वुह बाज़ू-ए-शाह में ।

(मुसहफ़=किताब, शानों=कंधों की, काफ़=
पहाड़ का नाम, ग़लग़ला=मानना,हुंघारा)

48

कुहनी गठी हुई थी कलाई भरी हुई ।
कुव्वत से येह भी और थी वुह भी भरी हुई ।
पंजे में पांच शेरों की कस्स थी भरी हुई ।
उंगली की पोर पोर में बिजली भरी हुई ।
सीना मिसाल आईने की पाक साफ़ था ।
सतिगुर के दुश्मनों को भी येह एतराफ़ था ।

49

येह पुश्ते-पाक, पुश्ते-पनाहे-जहान है ।
सिक्खों को इस का फ़ख़र है सिंहों को मान है ।
बचती इसी की साया में, बेकस की जान है ।
हिन्दोसतां की ढाल यही बेग़ुमान है ।
जिस सर पि छाई उस पि फिर आफ़त गिरी नहीं ।
है चरख़ भी गवाह येह रन में फिरी नहीं ।

(पुश्ते-पनाहे-जहान=दुनिया का सहारा,
बेकस=बेसहारा)

50

खोल्हे ग्रंथ-ए-पाक को बैठे हुज़ूर थे ।
उपदेश सुन के हो चुके सब को सरूर थे ।
जितने भी सामईन वुह नज़दीक-ओ-दूर थे ।
उन सब के रुख़ पि नूर के पैदा ज़हूर थे ।
तासीर थी ज़बां में येह ताकत बयान में ।
रूह फुंक गई थी धर्म की इक इक जवान में ।

(सामईन=सरोते, ज़हूर=प्रगटा, तासीर=असर)

51

दीवान का अभी न हुआ इख़तताम था ।
गरदिश में अभी बादा-ए-इरफ़ां का जाम था ।
इतने में आ के कहने लगा इक ग़ुलाम था ।
पहरे पि जु खड़ा हुआ बाला-ए-बाम था ।
बोला : उदू की फ़ौज है घेरे हिसार को।
क्या हुक्म अब हुज़ूर का है जां-निसार को ।

(इख़तताम=समाप्ती, बादा-ए-इरफ़ां=
आत्म ज्ञान की शराब, बाला-ए-बाम=
कोठे पर, उदू=वैरी, हिसार=गढ़ी)

52

इरशाद हो तो सब को अकेला भगा के आऊं ।
अजमेर चन्द आन में कैदी बना के आऊं ।
बाज़ीद ख़ां का सर भी अभी जा के मैं उड़ाऊं ।
इक सिंह एक लाख पि ग़ालिब हुआ दिखाऊं ।
शाबाश कह के सतिगुरू फ़ौरन खड़े हुए ।
ज़ुरअत पि पहरेदार की ख़ुश बड़े हुए ।

(इरशाद=हुक्म,)

53

ख़ेमे को अपने अपने रवां फिर जवां हुए ।
हथियार कस के ओपची शेर-ए-यियां हुए ।
जब कि किलाअ में बलन्द गुरू के निशां हुए ।
सामान-ए-जंग देख के सब शादमां हुए ।
सिंहों की फ़ौज हो चुकी आहन में ग़र्क थी ।
थे सर पि ख़ोद बर में ज़रह ता-बा-फ़रक थी ।

(ओपची=हथ्यार-बन्द योधे, यियां=गुसैल,रोहले,
शादमां=ख़ुश, आहन=लोहा, ख़ोद=लोहे की टोपी,
ज़रह=कवच, ता-बा-फ़रक=सिर तक)

54

ख़ेमे से लैस हो के अकाली निकल पड़े ।
ख़ंजर उठाया, तेग़ संभाली, निकल पड़े ।
ले कर तुफ़ंग बाज़ दुनाली निकल पड़े ।
इतने में ग़ुल हुआ शहे-आली निकल पड़े ।
ख़ुरशीद देख सरवर-ए-फ़ौज-ए-अकाल को ।
किबल-अज़-दुपहर शर्म से पहुंचा ज़वाल को ।

(तुफ़ंग=बन्दूक, ग़ुल=रौला, शहे-आली=महान
बादशाह, ख़ुरशीद=सूरज, सरवर=सरदार,
किबल-अज़-दुपहर=दुपहर से पहले,
ज़वाल=ढलना)

55

जिस जा किया हुज़ूर ने जा कर क्याम था ।
चमकौर की गढ़ी में येह इक ऊंचा बाम था ।
इस जा से चार कूंट का नज़ारा आम था ।
दिखता यहां से लश्कर-ए-आदा तमाम था ।
असवार ही असवार फैले हुए थे रन में ।
पयादे थे या थी आदमी-घास उग पड़ी बन में ।

(लश्कर-ए-आदा=वैरी दल, आदमी-घास=
आदमी जैसी घास)

56

सतिगुर ने मौका मौका से सब को बिठा दिया ।
हर बुरज पि फ़सील पि पहरा लगा दिया ।
येह मोर्चा इसे, उसे वुह दमदमा दिया ।
सिंहों का इक हिसार किले में बना दिया ।
दीवार-ओ-दर पि, पुश्तों पि जब सिंह डट गए ।
डर कर मुहासरीन सभी पीछे हट गए ।

