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हरिवंशराय बच्चन
Harivansh Rai Bachchan
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Bengal Ka Kaal Harivansh Rai Bachchan

बंगाल का काल हरिवंशराय बच्चन

बंगाल का काल

पड़ गया बंगाले में काल,
भरी कंगालों से धरती,
भरी कंकालों से धरती!

दीनता ले असंख्य अवतार,
पेट खला,
हाथ पसार,
पाँच उँगलियाँ बाँध,
मुँह दिखला,
भीतर घुसी हुई आँखों से,
आँसू ढार,
मानव होने का सारा सम्मान बिसार,
घूमती गाँव-गाँव,
घूमती नगर-नगर,
बाज़ारों-हाटों में, दर-दर, द्वार-द्वार!

अरे, यह भूख हुई साकार,
दीर्घाकार!
तृप्त कर सकता इसको कौन?
पेट भर सकता इसका कौन?
भूख ही होती, लो, भोजन!
मृत्यु अपना मुख शत-योजन
खोलती,
खाती और चबाती,
मोद मनाती,
मग्न हो मृत्यु नृत्य करती!
नग्न हो मृत्यु नृत्य करती!
देती परम तुष्टि की ताल,
पड़ गया बंगाले में काल,
भरी कंगालों से धरती,
भरी कंकालों से धरती!

क्या कहा?
कहाँ पड़ गया काल,
कहाँ कंगाल,
कहाँ कंकाल,
क्या कहा, कालत्रस्त बंगाल!

वही बंगाल-
जिस पर सजल घनों की
छाया में लह-लह लहराते
खेत धान के दूर-दूर तक,
जहाँ कहीं भी गति नयनों की।

जिस पर फैले नदी-सरोवर,
नद-नाले वर,
निर्मल निर्झर
सिंचित करते वसुंधरा का
आँगन उर्वर।

जिसमें उगते-बढ़ते तरुवर,
लदे दलों से,
फँदे फलों से,
सजे कली-कली कुसुमों से सुंदर।

वही बंगाल--
देख जिसे पुलकित नेत्रों से,
भरे कंठ से,
गद्गद स्वर से,
कवि ने गाया राष्ट्र गान वह-
वन्दे मातरम्,
सुजलाम्, सुफलाम्, मलयज शीतलाम्,
शस्य श्यामलाम्, मातरम्...।

वन्दे मातरम्--
जो नगपति के उच्च शिखर से
रासकुमारी के पदनख तक,
गिरि-गह्वर में,
वन प्रांतर में,
मरुस्थलों में, मैदानों में,
खेतों में औ' खलिहानों में,
गाँव-गाँव में,
नगर-नगर में,
डगर-डगर में,
बाहर-घर में,
स्वतंत्रता का महामंत्र बन,
कंठ-कंठ से हुआ निनादित,
कंठ-कंठ से हुआ प्रतिध्वनित।

जपकर जिसको आजादी के दीवानों ने
कितने ही
दी मिला जवानी
मिट्टी में काले पानी में।

कितनों ने हथकड़ी-बेड़ियों की झन-झन पर
जिसको गाया,
और सुनाया,
मन बहलाया
जबकि डाल वे दिये गये थे
देश प्रेम का मूल्य चुकाने
कठिन, कठोर, घोर कारागारों में।

कितने ही जिसको जिह्वा पर लाकर
बिना हिचक के,
बिना झिझक के,
हँसते-हँसते
झूल गए फाँसीवाले तख़्ते पर,
या खोल छातियाँ खड़े हुए
गोली की बौछारों में।

वही बंगाल--
जिसकी एक साँस ने भर दी
मरे देश में जान,
आत्म सम्मान,
आजादी की आन,
आज,
काल की गति भी कैसी, हाय,
स्वयं असहाय,
स्वयं निरुपाय,
स्वयं निष्प्राण,
मृत्यु के मुख का होकर ग्रास,
गिन रहा है जीवन की साँस।

हे कवि, तेरे अमर गान की
सुजला, सुफला,
मलय गंधिता
शस्य श्यामला,
फुल्ल कुसुमिता,
द्रुम सुसज्जिता,
चिर सुहासिनी,
मधुर भाषिणी,
धरणी भरणी,
जगत वन्दिता
बंग भूमि अब नहीं रही वह!

