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गोपालदास नीरज
Gopal Das Neeraj
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दर्द दिया है गोपालदास नीरज

दर्द दिया है
मेरा गीत दिया बन जाये
मस्तक पर आकाश उठाये
हज़ारों साझी मेरे प्यार में
छ: रुबाइयाँ
तुम दीवाली बनकर जग का तम दूर करो
दुनिया के घावों पर
तिमिर ढलेगा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ
चार विचार
उद्जन बम्ब के परीक्षण पर
आदि पुरुष
दो रुबाइयाँ-एक चीज़ है जो अभी
आज जी भर देख लो तुम चाँद को
विरह रो रहा है, मिलन गा रहा है
उसकी अनगिन बूँदों में
दुख ने दरवाज़ा खोल दिया
एक विचार
एक तेरे बिना प्राण ओ प्राण के !
सावन के त्योहार में
मन क्या होता है
चाह मंज़िल की
पपिहरा उठा पुकार पिया नहीं आये
तसवीर बन गया
लगन लगाई
जिस दिन तेरी याद न आई
तब तुम आए
प्राण ! मन की बात
तू उठा तो उठ गई सारी सभा
ओ बादर कारे
जा में दो न समायँ
मैं तो तेरे पूजन को
आज मेरे कंठ में
मेरे जीवन का सुख
गीत-नीरज गा रहा है
न बनने दो
 
 
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