(फ़सील=दीवार, हिसार=किला, मुहासरीन=
घेरे वाले)

57

फ़रमाए कलग़ीधर कि अब इक इक जवां चले ।
पा पा के हुक्म भेड़ों में शेर-ए-ज़ियां चले ।
बच कर अद्दू के दायो से यूं पहलवां चले ।
दांतों में जैसे घिर के दहन में ज़बां चले ।
घुसते ही रन में जंग का पल्ला झुका दिया ।
जिस समत तेग़ तोल के पहुंचे भगा दिया ।

(अद्दू=वैरी, दहन=मुंह, समत=तरफ़,दिशा)

58

एक एक लाख लाख से मैदान में लड़ा ।
जिस जा पि सिंह अड़ गए, झंडा वहां गड़ा ।
चश्म-ए-फ़लक ने था जो न देखा वुह रन पड़ा ।
घोड़े पि झूमता इक अकाली जवां बढ़ा ।
ग़ुल मच गया जेह पांच प्यारों में एक है ।
बे-मिसाल है शुजाअ, हज़ारों में एक है ।

(शुजाअ=बहादुर)

59

चिल्लाए बाज़्ज़ लो वुह दया सिंह जी बढ़े ।
खांडा पकड़ के हाथ में जीवत बली बढ़े ।
सतिगुर के बाग़ के हैं येह सरवे-सही बढ़े ।
लाशों के पाटने को सफ़र जन्नती बढ़े ।
इन सा दिलेर कोई नहीं है सिपाह में ।
सर नज़र कर चुके हैं, येह मौला की राह में ।

(सरवे-सही=सरू जैसे, नज़र=भेटा)

60

मुहकम की शकल देख के लहू नुचड़ गया ।
धब्बा अद्दू के जामा-ए-जुरअत पे पड़ गया ।
पटख़ा मरोड़ कर उसे हत्थे जु चढ़ गया ।
दहशत से हर जवान का हुलिया बिगड़ गया ।
साहब को देख मसख़ ख़त-ओ-ख़ाल हो गए ।
डर से सफ़ैद ज़ालिमों के बाल हो गए ।

(मसख़ ख़त-ओ-ख़ाल=मुंह मुहांदरा बिगड़ना)

61

जिस समत ग़ुल मचा था उधर जब निगाह की ।
आवाज़ साफ़ आने लगी आह ! आह ! की ।
इक ख़ालसे ने हालत-ए-लश्कर तबाह की ।
रन में कहीं जगह न रही थी पनाह की ।
भागो कि अब बचायो की सूरत नहीं रही ।
आए धर्म तो जंग की हिम्मत नहीं रही ।

62

लाखों को कत्ल करके प्यारे गुज़र गए ।
एक एक करके ख़ालसे सारे गुज़र गए ।
सदहा फ़ना के घाट उतारे गुज़र गए ।
भुस में लगा के आग शरारे गुज़र गए ।
ज़ख़्मों से सिंह सूरमे जब चूर हो गए ।
सरदार सर कटाने पे मज़बूर हो गए ।

(शरारे=शोले)

63

फ़वारा-ए-ख़ूं हर हर बुन-ए-मू से रवां हुआ ।
ज़ख़्मों से चूर चूर इक इक जवां हुआ ।
खा खा के तीर सिंह हर इक नातवां हुआ ।
सर तन पे शौक-ए-कत्ल में बार-ए-गिरां हुआ ।
लाखों की जान ले के दलेरों ने जान दी ।
सतिगुर गुरू गोबिन्द के शेरों ने जान दी ।

(बुन-ए-मू=बालों की जड़, नातवां=कमज़ोर,
बार-ए-गिरां=भारी बोझ)

64

ऐ तबा-ए-रसा आज दिखा अपनी रसाई ।
ए तेग़-ए-सुखन तू भी बता अपनी सफ़ाई ।
शहबाज़ ने मेरे कभी मुंह की नहीं खाई ।
हैं दर्द-ओ-असर ख़ैर से दोनों सगे भाई ।
ख़ाक उड़ने लगे बहर में गर आह करूं मैं ।
गुलख़न बने गुलज़ार अगर वाह करूं मैं ।

(तबा-ए-रसा=रंग पर आई तबियत,
बहर=समुन्दर, गुलख़न=भट्ठी )

65

गुलशन में चहक मुझ से हज़ारों ने उड़ाई ।
गुलबुन में महक मुझ से ही सारों ने उड़ाई ।
बिजली ने तड़प ज़ौ है सितारों ने उड़ाई ।
जोगी से खटक बन में है ख़ारों ने उड़ाई ।
नशतर कई रख देता हूं, हर मिसरा-ए-तर में ।
कांटा हूं जभी गुलशन-ए-आलम की नज़र में ।

(गुलबुन=गुलाब का बूटा, ज़ौ(ज़ूइ)=चमक,
मिसरा-ए-तर=अच्छा शिअर, आलम=संसार)