बंग भूमी अब
शस्य हीन है,
दीन क्षीण है,
चिर मलीन है,
भरणी आज हो गई हरणी;
जल दे, फल दे और अन्न दे
जो करती थी जीवन दान,
मरघट-सा अब रूप बनाकर,
अजगर-सा अब मुँह फैलाकर
खा लेती अपनी संतान!
बच्चे और बच्चियाँ खाती,
लड़के और लड़कियाँ खाती,
खाती युवक, युवतियाँ खाती,
खाती बूढ़े और जवान,
निर्ममता से एक समान;
बंग भूमि बन गई राक्षसी--
कहते ही लो कटी ज़बान!...

राम-रमा!
क्षमा-क्षमा!
माता को राक्षसी कह गया!
पाप शांत हो,
दूर भ्रान्ति हो।
ठीक, अन्नपूर्णा के आँचल
में है सर्वस,
अन्न तथा रस,
पड़ा न सूखा,
बाढ़ न आई
और नहीं आया टिड्डी दल,
किन्तु बंग है भूखा, भूखा, भूखा!
माता के आँचल की निधियाँ
अरे लूटकर कौन ले गया?

हाथ न बढ़ तू,
ठहर लेखनी,
अगर चलेगी, झूठ कहेगी,
हाथों पर हथकड़ी पड़ी है,
सच कहने की सज़ा बड़ी है,
पड़े जबानों पर हैं ताले,
नहीं जबानों पर, मुँह पर भी,
पड़े हुए प्राणों के लाले--
बरस-बरस के पोसे पाले
भूख-भूख कर,
सूख-सूखकर,
दारुण दुख सह,
लेकिन चुप रह,
जाते हैं मर,
जाते हैं झर
जैसे पत्ते किसी वृक्ष के
पीले, ढीले
झंझा के चलने पर!
कृमि-कीटों की मृत्यु किस तरह
होती इससे बदतर!

बोल विश्व विख्यात मेदिनी,
बोल विश्व इतिहास शोभिनी,
बोल बंग की पुण्य मेदिनी,
बोल बंग की पूत मेदिनी,
बोल विभा की चिर प्रसूतिनी,
बोल अमृत पुत्रों की जननी--

जननी श्री गोविंद गीत के
तन्मय गायक
रसिक विनायक
कवि नृप श्री जयदेव भक्त की;
बँगला वाणी
जीवन दानी,
कवि-कुल-कोकिल चंडिदास की;
औ' पद्मापति पद अनुरागी,
गृह परित्यागी,
परम विरागी
श्री चैतन्य देव की जिनकी
भक्ति ज्वाल में
विगलित होकर
हृदय बंग का कभी ढला था!

बोल अमर पुत्रों की जननी--
जननी श्री विद्यासागर की,
राष्ट्र गीत विरची बंकिम की,
मेघनाद-वध महाकाव्य के
प्रखर प्रणेता मधुसूदन की,
मानवता के वर विज्ञानी,
शरच्चंद्र की,
विश्ववंद्य कवि श्री रवींद्र की,
पिकी हिंद की सरोजिनी की,
तोरुदत्त औ श्री द्विजेंद्र की
और अग्निवीणा के वादक
कवि क़ाज़ी नज़रुलिस्लाम की।

बोल अजर पुत्रों की जननी--
जननी, भावी के वर द्रष्टा,
राजा मोहन राय सुधी की,
रामकृष्ण से परम यती की,
योगीश्वर अरविंद ज्ञानरत
और विवेकानंद व्रती की;
देश प्रेम के प्रथमोन्मेषक
'लाल' 'बाल' के बन्धु 'पाल' औ'
विद्यावाचस्पति सुरेन्द्र की,
जिसका नाम वीर अर्जुन की
अमर प्रतिज्ञा
'न पलायन' की
आंग्ल प्रतिध्वनि
बनकर हृदय-हृदय में गूँजी--
सुरेंदर नाथ,
सरेंडर नाट!
जननी ऐसे नाम धनी की,
औ उनके समकक्षी-से ही
वाग्मि घोष की,
देशबंधु श्री चितरंजन की,
आसुतोष की,
श्री सुबोस की!

