बाल कविताएँ रामधारी सिंह 'दिनकर' हिन्दी कविता
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रामधारी सिंह दिनकर
Ramdhari Singh Dinkar
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Baal Kavitayen Ramdhari Singh Dinkar

बाल कविताएँ रामधारी सिंह 'दिनकर'

1. सूरज का ब्याह

उड़ी एक अफवाह, सूर्य की शादी होने वाली है,
वर के विमल मौर में मोती उषा पिराने वाली है।

मोर करेंगे नाच, गीत कोयल सुहाग के गाएगी,
लता विटप मंडप-वितान से वंदन वार सजाएगी!

जीव-जन्तु भर गए खुशी से, वन की पाँत-पाँत डोली,
इतने में जल के भीतर से एक वृद्ध मछली बोली-

‘‘सावधान जलचरो, खुशी में सबके साथ नहीं फूलो,
ब्याह सूर्य का ठीक, मगर, तुम इतनी बात नहीं भूलो।

एक सूर्य के ही मारे हम विपद कौन कम सहते हैं,
गर्मी भर सारे जलवासी छटपट करते रहते हैं।

अगर सूर्य ने ब्याह किय, दस-पाँच पुत्र जन्माएगा,
सोचो, तब उतने सूर्यों का ताप कौन सह पाएगा?

अच्छा है, सूरज क्वाँरा है, वंश विहीन, अकेला है,
इस प्रचंड का ब्याह जगत की खातिर बड़ा झमेला है।’’

2. मिर्च का मज़ा

एक काबुली वाले की कहते हैं लोग कहानी,
लाल मिर्च को देख गया भर उसके मुँह में पानी।

सोचा, क्या अच्छे दाने हैं, खाने से बल होगा,
यह जरूर इस मौसम का कोई मीठा फल होगा।

एक चवन्नी फेंक और झोली अपनी फैलाकर,
कुंजड़िन से बोला बेचारा ज्यों-त्यों कुछ समझाकर!

‘‘लाल-लाल पतली छीमी हो चीज अगर खाने की,
तो हमको दो तोल छीमियाँ फकत चार आने की।’’

‘‘हाँ, यह तो सब खाते हैं’’-कुँजड़िन बेचारी बोली,
और सेर भर लाल मिर्च से भर दी उसकी झोली!

मगन हुआ काबुली, फली का सौदा सस्ता पाके,
लगा चबाने मिर्च बैठकर नदी-किनारे जाके!

मगर, मिर्च ने तुरत जीभ पर अपना जोर दिखाया,
मुँह सारा जल उठा और आँखों में पानी आया।

पर, काबुल का मर्द लाल छीमी से क्यों मुँह मोड़े?
खर्च हुआ जिस पर उसको क्यों बिना सधाए छोड़े?

आँख पोंछते, दाँत पीसते, रोते औ रिसियाते,
वह खाता ही रहा मिर्च की छीमी को सिसियाते!

इतने में आ गया उधर से कोई एक सिपाही,
बोला, ‘‘बेवकूफ! क्या खाकर यों कर रहा तबाही?’’

कहा काबुली ने-‘‘मैं हूँ आदमी न ऐसा-वैसा!
जा तू अपनी राह सिपाही, मैं खाता हूँ पैसा।’’

3. चांद का कुर्ता

हठ कर बैठा चाँद एक दिन, माता से यह बोला,
‘‘सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला।

सनसन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूँ,
ठिठुर-ठिठुरकर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूँ।

आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का,
न हो अगर तो ला दो कुर्ता ही कोई भाड़े का।’’

बच्चे की सुन बात कहा माता ने, ‘‘अरे सलोने!
कुशल करें भगवान, लगें मत तुझको जादू-टोने।

जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूँ,
एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूँ।

कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा,
बड़ा किसी दिन हो जाता है, और किसी दिन छोटा।

घटता-बढ़ता रोज किसी दिन ऐसा भी करता है,
नहीं किसी की भी आँखों को दिखलाई पड़ता है।

अब तू ही ये बता, नाप तेरा किस रोज़ लिवाएँ,
सी दें एक झिंगोला जो हर रोज बदन में आए?’’

