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दुष्यंत कुमार
Dushyant Kumar
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Ek Kanth Vishpayi Dushyant Kumar

एक कंठ विषपायी दुष्यन्त कुमार

1. सर्वहत के संवाद

सर्वहत
हाँ;
पटाक्षेप होने पर
मंच की सज्जा-सामग्री को संजोने के लिए
किसी भृत्य को आना चाहिए था
मैं यथा समय आया हूँ।

क्योंकि यह
विधाता के नियमों की बिडम्बना है ।
चाहे न चाहे
किन्तु
शासक की भूलों का उत्तरदायित्व
प्रजा को वहन करना पड़ता है,
उसे गलित मूल्यों का दंड भरना पड़ता है ।
और मैं मनुष्य ही नहीं हूँ
मैं प्रजा भी हूँ।

थका हुआ नहीं हूँ
बुभुक्षित हूँ...
(विक्षिप्त जैसी धीमी हंसी)

सुनो !
क्या तुम्हारे पास
एक रोटी होगी ?

जाते-जाते शिव के गणों ने
दक्षिन नगर-द्धार की गुफायों में छिपे हुए
मुझको भी पकड़ लिया...
मेरे भी तन पर व्रण छोड़ दिया
ये देखो...
(घाव दिखलाता है)
और में अचेत हो गया था
.......................
सब समझा ।
मैं समझ गया
नगर में तुम्हें भी कहीं
मदिरा या अन्न नहीं मिल पाया-
तुम भी यहाँ इसीलिए आए हो ।
है ना ?
(उल्लास से)

तुम भी बुभुक्षित हो...
मैं भी बुभुक्षित हूँ...
हम सब बुभुक्षित हैं...
ये सारी दुनिया बुभुक्षित है... ।
(विक्षिप्त हँसी हँसते हुए)
खाओ...खूब खाओ
यहाँ सब कुछ है

सब कुछ है... ।
देखो ये महल हैं
कंगूरे हैं
कलश हैं;

अतिथि-भवन हैं
राजमार्ग हैं...
इन सबको खालो
इन सबसे भूख मिट जाती है
इन कलश-कंगूरों को खाकर ही
मेरी
और तुम्हारी
और हम सबकी
क्षुधा शान्त होगी
वरना...
भूखे रह जाओगे
.......................
जब तक ये महल
ये सोने के कलश और कंगूरे
और ये राजमार्ग
हमारे खाने के लायक़ बनें
तब तक तुम
-मुझको ही खाओ ।

आओ मेरे बच्चो
डरो मत
आओ ।
(आत्मीयता से धीरे धीरे)

हाँ
देखो,
पहले मेरा दिल निकाल कर खाना
फिर दोनों हाथ...,
इन्होंने मुझे
बहुत कष्ट दिया;
ये अगर न होते तो यह जीवन
बड़ी सुगमता से जिया जाता ।

...हाँ
फिर थोड़ा सा
अपनी उँगलियों का मांस
मुझको भी दे देना ।
(ब्रह्मा और विष्णु उसकी दयनीय दशा
पर कातर-भाव से एक दूसरे
की और देखते हैं)
अरे !
ये तो बोलते नहीं
हिलते-डुलते भी नहीं
शायद खड़े-खड़े मर गए
झर झर झर
साँसों के सब पते झर गए
...खड़े-खड़े मर गए-
...बेचारे…
भूख के मारे ।
च: च: च: ।

किन्तु
मैं अकेला रह गया हूँ अब
बिल्कुल अकेला
पूरे नगर में अकेला,
आह !
इन राजमहलों से मोह
अब तोड़ना पड़ेगा मुझे
बहुत शीघ्र अब
यह नगर छोड़ना पड़ेगा मुझे
वरना क्या खाऊँगा और क्या पियूँगा यहाँ ?

छोड़ना...
ग्रहण करके
छोड़ना
कितना कठिन होता है
आह !