बोल अभय पुत्रों की जननी--
परदेशी के प्रथम विरोधी,
परदेशी को प्रथम चुनौती
देनेवाले
उससे लोहा लेने वाले,
कासिम औ सिराज वीर की,
और क्रान्ति के अग्रदूत
उस क्षुधीराम की
जिसने अपनी वय किशोर में
ही यह सिद्ध किया अब भी
बुझी राख में आग छिपी है;
उसी आग की चिनगारी-से,
परम-साहसी,
बंब प्रहारी
रास बिहारी की, जो अब भी
ऐसा सुनने में आता है,
अन्य देश में
छद्म वेष में घूम-घूमकर
अलख जगाता है हुब्बुल वतनी का।
और शहीद यतींद्र धीर की
जिसने बंदीघर के अंदर
पल-पल गल-गल,
पल-पल घुल-घुल,
तिल-तिल मिट-मिट,
एकसठ दिन तक
अनशन व्रत रखकर
प्राण त्यागकर
यह बतलाया था हो बंदी देह
मगर आत्मा स्वतंत्र है!

बोल अमर पुत्रों की जननी,
बोल अजर पुत्रों की जननी,
बोल अभय पुत्रों की जननी,
बोल बंग की वीर मेदिनी,
अब वह तेरा मान कहाँ है,
अब वह तेरी शान कहाँ है,
जीने का अरमान कहाँ है,
मरने का अभिमान कहाँ है!

बोल बंग की वीर मेदिनी,
अब वह तेरा क्रोध कहाँ है,
तेरा विगत विरोध कहाँ है,
अनयों का अवरोध कहाँ है!
भूलों का परिशोध कहाँ है!

बोल बंग की वीर मेदिनी,
अब वह तेरी आग कहाँ है,
आज़ादी का राग कहाँ है,
लगन कहाँ हैं, लाग कहाँ है!

बोल बंग की वीर मेदिनी,
अब तेरे सिरताज कहाँ हैं,
अब तेरे जाँबाज़ कहाँ हैं,
अब तेरी आवाज़ कहाँ हैं!

बंकिम ने गर्वोन्नत ग्रीवा
उठा विश्व से
था यह पूछा,
'के बोले मा, तुमि अबले?'

मैं कहता हूँ,
तू अबला है।
तू होती, मा,
अगर न निर्बल,
अगर न दुर्बल,
तो तेरे यह लक्ष-लक्ष सुत
वंचित रहकर उसी अन्न से,
उसी धान्य से
जिसपर है अधिकार इन्हीं का,
क्योंकि इन्होंने अपने श्रम से
जोता, बोया,
इसे उगाया,
सींच स्वेद से
इसे बढ़ाया,
काटा, माड़ा, ढोया,
भूख-भूख कर,
सूख-सूखकर,
पंजर-पंजर,
गिर धरती पर,
यों न तोड़ देते अपना दम
और नपुंसक मृत्यु न मरते।

क्षीणकाय कुत्ते के आगे
से भी अगर हटा ले कोई
उसकी सूखी हड्डी-रोटी
शेर की तरह गुर्राता है;
कान फटककर,
देह झटककर,
विद्युत गति से
अपना थूथन ऊपर कर के,
लंबे, तीखे
दाँत निकाले
रोटी लेनेवाले की छाती के ऊपर
चढ़ जाता है,
बढ़ जाता है
ले लेने को अपना हिस्सा;
कोता क़िस्सा--
पशु को भी आता है अपने
अधिकारों पर लड़ना-मरना,
जो कि आज तुम भूल गए हो,
भूखे बंग देश के वासी!

छाई है मुरदनी मुखों पर,
आँखों में है धँसी उदासी;
विपद् ग्रस्त हो,
क्षुधा त्रस्त हो,
चारों ओर भटकते फिरते,
लस्त-पस्त हो
ऊपर को तुम हाथ उठाते,
और मनाते
'बरसो राम पटापट रोटी!'
क्योंकि सिखाया,
क्योंकि पढ़ाया,
क्योंकि रटाया,
तुम्हें गया है--
'निर्बल के बल राम!
(हाय किसी ने क्यों न सुझाया
निर्बल के बल राम नहीं हैं
निर्बल के बल हैं दो घूँसे!)