4. चूहे की दिल्ली-यात्रा

चूहे ने यह कहा कि चूहिया! छाता और घड़ी दो,
लाया था जो बड़े सेठ के घर से, वह पगड़ी दो।
मटर-मूँग जो कुछ घर में है, वही सभी मिल खाना,
खबरदार, तुम लोग कभी बिल से बाहर मत आना!
बिल्ली एक बड़ी पाजी है रहती घात लगाए,
जाने वह कब किसे दबोचे, किसको चट कर जाए।
सो जाना सब लोग लगाकर दरवाजे में किल्ली,
आज़ादी का जश्न देखने मैं जाता हूँ दिल्ली।
चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ,

दिल्ली में देखूँगा आज़ादी का नया जमाना,
लाल किले पर खूब तिरंगे झंडे का लहराना।
अब न रहे, अंग्रेज, देश पर अपना ही काबू है,
पहले जहाँ लाट साहब थे वहाँ आज बाबू है!
घूमूँगा दिन-रात, करूँगा बातें नहीं किसी से,
हाँ फुर्सत जो मिली, मिलूँगा जरा जवाहर जी से।
गाँधी युग में कैन उड़ाए, अब चूहों की खिल्ली?
आज़ादी का जश्न देखने मैं जाता हूँ दिल्ली।
चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ,

पहन-ओढ़कर चूहा निकला चुहिया को समझाकर,
इधर-उधर आँखें दौड़ाईं बिल से बाहर आकर।
कोई कहीं नहीं था, चारों ओर दिशा थी सूनी,
शुभ साइत को देख हुई चूहे की हिम्तत दूनी।
चला अकड़कर, छड़ी लिये, छाते को सिर पर ताने,
मस्ती मन की बढ़ी, लगा चूँ-चूँ करके कुछ गाने!
इतने में लो पड़ी दिखाई कहीं दूर पर बिल्ली,
चूहेराम भगे पीछे को, दूर रह गई दिल्ली।
चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ, चूँ-चूँ-चूँ,

5. पढ़क्‍कू की सूझ

एक पढ़क्‍कू बड़े तेज थे, तर्कशास्‍त्र पढ़ते थे,
जहाँ न कोई बात, वहाँ भी नए बात गढ़ते थे।

एक रोज़ वे पड़े फिक्र में समझ नहीं कुछ न पाए,
"बैल घुमता है कोल्‍हू में कैसे बिना चलाए?"

कई दिनों तक रहे सोचते, मालिक बड़ा गज़ब है?
सिखा बैल को रक्‍खा इसने, निश्‍चय कोई ढब है।

आखिर, एक रोज़ मालिक से पूछा उसने ऐसे,
"अजी, बिना देखे, लेते तुम जान भेद यह कैसे?

कोल्‍हू का यह बैल तुम्‍हारा चलता या अड़ता है?
रहता है घूमता, खड़ा हो या पागुर करता है?"

मालिक ने यह कहा, "अजी, इसमें क्‍या बात बड़ी है?
नहीं देखते क्‍या, गर्दन में घंटी एक पड़ी है?

जब तक यह बजती रहती है, मैं न फिक्र करता हूँ,
हाँ, जब बजती नहीं, दौड़कर तनिक पूँछ धरता हूँ"

कहाँ पढ़क्‍कू ने सुनकर, "तुम रहे सदा के कोरे!
बेवकूफ! मंतिख की बातें समझ सकोगे थोड़े!

अगर किसी दिन बैल तुम्‍हारा सोच-समझ अड़ जाए,
चले नहीं, बस, खड़ा-खड़ा गर्दन को खूब हिलाए।

घंटी टून-टून खूब बजेगी, तुम न पास आओगे,
मगर बूँद भर तेल साँझ तक भी क्‍या तुम पाओगे?

मालिक थोड़ा हँसा और बोला पढ़क्‍कू जाओ,
सीखा है यह ज्ञान जहाँ पर, वहीं इसे फैलाओ।

यहाँ सभी कुछ ठीक-ठीक है, यह केवल माया है,
बैल हमारा नहीं अभी तक मंतिख पढ़ पाया है।

6. बर्र और बालक

सो रहा था बर्र एक कहीं एक फूल पर,
चुपचाप आके एक बालक ने छू दिया

बर्र का स्वभाव,हाथ लगते है उसने तो,
ऊँगली में डंक मार कर बहा लहू दिया

छोटे जीव में भी यहाँ विष की नही कमी है,
टीस से विकल शिशु चीख मार,रो उठा

रोटी को तवे में छोड़ बाहर की और दौड़ी,
रोना सुन माता का ह्रदय अधीर हो उठा

ऊँगली को आँचल से पोछ-तांछ माता बोली,
मेरे प्यारे लाल!यह औचक ही क्या हुआ?

