Hindi Kavita
गोपालदास नीरज
Gopal Das Neeraj
 Hindi Kavita 

Aasavari Gopal Das Neeraj

आसावरी गोपालदास नीरज

1. दीप और मनुष्य

एक दिन मैंने कहा यूँ दीप से
‘‘तू धरा पर सूर्य का अवतार है,
किसलिए फिर स्नेह बिन मेरे बता
तू न कुछ, बस धूल-कण निस्सार है ?’’

लौ रही चुप, दीप ही बोला मगर
‘‘बात करना तक तुझे आता नहीं,
सत्य है सिर पर चढ़ा जब दर्प हो
आँख का परदा उधर पाता नहीं।

मूढ़ ! खिलता फूल यदि निज गंध से
मालियों का नाम फिर चलता कहाँ ?
मैं स्वयं ही आग से जलता अगर
ज्योति का गौरव तुझे मिलता कहाँ ?’’

2. हर दर्पन तेरा दर्पन है

हर दर्पन तेरा दर्पन है, हर चितवन तेरी चितवन है,
मैं किसी नयन का नीर बनूँ, तुझको ही अर्घ्य चढ़ाता हूँ !

नभ की बिंदिया चन्दावाली, भू की अंगिया फूलोंवाली,
सावन की ऋतु झूलोंवाली, फागुन की ऋतु भूलोंवाली,
कजरारी पलकें शरमीली, निंदियारी अलकें उरझीली,
गीतोंवाली गोरी ऊषा, सुधियोंवाली संध्या काली,
हर चूनर तेरी चूनर है, हर चादर तेरी चादर है,
मैं कोई घूँघट छुऊँ, तुझे ही बेपरदा कर आता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है !!

यह कलियों की आनाकानी, यह अलियों की छीनाछोरी,
यह बादल की बूँदाबाँदी, यह बिजली की चोराचारी,
यह काजल का जादू-टोना, यह पायल का शादी-गौना,
यह कोयल की कानाफूँसी, यह मैना की सीनाज़ोरी,
हर क्रीड़ा तेरी क्रीड़ा है, हर पीड़ा तेरी पीड़ा है,
मैं कोई खेलूँ खेल, दाँव तेरे ही साथ लगाता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है !!

तपसिन कुटियाँ, बैरिन बगियाँ, निर्धन खंडहर, धनवान महल,
शौकीन सड़क, गमग़ीन गली, टेढ़े-मेढ़े गढ़, गेह सरल,
रोते दर, हँसती दीवारें नीची छत, ऊँची मीनारें,
मरघट की बूढ़ी नीरवता, मेलों की क्वाँरी चहल-पहल,
हर देहरी तेरी देहरी है, हर खिड़की तेरी खिड़की है,
मैं किसी भवन को नमन करूँ, तुझको ही शीश झुकाता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है !!

पानी का स्वर रिमझिम-रिमझिम, माटी का रव रुनझुन-रुनझुन,
बातून जनम की कुनुनमुनुन, खामोश मरण की गुपुनचुपुन,
नटखट बचपन की चलाचली, लाचार बुढ़ापे की थमथम,
दुख का तीखा-तीखा क्रन्दन, सुख का मीठा-मीठा गुंजन,
हर वाणी तेरी वाणी है, हर वीणा तेरी वीणा है,
मैं कोई छेड़ूँ तान, तुझे ही बस आवाज़ लगाता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है !!

काले तन या गोरे तन की, मैले मन या उजले मन की,
चाँदी-सोने या चन्दन की, औगुन-गुन की या निर्गुन की,
पावन हो या कि अपावन हो, भावन हो या कि अभावन हो,
पूरब की हो या पश्चिम की, उत्तर की हो या दक्खिन की,
हर मूरत तेरी मूरत है, हर सूरत तेरी सूरत है,
मैं चाहे जिसकी माँग भरूँ, तेरा ही ब्याह रचाता हूँ !
हर दर्पन तेरा दर्पन है!!

3. अधिकार सबका है बराबर

फूल पर हँसकर अटक तो, शूल को रोकर झटक मत,
ओ पथिक ! तुझ पर यहाँ अधिकार सबका है बराबर !

बाग़ है ये, हर तरह की वायु का इसमें गमन है,
एक मलयज की वधू तो एक आँधी की बहन है,
यह नहीं मुमकिन कि मधुऋतु देख तू पतझर न देखे,
कीमती कितनी कि चादर हो पड़ी सब पर शिकन है,
दो बरन के सूत की माला प्रकृति है, किन्तु फिर भी-
एक कोना है जहाँ श्रृंगार सबका है बराबर !

फूल पर हँसकर अटक तो, शूल को रोकर झटक मत,
ओ पथिक ! तुझ पर यहाँ अधिकार सबका है बराबर !

कोस मत उस रात को जो पी गई घर का सबेरा,
रूठ मत उस स्वप्न से जो हो सका जग में न तेरा,
खीज मत उस वक्त पर, दे दोष मत उन बिजलियों को-
जो गिरीं तब-तब कि जब-जब तू चला करने बसेरा,
सृष्टि है शतरंज औ’ हैं हम सभी मोहरे यहाँ पर
शाह हो पैदल कि शह पर वार सबका है बराबर !

फूल पर हँसकर अटक तो, शूल को रोकर झटक मत,
ओ पथिक ! तुझ पर यहाँ अधिकार सबका है बराबर !

है अदा यह फूल की छूकर उँगलियाँ रूठ जाना,
स्नेह है यह शूल का चुभ उम्र छालों की बढ़ाना,
मुश्किलें कहते जिन्हें हम राह की आशीष है वह,
और ठोकर नाम है-बेहोश पग को होश आना,
एक ही केवल नहीं, हैं प्यार के रिश्ते हज़ारों
इसलिए हर अश्रु को उपहार सबका है बराबर !

फूल पर हँसकर अटक तो, शूल को रोकर झटक मत,
ओ पथिक ! तुझ पर यहाँ अधिकार सबका है बराबर !

देख मत तू यह कि तेरे कौन दाएँ कौन बाएँ,
तू चलाचल बस कि सब पर प्यार की करता हवाएँ,
दूसरा कोई नहीं, विश्राम है दुश्मन डगर पर,
इसलिए जो गालियाँ भी दे उसे तू दे दुआएँ,
बोल कड़ुवे भी उठा ले, गीत मैले भी धुला ले,
क्योंकि बगिया के लिग गुंजार सबका है बराबर !

फूल पर हँसकर अटक तो, शूल को रोकर झटक मत,
ओ पथिक ! तुझ पर यहाँ अधिकार सबका है बराबर !

एक बुलबुल का जला कल आशियाना जब चमन में,
फूल मुस्काते रहे, छलका न पानी तक नयन में,
सब मगन अपने भजन में, था किसी को दुख न कोई,
सिर्फ़ कुछ तिनके पड़े सिर धुन रहे थे उस हवन में,
हँस पड़ा मैं देख यह तो एक झरता पात बोला-
‘‘हो मुखर या मूक हाहाकार सबका है बराबर !’’

फूल पर हँसकर अटक तो, शूल को रोकर झटक मत,
ओ पथिक ! तुझ पर यहाँ अधिकार सबका है बराबर !

4. यदि वाणी भी मिल जाए दर्पण को

सुन्दरता ख़ुद से ही शरमा जाए
यदि वाणी भी मिल जाए दर्पण को !