मैं सुनता हूँ...
मैं सब कुछ सुनता हूँ
सुनता ही रहता हूँ...
देख नहीं सकता हूँ
सोच नहीं सकता हूँ
और सोचना मेरा काम नहीं है
उससे मुझे लाभ क्या
मुझको तो आदेश चाहिये
मैं तो शासक नहीं
प्रजा हूँ
मात्र भृत्य हूँ
इस लिए केवल सुनना मेरा स्वभाव है ।

मैं ? हाँ...
मैंने पहचान लिया
मैंने सुनकर ही पहचान लिया
-ठीक वही स्वर है
-वही
जो मेरे महलों में एक रोज
भूखों की भीड़ ले आया था।
क्या तुमने भी मुझको पहचान लिया ?
(रुक कर)

याद नहीं आता क्या ?
पर मुझको याद है
मैं कभी सुनने में भूल नहीं कर सकता ।
हाँ, मुझको याद है
कि मैंने तुमसे

यह कभी न पूछा था-
तुम किसकी आज्ञा से आए हो?
मैंने तो बाहें फैलाकर तुम्हें अनायास
अपनी यह देह भेंट कर दी थी
पर तुमने कुछ भी न खाया था...
(रुक कर)
ये भी तुम्हें याद नहीं?
ओह !
अब समझा,
तुम शासक हो,
उनकी स्मरण-शक्ति दुर्बल हो जाती है ।
छोटी-छोटी बातें उन्हें याद नहीं आती हैं ।

पर तुम जाने कैसे शासक हो !
और...जाने कैसी है तुम्हारी यह प्रजा,
-ज़रा-ज़रा बातों पर चीखती-चिल्लाती है
शासन के दरवाज़े पीटती है
नारे लगाती है
और शत्रु सेना की तरह घिरी आती है...
(सीने पर हाथ मार कर)

अरे...प्रजा हम थे
हमने उफ़ तलक नहीं की
शासन के ग़लत-सलत झोकों के आगे भी
फसलों-से विनयी हम बिछे रहे निर्विवाद
हमारे व्यक्तित्व के लहलहाते हुए
खेतों से होकर-
दक्ष ने बहुत सी पगडंडियाँ बनाईं
कर दी सब फसलें बरबाद
पर हम नहीं बोले... बिछे रहे
हमने पथ दिया सबको
क्यों कि हम प्रजा थे

पर अब मैं
एक पगडंडी के सिवा और क्या हूँ ?
-धूल मरी विस्मृत सी पगडंडी एक :
जिस पर थके और जख़्मी पदचिह्न हैं अनेक :
और जो परम्परा की तरह,
एक दायरे में,
चक्कर लगाती हुई चलती है,
अब तो मैं खेत भी नहीं हूँ
और अगर खेत हूँ भी तो
अब मुझमें फ़सल कहाँ फलती है ?

तुम क्या कर सकते हो,
कोई क्या करता है अथवा कर सकता है
यह उसकी अपनी सामर्थ्य और क्षमता पर निर्भर है,

यह कोई सार्वजनिक प्रश्न नहीं ।
... हाँ ।
...लो मैं अपना प्रयोजन ही भूल गया
यह प्रयोजनी समाज !
जिसमें हर वात का प्रयोजन
देखा जाने लगा है आज ।
मैं इसमें आकर
प्रयोजन ही भूल गया ।

...हाँ, मुझको याद आया
-शायद मैं भूखा हूँ
-रोटी के लिन यहाँ आया हूँ।
-नहीँ ! नहीं !!
रोटी नहीँ,
-मांस और मदिरा ।
-नहीं, ये भी नहीं
शायद कुछ और...
शायद थोड़ा सा रक्त ?
(उल्लास पूर्वक)

हाँ ! याद आया
रक्त !
लाल-लाल
................................
................................
बतलाओ-
मुझमेँ या शिव में क्या अन्तर है ?
यहीँ ना कि मैं तो सर्वहत हूँ
-साघारण हूँ-
और वो विशिष्ट देवता है, शिवशंकर है !
किन्तु प्यास दोनों की एक-सी है !
(हँसता है और कुछ याद कर सहसा रुक जाता है)
ओह !
किन्तु क्षमा करें
भटक गया था मैं,
(रोते हुए)

मैं बतलाऊँ कब आएगा ?
प्रभु;
क्यों लोग 'नए' को ऊपर आने देना नहीं चाहते ?
(सर्वहत की ओर संकेत)

चाहे वे साधारण जन हों
अथवा महादेव शंकर हों
क्यों इनमें अधिकांश लोग लाशें ढोते हैं;
-लाशें मरी मान्यताओं की
मरे विचारों की
भावों की... ।