शिशु बोला,काट लिया मुझे एक बर्र ने है,
माता !बस,प्यार से ही मैंने था उसे छूआ

माता बोली,लाल मेरे,खलों का स्वभाव यही,
काटते हैं कोमल को,डरते कठोर से

काटा बर्र ने कि तूने प्यार से छुआ था उसे,
काटता नही जो दबा देता जरा जोर से

7. किसको नमन करूँ मैं भारत?

तुझको या तेरे नदीश, गिरि, वन को नमन करूँ, मैं ?
मेरे प्यारे देश ! देह या मन को नमन करूँ मैं ?
किसको नमन करूँ मैं भारत ? किसको नमन करूँ मैं ?

भू के मानचित्र पर अंकित त्रिभुज, यही क्या तू है ?
नर के नभश्चरण की दृढ़ कल्पना नहीं क्या तू है ?
भेदों का ज्ञाता, निगूढ़ताओं का चिर ज्ञानी है
मेरे प्यारे देश ! नहीं तू पत्थर है, पानी है
जड़ताओं में छिपे किसी चेतन को नमन करूँ मैं ?

तू वह, नर ने जिसे बहुत ऊँचा चढ़कर पाया था;
तू वह, जो संदेश भूमि को अम्बर से आया था।
तू वह, जिसका ध्यान आज भी मन सुरभित करता है;
थकी हुई आत्मा में उड़ने की उमंग भरता है ।
गन्ध -निकेतन इस अदृश्य उपवन को नमन करूँ मैं?
किसको नमन करूँ मैं भारत ! किसको नमन करूँ मैं?

वहाँ नहीं तू जहाँ जनों से ही मनुजों को भय है;
सब को सब से त्रास सदा सब पर सब का संशय है ।
जहाँ स्नेह के सहज स्रोत से हटे हुए जनगण हैं,
झंडों या नारों के नीचे बँटे हुए जनगण हैं ।
कैसे इस कुत्सित, विभक्त जीवन को नमन करूँ मैं ?
किसको नमन करूँ मैं भारत ! किसको नमन करूँ मैं ?

तू तो है वह लोक जहाँ उन्मुक्त मनुज का मन है;
समरसता को लिये प्रवाहित शीत-स्निग्ध जीवन है।
जहाँ पहुँच मानते नहीं नर-नारी दिग्बन्धन को;
आत्म-रूप देखते प्रेम में भरकर निखिल भुवन को।
कहीं खोज इस रुचिर स्वप्न पावन को नमन करूँ मैं ?
किसको नमन करूँ मैं भारत ! किसको नमन करूँ मैं ?

भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है
एक देश का नहीं, शील यह भूमंडल भर का है
जहाँ कहीं एकता अखंडित, जहाँ प्रेम का स्वर है
देश-देश में वहाँ खड़ा भारत जीवित भास्कर है
निखिल विश्व को जन्मभूमि-वंदन को नमन करूँ मैं !

खंडित है यह मही शैल से, सरिता से सागर से
पर, जब भी दो हाथ निकल मिलते आ द्वीपांतर से
तब खाई को पाट शून्य में महामोद मचता है
दो द्वीपों के बीच सेतु यह भारत ही रचता है
मंगलमय यह महासेतु-बंधन को नमन करूँ मैं !

दो हृदय के तार जहाँ भी जो जन जोड़ रहे हैं
मित्र-भाव की ओर विश्व की गति को मोड़ रहे हैं
घोल रहे हैं जो जीवन-सरिता में प्रेम-रसायन
खोर रहे हैं देश-देश के बीच मुँदे वातायन
आत्मबंधु कहकर ऐसे जन-जन को नमन करूँ मैं !

उठे जहाँ भी घोष शांति का, भारत, स्वर तेरा है
धर्म-दीप हो जिसके भी कर में वह नर तेरा है
तेरा है वह वीर, सत्य पर जो अड़ने आता है
किसी न्याय के लिए प्राण अर्पित करने जाता है
मानवता के इस ललाट-वंदन को नमन करूँ मैं !

