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हरिवंशराय बच्चन
Harivansh Rai Bachchan
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आकुल अंतर हरिवंशराय बच्चन

लहर सागर का नहीं श्रृंगार
मेरे साथ अत्याचार
बदला ले लो, सुख की घड़ियो
कैसे आँसू नयन सँभाले
आज आहत मान, आहत प्राण
जानकर अनजान बन जा
कैसे भेंट तुम्हारी ले लूँ
मैंने ऐसी दुनिया जानी
क्षीण कितना शब्द का आधार
मैं अपने से पूछा करता
अरे है वह अंतस्तल कहाँ
अरे है वह वक्षस्थल कहाँ
अरे है वह शरणस्थल कहाँ
क्या है मेरी बारी में
मैं समय बर्बाद करता
आज ही आना तुम्हें था
एकाकीपन भी तो न मिला
नई यह कोई बात नहीं
तिल में किसने ताड़ छिपाया
कवि तू जा व्यथा यह झेल
मुझको भी संसार मिला है
वह नभ कंपनकारी समीर
तूने अभी नहीं दुख पाए
ठहरा-सा लगता है जीवन
हाय, क्या जीवन यही था
लो दिन बीता, लो रात गई
छल गया जीवन मुझे भी
वह साल गया, यह साल चला
यदि जीवन पुनः बना पाता
सृष्टा भी यह कहता होगा
तुम भी तो मानो लाचारी
मिट्टी से व्यर्थ लड़ाई है
आज पागल हो गई है रात
दोनों चित्र सामने मेरे
चुपके से चाँद निकलता है
चाँद-सितारो, मिलकर गाओ
मैं था, मेरी मधुबाला थी
इतने मत उन्मत्त बनो
मेरा जीवन सबका साखी
तब तक समझूँ कैसे प्यार
कौन मिलनातुर नहीं है
कभी, मन, अपने को भी जाँच
यह वर्षा ॠतु की संध्या है
यह दीपक है, यह परवाना
वह तितली है, यह बिस्तुइया
क्या तुझ तक ही जीवन समाप्त
कितना कुछ सह लेता यह मन
हृदय सोच यह बात भर गया
करुण अति मानव का रोदन
अकेलेपन का बल पहचान
क्या करूँ संवेदना लेकर तुम्हारी
उनके प्रति मेरा, धन्यवाद
जीवन का यह पृष्ठ पलट, मन
काल क्रम से
यह नारीपन
वह व्यक्ति रचा
वेदना भगा
भीग रहा है भुवि का आँगन
तू तो जलता हुआ चला जा
मैं जीवन की शंका महान
तन में ताकत हो तो आओ
उठ समय से मोरचा ले
तू कैसे रचना करता है
पंगु पर्वत पर चढ़ोगे
गिरि शिखर, गिरि शिखर, गिरि शिखर
यह काम कठिन तेरा ही था
बजा तू वीणा और प्रकार
यह एक रश्मि
जब-जब मेरी जिह्वा डोले
तू एकाकी तो गुनहगार
गाता विश्व व्याकुल राग
 
 
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