और उसी से सब बचते हैं
(कष्ट से खड़ा हो जाता है)
सब बचते हैं...
मैं बतलाऊँ क्यों बचते हैं...
मैंने भी मुर्दे ढोए हैं
मैं केवल बतला सकता हूँ
मैं अपनी गर्दन नीची रखता हूँ
जो अपनी गर्दन ऊँची रखते हैं
वे भी
नए सत्य को सम्मुख पकड़कर नहीं देखते,
वे भी सहसा नए प्रश्न से नहीं जूझते
उससे लड़कर नहीं देखते,
सिर्फ़ व्यस्तताओं की रचना करके
उसे टाल जाते हैं
और युद्ध भी एक व्यस्तता का नाटक है !
(सहसा व्यंग्य मिश्रित आवेश में जाकर इन्द्र से)

तुमने भी न्याय के नाम पर
यह नाटक रचना चाहा था,
नए सत्य की सृजन-व्यथा से
कतराना बचना चाहा था !
-तुम भी तो अपवाद नहीं हो !
तुम भी तो...अपवा...द...हा हा हा...
रण का निर्णय लेते समय
बताओ तुमने क्या सोचा था ?

2. शंकर के संवाद

शंकर

देवत्व और आदर्शों का परिधान ओढ़
मैंने क्या पाया...?
निर्वासन !
प्रेयसि-वियोग !!
हर परम्परा के मरने का विष
मुझे मिला,
हर सूत्रपात का श्रेय
ले गए और लोग ।

...मैं ऊब चुका हूँ
इस महिना-मंडित छल से... ।

आह, शोक ने मुझे
अचीन्ही स्थितियों से जोड़ दिया,
महाशून्य के अन्तराल में
निपट अकेला छोड़ दिया;
सारा धीरज सोख लिया है
सारा रक्त निचोड़ दिया,
प्रिया-हीन व्यक्तित्व-विखंडित
जगह-जगह से तोड़ दिया ।

प्रिया-हीन संसार
और मैं देख रहा हूँ !
अपने जीवन पर
तम का विस्तार
और मैं देख रहा हूँ !
ये अपने से ही
अपने की हार
और मैं देख रहा हूँ !

धिक् मेरा देवत्व !
कि जिसकी कायर गाथा
धिक् मेरी सामर्थ्य !
कि जिसने टेका माथा,
धिक् मेरा पुंसत्व !
कि जिसका बोध अधूरा,
धिक् मेरा जीवन !
जिसका प्रतिशोध अधूरा ।

जिस भाषा में
मिला मुझे यह प्रश्न भयंकर ।
मुझे उसी में
देना होगा उत्तर !
(एक पल रुककर)

सम्प्रति बस प्रतिकार
देव, ॠषि, दानव सबसे ।
आह ! तीसरा नेत्र
रक्त का प्यासा कब से ।
चलो
अलकनंदा की ओर चलें अब प्रेयसि !
वहाँ तुझे मैं
स्नान कराऊँगा उस जल में,
फिर चंदन से माँग भरूँगा ।
फूट-फूट रोऊँगा कुछ देर वहाँ पर ।
फिर बाहों में तुझे उठाकर,
हदय लगाकर,
सुविधों का आह्वान करूँगा
फिर तुझको लेकर
मैं वन के हर उस कोने में विचरूँगा-
तेरे साथ जहाँ
जीवन के
सर्वोत्तम क्षण मैंने भोगे।
चलो... अलकनंदा की चलें अब प्रेयसि !

ये कौन ?
कौन, कैलास-शिखर पर
अनाहूत आया ?

ये किसका स्वर है
जो मेरे निश्चय से टकराया ?
स्तुति करता
सामने नहीं आता है
बचता है ।
यह कौन मुझे
सम्मोहित करने को
छल रचता है ।

मैं पारब्रह्म ?
कैलाशनाथ !
मैं निर्माता ?
मैं कालजयी व्यक्तित्व ?
स्वयंभू महादेव !

ये सारे संबोधन
हैं कितने क्रूर व्यंग्य !
जो करते आए हैं मेरे संग
छल सदैव ।

तुम दास समझते हो
मैं मित्र समझता था ।

संबोधन
और सर्वनामों की सृष्टि रोक,
उत्तर दो
मेरे एक प्रश्न का मित्र मान,

दक्ष के यज्ञ में
आमंत्रित थे सभी देव;
था किन्तु उपेक्षित मैं,
पर तुमने दिया थ्यान ?