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का बाल-काव्य
(डा. महेंद्र भटनागर)

‘दिनकर’ जी हिन्दी के उच्च-कोटि के यशस्वी कवि हैं। विषय-वैविध्य उनके काव्य की एक विशेषता है। इसके अतिरिक्त उनके काव्य का स्वरूप भी विविधता लिए हुए है। एक ओर तो उनकी रचनाएँ भाव-धारा की दृष्टि से इतनी गहन हैं तथा साहित्यिक सौन्दर्य से वे इतनी समृद्ध हैं कि उनका आस्वाद्य केवल कुछ विशिष्ट प्रकार के पाठक ही कर सकते; तो दूसरी ओर उनका काव्य इतना सरल-सरस है कि समान्य जनता के हृदय में सुगमता से उतरता चला जाता है। उनके ऐसे ही साहित्य ने देश के नौजवानों में क्रांति की भावना का प्रसार किया था। ऐसी रचनाओं में वे एक जनकवि के रूप में हमारे सम्मुख आते हैं। पर, ‘दिनकर’ जी का काव्य-व्यक्तित्व यहीं तक सीमित नहीं है। उन्होंने किशोर-काव्य और बाल-काव्य भी लिखा है। यह अवश्य है कि परिमाण में ऐसा काव्य अधिक नहीं है तथा इस क्षेत्र में उन्हें अपेक्षाकृत सफलता भी कम मिली है।
बाल-काव्य लिखना कोई बाल-प्रयास नहीं तथा वह इतना आसान भी नहीं। बाल-काव्य के निर्माता का कवि-कर्म पर्याप्त सतर्कता और कौशल की अपेक्षा रखता है। कोई भी प्रगतिशील और स्वस्थ राष्ट्र अपने बच्चों की उपेक्षा नहीं कर सकता। जिस भाषा के साहित्य में बाल-साहित्य का अभाव हो अथवा वह हीन कोटि का हो; तो उस राष्ट्र एवं उस भाषा के साहित्यकारों को जागरूक नहीं माना जा सकता। बच्चे ही बड़े होकर देश की बागडोर सँभालते हैं। वे ही देश के भावी विकास के प्रतीक हैं। उनके हृदय और मस्तिष्क का संस्कार यथासमय होना ही चाहिए।
यह कार्य साहित्य के माध्यम से सर्वाधिक प्रभावी ढंग से होता है। इसके अतिरिक्त साहित्य से बच्चों का स्वस्थ मनोरंजन भी होता है। वह उनकी मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की भी पूर्ति करता है। इससे उनके व्यक्तित्व का समुचित विकास होता है; जो अन्ततोगत्वा राष्ट्र अथवा मनुष्यता को सबल बनाने में सहायक सिद्ध होता है।
जो कवि सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति सचेत हैं तथा जो अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित हैं, प्रतिबद्ध हैं, वे बाल-साहित्य लिखने के लिए भी अवकाश निकाल लेते हैं। विश्व-कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसे अतल-स्पर्शी रहस्यवादी महाकवि ने कितना बाल-साहित्य लिखा है; यह सर्वविदित है। अतः ‘दिनकर’ जी की लेखनी ने यदि बाल-साहित्य लिखा है तो वह उनके महत्त्व को बढ़ाता ही है।
बाल-काव्य विषयक उनकी दो पुस्तिकाएँ प्रकाशित हुई हैं —‘मिर्च का मजा’ और ‘सूरज का ब्याह’। ‘मिर्च का मजा’ में सात कविताएँ और ‘सूरज का ब्याह’ में नौ कविताएँ संकलित हैं। ’मिर्च का मजा’ में एक मूर्ख काबुलीवाले का वर्णन है, जो अपने जीवन में पहली बार मिर्च देखता है। मिर्च को वह कोई फल समझ जाता है —
सोचा, क्या अच्छे दाने हैं, खाने से बल होगा,
यह जरूर इस मौसिम का कोई मीठा फल होगा।
-और जब कुँजड़िन उससे कहती है कि ‘यह तो सब खाते हैं, तो वह चार आने की सेर भर लाल मिर्च ख़रीद लेता है और नदी के किनारे बैठ कर खाने लगता है। खाते ही —
मगर, मिर्च ने तुरंत जीभ पर अपना जोर दिखाया,
मुँह सारा जल उठा और आँखों में जल भर आया।
-यहाँ तक तो ठीक था। पर, चूँकि उस मूर्ख काबुलीवाले ने इन मिर्चों पर चार आने ख़र्च किये हैं; इसलिए वह उन्हें फेंकना ठीक नहीं समझता। उन्हें खाकर ख़त्म कर देना चाहता है। उसका स्पष्ट कथन है कि मैं मिर्च नहीं —’खाता हूँ पैसा’ !
इस प्रकार यह कविता हास्य का सृजन करती है। हास्य का आलम्बन एक मूर्ख व्यक्ति (काबुलीवाला) है। निस्संदेह लोगों की मूर्खता पर हम बराबर हँसते हैं। यह कविता संकलन की प्रथम व प्रमुख कविता है। इसी कविता के शीर्षक पर पुस्तक का नामकरण हुआ है।