66

मैदां में अद्दू मेरी हवा को नहीं पहुंचा ।
शबदोज़-ए-सुख़न के सुमे-पा को नहीं पहुंचा ।
ता अर्श गया तब-ए-रसा को नहीं पहुंचा ।
बन्दा कोई जिस तरह ख़ुदा को नहीं पहुंचा ।
ख़ामा तो नहीं हाथ में मूसा का असा है ।
फ़रऊन-ए-अद्दू की मेरी मुट्ठी में कज़ा है ।

(अद्दू=दुश्मन, शबदोज़-ए-सुख़न=कविता
का घोड़ा, सुमे-पा=पैर का सुम, ख़ामा=
कलम, असा=डंडा, कज़ा=मौत)

67

अशआर से मुर्दों को भी ज़िन्दा किया मैंने ।
कितने ही मरीज़ों को मसीहा किया मैंने ।
उर्दू-ए-मुअल्ला को मुजल्ला किया मैंने ।
नापैद था जो रंग वुह पैदा किया मैंने ।
तहसीं लिया करता हूं टूटे हुए दिल की ।
बस इश्क के मारे हुए लूटे हुए दिल की ।

(उरदू-ए-मुअल्ला=महान उरदू ज़बान,
मुजल्ला=चमकदार, तहसीं=शाबाश)

68

जिस दिल को नहीं इश्क-ए-हकीकी से सरोकार ।
पत्थर का वुह टुकड़ा है वुह दिल तो नहीं ज़िनहार ।
ख़ालिक का प्यारा है जो ख़लकत को करे प्यार ।
इतना है फ़कत काफ़िर-ओ-दींदार का मअयार ।
सिक्खी भी सिखाती है फ़ना ज़ात में हो जा ।
पैरो गुरू नानक का हर इक बात में हो जा ।

(ज़िनहार=बिलकुल, काफ़िर-ओ-दींदार=
मनमुख गुरमुख, नास्तिक आस्तिक)

69

मिल शैख़ को ऐ सिंह तू मर्दाना समझ कर ।
वाहगुरू की शम्हा का परवाना समझ कर ।
कर तौफ़-ए-हरम भी दर-ए-जानाना समझ कर ।
कांसी में भी राम का काशाना समझ कर ।
वाहगुरू की फ़तह तू मन्दर में गजा दे ।
नारा सति स्री अकाल का मस्जिद में लगा दे ।

(तौफ़-ए-हरम=काबे की परिकर्मा, दर-ए-
जानाना=प्रीतम का दर, काशाना=घोंसला)

70

जब तक तेरी नज़रों में कोई ग़ैर है बाकी ।
तब तक ही तमीज़-ए-हरम-ओ-दैर है बाकी ।
दे शैख़-ओ-ब्रहमन को जो कुछ बैर है बाकी ।
कहते हैं गुरू शर है फ़ना, ख़ैर है बाकी ।
नेकी ही वुह दौलत है कभी छुट नहीं सकती ।
सरहिन्द तो लुट सकता है येह लुट नहीं सकती ।

(तमीज़-ए-हरम-ओ-दैर=मन्दिर मस्जिद की
पहचान, शर=बुराई, ख़ैर=नेकी)

71

तौहीद के परचार से सब नेकियां कम हैं ।
मुहताज इसी चीज़ के अब दीन-ओ-धर्म हैं ।
साग़र मए-तौहीद का गो पी चुके हम हैं ।
लेकिन दिल-ए-मुस्लिम में भी मौजूद सनम हैं ।
है शिरके-ख़फ़ी शिरके-जली आम नहीं है ।
ताहम जो है इस्लाम वुह इस्लाम नहीं है ।

(तौहीद=इक रब्ब, साग़र=प्याला, सनम=
बुत्त, शिरके=रब्ब का शरीक, ख़फ़ी=
गुप्त, जली=प्रगट)

72

उठ साकिया, उठ साग़र-ए-तौहीद पिला दे ।
अंजाम-ए-धर्म-ओ-दीन की तमहीद पिला दे ।
ए मेरे सख़ी(सुख़न), ऐ मिरे जमशीद ! पिला दे ।
हो जाए फ़कीरों की भी आज ईद पिला दे ।
ता मज़हब-ए-उश्शाक से सर ले के न जाएं ।
मानिन्द-ए-बराहीम पिसर ले के न जाएं ।

(अंजाम=नतीजा, तमहीद=भूमिका, जमशीद=
इक रंगीला बादशाह, मज़हब-ए-उश्शाक=
आशिकों की कत्लगाह, पिसर=पुत्र)

73

इक ख़्वाब सा दुनिया का वजूद और अदम है ।
है दिल में मिरे जिस का येह सब जाह-ओ-हशम है ।
अंजामे-दो-आलम मिरे आगाज़ से कम है ।
आज़ाद हूं बेफ़िक्र हूं शादी है न ग़म है ।
सेर इतना हूं हर बेश मुझे कम नज़र आया ।
इक बून्द से बढ़ कर न मुझे यम नज़र आया ।

(वजूद और अदम=होना न होना , जाह-
ओ-हशम=रुतबा, आगाज़=शुरू, बेश=अधिक,
यम=दरिया)

