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महादेवी वर्मा
Mahadevi Verma
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Deepshikha Mahadevi Verma

दीपशिखा महादेवी वर्मा

अलि कहाँ सन्देश भेजूँ
अलि, मैं कण-कण को जान चली
आज तार मिला चुकी हूँ
आज दे वरदान
आँसुओं के देश में
आँसू से धो आज
ओ चिर नीरव
कहाँ से आये बादल काले
कोई यह आँसू आज माँग ले जाता
क्यों अश्रु न हों श्रृंगार मुझे
गूँजती क्यों प्राण-वंशी
गोधूली अब दीप जगा ले
घिरती रहे रात
जग अपना भाता है
जब यह दीप थके तब आना
जो न प्रिय पहिचान पाती
झिप चलीं पलकें तुम्हारी पर कथा है शेष
तम में बनकर दीप-आँसू से धो आज
तरल मोती से नयन भरे
तुम्हारी बीन ही में बज रहे हैं बेसुरे सब तार
तू धूल-भरा ही आया
तू भू के प्राणों का शतदल
तेरी छाया में अमिट रंग-बहना जलना
दीप मेरे जल अकम्पित
धूप सा तन दीप सी मैं
निमिष से मेरे विरह के कल्प बीते
पथ मेरा निर्वाण बन गया
पंथ होने दो अपरिचित
प्राण हँस कर ले चला जब
प्राणों ने कहा कब दूर,पग ने कब गिने थे शूल
प्रिय मैं जो चित्र बना पाती
पुजारी दीप कहीं सोता है
पूछता क्यों शेष कितनी रात
फिर तुमने क्यों शूल बिछाए
मिट चली घटा अधीर
मेघ सी घिर झर चली मैं
मेरे ओ विहग-से गान
मैं क्यों पूछूँ यह विरह-निशा
मैं चिर पथिक
मैं न यह पथ जानती री
मैं पलकों में पाल रही हूँ यह सपना सुकमार किसी का
मोम सा तन घुल चुका
यह मन्दिर का दीप
यह सपने सुकुमार तुम्हारी स्मित से उजले
लौट जा ओ मलय-मारुत के झकोरे
विहंगम-मधुर स्वर तेरे
शेषयामा यामिनी मेरा निकट निर्वाण!पागल रे शलभ अनजान
सजल है कितना सवेरा
सपने जगाती आ
सब आँखों के आँसू उजले
सब बुझे दीपक जला लूँ
हुए शूल अक्षत मुझे धूलि चन्दन
 
 
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