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अज्ञेय
Agyeya
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Aangan Ke Par Dwar Agyeya

आँगन के पार द्वार अज्ञेय
अन्तःसलिला

सरस्वती पुत्र
बना दे, चितेरे
भीतर जागा दाता
अन्धकार में दीप
पास और दूर
पहचान
झील का किनारा
अंतरंग चेहरा
पराई राहें
पलकों का कँपना
एक उदास साँझ
अनुभव-परिपक्व
सूनी-सी साँझ एक
एक प्रश्न
अँधेरे अकेले घर में
चिड़िया ने ही कहा
अन्तःसलिला
साँस का पुतला

चक्रांत शिला

यह महाशून्य का शिविर
वन में एक झरना बहता है
सुनता हूँ गान के स्वर
किरण अब मुझ पर झरी
एक चिकना मौन
रात में जागा
हवा कहीं से उठी, बही
जितनी स्फीति इयत्ता मेरी झलकाती है
जो बहुत तरसा-तरसा कर
धुँध से ढँकी हुई
तू नहीं कहेगा ?
अरी ओ आत्मा री
अकेली और अकेली
वह धीरे-धीरे आया
जो कुछ सुन्दर था, प्रेम, काम्य
मैं कवि हूँ
न कुछ में से वृत्त यह निकला
अंधकार में चली गई है
उस बीहड़ काली एक शिला पर बैठा दत्तचित्त
ढूह की ओट बैठे
यही, हाँ, यही
ओ मूर्त्ति !
व्यथा सब की
उसी एकांत में घर दो
सागर और धरा मिलते थे जहाँ
आँगन के पार
दूज का चाँद

असाध्य वीणा

असाध्य वीणा
 
 
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