खुबसूरत है हर फूल मगर उसका
कब मोल चुका पाया है सब मधुबन ?
जब प्रेम समर्पण देता है अपना
सौन्दर्य तभी करता है निज दर्शन,

अर्पण है सृजन और रुपान्तर भी,
पर अन्तर-योग बिना है नश्वर भी,
सच कहता हूँ हर मूरत बोल उठे
दो अश्रु हृदय दे दे यदि पाहन को !

सुन्दरता ख़ुद से ही शरमा जाए
यदि वाणी भी मिल जाए दर्पण को।

सौ बार भरी गगरी आ बादल ने
प्यासी पुतली यह किन्तु रही प्यासी,
साँसों ने जाने कैसा शाप दिया
बन गई देह हर मरघट की दासी

दुख ही दुख है जग में सब ओर कहीं,
लेकिन सुख का यह कहना झूठ नहीं,
‘सब की सब सृष्टि खिलौना बन जाए
यदि नज़र उमर की लगे न बचपन को !’

सुन्दरता ख़ुद से ही शरमा जाए
यदि वाणी मिल जाए दर्पण को !

रुक पाई अपनी हँसी न कलियों से
दुनिया ने लूट इसी से ली बगिया
इस कारण कालिख मुख पर मली गई
बदशक्ल रात पर मरने लगा दिया,

तुम उसे गालियाँ दो, कुछ बात नहीं
लेकिन शायद तुमको यह ज्ञात नहीं,
आदमी देवता ही होता जग में
भावुकता अगर न मिलती यौवन को !

सुन्दरता ख़ुद से ही शरमा जाए !
यदि वाणी भी मिल जाए दर्पण को !

है धूल बहुत नाचीज़ मगर मिटकर
दे गई रूप अनगिन प्रतिमाओं को,
पहरेदारी में किसी घोंसले की
तिनके ने रक्खा क़ैद हवाओं को,

निर्धन दुर्बल है, सबका नौकर है
और धन हर मठ-मन्दिर का ईश्वर है
लेकिन मुश्किलें बहुत कम हो जाएँ
यदि कंचन कहे ग़रीब न रजकण को !

सुन्दरता ख़ुद से ही शरमा जाए
यदि वाणी भी मिल जाए दर्पण को !

चन्दन की छाँव रहे विषधर लेकिन
मर पाया ज़हर न उनके बोलों का,
पर पिया पिया का राग पपीहे को
आ सिखला गया वियोग बादलों को,

चाहे सागर को कंगन पहनाओ-
चाहे नदियों की चूनर सिलवाओ,
उतरेगा स्वर्ग तभी इस धरती पर
जब प्रेम लिखेगा ख़त परिवर्तन को !

सुन्दरता ख़ुद से ही शरमा जाए
यदि वाणी भी मिल जाए दर्पण को !

5. ओ प्यासे अधरोंवाली

ओ प्यासे अधरोंवाली ! इतनी प्यास जगा
बिन जल बरसाए यह घनश्याम न जा पाए !

गरजी-बरसीं सौ बार घटाएँ धरती पर
गूँजी मल्हार की तान गली-चौराहों में
लेकिन जब भी तू मिली मुझे आते-जाते
देखी रीती गगरी ही तेरी बाँहों में,

सब भरे-पुरे तब प्यासी तू,
हँसमुख जब विश्व, उदासी तू,

ओ गीले नयनोंवाली ! ऐसे आँज नयन
जो नज़र मिलाए तेरी मूरत बन जाए !

ओ प्यासे अधरोंवाली ! इतनी प्यास जगा
बिन जल बरसाए यह घनश्याम न जा पाए !

रेशम के झूले डाल रही है झूल धरा
आ आ कर द्वार बुहार रही है पुरवाई,
लेकिन तू धरे कपोल हथेली पर बैठी
है याद कर रही जाने किसकी निठुराई,

जब भरी नदी तू रीत रही,
जी उठी धरा, तू बीत रही,

ओ सोलह सावनवाली ! ऐसे सेज सजा
घर लौट न पाए जो घूँघट से टकराए !

ओ प्यासे अधरोंवाली ! इतनी प्यास जगा
बिन जल बरसाए यह घनश्याम न जा पाए !

पपीहे के कंठ पिया का गीत थिरकता है,
रिमझिम की वंशी बजा रहा घनश्याम झुका,
है मिलन प्रहर नभ-आलिंगन कर रही भूमि
तेरा ही दीप अटारी में क्यों चुका चुका,

तू उन्मन जब गुंजित मधुबन,
तू निर्धन जब बरसे कंचन,

ओ चाँद लजानेवाली ! ऐसे दीप जला
जो आँसू गिरे सितारा बनकर मुस्कराए !

ओ प्यासे अधरोंवाली ! इतनी प्यास जगा
बिन जल बरसाए यह घनश्याम न जा पाए !

बादल खुद आता नहीं समुन्दर से चलकर
प्यास ही धरा की उसे बुलाकर लाती है,
जुगनू में चमक नहीं होती, केवल तम को
छूकर उसकी चेतना ज्वाल बन जाती है,

सब खेल यहाँ पर है धुन का,
जग ताना-बाना है गुन का,

ओ सौ गुनवाली ! ऐसी धुन की गाँठ लगा
सब बिखरा जल सागर बन बनकर लहराए !

ओ प्यासे अधरोंवाली ! इतनी प्यास जगा
बिन जल बरसाए यह घनश्याम न जा पाए !

6. कोई मोती गूँथ सुहागिन

कोई मोती गूँथ सुहागिन ! तू अपने गलहार में
मगर बिदेसी रूप न बंधनेवाला है सिंगार में!

एक हवा का झोंका जीवन, दो क्षण का मेहमान है
अरे ठहरना कहाँ यहाँ गिरवी हर एक मकान है,
व्यर्थ सुनहरी घूप और यह व्यर्थ रुपहरी चाँदिनी
हर प्रकाश के साथ किसी अँधियारे की पहचान है,
चमकीली चोली-चुनरी पर मत इतरा यूँ साँवरी!
सबको चादर यहाँ एक-सी मिलती चलती बार में!

कोई मोती गूँथ सुहागिन ! तू अपने गलहार में
मगर बिदेसी रूप न बंधनेवाला है सिंगार में!

ये गुलाब से गाल इन्हें ऋण देना है पतझार का,
चढ़ती हुई उमर पर पानी है मौसमी फुहार का,
अधरों को यह वंशी जो चुम्बन के गीत सुना रही
होगी कल ख़ामोश उठेगा डोला जब उस पार का,
दर्पण में मुख देख देख मत अपनी छवि यर रीझ यूँ
पड़ती जाती है दरार छिन छिन तन की दीवार में ।

कोई मोती गूँथ सुहागिन ! तू अपने गलहार में
मगर बिदेसी रूप न बंधनेवाला है सिंगार में!

श्यामल यमुना से केशों में गंगा करती वास है,
भोगी अंचल की छाया में सिसक रहा संन्यास है,
म्हावर-मेंहदी, काजल-कंघी गर्व तुझे जिन पर बड़ा
मुट्ठी-भर मिट्टी ही केवल इन सबका इतिहास है,
नटखट लट का नाग जिसे तू भाल बिठाए घूमती
अरी! एक दिन तुझको ही डस लेगा भरे बजार में ।

कोई मोती गूँथ सुहागिन ! तू अपने गलहार में
मगर बिदेसी रूप न बंधनेवाला है सिंगार में!

