रजनीश्वर चौहान 'रजनीश'

रजनीश्वर चौहान (11 मार्च, 1995-) का जन्म श्री चेत राम चौहान-पिता (व्यवसाय: हि.प्र. पुलिस) और श्रीमती रेनू चौहान-माँ (व्यवसाय: गृहिणी) के हिमाचली परिवार में चौपाल, शिमला, हिमाचल प्रदेश में हुआ । उन्होंने एम.कॉम (हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, (2016-2018) के साथ-साथ संगीत विशारद (भातखंडे संगीत विद्यापीठ, लखनऊ, (2013-2017) से उत्तीर्ण की। ‌संगीत और चित्रकला में पूर्ण रुचि और आंशिक रूप से भाग लेने के साथ-साथ, वर्तमान में वह शिमला में शौर्यगेट (मनोरंजन प्रोडक्शन हाउस) के साथ थिएटर (नाटक), फिल्म निर्माण (अभिनय, पटकथा लेखन और निर्देशन) कर रहे हैं। कुछ नाटक हैं जिनमें रजनीश्वर चौहान 'रजनीश' ने अभिनय किया है, जैसे "इन द किंगडम ऑफ फूल्स ", "द इनविज़िबल मैन ", "नैनजोर के बाबू", "गोदान ", "डॉक्टर पल्टा", "द थ्री शेड्स - ओथेलो", "14 अगस्त - आर्टिकल 32 हियरिंग ", "रानी रुकमन" आदि और मिनी / शॉर्ट / वेब फिल्म जैसे "उल्टी", "अ वैल प्लेस्ड प्रॉपर्टी", "ज़ी फाइव ओरिजिनल काफ़िर ", "अ क्रिसमस स्माइल"आदि में भी कार्य किया है । रजनीश्वर चौहान 'रजनीश' कविताओं, ग़ज़लों और नज़्मों को साहित्यिक नाम "रजनीश" के साथ लिखते हैं ।

हिन्दी कविता रजनीश्वर चौहान 'रजनीश'

ख्वाब आँखों में लिए जो निकले ज़माने में
सियासी सिक्के बेकार हो जाते हैं
है अजब तेरा शहर कि बुलावा नहीं आता
रगों में ही रखना है तो रखो संभाल के
आओ फिर सहारा दो मुझे
करके बेहाल पूछते हैं हाल ज़रूर ज़माने वाले
अब कुछ यूँ कर कि यूँ मिल मुझसे
ज़िन्दगी, ज़िन्दगी नहीं तेरी दुआओं से
दौर-ए-सियासत में है बोलबाला खून का
आज तेरे नाम को नाम कर आया हूँ
रोशनी को यूँ न कर बयाँ की सभी राज़ी हो चले
ज़ुबाँ-ओ-ग़ज़ल मेरी मसरूफ़ है फिसल जाने में
कुनबा-ए-मंदिर-ओ-मस्जिद कुछ हिल सा उठा है
किसीकी कागज़ी शाख़-ए-नरगिस नहीं हूँ मैं
हम वह बच्चे हुआ करते थे
ज़ख़्म अब और लिए नहीं जाते
रह गया बूटा आँगन का शजर होते-होते
सबब कोई पूछता है
चलते-फिरते बुतों को बुत होने का ख़ुमार बहुत है
फिर तमन्ना-ए-जाँ है तो शमशीर बनके लगो
जवां ख़्यालों पे सख़्ती सी रहती है कोई
इरफ़ान के लिए
जिनकी ख़ातिर वाइज़ भी अपने सर मुंडवाते हैं
जहाँ का हरेक हर्फ़ लिखता बस एक वफ़ा बच जाता
वक्त ऐसा भी नहीं कि मेहरबाँ होने नहीं देता
नादानी में हाथ से फिसलकर गया था
यूँ दश्त-बा-दश्त बवण्डर हो जाना
कोई मेरा अपना मेरी बात पे बस सर हिलाए कभी
जान, जान लगे सो कुछ यूँ किया करती है नींद
इन्तेहा ख़ैर कि मेरे सर तेरे ख़यालों का बसर होता है
 
 
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