जब न राम टस से मस होते,
नहीं बरसते तुम पर रोटी,
सुरुआ-बोटी,
तुम हो अपना भाग्य कोसते,
मन मसोसते,
यही बदा था,
यही लिखा था,
'ह्वैहै वही जो राम रचि राखा,
को करि तर्क बढ़ावै शाखा--'
अंतिम साँसों से रट-रटकर
तुम जाते मर,
लेकिन जीवित भी रहने पर
कब तुम थे मुर्दों से बेहतर!
पच्छिम की है एक कहावत,
इसको सीखो,
इसको धोखो,
गॉड हेल्पस दोज़
हू हेल्प देमसेल्वज़
राम सहायक उनके होते
जो अपने हैं स्वयं सहायक
पूर्व जन्म के
धर्म-कर्म में,
भाग्य मर्म में
इस जीवन का अर्थ न खोजो।
यही कायरों के शरणस्थल,
यहीं छिपा करते हैं निर्बल
यहीं आड़ लेते हैं असफल।

मुझसे सुन लो,
नहीं स्वर्ग से अन्न‍ गिरेगा,
नहीं गिरेगी नभ से रोटी;
किन्तु समझ लो,
इस दुनिया की प्रति रोटी में,
इस दुनिया के हर दाने में,
एक तुम्हारा भाग लगा है,
एक तुम्हाररा निश्चित हिस्सा,
उसे बँटाने,
उसको लेने,
उसे छीनने,
औ' अपनाने
को जो कुछ भी तुम करते हो,
सब कुछ जायज,
सब कुछ रायज।

नए जगत में आँखें खालों,
नए जगगत की चालें देखों,
नहीं बुद्धि से कुछ समझा तो
ठोकर खाकर तो कुछ सीखों,
और भुलाओ पाठ पुराने।

अपना सारा हिस्सा खोकर,
तुम बैठे हो निश्वल होकर
कैसे कायर!
उठो भाग अब अपना माँगो,
बंग देश के भूखो जागो!

घोषित कर दो दिग दिगंत में
भूख नहीं है भीख चाहती,
भूख नहीं है भीख माँगती,
भीख माँगते केवल कादर,
केवल काहिल,
केवल बुजदिल;
भूख बली है,
भूख चली है
अब अपने प्रति न्याय माँगने,
अब अपना अधिकार माँगने,
और न दो तो रार माँगने।

कम पर मत संतोष करो तुम,
होश करो तुम,
कर संतोष कहाँ तुम पहुँचे,
हटते-हटते,
कटते-कटते,
घटते-घटते,
वहाँ जहाँ संतोष मरण है।

संतो ने संतोष सिखाया?
इसी नतीजे पर पहुँचाया
है तुमको तो
मैं कहता हूँ
संत तुम्हारे महा लंठ थे,
पर चालाक तुम्हारे शासक,
पर चालाक तुम्हारे शोषक,
जो दे लंबे-चौड़े चंदे,
करा कीर्तन,
करा हरिभजन,
इन संतों की सरस बानियाँ
हैं तुम पर बरसाते रहते,
शांत रहो तुम,
भ्रांत रहो तुम,
और तुम्हारी आग न जागे,
असंतोष का राग न जागे,
और तुम्हारे मुँह के अंदर
अटका रहे राम का रोड़ा
जिससे मुख से शब्द क्रान्ति का निकल न पाए!

नए जगत में आँखें खोलो,
नए जगत की चालें देखो,
नहीं बुद्धि से कुछ समझा तो
ठोकर खाकर कुछ तो सीखो,
और भुलाओ पाठ पुराने।

मन से अब संतोष हटाओ,
असंतोष का नाद उठाओ,
करो क्रांति का नारा ऊँचा,
भूखों, अपनी भूख बढ़ाओ,
और भूख की ताकत समझो,
हिम्मत समझो,
जुर्रत समझो,
कूवत समझो;
देखो कौन तुम्हासरे आगे
नहीं झुका देता सिर अपना।