कल जिस ठौर खड़ी थी दुनिया आज नहीं उस ढाँव है,
जिस आँगन थी धूप सुबह, उस आँगन में अब छाँव है,
प्रतिपल नूतन जन्म यहाँ पर प्रतिपल नूतन मृत्यु है,
देख आँख मलते-मलते ही बदल गया सब गाँव है,
रूप-नदी-तट तू क्या अपना मुखड़ा मल-मल धो रही
है न दूसरी बार नहाना संभव बहती धार में !

कोई मोती गूँथ सुहागिन ! तू अपने गलहार में
मगर बिदेसी रूप न बंधनेवाला है सिंगार में!

जब तक डूबे सूर्य सबेरा ब्याहा जाए शाम से,
तब तक गोरी माथे बिंदिया जड़ ले तू आराम से,
मुंदते ही पलकें सूरज की उठते ही दिन की सभा
सब को फुरसत यहाँ मिलेगी अपने-अपने काम से,
बहक उठा है चाँद और यह महक उठी है चाँदनी
देख प्यार की रितु न बीत जाए इस भरी बहार में!
कोई मोती गूँथ सुहागिन ! तू अपने गलहार में
मगर बिदेसी रूप न बंधनेवाला है सिंगार में!

7. विदा-क्षण आ पहुंचा

जब तक कुछ अपनी कहूँ, सुनूँ जग के मन की
तब तक ले डोली द्वार विदा-क्षण आ पहुंचा !

फूटे भी तो थे बोल न श्वास कुमारी के
गीतोंवाली इकतारा गिरकर टूट गया,
हो भी न सका था परिचय दृग का दर्पन से
काजल आँसू बनकर छलका औ" छूट गया,

तन भींगा, मन भींगा, कण-कण, तृण-तृण भींगा,
देहरी-द्वारा, आंगन-उपवन, त्रिभुवन भींगा,
जब तक मैं दीप जलाऊँ कुटिया के द्वारे
तब तक बरसात मचाता सावन आ पहुंचा!
जब तक कुछ अपनी कहूँ, सुनूँ जग के मन की
तब तक ले डोली द्वार विदा-क्षण आ पहुंचा !

रह गये धरे के धरे ताक में ज्ञान-ग्रन्थ,
छुट गई बँधी की बँधी रतनवाली गठरी
लुट गई सजी की सजी रूप की हाट और
देखती खड़ी की खड़ी रही सिगरी नगरी,

कुछ ऐसी लूट मची जीवन चौराहे पर,
खुद को ही खुद लूटने लगा हर सौदागर,
औ' जब तक कोई आए हमको समझाए
तब तक भुगताने ब्याज महाजन आ पहुंचा!

जब तक कुछ अपनी कहूँ, सुनूँ जग के मन की
तब तक ले डोली द्वार विदा-क्षण आ पहुंचा !

आँसू ने दी आवाज तनिक रुक निर्मोही,
सिन्दूर तड़प बोला अब कहाँ मिलन होगा,
अलकों ने कहा ज़रा यह लट तो सहला जा
क्या ठीक कि सपनों का गौना किस दिन होगा !

सिंगार सिसकता रहा, बिलखता रहा हिया,
दुहराता रहा गगन से चातक 'पिया पिया',
पर जब तक कोई टेर कहीं पहुंचे तब तक
हर कोलाहल का हल सूनापन आ पहुंचा!

जब तक कुछ अपनी कहूँ, सुनूँ जग के मन की
तब तक ले डोली द्वार विदा-क्षण आ पहुंचा !

बाँहों ने बाँहों को बढ़कर छूना चाहा,
अधरों ने अधरों से मिलने को शोर किया,
आँखें आँखों में खो जाने को मचल पड़ीं
प्राणों ने प्राणों के हित तन झकझोर दिया,

सब ने खींचातानी की, आनाकानी की,
अपनी-अपनी कमज़ोरी की अगवानी की,
पर जब तक पहुंचे प्यास तृप्ति के दरवाज़े
तब तक प्याले का अमृत गरल बन आ पहुंचा !

जब तक कुछ अपनी कहूँ, सुनूँ जग के मन की
तब तक ले डोली द्वार विदा-क्षण आ पहुंचा !

! कल सुबह एक मनिहारिन मेले में बैठी
थी बेच रही चूड़ियाँ हज़ारों चालों की,
इकरंगी-दोरंगी, भाँवर की, गौने की
ब्याही अनब्याही सभी कलाईवालों की,

कौतूहलवश मैंने भी चाहा, मैं अपनी
घरनी के लिए ले चलूँ चूड़ी सितवर्णी,
पर जब तक मैं कुछ मोल करूँ उससे तब तक
खुद मुझे खोजता कोई कंगन आ पहुंचा!

जब तक कुछ अपनी कहूँ, सुनूँ जग के मन की
तब तक ले डोली द्वार विदा-क्षण आ पहुंचा !

8. बसंत की रात

आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना ।

धूप बिछाए फूल–बिछौना,
बग़िया पहने चांदी–सोना,
कलियां फेंके जादू–टोना,
महक उठे सब पात,
हवन की बात न करना
आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना ।

बौराई अंबवा की डाली,
गदराई गेहूं की बाली,
सरसों खड़ी बजाए ताली,
झूम रहे जल–पात,
शयन की बात न करना
आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना।

खिड़की खोल चंद्रमा झाँके,
चुनरी खींच सितारे टाँके,
मन करूं तो शोर मचाके,
कोयलिया अनखात,
गहन की बात न करना
आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना।

निंदिया बैरिन सुधि बिसराई,
सेज निगोड़ी करे ढिठाई,
तान मारे सौत जुन्हाई,
रह–रह प्राण पिरात,
चुभन की बात न करना
आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना।

यह पीली चूनर, यह चादर,
यह सुंदर छवि, यह रस–गागर,
जनम–मरण की यह रज–कांवर,
सब भू की सौग़ात,
गगन की बात न करना
आज बसंत की रात,
गमन की बात न करना।

९ मार्च २००६

9. प्यार न होगा

जग रूठे तो बात न कोई
तुम रूठे तो प्यार न होगा !

मणियों में तुम ही तो कौस्तुभ
तारों में तुम ही तो चन्दा,
नदियों में तुम ही तो गंगा
गन्धों में तुम ही निशिगन्धा,

दीपक में जैसे लौ-बाती,
तुम प्राणों के संग-संगाती,
तन बिछुड़े तो बात न कोई
तुम बिछुड़े सिंगार न होगा।

जग रूठे तो बात न कोई
तुम रूठे तो प्यार न होगा।

व्योम नहीं यह, भाल तुम्हारा
धरा नहीं है धूल चरण की,
सृष्टि नहीं यह लीला केवल-
सृजन-प्रलय की प्रलय-सृजन की,

तन का, मन का, जग-जीवन का
तुमसे ही नाता इन-उन का,
हम न रहें तो बात न कोई
तुम न रहे संसार न होगा।

जग रूठे तो बात न कोई
तुम रूठे तो प्यार न होगा।

पूनम गौर कपोल बिराजे
अधर हँसें ऊषा अरुणीली,
कुन्तल-लट से लिपटी संध्या
श्यामा अंजन-रेख नशीली,

सरि-सागर, दिशि भू-अम्बर
तुमसे ही द्युतिमान चराचर,
रवि न उगे तो बात न कोई
तुम न उगे उजियार न होगा।
जग रूठे तो बात न कोई
तुम रूठे तो प्यार न होगा।

तुम बोले संगीत जी गया,
तुम चुप हुए, हुई चुप वाणी,
तुम विहँसे मधुमास हँस उठा,
तुम रोये रो उठा हिमानी,

जन्म विरह-दिन, मरण मिलन-क्षण,
तुम ही दोनों पर्व चिरन्तन,
दृग न दिखें तो बात न कोई,
तुम न दिखे दरबार न होगा !