74

ओंधाए हुए मस्त प्याला को हैं कब से ।
बात हो नहीं सकती है नकाहत के सबब से ।
अब तक न कहा हम ने तकल्लुफ़ से अदब से ।
बेहाल हैं मैकश तिरे बादा की तलब से ।
शीशे में डुबो दे हमें साग़र में डुबो दे ।
संतोख के तालाब में, कौसर में डुबो दे ।

(ओंधाए=उलटाए, मस्त= खाली, नकाहत=
कमज़ोरी, मैकश=शराबी, बादा की तलब=
शराब की इच्छा, कौसर=इक स्वर्गिक नदी)

75

दे इश्क के, इरफ़ां के, वहदत के प्याले ।
दस बीस पिला दे मए-अंमृत के प्याले ।
उल्फ़त के प्याले वुह मुहब्बत के प्याले ।
दुनिया में पिला कौसर-ए-जन्नत के प्याले ।
नशा हो फिर ऐसा कि दूई दिल से जुदा हो ।
जिस चीज़ को देखूं मुझे दीदार-ए-ख़ुदा हो ।

(इरफ़ां=ज्ञान, वहदत=एक रब को मानना)

76

ए कतरा-ए-नाचीज़ में जां डालने वाले ।
ऐ रहम के सांचे में हसीं ढालने वाले ।
ऐ रंग रंगीले ! ऐ हमें पालने वाले ।
आफ़ात को ऐ बन के सिपर टालने वाले ।
ना-अहल हूं दाता ! मुझे अहल बना दे !
मुश्किल जिसे समझूं तू उसे सहल बना दे !
(हसीं=सुन्दर, सिपर=ढाल)

77

हां मुल्क-ए-सुख़न की मुझे जागीर अता कर ।
लफ़्ज़ों को मिरे बरुश-ए-शमशीर अता कर ।
बेमिसल मुझे कुव्वत-ए-तहरीर अता कर ।
तू आप मुअस्सर है वुह तासीर अता कर ।
मुश्किल तो नहीं, गर मिरे मौला का कर्म हो ।
नायाब सी शै गंज-ए-शहीदां येह रकम हो ।

(बेमिसल=बेमिसाल, कुव्वत-ए-तहरीर=लिखने
की शक्ति, मुअस्सर=असर डालने वाला, रकम=
लिखना)

78

गोबिन्द के दिलदार किले से निकल आए ।
वुह देखिए सरकार किले से निकल आए ।
घोड़े पे हो असवार किले से निकल आए ।
ले हाथ में तलवार किले से निकल आए ।
क्या वसफ़ हो उस तेग़ का इस तेग़े-ज़बां से ।
वुह म्यान से निकली नहीं निकली येह दहां से ।

(वसफ़=सिफ़त, दहां=मुंह)

79

किस मुंह से करूं तेग़-ए-ख़मदार की तारीफ़ ।
गोबिन्द की बख़्शी हुई तलवार की तारीफ़ ।
परकाला-ए-आतिश की शर्ररबार की तारीफ़ ।
बांकी की, नुकीली की, तरहदार की तारीफ़ ।
थी दोश पि शमशीर या कांधे पि परी थी ।
थी तिशना-ए-ख़ूं इस लिए ग़ुस्से में भरी थी ।

(ख़मदार=टेढ़ी, परकाला-ए-आतिश=आग
की लाट, तिशना-ए-ख़ूं=ख़ून की प्यासी)

80

अज़-दीदा-ए-जौहर इसे देखा, उसे देखा ।
कुछ देर बराबर इसे देखा, उसे देखा ।
पहलू को बदल कर इसे देखा, उसे देखा ।
सदके हुए सर पर इसे देखा, उसे देखा ।
अब क्या था गिरी, बर्क-ए-बला बन के गिरी वुह ।
मुंह फिर गए लाखों ही के जिस समत फिरी वुह ।

(अज़-दीदा-ए-जौहर=पारखी आंख से, बरक=
बिजली)

81

कहते थे अद्दू बर्क है तलवार नहीं है ।
इस काट का देखा कभी हथियार नहीं है ।
नौ-मशक जवां येह कोई ज़िनहार नहीं है ।
सतिगुर हैं येह फ़रज़न्द-ए-वफ़ादार नहीं है ।
ललकारे अजीत और मुख़ातिब हुए सब से ।
फ़रमाए अद्दू से न निकल हद्द-ए-अदब से ।

(नौ-मशक=नया अभ्यासी, फ़रज़न्द=पुत्र)

82

सतिगुर गुरू गोबिन्द के हमसर नहीं हम हैं ।
उन के तो कफ़-ए-पा के बराबर नहीं हम हैं ।
ख़ादिम हैं हर इक सिंह के अफ़सर नहीं हम हैं ।
जो तुम हो समझते वुह मुकर्रर नहीं हम हैं ।
फ़रज़न्द हैं दिलबन्द हैं, हमसर तो नहीं हैं ।
हम कलग़ियों वाले के बराबर तो नहीं हैं ।

(ख़ादिम=सेवक, मुकर्रर=वार वार, कफ़=
हथेली)