मिर्च को देखकर काबुलीवाला कहता है-‘क्या अच्छे दाने हैं।’ यहाँ मिर्च का आकार भी दृष्टव्य है ! ‘खाने से बल होगा’ का अर्थ कि इन ‘दानों’ के खाने से शक्ति बढे़गी ! ‘मौसिम’ शब्द कवि के अरबी के ज्ञान का परिचायक है; जबकि ‘मज़ा’ और ‘ज़रूर’ कवि को रुचिकर नहीं! चवन्नी की एक सेर लाल मिर्च से ज़ाहिर होता है कि यह कविता उस समय की लिखी हुई है जब चीजें बहुत सस्ती रही होंगी। (कविताओं के अन्त में रचना-काल अंकित नहीं है; यद्यपि कुछ कविताओं की विषय-सामग्री से स्पष्ट होता है कि वे स्वातन्त्र्योत्तर काल की हैं।) ‘खर्च हुआ जिस पर उसको क्यों बिना सधाये छोड़ें ?' — में ‘सधाये’ स्थानिक प्रयोग है।

‘पढ़क्कू की सूझ’ की विषय-सामग्री चिर-परिचत है; मात्र उसे पद्यबद्ध किया गया है। इस कविता में ‘मंतिख’ शब्द का प्रयोग है; यद्यपि अन्त में टिप्पणी दे दी गयी है कि ‘मंतिख' तर्कशास्त्र को कहते हैं। ‘चूहे की दिल्ली यात्रा’ और ‘अंगद कुदान’ बाल-मनोविनोद के सर्वाधिक उपयुक्त हैं। ‘अंगद कुदान’ के भी कुछ शब्द-प्रयोग कम प्रचलित हैं; यथा-पंघत (पंगत), आधी नीबू (आधा नीबू), मुस्की (स्थानिक प्रयोग), पिहकारी (पक्षियों के लिए प्रयुक्त होने वाला शब्द; वानरों के लिए प्रयुक्त ) आदि।

‘मामा के लिए आम’ शीर्षक कविता ‘चूहे की दिल्ली यात्रा’ के समान बाल-विनोद की रचना है। इसमें गीदड़ (गीदड़ पांडे !) की चतुराई बतायी गयी है। गीदड़ झूठ बोलने में सफल हो जाता है। झूठ बोलने के कारण उसकी दुर्गति नहीं होती। अतः शैक्षिक प्रभाव बच्चों के अनुकूल नहीं। वे भी गीदड़ के समान चतुर बनना चाहेंगे; झूठ बोलेंगे। गीदड़ को तो झूठ बोलने में लाभ रहा; पर हो सकता है, बच्चों को इसका कुफल भोगना पड़े। ‘झब्बू का परलोक सुधार’ एक मूर्ख चेले का आख्यान है। बिना सोचे-समझे आँखें बंद करके अनुकरण करने वालों पर व्यंग्य। इस प्रकार ‘मिर्च का मजा’ की अधिकांश कविताओं के पात्र मूर्ख हैं तथा इन कविताओं से हास्य की सृष्टि होती है। बालकों का मनोरंजन इस पुस्तिका से सम्भव है। ’सूरज का ब्याह’ की अधिकांश कविताएँ ‘मिर्च का मजा’ की कविताओं के समान हैं। सूरज और उषा के विवाह का प्रंसग ‘सूरज का ब्याह’ में है। इसमें एक वृद्ध मछली का कथन पर्याप्त तर्क-संगत है —
अगर सूर्य ने ब्याह किया, दस-पाँच पुत्र जन्मायेगा
सोचो, तब उतने सूर्यों का ताप कौन सह पायेगा ?
अच्छा है, सूरज क्वाँरा है, वंशहीन, अकेला है,
इस प्रचंड का ब्याह जगत की खातिर बड़ा झमेला है।