जग रूठे तो बात न कोई
तुम रूठे तो प्यार न होगा !

तुमसे लागी प्रीति, बिना-
भाँवर दुलहिन हो गई सुहागिन,
तुमसे हुआ विछोह, मृत्तिका-
की वन्दिन हो गई अनादिन,

निपट-बिचारी, निपट-दुखारी,
बिना तुम्हारे राजकुमारी,
मुक्ति न मिले, न कोई चिन्ता,
तुम न मिले भव पार न होगा।

जग रूठे तो बात न कोई,
तुम रूठे तो प्यार न होगा।

10. दूर नहीं हो

तन से तो सब भाँति विलग तुम
लेकिन मन से दूर नहीं हो!

हाथ न परसे चरण सलौने,
पाँव न जानी गैल तुम्हारी,
दृगन न देखी बाँकी चितवन,
अधर न चूमी लट कजरारी,

चिकने-खुदरे, गोरे-काले,
छलकन और बेछलकन वाले,
घट को तो तुम निपट निगुण पर,
पनिहारिन से दूर नहीं हो!

तन से तो सब भाँति विलग तुम
लेकिन मन से दूर नहीं हो!

जुड़े न पंडित, सजी न वेदी,
वचन न हुए, न मन्त्र उचारे,
जनम-जनम को किन्तु वधू यह
हाथ बिकी बेमोल तुम्हारे,

झूठे-सच्चे, कच्चे-पक्के,
रिश्ते जितने दुनिया भर के,
सबसे तो तुम मुक्त, प्रेम-
के वृन्दावन से दूर नहीं हो!

तन से तो सब भाँति विलग तुम
लेकिन मन से दूर नहीं हो!

रचते-रचते चित्र उड़े रंग,
शब्द थके लिख-लिख परिभाषा,
गढ़-गढ़ मूरत माटी हारी,
ख़त्म न लेकिन खेल तमाशा,

कब तक और छिपोगे बोले,
अब तो मन्दिर के पट खोले,
भले भजन से दूर मगर तुम
हठी रुदन से दूर नहीं हो !

तन से तो सब भाँति विलग तुम
लेकिन मन से दूर नहीं हो!

11. पाती तक न पठाई

ऐसी सुधि बिसराई
कि पाती तक न पठाई।

बरखा गई मिलन-ऋतु बीती,
घोर घटा घहरी मन-चीती,
पर गागर रीती की रीती,
अधरों बूंद न आई
प्यास से प्यास बुझाई।

ऐसी सुधि बिसराई
कि पाती तक न पठाई।

रोज़ उड़ाए काग सवेरे,
रोज़ पुराये चौक-घनेरे,
कभी अँधेरे, कभी उजेरे,
पथ-पथ धूल रमाई,
हुई सब लोक हँसाई।

ऐसी सुधि बिसराई
कि पाती तक न पठाई।

बहकी बगियाँ, महकी कलियाँ
गूंजे आँगन, झूमीं गलियाँ,
खुलीं न मेरी किन्तु किवरियाँ,
साँकल कौन लगाई
कि खोलत उमर सिराई।

ऐसी सुधि बिसराई
कि पाती तक न पठाई।

मन की कुटिया सूनी-सूनी,
देह बनी चन्दन की धूनी,
बहुत हुई प्रिय ! आँख-मिचौनी,
अब तो हो सुनवाई
सुबह संध्या बन आई।

ऐसी सुधि बिसराई
कि पाती तक न पठाई।

12. धनियों के तो धन हैं लाखों

धनियों के तो धन हैं लाखों
मुझ निर्धन के धन बस तुम हो!

कोई पहने माणिक-माला
कोई लाल जुड़ावे
कोई रचे महावर मेंहदी
मुतियन मांग भरावे

सोने वाले चांदी वाले
पानी वाले पत्थर वाले
तन के तो लाखों सिंगार हैं
मन के आभूषण बस तुम हो!

धनियों के तो धन हैं लाखों
मुझ निर्धन के धन बस तुम हो!

कोई जावे पुरी द्वारिका
कोई ध्यावे काशी
कोई तपे त्रिवेणी संगम
कोई मथुरा वासी

उत्तर-दक्खिन, पूरब-पच्छिम
भीतर बाहर, सब जग जाहर
संतों के सौ-सौ तीरथ हैं
मेरे वृन्दावन बस तुम हो!

धनियों के तो धन हैं लाखों
मुझ निर्धन के धन बस तुम हो!

कोई करे गुमान रूप पर
कोई बल पर झूमे
कोई मारे डींग ज्ञान की
कोई धन पर घूमे

काया-माया, जोरू-जाता
जस-अपजस, सुख-दुःख, त्रिय-तापा
जीता मरता जग सौ विधि से
मेरे जन्म-मरण बस तुम हो!

धनियों के तो धन हैं लाखों
मुझ निर्धन के धन बस तुम हो!

13. स्वप्न झरे फूल से

स्वप्न झरे फूल से,
मीत चुभे शूल से,
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से,
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे!

नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठें कि राह रथ निकल गई,
पात-पात झर गए कि शाख-शाख जल गई,
फाँस तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्रु बन चले,
छन्द हो हवन चले,
साथ के सभी दिए धुआँ पहन-पहन चले,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके रुके,
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे,
कारवाँ गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे!

(नींद भी खुली न थी कि हाय धूप ढल गई,
पाँव जब तलक उठे कि ज़िन्दगी फिसल गई,
पात-पात झर गये कि शाख़-शाख़ जल गई,
चाह तो निकल सकी न, पर उमर निकल गई,
गीत अश्क़ बन गए,
छंद हो दफ़न गए,
साथ के सभी दिऐ धुआँ-धुआँ पहन गये,
और हम झुके-झुके,
मोड़ पर रुके-रुके
उम्र के चढ़ाव का उतार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे।)

क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार का उठा,
क्या सुरूप था कि देख आईना सिहर उठा,
इस तरफ जमीन और आसमाँ उधर उठा,
थामकर जिगर उठा कि जो मिला नजर उठा,
एक दिन मगरछली-
वह-हवा यहाँ चली
लुट गई कली-कली कि घुट गई गली-गली
और हम दबी नजर,
देह की दुकान पर,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे,
कारवाँ गुजर गया, गुबार देखते रहे!

(क्या शबाब था कि फूल-फूल प्यार कर उठा,
क्या सुरूप था कि देख आइना मचल उठा
इस तरफ जमीन और आसमां उधर उठा,
थाम कर जिगर उठा कि जो मिला नज़र उठा,
एक दिन मगर यहाँ,
ऐसी कुछ हवा चली,
लुट गयी कली-कली कि घुट गयी गली-गली,
और हम लुटे-लुटे,
वक्त से पिटे-पिटे,
साँस की शराब का खुमार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे।)

आँख थी मिली मुझे कि अश्रु-अश्रु बीन लूँ,
होंठ थे खुले कि चूम हर नज़र हसीन लूँ,
दर्द था दिया गया कि प्यार से यक़ीन लूँ,
और गीत यूँ कि रात से चिराग़ छीन लूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि ढह गए क़िले बिखर-बिखर,
और हम लुटे-लुटे,
वक्त से पिटे-पिटे,
दाम गाँठ के गँवा, बज़ार देखते रहे,
कारवाँ गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे!