83

उस हाथ में थे बाज़ू-ए-गोबिन्द के कसबल ।
फ़रज़न्द की तलवार से थर्रा गए जल थल ।
ज़िन्दों का तो क्या ज़िक्र है मुरदे हुए बेकल ।
शमशान में था शोर मज़ारों में थी हलचल ।
जमना के भी पानी में तलातम सा बपा था ।
गंगा के भी ज़र्रों में अजब जोश भरा था ।

(कसबल=मजबूत पकड़, बेकल=बेचैन,
तलातम=लहरें)

84

देव लोक के सब देवते फिरदौस से झांके ।
रुसतम से जवां, भीम से यल, नल से बांके ।
हैरां थे हुनर से, पिसर-ए-पीर-ए-ज़मां के ।
आकाश की मख़लूक को ख़तरे हुए जां के ।
तलवार वुह ख़ूंख़ार थी, तोबा ही भली थी ।
लाखों की ही जां ले के बला सर से टली थी ।

(फिरदौस=बहिशत, यल=वीर)

85

पलटन प गिरी काट दिया पल में रसाला ।
सर उस का उछाला, कभी धड उस का उछाला ।
लाशों से वुह जा पट गई साया जहां डाला ।
था खैंच लिया डर से मह-ओ-महर ने हाला ।
तोंदल फ़लक-ए-पीर खड़ा हांप रहा था ।
मरीख को लरज़ा था, ज़ुहल कांप रहा था ।

(मह-ओ-महर=चांद सूरज, फ़लक-ए-पीर=
बूढ़ा आकास, मरीख=मंगल, ज़ुहल=शनी)

86

दहशत से सभी बुरज सितारों में घुसे थे ।
अकरब असद-ओ-सौर हिसारों में घुसे थे ।
येह होश थे गुंम अयदहे ग़ारों में घुसे थे ।
शेरों में हिरन शेर चिकारों में घुसे थे ।
येह इस को दिखा और न वुह उस को नज़र आया ।
छुपने के लिए भेड़िया भेड़ों में दर आया ।

(अकरब=ब्रिशचक, असद=सिंह राशी, सौर=
ब्रिख राशी, हिसार=किले, अयदहे=सराल)

87

येह आई वुह पहुंची वुह गई, सन से निकल कर ।
जब बैठ गई सर पि उठी तन से निकल कर ।
दो कर गई चार आई न जोशन से निकल कर ।
तर्रारी में तेज़ी में थी नागन से निकल कर ।
दुश्मन को लिया मरकब-ए-दुश्मन भी न छोड़ा ।
असवार को दो कर गई तौसन भी न छोड़ा ।

(जोशन=ज़रह, कवच, मरकब=सवारी, तौसन=
घोड़ा)

88

तलवार सी तलवार थी क्या जानिए क्या थी ।
ख़ूंख़ार थी ख़ूम्बार थी आफ़त थी बला थी ।
थी आब या फौलाद पि बिजली की जिला थी ।
यमराज की अंमां थी वुह शमशीर-ए-कज़ा थी ।
अरदल में बिचारे मलकुल-मौत खड़े थे ।
अपने शुगल-ए-ख़ास में मशगूल बड़े थे ।

(जिला=चमक, कज़ा=मौत, मलकुल-मौत=
काल पुरख)

89

घोड़ा वुह सुबक-सेर बदल जिस का नहीं था ।
देखा तो कहां था अभी देखा तो कहीं था ।
महफूज़ कोई उस से, मकां था न मकीं था ।
बाला-ए-फ़लक था वुह कभी ज़ेर-ए-ज़मीं था ।
थी टाप की आवाज़ या सैली-ए-सबा थी ।
ग़ुंचे के चटख़ने की सदा इस से सिवा थी ।

(सुबक-सेर=तेज चाल, मकीं=वासी, बाला-
ए-फ़लक=आकाश पर, ज़ेर=नीचे, सैली-ए-
सबा=सुबह हवा का चलना, ग़ुंचे=कली,
सदा=आवाज़, सिवा=अधिक)

90

इस को कुचल आया कभी उस को कुचल आया ।
सदहा की लकदकोबी से हैयत बदल आया ।
ठोकर जहां मारी, वहां पानी निकल आया ।
शेर आ गया गर सामने बोला, "संभल आया" ।
तेज़ी में हवा को भी था वुह कान कतरता ।
था सुम से कभी फूल, कभी पान कतरता ।

(सदहा=सैंकड़े, लकदकोबी=लताड़न, हैयत=
हुलिया)

91

कहते थे सभी असप नहीं, है येह छलावा ।
ताकत भी बला की है, नज़ाकत के इलावा ।
करते थे नज़र-बाज़, उसे देख के दावा ।
ऐसा न कदम ही है, किसी का न कावा ।
पुट्ठा है अलग्ग, इस की कनौती ही जुदा है ।
सीमाब लहू की जगह रग रग में भरा है ।

(असप=घोड़ा, कावा=टाप, सीमाब=पारा)

92

ताऊस सी दुंम, चांद से सुम, मार की सूरत ।
बेपर है मगर उड़ता है, परदार की सूरत ।
कस शेर की, बल फील का रहवार की सूरत ।
फिरता है इशारे से ही परकार की सूरत ।
जिस समत गया रन का येह नक्शा बदल आया ।
पलटन पलट आया, येह रसाला कुचल आया ।

