Hindi Kavita
भक्त कबीर जी
Bhakt Kabir Ji
 Hindi Kavita 

Dohe Bhagat Kabir Ji

दोहे भक्त कबीर जी

अन्तर्यामी एक तुम, आत्मा के आधार ।
जो तुम छोड़ो हाथ तो, कौन उतारे पार ॥

आया था किस काम को, तू सोया चादर तान ।
सुरत सम्भाल ए गाफिला, अपना आप पहचान ॥

आए हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर ।
एक सिंहासन चढ़ि चले, एक बँधे जात जंजीर ॥

ऊँचे पानी न टिके, नीचे ही ठहराय ।
नीचा हो सो भर पिए, ऊँचा प्यासा जाय ॥

ऐसी वाणी बोलीए, मन का आपा खोय ।
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय ॥

कबिरा माला मनहि की, और संसारी भेख ।
माला फेरे हरि मिले, गले रहट के देख ॥

कबिरा यह तन जात है, सके तो ठौर लगा ।
कै सेवा कर साधु की, कै गोविंद गुन गा ॥

कबीरा जपनी काठ की, क्या दिखलावे लोय ।
ह्रदय नाम न जपेगा, यह जपनी क्या होय ॥

कबीरा ते नर अन्ध हैं, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर ॥

कबीरा धीरज के धरे, हाथी मन भर खाय ।
टूट एक के कारने, स्वान घरै घर जाय ॥

कबीरा सोया क्या करे, उठि न भजे भगवान ।
जम जब घर ले जायेंगे, पड़ी रहेगी म्यान ॥

कहता तो बहुत मिला, गहता मिला न कोय ।
सो कहता वह जान दे, जो नहिं गहता होय ॥

कहना सो कह दिया, अब कुछ कहा न जाय ।
एक रहा दूजा गया, दरिया लहर समाय ॥

कामी, क्रोधी, लालची, इनसे भक्ति न होय ।
भक्ति करे कोइ सूरमा, जाति वरन कुल खोय ॥

काया काठी काल घुन, जतन-जतन सो खाय ।
काया वैद ईश बस, मर्म न काहू पाय ॥

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब ।
पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब ॥

कुटिल वचन सबसे बुरा, जारि करे तन छार ।
साधु वचन जल रूप है, बरसे अमृत धार ॥

क्या भरोसा देह का, बिनस जात छिन मांहि ।
साँस-सांस सुमरिन करो और यत्न कुछ नांहि ॥

गारी ही सों ऊपजे, कलह कष्ट और मींच ।
हारि चले सो साधु है, लागि चले सो नींच ॥

गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागूं पाँय ।
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय ॥

छिन ही चढ़े छिन उतरे, सो तो प्रेम न होय ।
अघट प्रेम पिंजरे बसे, प्रेम कहावे सोय ॥

छीर रूप सतनाम है, नीर रूप व्यवहार ।
हंस रूप कोई साधु है, सत का छाननहार ॥

जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय ।
यह आपा जो डाल दे, दया करे सब कोय ॥

जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं मैं नाय ।
प्रेम गली अति साँकरी, ता में दो न समाय ॥

जब लग नाता जगत का, तब लग भक्ति न होय ।
नाता तोड़े हरि भजे, भगत कहावे सोय ॥

जब लगि भगति सकाम है, तब लग निष्फल सेव ।
कह कबीर वह क्यों मिले, निष्कामी तज देव ॥

जब ही नाम हिरदे धरा, भया पाप का नाश ।
मानो चिंगारी आग की, परी पुरानी घास ॥

जब ही नाम ह्रदय धरयो, भयो पाप का नाश ।
मानो चिनगी अग्नि की, परि पुरानी घास ॥

जल ज्यों प्यारा माहरी, लोभी प्यारा दाम ।
माता प्यारा बारका, भगति प्यारा नाम ॥

जहाँ आपा तहाँ आपदा, जहाँ संशय तहाँ रोग ।
कह कबीर यह क्यों मिटें, चारों दीर्घ रोग ॥

जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप ।
जहाँ क्रोध तहाँ पाप है, जहाँ क्षमा तहाँ आप ॥

जा कारण जग ढूंढिया, सो तो घट ही माहिं ।
परदा दिया भरम का, ताते सूझे नाहिं ॥

जागन में सोवन करे, साधन में लौ लाय ।
सूरत डोर लागी रहे, तार टूट नाहिं जाय ॥

जाति न पूछो साधु की, पूछि लीजिए ज्ञान ।
मोल करो तलवार का, पड़ी रहन दो म्यान ॥

जो तोको कांटा बुवे, ताहि बोय तू फूल ।
तोको फूल के फूल है, वाको है त्रिशूल ॥

ज्यों तिल मांही तेल है, ज्यों चकमक में आग ।
तेरा सांई तुझमें है, जाग सके तो जाग ॥

तन बोहत मन काग है, लक्ष योजन उड़ जाय ।
कबहु के धर्म अगम दयी, कबहुं गगन समाय ॥

तब लग तारा जगमगे, जब लग उगे न सूर ।
तब लग जीव जग कर्मवश, ज्यों लग ज्ञान न पूर ॥

तिनका कबहुँ न निंदिये, जो पाँयन तर होय ।
कबहुँ उड़ आँखिन परे, पीर घनेरी होय ॥

तीरथ गये ते एक फल, सन्त मिले फल चार ।
सत्गुरु मिले अनेक फल, कहे कबीर विचार ॥

तेरा साँई तुझमें है, ज्यों पहुपन में बास ।
कस्तूरी का हिरन ज्यों, फिर-फिर ढ़ूँढ़त घास ॥