(हाथ थे मिले कि जुल्फ चाँद की सँवार दूँ,
होंठ थे खुले कि हर बहार को पुकार दूँ,
दर्द था दिया गया कि हर दुखी को प्यार दूँ,
और साँस यूँ कि स्वर्ग भूमी पर उतार दूँ,
हो सका न कुछ मगर,
शाम बन गई सहर,
वह उठी लहर कि दह गये किले बिखर-बिखर,
और हम डरे-डरे,
नीर नयन में भरे,
ओढ़कर कफ़न, पड़े मज़ार देखते रहे
कारवां गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे!)

माँग भर चली कि एक, जब नई-नई किरन,
ढोलकें धुमुक उठीं, ठुमक उठे चरण-चरण,
शोर मच गया कि लो चली दुल्हन, चली दुल्हन,
गाँव सब उमड़ पड़ा, बहक उठे नयन-नयन,
पर तभी ज़हर भरी,
ग़ाज एक वह गिरी,
पुंछ गया सिंदूर तार-तार हुई चूनरी,
और हम अजान से,
दूर के मकान से,
पालकी लिये हुए कहार देखते रहे।
कारवां गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे।

एक रोज एक गेह चाँद जब नया उगा,
नौबतें बजीं, हुई छटी, डठौन, रतजगा,
कुँडली बनी कि जब मुहूर्त पुन्यमय लगा,
इसलिए कि दे सके न मृत्यु जन्म को दग़ा,
एक दिन न पर हुआ,
उड़ गया पला सुआ,
कुछ न कर सके शकुन, न काम आ सकी दुआ,
और हम डरे-डरे,
नीर नैन में भरे,
ओढ़कर कफन पड़े मजार देखते रहे,
चाह थी न, किंतु बार-बार देखते रहे,
कारवाँ गुज़र गया, ग़ुबार देखते रहे!

14. हम सब खिलौने हैं

हम सब खिलौने हैं!
ढीठ काल-बालक के हाथों में
फूलों के बेहिसाब दौने हैं!
हम सब खिलौने हैं!

जन्मों के निर्दयी कुम्हार ने
साँसों के चाकों पर हमको चढ़ाया है,
तरह-तरह माटी ने रूंदा है जब
तब यह अनूप रूप हमको मिल पाया है,
सब को हम मनहर हैं,
ऊपर से बहुत-बहुत सुन्दर हैं,
लेकिन हम भीतर से रिक्त और बौने हैं!
हम सब खिलौने हैं!!

हम से हर मेले की शान है,
हम से नुमायश हर लगती है,
हमसे हर आंगन बहलता है,
हम से दुनिया की हर एक दुकान सजती है,
लेकिन इतने पर भी
ये सब गुण रखकर भी,
हम मरण-ग्राहक के वास्ते बिछाये निज
बिछौने हैं!
हम सब खिलौने हैं!!

स्वत्व है हमारा बस इतना ही
कोई भी हम से आ खेले,
औ' खेल-खेल में ही हमें तोड़ दे,
गेह-गाँव-नगर वही अपना है,
वक्त का खिलाड़ी हमें जाके जहाँ छोड़ दे,
यद्यपि हम धूलि हैं, बिकते हैं,
नाशवान होने से घिसते हैं,
चुकते हैं
लेकिन हम हैं तो सब खेल यहाँ बार-बार
होने हैं !
क्योंकि हम सब खिलौने हैं!

15. ओ प्यासे

हर घट से अपनी प्यास बुझा मत ओ प्यासे!
प्याला बदले तो मधु ही विष बन जाता है!

हैं तरह-तरह के फूल धूल की बगिया में
लेकिन सब ही आते पूजा के काम नहीं,
कुछ में शोख़ी है, कुछ में केवल रूप रंग
कुछ हँसते सुबह मगर मुस्काते शाम नहीं,

दुनिया है एक नुमायश सीरत–सूरत की
होती है क़ीमत मगर नहीं हर मूरत की
हर सुन्दर शीशे को मत अश्रु दिखा अपने,
सौन्दर्य न अपनाता, केवल शरमाता है!

हर घट से अपनी प्यास बुझा मत ओ प्यासे!
प्याला बदले तो मधु ही विष बन जाता है!

पपिहे पर वज्र गिरे, फिर भी उसने अपनी
पीड़ा को किसी दूसरे जल से नहीं कहा,
लग गया चाँद को दाग़, मगर अब तक निशि का
आँगन तज कर वह और न जा कर कहीं रहा,

हर एक यहाँ है अडिग–अचल अपने प्रण पर
फिर तू ही क्यों भटका फिरता है इधर–उधर,
मत बदल–बदल कर राह सफ़र तय कर अपना
हर पथ मंज़िल की दूरी नहीं घटाता है!

हर घट से अपनी प्यास बुझा मत ओ प्यासे!
प्याला बदले तो मधु ही विष बन जाता है!

दीपक ने जलन दिखा डाली सबको अपनी
इस कारण अब तक उसका जलना बंद नहीं,
है भटक रहा भँवरा बन–बन बस इसीलिये
है एक फूल का चुंबन उसे पसंद नहीं,

है प्यार स्वतंत्र, मगर है कहीं नियंत्रण भी
ज्यों छंद कहीं है मुक्ति, कहीं है बन्धन भी,
हर देहरी मत अपनी भक्ति चढ़ा पागल !
हर मन्दिर का भगवान न पूजा जाता है ।
(हर मंदिर का तो बस पाषाणों से नाता है!)

हर घट से अपनी प्यास बुझा मत ओ प्यासे!
प्याला बदले तो मधु ही विष बन जाता है!

जलते-जलते फट गया हिया धरती का पर
सावन जब आया अपनी मर्ज़ी से आया,
बादल जब बरसा अपनी मर्ज़ी से बरसा,
नभ ने जब गाया अपनी मर्ज़ी से गाया,
इच्छा का ही चल रहा रहँट हर पनघट पर,
पर सब की प्यास नहीं बुझती है इस तट पर
तू क्यों आवाज़ लगाता है हर गगरी को?
आनेवाला तो बिना बुलाये आता है।

हर घट से अपनी प्यास बुझा मत ओ प्यासे!
प्याला बदले तो मधु ही विष बन जाता है!

मैं आज सुबह बाज़ार गया तो बीच सड़क
कुछ कपड़े बेच रहा था कोई सौदागर,
मनमोहक बरन-बरन का जिनका सूत देख,
मेरा भी रीझ गया मन एक दुलाई पर,

ओढ़ा पर उसको तो सब करने लगे व्यंग,
पर ग्राहक एक तभी बोला यह देख ढंग-
मन भले विवाह करे हर एक वस्त्र से पर
हर वस्त्र नहीं हर तन पर शोमा पाता है।

हर घट से अपनी प्यास बुझा मत ओ प्यासे!
प्याला बदले तो मधु ही विष बन जाता है!

