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अज्ञेय
Agyeya
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Aisa Koi Ghar Aapne Dekha Hai Agyeya

ऐसा कोई घर आपने देखा है अज्ञेय

कौन खोले द्वार
जहाँ सुख है
कुछ चीज़ें होती हैं जो
तुम मत बोलना
कभी कभी
गलाई
वन-तुलसी
घटा झुक आई
उमड़ मेघ
परस तो गए
बौछार
यह कविता मैं ने उस दिन
गांधारी
वे तो फिर आएँगे
हम ज़रूर जीतेंगे
रक्तबीज
देवासुर
मैत्रेय
फिर गुज़रा वह
चौरा
प्रणाम
जड़ें
आँख को आँख
ओ साँइयाँ
लेडा का हंस
स्वयं जब बोली चिड़िया
प्रतीक्षा
आर्फ़ेउस
कवि का भाग
द्वा सुपर्णा
घर
इसी भीड़ में खोजता हूँ
देहरी पर दिया
नहीं, युलिसीज़
फिर आऊँगा मैं भी
साँझ के सारस
गुफ़ाओं में
चीनी चाय पीते हुए
गूँगे
सुनो मैं ने कहीं हवाओं को
छंद
 
 
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