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Poetry in Hindi Bharat Angara Manu

हिंदी कविता-भारत अंगारा मानु

ग़ज़ल-लफ़्ज़ बनकर आलम-ऐ-दिल जब निकला

लफ़्ज़ बनकर आलम-ऐ-दिल जब निकला
कोई क़तरा आँख से बेसबब निकला ।

दूर तक नज़रों के हिस्से सूनापन
जाने वो इस रास्ते से कब निकला ।

हर कोई चेहरा तेरा चेहरा मिला
अपना चेहरा ढूँढने जब जब निकला ।

कोशिशें नाकाम तो होती रहीं
हौसला फिर भी मगर बेहद निकला ।

बेवज़ह बरसों रहा वो बोलता
चुप हुआ तो दिल में जो था सब निकला ।

जाते जाते मुड़कर मुझको देखना
उसका हर अंदाज़ बेमतलब निकला ।

ग़ज़ल-जा रहे हैं आप गर तो मुस्कुरा कर जाइये

जा रहे हैं आप गर तो मुस्कुरा कर जाइये,
आपका हर ग़म हमारे पास छोड़ जाइये..।

मुस्कुरा कर जिस तरह मुझसे मिले कल रात तुम,
खुश रहोगे यूँ ही..इतना वादा करते जाइये..।

कितनी हसरत से सदा देखा है तुमको ही सनम,
हो सके तो फिर कभी यूँ ही नज़र आ जाइये..।

दूर दरियाओं में जो बरसों भटकता ही रहा,
अब तो राह-ए-आब में कोई किनारा चाहिए..।

याद-ए-माज़ी, ख़ुशनुमा लम्हात कुछ तो पास हैं,
ज़िन्दगी को तो सिर्फ कोई सहारा चाहिए..।

मुन्तज़िर के घर में अब रोशन चिराग़-ए-याद है,
'मानु' अब मेरे अंधेरों से न यूँ घबराइये ।।

ग़ज़ल-अजब है ये अदब उनका, अजब अंदाज़ रखते हैं

अजब है ये अदब उनका, अजब अंदाज़ रखते हैं ।
उन्हें कोई ज़रूरत हो तभी वो याद करते हैं..।

हमारे सहरा-ऐ-मन में बरसते हैं वो बनके नूर
मगर अहसान ये हमपर वो मुद्दत बाद करते हैं..।

न जाने क्या मरासिम है, न वो समझे न हम समझे
कि वो तो भूल जाते हैं, मगर हम याद रखते हैं..।

सुनो आलम है ये कि आजकल रातों को ना सोकर
भरी सर्दी में भी महताब से हम बात करते हैं..।

हम सादा-से, वो हैं हसीं इतने कि क्या कहिये
जहाँ से वो गुज़रते हैं 'मानु', हज़ारों दिल बिखरते हैं..।

नज़्म-एक ख़्वाब ही थी तुम मेरे लिए

एक ख़्वाब ही थी तुम मेरे लिए..

ख़्वाबों में ही बस देखा तुम्हें
वो हसीं ख़्वाब तुम्हें पाने के ..।

वाकिफ़ हूँ मैं इस बात से कि
तुमको मैं पा तो नहीं सकता..
पर ख़्वाबों में तुम्हे लाने से
मैं खुद को रोक नहीं सकता ..।

ख़्वाबों के हसीं ये लम्हें ही काफी हैं
खुश रहने के लिए..।

एक ख़्वाब ही थी तुम मेरे लिए
एक ख़्वाब ही हो तुम मेरे लिए..।।

नज़्म-आँखों को खाली रहने दे

फिर ये आँखें खाली हैं..
अब और न सपने देख.. ऐ मन!
इन्हें खाली ही तू रहने दे..।

जब सपने बिखरा करते हैं
आवाज़ नहीं होती है.. मगर
हर शय भी बिखर सी जाती है..।

मैं भी तो कितना बिखर गया..
सब टुकड़े खुद के चुनने दे..
आँखों को और न ख़्वाब दिखा..
आँखों को खाली रहने दे..
आँखों को खाली रहने दे..।।

नज़्म-तुम इतनी चुपचाप हो.. क्यूँ

तुम इतनी चुपचाप हो.. क्यूँ..?
तुम खामोश जो रहती हो, सब कुछ तनहा सा लगता है..
लगता है सभी फूल भी अब मुरझा जायेंगे..
तुम खामोश हो तो जैसे मेरी आवाज़ कहीं गुम है..
मैं भी गुमसुम हो जाता हूँ..।

फिर तुम इतनी चुपचाप हो क्यों..?

ख़ामोशी अपने होंठों की इस क़ैद से अब आज़ाद करो..

अब और न यूँ परेशान रहो..
मैं भी तो हंसना चाहता हूँ,
इसलिए ज़रा अब तो हंस दो..।
(भारत अंगारा 'मानु'-सिरसा (हरियाणा)

 
 
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