‘मेमना और भेड़िया’ में सुरक्षित स्थान पर खड़े मेमने की चुहलबाज़ी बच्चों के लिए रोचक है। ‘चाँद का कुर्ता’ शीर्षक कविता चन्द्रमा की कलाओं को लक्ष्य करके लिखा गया है। प्रस्तुत कविता किंचित उपदेशप्रद है; जो एक तथ्य की बात बच्चों के सम्मुख रखती है। कुत्ता खरगोश को पकड़ नहीं पाता। इस पर कुत्ते का कथन ध्यान देने योग्य है — मैं तो दौड़ रहा था केवल दिन का भोजन पाने
लेकिन, खरहा भाग रहा था अपनी जान बचाने,
कहते हैं सब शास्त्र, कमाओ रोटी जान बचाकर।
पर, संकट में प्राण बचाओ सारी शक्ति लगाकर।

‘ज्योतिषी तारे गिनता था’ का पात्र एक मूर्ख व्यक्ति है। तारे गिनने वाला एक मूर्ख ज्योतिषी कुएँ में गिर पड़ता है। इसलिए ‘चलो मत आँखें मीचे ही, देख लो जब तब नीचे भी’। 'चील का बच्चा’ में चील के बच्चे के ऊधम का उल्लेख है। पर, यह कविता हास्य-विनोद की न होकर कुछ करुण हो गयी है। चील का बच्चा बीमार है। अनेक दवाइयाँ दी गयीं, पर वह ठीक नहीं हुआ। किसी देवता के आशीष की उसे कामना है ; पर कोई देवता उसे आशीष देनेवाला नहीं। क्यों कि —
माँ बोली, ‘ऊधमी! कहाँ पर जाऊँ मैं!
कौन देवता है जिसको गुहराऊँ मैं!
किस चबूतरे पर न चोंच तूने मारी!
चंगुल से तूने न ध्वजा किसकी फाड़ी!
किसकी थाली के प्रसाद का मान रखा?
तूने किसके पिंडे का सम्मान रखा?
किसी देव के पास नहीं मैं जाऊँगी,
जाऊँ तो केवल उलाहना पाऊँगी।
रूठे हैं देवता, न कोई चारा है
ले ईश्वर का नाम कि वही सहारा है।
इस कविता में भी ‘घोंसले’ के लिए ‘खोंते’ शब्द का प्रयोग किया है। इसी प्रकार ‘चतुर सूअर‘ एक आँचलिक शब्द पजाने का प्रयोग है। वह एकांत में जब-तब अपने दाँत पजा लेता है; क्यों कि —
.हँसकर कहा चतुर सूअर ने, ''दुश्मन जब आ जायेगा
दाँत पजाने की फुरसत तो मुझे नहीं दे पायेगा।
इसलिए, जब तक खाली हूँ दाँत पजा धर लेता हूँ,
पेट फाड़ने की दुश्मन का तैयारी कर लेता हूँ !''

‘बर्र और बालक’ का सार निम्नलिखित उपदेश है —
माता बोली, लाल मेरे, खलों का स्वभाव यही,
काटते हैं कोमल को, डरते कठोर से।
काटा बर्र ने कि तूने प्यार से छुआ था उसे,
काटता नहीं जो दबा देता जरा जोर से।

कविता की भूमिका में घटना का उल्लेख कर दिया है ; जो इस प्रकार है —
''अल्लाउद्दीन खिलजी ने जब चित्तौर पर कब्जा कर लिया, तब राणा अजय सिंह अपने भतीजे हम्मीर और बेटों को लेकर अरावली पहाड़ पर कैलवारा के किले में रहने लगे। राजा मुंज ने वहीं उनका अपमान किया था; जिसका बदला हम्मीर ने चुकाया। उस समय हम्मीर की उम्र सिर्फ ग्यारह साल की थी। आगे चलकर हम्मीर बहुत बड़ा योद्धा निकला और उसके हठ के बारे में यह कहावत चल पड़ी कि ‘तिरिया तेल हमीर हठ चढ़ै न दूजी बार।’ इस रचना में ‘दिनकर’ जी का ओजस्वी-तेजस्वी स्वरूप झलका है; क्यों कि इस कविता की विषय-सामग्री उनकी रुचि के अनुरूप थी। ’बालक हम्मीर’ कविता राष्ट्रीय गौरव से परिपूर्ण रचना है। इस कविता की निम्नलिखित पंक्तियाँ पाठक के मन में गूँजती रहती हैं —
धन है तन का मैल, पसीने का जैसे हो पानी,
एक आन को ही जीते हैं इज्जत के अभिमानी।

 
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