देवत्व और आदर्शों का परिधान ओढ़
मैंने क्या पाया ?
निर्वासन !
प्रेयसि-वियोग !!
(गहरी पीड़ा से)

हर परम्परा के मरने का विष,
मुझे मिला,
हर सूत्रपात का
श्रेय ले गये और लोग ।
(क्षण भर रुक कर)

मैं ऊब चुका हूँ
इस महिमा-मंडित छल से,
अब मुझे स्वयं का
वास्तव-सत्य पकड़ना है,
जिन आदर्शों ने
मुझे छला है कई बार
मेरा सुख लूटा है
अब उनसे लड़ना है ।
(फटकारते हुए)

बोलो
क्यों आए हो ?
क्या और अपेक्षित है ?

कर्तव्य तुम्हारा
धन-संचय से इतर
और भी है कोई ?
यदि है तो, हे धनपति कुबेर !
यह है कुयोग;

मैं तो समझा था
धन के दृष्टि नहीं होती
भावना-शून्य हो जाते हैं
धनवान लोग ।
आत्मस्थ बना देती है सत्ता मित्रों को
आचरण बदलते जाते हैं उनके क्षण-क्षण,
अपनत्व खत्म हो जाता है,
बच रहता है थोड़ा सा शिष्टाचार
और औपचारिकता,
प्रभुता का ऐसा ठी होता आकर्षणा ।
...........................
सम्प्रति केवल
बल की भाषा
शक्ति-प्रदर्शन,
सम्प्रति केवल
युद्ध, व्यूह-रचना,
अरि-मर्दन,
ओ मेरे आत्मज योद्धाओ
अरे अभागो,
ओ डाकिनियो, साकिनियो
ओ प्रेतो जागो ।

जागो वीरभद्र, त्वरिता
पर्पट, ईशानी,
जागो शंकुकर्न, गुह्यक,
वैष्णवी, भवानी ।

केकराक्ष, दुद्रम,
विष्टंभवीर, संदारक,
पिप्पल, आवेशन,
आदित्यमूर्ध, सन्तानक,

जागो कात्यायनी
भद्रकाली, सर्वांकक ।
समद, काकपादोदर
कुंडी; प्रमथ भयानक ।
कपालीश, कूष्णांड
और भैरव सन्नाधो,
उठो, तुरत संकेतों पर
ब्रह्मांड हिला दो...

कौन ?
अलका पति !
तुम अब तक गए नहीं?
मन में अविनिश्चित संकल्प ठान
जाने किस क्षण से प्रेरित अजान,
अभय दे दिया था तुमको मैंने ।
तुम अब तक गए नहीं?
मेरे प्रति सहानुभूति चुकी नहीं?

देवलोक !
देवलोक !! देवलोक !!!
जो कि इस परिस्थिति का
नाथ है, नियन्ता है ।
मृत्यु का निमित
और प्रेयसि का हन्ता है ।
मैं उसको क्षमा नहीं कर सकता...

पल भर में त्यागो कैलाश-भूमि
अन्यथा इसी क्षण
मैं तुम्हें भस्म करता हूँ।

ठहरो ।
हाँ, कह देना विष्णु और ब्रह्मा से,
संध्या तक
सती में न आई यदि चेतनता
तो मेरा क्रोध देव भोगेंगे ।
...रुधिर वमन करेंगी दिशाएँ दश
आवर्ती पवन आग उगलेंगे,
चूर्ण-चूर्ण होंगी गिरि-मालाएँ,
सिंधु सूख जाएँगे ।

कह देना-
होगा दिग्दाह रुधिर वर्षण के साथ-साथ
पूरा ब्रह्मांड मम कर दूँगा ।

डमर-डमर बजने दो डमरू
जब तक शक्ति विकास न पाए
जब तक मेरी मृतक प्रिया के
शव में वापस सांस न आए ।

उमर-डम बजने दो डमरू
होने दो तांडव त्रिलोक में,
महादेव की प्रतिहिंसा भी
देखे देव-समाज शोक में ।

आह प्रिया !
अब क्या रह गया शेष ?
सूना सा लगता है
सारा कैलाश-देश ।
नंदा का मलिन वेश ।
हिम तक पर व्याप्त क्लेश ।
सारे संदर्भ व्यर्थ,
जीवन का कुछ न अर्थ,
अब ऐसा एक नहीं
जो मेरे भाव ग्रहण करने में
हो समर्थ ।

आह प्रिया !
मेरा हर एक शब्द
था तुझको पूर्ण वाक्य ।
मेरे हित
तूने क्यों राज्य भोग त्याग दिया ?
नंदा-व्रत पूर्ण किया ?
क्यों मुझसे
मुझको ही माँग लिया ?
...फिर मेरा हाथ छोड़
अधबर में साथ छोड़
चली गई...

 
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