दया कौन पर कीजिये, का पर निर्दय होय ।
सांई के सब जीव हैं, कीरी कुंजर दोय ॥

दस द्वारे का पिंजरा, ता में पंछी कौन ।
रहे को अचरज है, गए अचम्भा कौन ॥

दान दिए धन ना घटे, नदी न घटे नीर ।
अपनी आँखों देख लो, यों कह गए कबीर ॥

दिल का महरम ना मिला, जो मिला सो गर्जी ।
कह कबीर आसमान फटा, क्योंकर सीवे दर्जी ॥

दुख में सुमरिन सब करे, सुख में करे न कोय ।
जो सुख में सुमरिन करे, दुख काहे को होय ॥

दुर्बल को न सताइए, जाकी मोटी हाय ।
बिना जीभ की हाय से, लोह भस्म हो जाय ॥

दुर्लभ मानुष जन्म है, होय न बारम्बार ।
तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार ॥

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥

नहीं शीतल है चन्द्रमा, हिंम नहीं शीतल होय ।
कबीरा शीतल सन्त जन, नाम सनेही सोय ॥

नींद निशानी मौत की, उठ कबीरा जाग ।
और रसायन छांड़ि के, नाम रसायन लाग ॥

पतिवृता मैली भली, काली कुचल कुरूप ।
पतिवृता के रूप पर, वारो कोटि सरूप ॥

प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट बिकाय ।
राजा-परजा जेहि रुचें, शीश देई ले जाय ॥

प्रेम प्याला जो पिये, शीश दक्षिणा देय ।
लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय ॥

पाँच पहर धन्धे गया, तीन पहर गया सोय ।
एक पहर हरि नाम बिन, मुक्ति कैसे होय ॥

फल कारण सेवा करे, करे न मन से काम ।
कहे कबीर सेवक नहीं, चाहै चौगुना दाम ॥

फूटी आँख विवेक की, लखे ना सन्त असन्त ।
जाके संग दस-बीस हैं, ताको नाम महन्त ॥

बलिहारी गुरु आपनो, घड़ी-घड़ी सौ सौ बार ।
मानुष से देवता किया करत न लागी बार ॥

बाजीगर का बांदरा, ऐसा जीव मन के साथ ।
नाना नाच दिखाय कर, राखे अपने साथ ॥

बानी से पह्चानिये, साम चोर की घात ।
अन्दर की करनी से सब, निकले मुँह कई बात ॥

बाहर क्या दिखलाईए, अन्तर जपिए राम ।
कहा काज संसार से, तुझे धनी से काम ॥

बैद मुआ रोगी मुआ, मुआ सकल संसार ।
एक कबीरा ना मुआ, जेहि के राम अधार ॥

भक्ति गेंद चौगान की, भावे कोई ले जाय ।
कह कबीर कुछ भेद नाहिं, कहां रंक कहां राय ॥

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोहि ।
इक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोहि ॥

माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय ।
भगतां के पीछे लगे, सम्मुख भागे सोय ॥

माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर ।
आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥

मार्ग चलते जो गिरा, ताकों नाहि दोष ।
जो कबिरा बैठा रहे, तो सिर करड़े दोष ॥

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर ।
कर का मन का डार दे, मन का मनका फेर ॥

माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख ।
माँगन से मरना भला, यह सतगुरु की सीख ॥

मैं अपराधी जन्म का, नख-सिख भरा विकार ।
तुम दाता दु:ख भंजना, मेरी करो सम्हार ॥

रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय ।
हीरा जन्म अमोल है, कौड़ी बदले जाय ॥

लागी लगन छूटे नाहिं, जीभ चोंच जरि जाय ।
मीठा कहा अंगार में, जाहि चकोर चबाय ॥

लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट ।
पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट ॥

शीलवन्त सबसे बड़ा, सब रतनन की खान ।
तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन ॥

सब ते लघुताई भली, लघुता ते सब होय ।
जैसे दूज का चन्द्रमा, शीश नवे सब कोय ॥

साईं इतना दीजिये, जा में कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा न रहूँ, साधु ना भूखा जाय ॥

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय ।
सार-सार को गहि रहे, थोथ देइ उड़ाय ॥

सुख में सुमरिन ना किया, दु:ख में किया याद ।
कह कबीर ता दास की, कौन सुने फरियाद ॥

सुख सागर का शील है, कोई न पावे थाह ।
शब्द बिना साधु नहीं, द्रव्य बिना नहीं शाह ॥

सुमरित सुरत जगाय कर, मुख से कछु न बोल ।
बाहर का पट बन्द कर, अन्दर का पट खोल ॥

सुमरिन में मन लाइए, जैसे नाद कुरंग ।
कहै कबीर बिसरे नहीं, प्रान तजे तेहि संग ॥

सोया साधु जगाइए, करे नाम का जाप ।
यह तीनों सोते भले, साकित सिंह और साँप ॥

संत ही ते सत बांटई, रोटी में ते टूक ।
कहे कबीर ता दास को, कबहूँ न आवे चूक ॥

हीरा वहाँ न खोलिये, जहाँ कुंजड़ों की हाट ।
बांधो चुप की पोटरी, लागहु अपनी बाट ॥

 
 
 
 Hindi Kavita