16. स्नेह सदा जलता है

दीप नहीं, स्नेह सदा जलता है ।

मिट्टी के शीश साज
सौरभ-आलोक-छत्र
गूंथ हृदय-हार मध्य
किरन-कुसुम-ज्योति-पत्र
वृक्ष नहीं, बीज अरे फलता है ।
दीप नहीं, स्नेह सदा जलता है ।

जन्म-मरण दो डग धर
नाप सकल भुवन-लोक
पथ का पाथेय लिये
नयन-द्वय हर्ष-शोक
रूप नहीं, रे अरूप चलता है
दीप नहीं, स्नेह सदा जलता है ।

रेखा की वन्दिनि, गुण-
वर्णों की भ्रमासक्ति
छवि की छाया-तटनी
दृग की जड़ धूल-भक्ति,
आकृति तो कृति की असफलता है।
दीप नहीं, स्नेह सदा जलता है।

17. बुलबुल और गुलाब

मत छेड़!
मत छेड़!
बुलबुल ! सोते गुलाब को मत छेड़ !

धूप से
गर्मी से
काँटों से,
हवा के गरम-गरम तेज़ सर्राटों से
दिन-भर यह लड़ा है,
झगड़ा है,
और अभी थक कर,
बहुत थक कर
शायद ग़श खाकर गिर पड़ा है ।
थकन इसे कुछ तो मिटाने दे,
तुझ को आलिंगन में जड़ सके,
और तेरे होठों पर चुम्बन का ताजमहल गढ़ सके,
इसकी भुजाओं में इतनी तो शक्ति आ जाने दे !
मत छेड़!
मत छेड़!
बुलबुल ! सोते गुलाब को मत छेड़!

मत छेड़!
मत छेड़!
बुलबुल ! सोते गुलाब को मत छेड़!
तेरी शरारत से सोये हुए घावों को ठेस लग सकती है,
नरम-नरम पातों में,
ठंडी-ठंडी डालों में आग दहक सकती है,
आवारा चाँद की
हरजाई नींद की आँख बहक सकती है,
क्योंकि प्यार सोये तो शीशा है,
जागे तो जादू है,
दर्द जब तक भीतर है वश में है,
बाहर बेक़ाबू है ।
ठंडे अंगारों का गाँव है यह
व्यर्थ चिनगारी ने यहाँ डाल,
हवा जो पत्तों के तकियों पर
सोने की कोशिश में करवट बदल रही है,
खुशबू जो पंखुरी की खिड़की से
दबे पाँव चोर जैसी चुप-चुप निकल रही है,
उन सब में उठा न असमय भूचाल !

मत छेड़ !
मत छेड़ !
बुलबुल ! सोते गुलाब को मत छेड़ !

बुलबुल ! यह वह देश नहीं
जहाँ प्यार बेरोक किया जा सके,
मन भाये फूल को
आत्मा का अर्घ्य बेखौफ़ दिया जा सके ।
मिटूटी के अश्रु भरे नाटक में
सुख यहाँ केवल विष्कंभक है,
और आनन्द-
अरे वह तो मेहमान है,
भूले-भटके ही कभी आता है,
शाम आए तो सुबह वापिस चला जाता है,
यह केवल रोग है,
शौक है जो पास रह पाता है ।
और यहाँ प्यार-
अरे प्यार नहीं, सौदा है
उसकी दुकानें हैं
हाटें-बाज़ारें हैं
जिनमें वह कपड़ों के भाव मोल बिकता है,
चाँदी और सोने की उसकी तराजू में
आदमी से लेकर ईश्वर तक तुलता है ।
और यहाँ दिल दिल के बीच दीवारें हैं,
जाति-पाँति,
धर्म-कर्म,
रंग-वर्ण,
देश-काल वाली बड़ी ऊँची मीनारें हैँ।
उनको गिराना आसान कोई काम नहीं
वहाँ लगे बड़े-बड़े पहरे हैं
क्योंकि मठ-मस्जिद औ' गिरजाघर
पंडित औ' पादरीशेख और मौलवी
मज़हब के जितने भी ठेके-ठेकेदार हैं,
सब के सब इन्हीं के सहारे तो ठहरे हैं।
इन्हें लाँघ जाने की सज़ा मौत पाना है
ईसा की भाँति क्रास ऊपर चढ़ जाना है,
गांधी की तरह गोली खाकर मर जाना है।
मरण क्या तुझको स्वीकार है?
अर्थी उठाने को अपनी तैयार है?
नहीं! नहीं !
तो मत छेड़! मत छेड़!
बुलबुल ! सोते गुलाब को मत छेड़!

मत छेड़!
मत छेड़!
बुलबुल सोते गुलाब को मत छेड़!

दुखी क्यों होती उदास क्यों होती है!
प्यार गर प्यार है तो उसका हर आँसू एक मोती है,
मोती वह-
माँग जिसे भर कर
जवान यह बूढ़ी सृष्टि होती है ।
तूने जो मोती ढुलकाया
वह व्यर्थ नहीं जायेगा,
प्यार का मौसम इसी बगिया में आयेगा,
आयेगा नहीं तो वह-
आने को विवश किया जायेगा।
आज मगर दूसरी ही बात है,
कहने को बहुत कुछ तबियत है,
लेकिन यह देख कैसी काली-काली रात है।
कल की जो बात आज़ सुनेगी, डर जायेगी,
तेरी यह शानदार कलगी गिर जायेगी;
और फिर अंधेरे के कान भी...
बहुत सजग होते हैं
बहुत कुछ तो वे बिना कहे सुन लेते हैं,
इसीलिए चाँदनी का चुम्बन
सितारे बहुत धीरे से लेते हैँ।
लेकिन तू चुम्बन...नहीं-
जा आज लौट जा
गीतों की शहज़ादी!
अपने ही गीतों के गाँवों को लौट जा।
तब यहाँ आना जब
किसी भी बगिया के आस-पास
कोई भी न घेरा हो,
कोई भी न मेढ़ हो,
कोई न दीवार हो,
हर पौधा हँसता हो, जगता हो,
सब पर बहार हो
और हर फूल तुझे-
प्यार करने के लिए-
बिल्कुल आज़ाद हो-
बिल्कुल तैयार हो।
आज किन्तु सोये हुए सपनों को
मत छेड़! मत छेड़!
बुलबुल !
जीवन के घायल सिपाही को मत छेड़!

18. अस्पृश्या

एक दिन शिशिर की शीत संध्या को
घूमकर आ रहा था वापिस भवन की ओर
नगर के स्वच्छ और पक्के फुटपाथ पर,
इतनी पड़ रही थी ठंड
संसृति की चेतना हुए थी जड़ हिमराशि ।
मानव कृतघ्नता-सी तीक्ष्ण प्राण-भेदिनी
हड्डियां कंपाती
और नस-नस चटकाती हुई
चलती थी भयंकर वात ।
शीत का स्वराज्य था,
मृत्यु-सी शीतल जड़ छाई थी विचित्र शान्ति
पक्षी भी न नीड़ों से बाहर तक झाँकते थे
केवल दो-चार श्रमिक
कभी-कभी नज़र आ जाते थे इधर-उधर
पेट में दबाये सर !
सहसा तीव्र वायु-वेग होने लगा,
और गगन भर गया प्रचंड काल मेघों से ।
ताण्डव आरम्भ हुआ
वाणों की वर्षा-सी झड़ी फिर लग गई,
चलती हुई राह यह जहाँ की तहाँ रुक गई,
मानो सब हलचल हो चुक गई।
उस पथ के पास एक मन्दिर था।
मन्दिर-जहाँ द्वार पर धर्म का पहरा है
ज्ञान-भक्ति नित्य जहाँ शीश झुका आते हैं,
और हम सब के भगवान जहाँ-
भक्तों से निशि-दिन प्रसाद भोग पाते हैं
लेकिन हमारे कभी काम नहीं आते हैं,
बहुत यदि सताओ तो पट बन्द करके सो जाते हैं।