(ताऊस=मोर, मार=सांप, कस=पकड़, फील=हाथी,
रहवार=तेज़ घोड़ा)

93

पकड़े जिसे गर्दन से येह पूरा उसे कर दे ।
हो कामिल-ए-फ़न भी तो अधूरा उसे कर दे ।
पैरों में तुफ़ंग आए तो बूरा उसे कर दे ।
जिस तोप पि दे टाप येह चूरा उसे कर दे ।
जी में कदर-अन्दाज़ डरे, ओपची घागे ।
तोपों को ग़रज़ छोड़ के सभी तोपची भागे ।

(तुफ़ंग=बन्दूक, कदर-अन्दाज़=पक्के तीर-
अन्दाज़, ओपची=हथियारबन्द योधे)

94

शहज़ादा-ए-ज़ी-शाह ने भागड़ सी मचा दी ।
येह फ़ौज भगा दी, कभी वुह फ़ौज भगा दी ।
बढ़-चढ़ के तवक्को से शुजाअत जो दिखा दी ।
सतिगुर ने वहीं किले से बच्चे को निदा दी ।
शाबाश पिसर ख़ूब दलेरी से लड़े हो ।
हां, क्यों न हो, गोबिन्द के फ़रज़न्द बड़े हो ।

(शहज़ादा-ए-ज़ी-शाह=उच्ची शान वाला
शाहज़ादा, शुजाअत=वीरता, निदा=आवाज़,
पिसर=पुत्र)

95

दिलबन्द ने तलवार से तसलीम बजाई ।
गर्दन पए-आदाब दिलबर ने झुकाई ।
इस वकफ़ा में फ़ौज-ए-सितम-आरा उमंड आई ।
बरछी किसी बदबख़त ने पीछे से लगाई ।
त्युरा के गिरे ज़ीन से सरकार ज़मीं पर ।
रूह खुल्द गई और तन-ए-ज़ार ज़मीं पर ।

(सितम-आरा=ज़ालिम, त्युरा के=चक्कर
खा कर, खुल्द=स्वर्ग, तन-ए-ज़ार=मुर्दा शरीर)

96

बेटे को शहादत मिली देखा जो पिदर ने ।
तूफ़ां बपा ग़म से किया दीदा-ए-तर ने ।
इस वक्त कहा नन्न्हे से मासूम पिसर ने ।
रुख़सत हमें दिलवाउ पिता जाएंगे मरने ।
भाई से बिछड़ कर हमें जीना नहीं आता ।
सोना नहीं, खाना नहीं, पीना नहीं भाता ।

(पिदर=पिता, पिसर=पुत्र)

97

थी दूसरे बेटे की सुनी बेनती जिस दम ।
सर को, दहन-ए-पाक को बोसे दीये पैहम ।
मरने के लिए कहने लगे जाईए जम जम ।
रूठो न ख़ुदा-रा ! नहीं रोकेंगे कभी हम ।
हम ने था कहा बाप को जां दीजे धर्म पर ।
लो कहते हैं अब आप को जां दीजे धर्म पर ।

(दहन-ए-पाक=पवित्र मुंह, बोसे=चुम्बन,
पैहम=लगातार)

98

मरने से किसी यार को हम ने नहीं रोका ।
फ़रज़न्द-ए-वफ़ादार को हम ने नहीं रोका ।
ख़ुशनूदी-ए-करतार को हम ने नहीं रोका ।
अब देखिए सरकार को हम ने नहीं रोका ।
तुम को भी इसी राह में कुर्बान करेंगे ।
सद शुक्र है हम भी कभी ख़ंजर से मरेंगे ।

(ख़ुशनूदी=रज़ा,ख़ुशी)

99

कुर्बान पिदर को कोई इन्कार नहीं है ।
सिन खेल का है, रन का सज़ावार नहीं है ।
आई ही चलानी तुम्हें तलवार नहीं है ।
येह गुल सा बदन काबिल-ए-सूफ़ार नहीं है ।
शाहज़ादा-ए-जुझार ने फ़ौरन कहा अब्बा ।
मैं भाईयों से क्यों रहूं घट कर भला अब्बा ।

(सिन=उमर, सूफ़ार=तीर की नोक)

100

ज़िन्दा चुना जाना भी तो आसान नहीं है !
सरहिन्द में दी भाईयों ने क्या जान नहीं है ।
क्यों मुझ को धर्म-युद्ध का कुछ ध्यान नहीं है ।
बन्दे को छुरी खाने का अरमान नहीं है ।
लड़ना नहीं आता मुझे मरना तो है आता ।
ख़ुद बढ़ के गला तेग़ पि धरना तो है आता ।

101

रोके से कभी शेर का बच्चा भी रुका है ।
झूठे तो रुके क्या कोई सच्चा भी रुका है ।
पतझड़ में समर शाख़ पि कच्चा भी रुका है ।
सर देने से रब्ब को कोई अच्छा भी रुका है ।
नेकी है येह ऐसी, कि जवाब हो नहीं सकता ।
पापी पि भी दोज़ख़ का अज़ाब हो नहीं सकता ।