याद मुझे हो आई सहसा
एक पते की बात पुरानी,
हुए दस बरस,
जापानी कवि योन नगूची
भारत में था,
देख देश की अकर्मण्यता
उसने यह आदेश किया था--
'यू हैव टु गिव योर पीपुल
दि सेंस ऑफ़ हंगर,
'अपने देश वासियों को है तुम्हें बताना
अर्थ भूख का।'

जबकि पढ़ा था
खूब हँसा था,
जहाँ करोड़ों दिन भर मर-खप
आधा पेट नहीं भर पाते
एक बार भी जो जीवन में
नहीं अघाते,
और जहाँ का नेता-नेता
नहीं भूलता है दुहराना
देता भाषण,
स्टारविंग मिलियन--
भूखे अनगिन,
वहाँ सुनाना
'अपने देश वासियों को है तुम्हें बताना
अर्थ भूख का।'
कितना उपहासास्पद, सच है,
कवि ही ठहरे,
जल्प दिया जो जी में आया।

बीत गए दस बरस देश के,
पड़ा काल बंगाल भूमि पर
और पढ़ा पत्रों में मैंने,
कैसे भूखों के दल के दल
गहना-गुरिया, बर्तन-भाँड़ा
गैया-गोरू, बैल-बछेरू,
बोरी-बँधना, कपड़ा-लत्ता,
ज़र-ज़मीन सब बेच-बाचकर,
पुश्तैनी घर-बार छोड़कर,
चले आ रहे हैं कलकत्ता।

कैसे भूखों के दल के दल
दर-दर मारे-मारे फिरते,
दाने-दाने को बिललाते,
ग्रास-ग्रास के लिए तरसते,
कौर-कौर के लिए तड़पते,
मौत मर रहे हैं कुत्तों की;
अरे नहीं,
कुत्ता भी मरता नहीं इस तरह,
मौत मर रहे हैं कीड़ों की,
या इनसे भी निम्न कोटि की।
(उफ़ मनुष्य के महापतन की
बनी न सीमा!)

और सुना जब मैंने यह भी,
भूखे देखे गए छीनकर
बच्चों से निज रोटी खाते,
या कि बेचते उनको हाटों
में कुछ ताँबे के टुकड़ों पर,
जिससे दो दिन और जिएँ वे
पशु का जीवन,
और फिरें फिर
घूरों पर
कूड़ाखानों पर,
और अधिक गंदी जगहों पर,
उठा दाँत से लेने को यदि--
मानवता को निंदित करते,
लज्जित करते,
मानव को मानव संज्ञा से
वंचित करते......

तब मैंने यह कहा कि हमने
अर्थ भूख का अभी न जाना,
हमें भूख का अर्थ बताना,
भूखों, इसको आज समझ लो,
मरने का यह नहीं बहाना!

फिर से जीवित,
फिर से जाग्रत,
फिर से उन्नत
होने का है भूख निमंत्रण,
है आवाहन।

भूख नहीं दुर्बल, निर्बल है,
भूख सबल है,
भूख प्रबल हे,
भूख अटल है,
भूख कालिका है, काली है,
या काली सर्व भूतेषु
क्षुधा रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,
नमस्तस्यै, नमोनम:!

भूख प्रचंड शक्तिशाली है,
या चंडी सर्व भूतेषु
क्षुधा रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,
नमस्तस्यै, नमोनम:!

भूख अखंड शौर्यशाली है,
या देवी सर्व भूतेषु
क्षुधा रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमोनम:!

भूख भवानी भयावनी है,
अगणित पद, मुख, कर वाली है,
बड़े विशाल उदरवाली है।
भूख धरा पर जब चलती है,
वह डगमग-डगमग हिलती है।
वह अन्याय चबा जाती है,
अन्यायी को खा जाती है,
और निगल जाती है पल में
अन्यायी का दु:सह शासन,
हड़प चुकी अब तक कितने ही
अत्याचारी सम्राटों के
छत्र, किरीट, दंड, सिंहासन!

