Hindi Kavita
डॉ. ओमप्रकाश सिंह
Dr. Omprakash Singh
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डॉ. ओमप्रकाश सिंह हिन्दी कविता

1. फाल्गुन का गीत

संध्या के चेहरे पर
फागुन ने रच दिया गुलाल।

पीले वस्त्र पहनकर आई
वैरागिन सरसों
आम और महुआ बौराये
लगते हैं बरसों
रंग-बिरंगे बिंब उभरते
झाँक रहा है ताल।

खेल रहा ले पिचकारी
सूरज आँगन आँगन
फैल रही खुशबू
खेतों में बाग़ों में वन-वन
स्नेह-नदी में मौन मछलियाँ
काट रही हैं जाल।

खिड़की से मालती झाँकती
द्वार हँसे बेला
पनघट-पनघट भीग रहा है
चंद्रमुखी मेला।
घूँघट शरमाया कान्हा ने
चूम लिया क्यों भाल?

2. स्वर्ण लंकाएँ

क्या करोगे
अब बनाकर सेतु सागर पर
राजपथों पर खड़ी हैं स्वर्णलंकाएँ।

पाप का रावण
चढ़ा है स्वर्ण के रथ पर,
हो रहा जयगान उसका
पुण्य के पथ पर,
राक्षसों ने पाँव फैलाए गली-कूचे
आज उनसे स्वर मिलाती हैं अयोध्याएँ।

राम तो अब हैं नहीं
उनके मुखौटे हैं,
सती साध्वी के चरण
हर ओर मुड़ते हैं,
कैकई की छाँह में हैं मंथरायें भी
नाचती हैं विवश होकर राज सत्ताएँ।

दर्द के साये
हवा के साथ चलते हैं,
सत्य के पथ पर
सभी के पाँव जलते हैं,
घूमती माँएँ अशोक बाटिकाओं में
अब नहीं होती धरा पर अग्नि परीक्षाएँ।

आम जनता रो रही है
ख़ास लोगों से,
युग-मनीषी खेलते हैं
स्वप्न-भोगों से,
अब नहीं नवकुश लड़ें अस्तित्व की ख़ातिर
छूटती हैं हाथ से अभिशप्त वल्गाएँ

3. आ गया आतंक

हाथ में
बंदूक लेकर
आ गया आतंक!

काँपता बाज़ार
थर्राते हैं चौराहे
स्वप्न-पक्षी के
परों को अब कोई बाँधे

लो, खुले आकाश पर
गहरा गया आतंक!

आज रिश्ते काँच की
दीवार से लड़ते
देहरी पर नई कीलें
ठोंककर हँसते

सुर्ख आँखों पर उतरकर
छा गया आतंक!

सभ्यता विश्वास के घर
हो गई शैतान
सत्य के नीचे खुली है
झूठ की दूकान

रक्त-सिंचित पाँव धर
बौरा गया आतंक!

4. अरे हरिण मन

अरे हरिण मन!
चल, चंदन वन
गूँज रहा शहनाई से!

नव सपनों की झील
भला क्यों थर्राई है आँखों में
आँचल कहाँ चाँद का अटका
है बादल की शाखों में

अरे हरिण मन!
नाच रहा क्यों
वंशीवट पुरवाई से!

बाँट न लेंगे दर्द कंटीले
जंगल के हरियल पत्ते
कोहरे की औकात है कितनी
सूरज को आकर ढक ले

अरे हरिण मन!
खेल रहा क्यों
केहरि की तरुणाई से!

जितने मन से चाल चला तू
उतनी ही दूरी तय की
सपनों से सपनों तक
उलझे-उलझे ही पूरी वय की

अरे हरिण मन!
भाग रहा तू
अपनी ही परछाँई से!

5. इंद्रप्रस्थ के लोग

इंद्रप्रस्थ की
बात करें क्या
इंद्रप्रस्थ के लोग!

सिंहासन के
आसपास ही
सुलग रही है आँखें
जोड़ रहे जो
भीतर-बाहर
इंद्रप्रस्थ की साँसें

राजा का मन ही
बहलाते
इंद्रप्रस्थ के लोग!

रिश्तों का
अवमूल्यन करने की
मन में हैं ठाने
अहंकार सिर पर
चढ़ बैठा
लगा मंच पर गाने

आडंबर की
चादर ओढ़े
ये संन्यासी लोग!

जाल बिछाए
लहर-लहर पर
खींचे बहती नावें
घाट-घाट
करवाए पट्टे
कब्जेदारी गाएँ

उसके आगे-पीछे
नाचें
मंत्रोच्चारी लोग!

 
 
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