(समर=फल, दोज़ख़=नरक, अज़ाब=दुक्ख)

102

किस शख़स ने होना यहां ताराज नहीं है ।
क्या दम का भरोसा कि था कल आज नहीं है ।
बढ़ चढ़ के धर्म-युद्ध से मिअराज नहीं है ।
मरग-ए-शुहदा वसफ़ की मुहताज नहीं है ।
सिंहों के लिए मौत येह रहमत का सबब है ।
रब्ब हो गया जिन भगतों का उन के लिए सब है ।

(ताराज=नाश, मिअराज=पदवी,पउड़ी,
मरग-ए-शुहदा=शहीदों की मौत, वसफ़=
तारीफ़)

103

भगवान हो ख़ुश जिन से, है ख़ुशकी तरी उन की ।
रहती है हर इक फ़सल में, खेती हरी उन की ।
करतार सदा रखते हैं झोली भरी उन की ।
फिरदौस भी उन का इन्द्र-पुरी उन की ।
मर जाना धर्म पर बहुत आसान है हम को !
सतिगुर के पिसर हैं, यही शायान है हम को !!

(ख़ुशकी तरी=थल जल, शायान=उच्चित)

104

भर्राई सी आवाज़ से बोले गुरू गोबिन्द ।
पाला है तुम्हें नाज़ से बोले गुरू गोबिन्द ।
रोका नहीं आगाज़ से बोले गुरू गोबिन्द ।
उस नन्हे से जां-बाज़ से बोले गुरू गोबिन्द ।
लो आउ तन-ए-पाक पि हथियार सजा दें ।
छोटी सी कमां नन्ही सी तलवार सजा दें ।

105

हम देते हैं ख़ंजर उसे तीर समझना ।
नेज़े की जगह दादा का तुम तीर समझना ।
जितने मरें इस से उन्हें बे-पीर समझना ।
ज़ख़्म आए तो होना नहीं दिलगीर समझना ।
जब तीर कलेजे में लगे सी नहीं करना ।
उफ़ मुंह से मेरी जान कभी भी नहीं करना ।

106

लो जायो, सिधारो ! तुम्हें अल्ल्हा को सौंपा !
मर जायो या मारो तुम्हें अल्ल्हा को सौंपा !
रब्ब को न बिसारो तुम्हें अल्ल्हा को सौंपा !
सिक्खी को उभारो तुम्हें अल्ल्हा को सौंपा !
वाहगुरू अब जंग की हिम्मत तुम्हें बख़शे !
पयासे हो बहुत जाम-ए-शहादत तुम्हें बख़शे !

107

बेटा, हो तुम ही पंथ के बेड़े के ख़िवय्या ।
सर भेंट करो ताकि धर्म की चले नय्या ।
ले दे के तुम्हीं थे मिरे गुलशन के बकय्या ।
लो जायो, राह तकते हैं सब ख़ुल्द में भय्या ।
ख़वाहश है तुम्हें तेग़ चलाते हुए देखें !
हम आंख से बरछी तुम्हें खाते हुए देखें !!

108

दादा से मिलो सुअरग में जिस दम तो येह कहना ।
दो चार हों गर ख़ुल्द में आदम तो येह कहना ।
जब भेस में नानक के मिलें हम तो येह कहना ।
पाएं कहीं गोबिन्द का महरम तो येह कहना ।
आज़ाद करायआ बनी-आदम के गले को ।
कटवा दीए बच्चे भी मुरीदों के भले को ।

(महरम=जानकार, बनी-आदम=बाबा आदम
की औलाद)

109

जब फ़तह गजा कर गए जुझार थे रन में ।
हर शेर, बघेला नज़र आने लगा बन में ।
नन्ही सी कज़ा बोली मैं आई हूं शरन में ।
दिलवायो अमां गोशा-ए-दामान-ए-कफ़न में ।
मैं जिस के हूं कबज़े में वुह काबू में है तेरे !
गुर्याई का बल नन्हे से बाज़ू में है तेरे ।

(अमां=शरन, गोशा-ए-दामान-ए-कफ़न=
कफ़न के कपड़े का किनारा)

110

दस बीस को ज़ख़्मी किया दस बीस को मारा ।
इक हमले में इस एक ने इकीस को मारा ।
ख़न्नास को मारा कभी इबलीस को मारा ।
ग़ुल मच गया इक तिफ़ल ने चालीस को मारा ।
बच बच के लड़ो कलग़ियों वाले के पिसर से ।
येह नीमचा लाए हैं गुरू जी की कमर से ।

(ख़न्नास और इबलीस=शैतान के नाम, तिफ़ल=
बच्चा, नीमचा=छोटा खंडा)

111

शहज़ादे के हरबे से शुजाअ-ओ-जरी हारे ।
जी-दारों के जी छूट गए, सब कवी हारे ।
मासूम से वुह बाज़ी सभी लश्करी हारे ।
कमज़ोर से निरबल से, हज़ारों बली हारे ।
मैदां में जब भाई का लाशा नज़र आया ।
घोड़े से वुह मासूम दिलावर उतर आया ।