नहीं यकीन तुम्हें आता है ?
नहीं सुनाई तुम्हें किसीने
कभी फ़्रांस की क्रांति अभी तक ?
भूखों ने की क्रांति वहाँ थी ।

तुम भूखे हो मरनेवाले),
हाथ हाथ पर धरनेवाले,
वे भूखे थे जीनेवाले,
हाथ उठा कुछ करनेवाले
साहस वाले, सीनेवाले ।

बीते बरस एक सौ चौवन,
यह विप्लव विस्फोटक फूटा
फ़्रांस देश में,
जो अनियंत्रित राज शक्ति का
अटल केंद्र था,
अडिग दुर्ग था ।

राजा निज वैभव विलास की
सामग्री संचित करने में,
रम्य महल औ' भव्य भवन के
निर्मित औ' सज्जित करने में,
और महत्वाकांक्षा प्रेरित
समर योजनाओं के ऊपर
बहा रहा था धन ऐसे जैसे हो पानी !

और फ़्रांस की प्रजा विचारी,
प्रजा दुखारी,
दुर्दिन मारी,
यह कर भारी
अदा कर रहीं थी अपने जीवन के रक्त कणों से !

सहने की सीमा आ पहुँची;
बहुत प्रजा ने राजा को समझाना चाहा,
अपना कष्ट बताना चाहा,
पर अभिमानी
करता चला गया मनमानी !

पुरुष निवासी थे पेरिस के,
नहीं वहाँ रहते थे हिजड़े
नहीं वहाँ बसते- थे ज़नखे
जो सारे अत्याचारों को
या अमानुषिक व्यवहारों को
शीश झुकाकर सह लेते हैं ।

क्रोधानल से,
महा प्रबल से
धधक उठी छाती पेरिस की;
एक लपट में राख हो गया
बास्तील का क़िला- पुराना,
जो प्रतीक बन खड़ा हुआ था
राजा की सत्ता-प्रभुत्ता का ।

और दगी यह आग देश के
हर कोने में,
हर गोशे में,
उथल-पुथल मच गई फ़्रांस में,
घोर अराजकता ने अपना पाँव पसारा,
बिखरा शीराज़ा समाज का,
अन्न हो गया गायब सहसा
पेरिस की हाटों-बाटों से,
लगे तड़पने लोग भूख से !

सुनो हाल अब ज़रा उधर का ।
राजा-रानी
तज रजधानी,
ले रक्षक, सेना, सेनानी,
चले गए थे वरसाई को
ग्यारह मील दूर पेरिस से ।

एक मनोहर वनस्थली में
वरसाई गर्विता बसी थी,
ऋद्धि-सिद्धि, संपत्ति, विभव से,
वैभव से सब भाँति लसी थी ।
गुंबद, कलश, धरहरे वाले
नभ-चुंबी प्रासाद खड़े थे,
जिनकें चारों ओर सुशोभित
हरे, घने उद्यान बड़े थे ।
झलक रहा था जहाँ-तहाँ पर
भीलों का नीलम-सा पानी,
करते थे संगीत मनोरम
जिधर-तिधर झरने सैलानी ।
शीतल, मंद, सुगंधित सारी
चिंताओं को हरनेवाला
पवन सदा उसपर बहता था,
मानो वह कहता रहता था--
नहीं यहाँ कोई आएगा
भंग शांति को करनेवाला ।
(कितना था अज्ञान यहाँ पर
कल होनेवाले ऊधम से ! )

जब पेरिस भूखों मरता था
वृद्ध पिता-माता फैलाए
हाथ पुत्र से यह कहते थे,
'बेटा भूख लगी है, रोटी !'
तब वरसाई के शातू में
झाड़ और फ़ानूस सुसज्जित
सबसे बड़े हाल के अंदर
भोज दे रहे थे नृप-दंपति,
होने को शरीक जिसमें थे
सब अमीर-उमरा आमंत्रित ।
(शातू=महल)

जब पेरिस भूखों मरता था,
पत्नी अपने पति के आगे
प्रेम और यौवन का सारा
स्वप्न तथा रोमांस भूलकर
हाथ पसारे यह कहती थी,
"प्यारे भूख लगी है, रोटी",
तब वरसाई के शातू में
हंसी-दिल्लगी और मनोरंजक
गप्पों के फ़ौवारों में,
ह्विस्की, ब्रैंडी, शैम्पेन की
बोतल की बोतल के मुंह से
काग उड़ रहे थे पल-पल पर ।