एक क्षण में ही उसी मन्दिर के आँगन में
भीड़ बड़ी जुड़ गई
और लोग करने लगे कीर्तन भगवान का ।
उसी समय-
दूर एक पेड़ के नीचे से
दुख की साकार कृष्ण छाया-सी
दैन्य दारिद्रय की अनकही कथा-सी,
शोषण की प्रथा,
और वाणाविद्ध हंसिनी की व्यथा-सी,
फटे ग्रथित चिथडों में लिपटी
ज्वर के असह्य ताप भार से
काँपती-कराहती-
गिरती सँभलती हुई
अर्धनग्न युवती एक चली आयी इधर ।
जगह-जगह कंकड़ औ' पत्थर की चोटों से
घायल था उसका तन,
और था चू रहा अजस्र रक्त
रोते हुए घावों से ।
एक बालक था नग्न-
छिपा अस्थि-अंक में
उसके मातृत्व का सजीव स्वप्न
गांधी जवाहर या कि कोई भविष्य का।
बालक था इतना हतसंज्ञ हुआ शीत से
कि
रोने का शब्द भी न मुख से निकलता था ।
देख समवेत जन-पुंज वहाँ मन्दिर में
दूने साहस से वह बढ़ने लगी क्षीणकाय-
बढ़ता है जैसे कोई खोया हुआ पथिक एक-
पास ही देख निज मंज़िल को।
चढ़कर पर ज्यों ही वह सीढ़ियों के पास गई
एक तिलकधारी यूँ पुजारी ने कहा चीख-
"राँड भ्रष्ट करने चली अकलुष भगवान को ।"
रह गई ठिठककर वह वहीं हाय,
मानो हो देखा भयंकर सर्प सामने।
किन्तु मातृ-उर की सजीव ममता-सी वह
गिड़गिड़ा कर बोली संकेत कर बालक को-
'दया करो इस पर देव ।"
पर न द्रवित हो सका उसका पाषाण हृदय
होता भी कैसे भला-
आख़िर को था तो पत्थर का पुजारी वह
क्रोध कर बोला यूँ-
"भाग जा यहाँ से नहीं लात अभी खाएगी !'
इसके ही पूर्व किन्तु युवती थी गिर पड़ी
उसके जड़ चरणों पर
और धो रही थी मल उनका जल धारा से
या कि धो रही थी समाज का सजीव कोढ़।
लाल कर आँखें विकराल नर-हिंसक-सा बोला वह-
"भ्रष्टे-पापिष्ठे ! भ्रष्ट का दिया तूने मुझे।"
और दूसरे ही क्षण
युवती थी पड़ी हुई हाय तले सीढ़ियों के-
एक पग ठोकर से-
मन्दिर से दूर-
उसके घर से भी दूर-
जहाँ रहा करता है अशरण-शरण दाता वह !
लेकिन फिर शिशु को-
निश्चेष्ट और मौन देख
किसी आशंका का चिन्तन कर
सिहर उठी,
काँप उठी,
जी उठी,
मर उठी,
तिर उठी नील नयन-सागर में
और निज प्राण का भी ध्यान छोड़ बोली यूँ-
"पूज्य जहाँ बैठे हैं कितने ही श्वान वह-
मेरे प्रवेश से अपावन हो जाएगा?
ज़रा तो दया करो इस अबोध शिशु पर ।"
किन्तु वह पुजारी फुंकार कर गरजा यूँ-
"अपने यारों की सम्पति लिए गोद में
फिरती है भ्रष्ट ! दया-दया चिल्लाती हुई
अपने सतीत्व को टके सेर
गली-गली बेचने वाली !
कुत्तों से ज्यादा अपवित्र है तेरी छाँह ।"

अब न सुन सकी वह और
रह-रह कानों में उसके ये गूँजते थे शब्द-
"अपने सतीत्व को टके सेर
गली-गली बेचने वाली !
कुत्तों से ज्यादा अपवित्र है तेरी छाँह ।"

दूसरे रोज़!
उसी पेड़ की छाँह में पड़ी थी वह क्षीणकाय
मरी हुई
और स्तनों से यह लिपटा था शिशु ऐसे-
जैसे मन माया से-
किन्तु चेतना विहीन !
जहाँ नहीं मानव मानव समान
कैसा यह तेरा दरबार है ?
व्यर्थ ही चमक रहा फैले घने तम में
व्यर्थ ही रूप धरे धूर्त भगवान का
खंड-खंड होजा ओ मन्दिर के स्वर्ण-कलश !
खंड-खंड होजा ओ पाषाण-प्रतिमे आज !
5.6.1946

19. दुख के दिन

(1)
हँसकर दिन काटे सुख के, हँस खेल काट फिर दुख के दिन भी ।

मधु का स्वाद लिया है तो विष का भी स्वाद बताना होगा,
खेला है फूलों से तो शूलों को भी अपनाना होगा,
कलियों के रेशमी कपोलों को तूने चूमा है तो फिर
अंगारों को भी अधरों यर धर कर रे ! मुस्काना होगा,
जीवन का पथ ही कुछ ऐसा जिस पर धूप-छाँह संग रहतीं
सुख के मधुर क्षणों के संग ही बढ़ता है हर दु:ख का क्षण भी ।
हँसकर दिन काटे सुख के, हँस खेल काट फिर दुख के दिन भी ।

(2)
गहन कुहू की अंधियारी में कब तारों को छवि मुरझाई ?
कोटों के कटु अंचल में कब कलि की सुन्दरता अकुलाई ?
बन्द हुई कब पपीहे की 'पी' वज्र बिजलियों के पतझड़ में,
सरिता की चल चंचलता कब सागर के सन्मुख शरमाई ?
तू फिर क्यों खो बैठा साहस देख घिरा सिर पर दुख-बादल
और भुला बैठा क्यों तुझमें शेष अभी जीवन, यौवन भी।
हँसकर दिन काटे सुख के, हँस खेल काट फिर दुख के दिन भी ।

(3)
शूलों का अस्तित्व जहाँ है फूल वहीं तो मुस्काता है,
जहाँ अँधेरे की सत्ता है, जुगनू वहीं चमक पाता है ।
जीवन पूर्ण नहीं है पाकर केवल कुछ सुख के ही मृदु क्षण
सुख भी तो सुख कहलाता तब जीवन में जब दुख आता है,
इस पल जो कुछ है सन्मुख वरदान समझ उसको मेरे मन !
और देख फिर खोजेगा सुख तेरे दुख की छाँह-शरण ही
सुख के दिन सपने थे केवल सत्य मनुज ये दुख के दिन ही ।

(4)
सुख के दिवस दिए थे जिसने देन उसी की ये दुख के दिन
जिस घट से छलकी थी मदिरा, शेष उसी घट के ये विषकण
यह अचरज की बात न कोई, सीधा-सादा खेल प्रकृति का
मधु ऋतु से विक्रय पतझर का सदा किया करता है मधुवन
यह क्रम निश्चित इसे न कोई बदल सका है, बदल सकेगा,
इससे ही तो कहता हूँ हैं व्यर्थ अश्रु औ' व्यर्थ रुदन भी।
हँसकर दिन काटे सुख के, हँस खेल काट फिर दुख के दिन भी ।