(हरबे=हथियार, शुजाअ-ओ-जरी=बहादुर
और दिलावर)

112

सर गोद में ले कर के कहा भाई से बोलो ।
इस ख़्वाब-ए-गिरां से कहीं हुशियार तो हो लो ।
हम कौन हैं देखो तो ज़रा आंख तो खोल्हो ।
सोने की ही ठानी है अगर मिल के तो सो लो ।
भाई तुम्हें जब गंज-ए-शहीदां की ज़मीं है ।
ठानी हुई हम ने भी बसेरे की यहीं है ।

113

इतने में ख़दंग आ के लगा हाए जिगर में ।
था तीर कलेजे में या कांटा गुल-ए-तर में ।
तारीक ज़माना हुआ सतिगुर की नज़र में ।
तूफ़ान उठा ख़ाक उड़ी बहर में बर में ।
त्युरा के गिरा लख़त-ए-जिगर, लख़त-ए-जिगर पर ।
क्या गुज़री है इस वक्त कहूं क्या मैं पिदर पर ।

(ख़दंग=तीर, तारीक=अंधेरा, बहर=समुन्दर,
बर=धरती, लख़त=टुकड़ा)

114

थे चाहते पैवन्द करें ख़ाक का सब को ।
हातिफ़ ने कहा काम में लाना न ग़ज़ब को ।
लड़ना नहीं मनज़ूर है आज आप का रब्ब को ।
येह सुन के गुरू भूल गए रंज-ओ-तअब को ।
कबज़े से मअन तेग़ के फिर हाथ उठाया ।
सतिगुर ने वहीं सजदा-ए-शुक्राना बजायआ ।

(पैवन्द=मिलाना, हातिफ़=आकाश वाणी करने
वाला फ़रिशता, रंज-ओ-तअब=दुक्ख, मअन=
तुरंत)

115

याकूब को यूसफ़ के बिछड़ने ने रुलाया ।
साबिर कोई कम ऐसा रसूलों में है आया ।
कटवा के पिसर चारे इक आंसू न गिराया ।
रुतबा गुरू गोबिन्द ने रिश्यों का बढ़ाया ।
डंडक में फिरे राम तो सीता थी बग़ल में ।
वुह फ़ख़र-ए-जहां हिन्द की माता थी बग़ल में ।

(साबिर=सबर करने वाला, रसूल=अवतार)

116

लछमन सा बिरादर पए-तसकीन-ए-जिगर था ।
सीता सी पतीबरत से बन राम को घर था ।
बाकी हैं कन्हय्या तो नहीं उन का पिसर था ।
सच्च है गुरू गोबिन्द का रुतबा ही दिगर था ।
कटवा दीये शिश शाम ने गीता को सुना कर ।
रूह फूंक दी गोबिन्द ने औलाद कटा कर ।

(बिरादर=भाई, तसकीन=चैन, दिगर=
और ही, अनोखा)

117

बेचैन हैं अब ख़ालसा जी रंज के मारे ।
दिल पर ग़म-ओ-अन्दोह के चलने लगे आरे ।
ख़ामोश तड़पने लगे सतिगुर के प्यारे ।
जोगी जी कहो पंथ से अब फ़तह गुज़ारे ।
छाया हुआ दीवान पे अब ग़म का समां है ।
बस ख़तम शहीदों की शहादत का बयां है ।

बस्स एक हिन्द में तीर्थ है यातरा के लिये ।
कटाए बाप ने बच्चे जहां ख़ुदा के लिये ।

चमक है मेहर की चमकौर तेरे ज़र्रों में,
यहीं से बन के सतारे गए समा के लिये ।

गुरू गोबिन्द के लख़त-ए-जिगर अजीत जुझार,
फ़लक पि इक, यहां दो चांद हैं ज़िया के लिये ।

दक्कन में दूर मरकद है हज़ूर साहब का,
पहुंचना जिस जगह मुश्किल है मै-नवा के लिये ।

भटकते फिरते हैं क्यों हज्ज करें यहां आ कर,
येह काबा पास है हर एक खालसा के लिये ।

यहां वुह लेटे हैं, सतलुज ने जोश में आ कर,
चरन हज़ूर के नहरें बहा बहा के लिये ।

मिज़ार गंज-ए-शहीदां है उन शहीदों का,
फ़रिशते जिन की तरसते थे ख़ाक-ए-पा के लिये ।

उठाएं आंखों से आकर यहां की मट्टी को,
जो ख़ाक छानते फिरते हैं कीमीया के लिये ।

येह है वुह जा जहां चालीस तन शहीद हुए,
ख़ताब सरवरी सिंहों ने सर कटा के लिये ।

दिलाई पंथ को सर-बाज़ीयों ने सरदारी,
बराय कौम येह रुतबे लहू बहा के लिये ।

(मेहर=सूरज, समा=आकाश, ज़िया=रोशनी,
मरकद=समाधी, मै-नवा=नंग मलंग, मिज़ार=
समाधी, कीमीया=रसायन, सरवरी=सरदारी,
सर-बाज़ीओं=कुर्बानियां)


 
 
 
 
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