जब पेरिस भूखों मरता था,
बच्चे माओं के आँचल को
थाम दृगों में आँसू भर-भर,
मचल-मचल, रोते-चिल्लाते
थे कहते, 'मा भूख लगी है,
रोटी लाओ, रोटी लाओ !'
तब वरसाई के शातू में
रंग-बिरंगी वर्दी पहने
चतुर बजनिए झूम-झूमकर
बैंड गहागह बजा रहे थे,
और बिगुल की धुतू-धकर के
झंडों की हर-हर, फर-फर के
बीच अंतनता गर्वित-ग्रीवा
(हुई नाम से निश्चित क़िस्मत)
राज कुंवर को लिए गोद में,
भरी मोद में,
किए लुई को पीछे-पीछे,
घूम रही थी मेहमानों में,
जैसे हो चंदा तारों की भरी सभा में ।
(अंतनता=फ़्रांस के राजा लुई
सोलहवें की पत्नी)

जिधर दृष्टि जाती थी उसकी,
खड़ी कतारें सामंतों की
खड्ग हवा में लहराती थीं,
झहराती थीं,
झनकाती थीं,
चमकाती थीं,
और उठा मदिरा के प्याले,
राज स्वास्थ्य कें लिए उन्हें पी,
राजभक्ति की सौगंधें खाती थीं ।

जब पेरिस भूखों मरता था
बच्चों से लेकर बूढ़े तक
क्षीण हो रहे थे दिन-प्रतिदिन,
तब मेज़ों की जूठन खाकर,
खूब अघाकर
मोटा रहे थे बरसाई कै कुत्ते-कुत्ते ।

एक सबेरे
बेटे ने भूखी मा देखी !
पति ने भूखी पत्नी देखी !
मा ने देखे भूखे बच्चे !
और एक निश्चय से सारा
पेरिस पल में एक हो गया !

सड़क-सड़क से, हाट-हाट से,
गली-गली से, बाट-बाट से,
घर-घर से औ' घाट-घाट से,
दर-दर से औ' दूकानों से,
दफ़्तर से औ' दीवानों से,
होटल से, काफ़ीखानों से,
दूर-दूर से, पास-पास से
एक उठी आवाज और वह
गूँज गई संपूर्ण नगर में--

एलों-एलों, एलों-एलों !
चलो चलें, चलें चलो !
घर छोड़ो, बाहर निकलो !
एलों-एलों !
चलो-चलो !
एलों-एलों !
मिलो-मिलो !
एलों-एलों !
सब मिलकरके साथ चलो !
एलों-एलों !
साथ चलो औ' साथ बढ़ो !
एलों-एलों, एलों-एलों !
साथ बढ़ो औ" साथ रहो,
जो कूछ कहना साथ कहो,
जो कुछ करना साथ करो,
जो कुछ बीते साथ सहो,
साथ जिओ सब, साथ मरो !
एलों-एलों, एलों-एलों !
(एलों(Allons)=आओ चलें)

जो जिसके हथियार लग गया
हाथ वही वह लेकर निकला,
कोई ले बंदूक़ पुरानी,
कोई ले तलवार दुधारी,
कोई बल्लम, कोई फरसा,
कोई बरछी, कोई बरछा,
कोई भाला, कोई नेज़ा,
कोई सीधा, कोई तिरछा,
कोई छुरी और कटारी,
कोई छुरा और भुजाली,
कोई कुल्हरी और कुदाली,
कोई आरा, कोई आरी;
जिनको कुछ न मिला पेड़ों की
शाख लिए हाथों में निकले,
टेढ़ी-मेढ़ी भद्दी, भारी
या पत्थर ईंटे नोकीले !

एक सबेरे
फटे-पुराने कपड़े पहने,
बाल बिखेरे,
बालक, वृद्ध, युवा, नर, नारी
कितने, इनको कौन गिने रे,
क्षीणकाय पर दृढ़ संकल्पी,
सज बेढंगे हथियारों से,
सज बेडौले औज़ारों से,
आसमान में उन्हें उठाते,
उन्हें घुमाते औ' उछालते
हुए इकट्ठा,
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