Hindi Kavita
हरिवंशराय बच्चन
Harivansh Rai Bachchan
 Hindi Kavita 

एकांत-संगीत हरिवंशराय बच्चन

एकांत संगीत (कविता)
अब मत मेरा निर्माण करो
मेरे उर पर पत्थर धर दो
मूल्य दे सुख के क्षणों का
कोई गाता, मैं सो जाता
मेरा तन भूखा, मन भूखा
व्यर्थ गया क्या जीवन मेरा
खिड़की से झाँक रहे तारे
नभ में दूर-दूर तारे भी
मैं क्यों अपनी बात सुनाऊँ
छाया पास चली आती है
मध्य निशा में पंछी बोला
जा कहाँ रहा है विहग भाग
जा रही है यह लहर भी
प्रेयसि, याद है वह गीत
कोई नहीं, कोई नहीं
किसलिये अंतर भयंकर
अब तो दुख दें दिवस हमारे
मैंने गाकर दुख अपनाए
चढ़ न पाया सीढ़ियों पर
क्या दंड के मैं योग्य था
मैं जीवन में कुछ न कर सका
कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं
जैसा गाना था, गा न सका
गिनती के गीत सुना पाया
किसके लिए? किसके लिए
बीता इकतीस बरस जीवन
मेरी सीमाएँ बतला दो
किस ओर मैं? किस ओर मैं
जन्म दिन फिर आ रहा है
क्या साल पिछला दे गया
सोचा, हुआ परिणाम क्‍या
फिर वर्ष नूतन आ गया
यह अनुचित माँग तुम्हारी है
क्या ध्येय निहित मुझमें तेरा
मैं क्या कर सकने में समर्थ
पूछता, पाता न उत्‍तर
तब रोक न पाया मैं आँसू
गंध आती है सुमन की
है हार नहीं यह जीवन में
मत मेरा संसार मुझे दो
मैंने मान ली तब हार
देखतीं आकाश आँखें
तेरा यह करुण अवसान
बुलबुल जा रही है आज
जब करूँ मैं काम
मिट्टी दीन कितनी, हाय
घुल रहा मन चाँदनी में
व्याकुल आज तन-मन-प्राण
मैं भूला-भूला-सा जग में
खोजता है द्वार बन्दी
मैं पाषाणों का अधिकारी
तू देख नहीं यह क्यों पाया
दुर्दशा मिट्टी की होती
क्षतशीश मगर नतशीश नहीं
यातना जीवन की भारी
दुनिया अब क्या मुझे छलेगी
त्राहि, त्राहि कर उठता जीवन
चाँदनी में साथ छाया
सशंकित नयनों से मत देख
ओ गगन के जगमगाते दीप
ओ अँधेरी से अँधेरी रात
मेरा भी विचित्र स्वभाव
डूबता अवसाद में मन
उर में अग्नि के शर मार
जुए के नीचे गर्दन डाल
दुखी-मन से कुछ भी न कहो
आज घन मन भर बरस लो
स्वर्ग के अवसान का अवसान
यह व्यंग नहीं देखा जाता
तुम्‍हारा लौह चक्र आया
हर जगह जीवन विकल है
जीवन का विष बोल उठा है
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ
जीवन भूल का इतिहास
नभ में वेदना की लहर
छोड़ मैं आया वहाँ मुस्कान
जीवन शाप या वरदान
जीवन में शेष विषाद रहा
अग्नि देश से आता हूँ मैं
सुनकर होगा अचरज भारी
जीवन खोजता आधार
हा, मुझे जीना न आया
अब क्या होगा मेरा सुधार
मैं न सुख से मर सकूँगा
आगे हिम्मत करके आओ
मुँह क्यों आज तम की ओर
विष का स्‍वाद बताना होगा
कोई बिरला विष खाता है
मेरा जोर नहीं चलता है
मैंने शान्ति नहीं जानी है
अब खँडहर भी टूट रहा है
प्राथर्ना मत कर, मत कर, मत कर
कुछ भी आज नहीं मैं लूँगा
मुझे न सपनों से बहलाओ
मुझको प्यार न करो, डरो
तुम गये झकझोर
ओ अपरिपूर्णता की पुकार
सुखमय न हुआ यदि सूनापन
अकेला मानव आज खड़ा है
कितना अकेला आज मैं
 
 
 Hindi Kavita