(5)
मुस्काता ही रहा सदा तो मुश्किल भी हल हो जाएगी,
रुके अश्रु-सी थकी ज़िन्दगी, तूफानों की गति पाएगी,
पथ की ऊंचाई, नीचाई जिसे देखकर डरता है मन
क्षण-भर में तेरे पग से, रुँद-रुँद कर समतल हो जाएगी,
दुख के सम्मुख मुस्काने से दुख ही, सुख लगने लगता है,
बन जाता विश्वास विजय का थका पड़ा मुरदा-सा मन भी।
हँसकर दिन काटे सुख के, हँस खेल काट फिर दुख के दिन भी ।

(6)
हँसकर या रोकर तय कर, तय करना है तुझको ही यह मग,
तुझ पर हँसने का अवसर वह ताक रहा है छिप-छिप कर जग,
लक्ष्य-प्राप्ति से पूर्व कहीं जो रुका याद रख, जग के संग-संग
तुझ पर खूब हँसेंगे तुझको प्यार सदा करने वाले दृग,
और पंथ पर चलते-चलते ही यदि पथ की धूल बना तो
तेरी ख़ाक देख शरमाएगा युग-मस्तक का चन्दन भी ।
हँसकर दिन काटे सुख के, हँस खेल काट फिर दुख के दिन भी ।

(7)
साँझ सूर्य की सांध्य-किरन जो तम की चादर में खो जाती,
वही प्रात ऊषा बन कर फिर तम के घूँघट से मुस्काती
तम से दूर ज्योति जीवन की ज्योतिहीन है तम सी ही है,
क्योंकि बुझी-सी ही जलती है दिन में दीपक की हर बाती,
माना यह प्रकाश जीबन में भरता है युग-दिन की हलचल,
किन्तु थके मन को देता विश्राम निशा का सूनापन ही।
सुख के दिन सपने थे केवल सत्य मनुज ये दुख के दिन ही ।

(8)
सुख में थी आसान ज़िन्दगी इससे उसकी याद सताती,
दुख में कठिन बना है जीबन इसीलिए पीड़ा अकुलाती,
किन्तु याद रख, एक समय है जब अभाव खलता है दुख का,
और खोजने पर भी पीड़ा छाँह न तब दुख की छू पाती,
जीवन का वह निर्मम क्षण यदि आज नहीं तो कल आएगा,
सँभल मनुज ओ ! तुझे छल रहा प्रति पल तेरा मन दुश्मन ही ।
सुख के दिन सपने थे केवल सत्य मनुज ये दुख के दिन ही ।

(9)
सुख का ऋण तो चुका दिया है तूने लेकर ये दुख के क्षण,
किन्तु शेष है अभी चुकाना सबसे अधिक कठिन दुख का ऋण,
कुछ ले देकर नहीं, किन्तु यह दुख का ऋण चुकता है ऐसे-
अधरों पर मुस्कान सजी हो नयनों से झरते हों जल-कण,
जो हँसकर मुस्काकर दुख का यह ऋण कठिन चुका लेता है,
हार मान लेते हैं उससे सुख-दुख जीवन और मरण भी।
हँसकर दिन काटे सुख के, हँस खेल काट फिर दुख के दिन भी ।

(10)
कल नभ पर छाई थी ऐसी सघन घनों की काली चादर,
ऐसा लगता था न कभी फिर मुस्का पाएगा शशि सुन्दर,
किन्तु आज ही उस तम का है नाम निशाँ तक शेष न जग में,
जड़ा खड़ा तारक-मजियो से जगमग-जगमग करता अम्बर,
अचरज का मेला है यह जग कभी अंधेरा कभी उजेरा,
मधु में यहाँ छिपा रहता है काल-हलाहल का क्रन्दन भी ।
हँसकर दिन काटे सुख के, हँस खेल काट फिर दुख के दिन भी ।

(11)
टूटे वे सपने ही जब लख जिन्हें अमरता थी शरमाई,
सूखा वह मधु ही जब जिसके सम्मुख अमर तृषा सकुचाई,
छूट गए वे साथी ही जिनके नयनों की स्नेह-छाँह में-
रोती-सी ज़िन्दगी फूल की मुस्कानें भर कर मुस्काई,
दे न सके जब साथ पंथ पर वे अमरत्व-शिला के पुतले,
फिर रे ! कब तक घिरा रहेगा जीवन के नभ पर दुख-क्षण भी ।
रहे न जब सूख के ही दिन तो कट जाएँगे दुख के दिन भी।

8-9-1947

20. मुझे तुम भूल जाना

भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना!

साथ देखा था कभी जो एक तारा
आज भी अपनी डगर का वो सहारा
आज भी हैं देखते हम तुम उसे पर
है हमारे बीच गहरी अश्रु-धारा
नाव चिर जर्जर नहीं पतवार कर में
किस तरह फ़िर हो तुम्हारे पास आना।
भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना!

सोच लेना पंथ भूला एक राही
लख तुम्हारे हाथ में लख की सुराही
एक मधु की बूंद पाने के लिए बस
रुक गया था भूल जीवन की दिशा ही
आज फ़िर पथ ने पुकारा जा रहा वह
कौन जाने अब कहाँ पर हो ठिकाना।
भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना!

चाहता है कौन अपना स्वप्न टूटे?
चाहता है कौन पथ का साथ छूटे?
रूप की अठखेलियाँ किसको न भातीं?
चाहता है कौन मन का मीत रूठे?
छूटता है साथ सपने टूटते पर
क्योंकि दुश्मन प्रेमियों का है जमाना।
भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना!

यदि कभी हम फ़िर मिले जीवन-डगर पर
मैं लिए आँसू, लिए तुम हास मनहर
बोलना चाहो नहीं तो बोलना मत
देख लेना किन्तु मेरी ओर क्षण भर
क्योंकि मेरी राह की मंजिल तुम्हीं हो
और जीने का तुम्हीं तो हो बहाना।
भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना!

साँझ जब दीपक जलाएगी गगन में
रात जब सपने सजाएगी नयन में
पी कहाँ जब-जब पुकारेगा पपीहा
मुस्कुराएगी कली जब-जब चमन में
मैं तुम्हारी याद कर रोता रहूँगा
किन्तु मेरी याद कर तुम मुस्कुराना।
भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना!

रोज़ ही नभ में घिरेंगे प्यार के घन,
रोज़ यूलेंगे फलेंगे रूप के बन,
रोज़ कलियों के उठा घूँघट शराबी,
गुनगुनाता मदिर मधुमास गुन-गुन,
फूल कलियाँ वे वही सब कुछ रहेगा,
पर न गाएगी कभी बुलबुल तराना।
भूल जाओ तो मुझे तुम भूल जाना।
भूल जाना किस तरह संग-संग तुम्हारे
छाँह बन कर मैं रहा संध्या-सकारे
सोचना मत किस तरह मैं जी रहा हूँ
चल रहा हूँ किस तरह सुधि के सहारे
किन्तु इतनी भीख तुमसे माँगता हूँ
यदि सुनो यह गीत इसको गुनगुनाना।
भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना!

10-8-49

 
 
 Hindi Kavita