हिंदी कविताएँ : युवराज हरितवाल

Hindi Poetry : Yuvraj Haritwal



1. गंगा हर की जटा से बहती

गंगा हर की जटा से बहती, गले मे सर्प की माला है। डमरू बाजे डम डम डम डम शिव तांडव करे निराला है। अर्ध-चंद्र का मुकुट है पहने मस्तक पर जलती ज्वाला है। बाबा भोला भला हमारा करुणा करने वाला है। पर्वतराज की पुत्री के संग बैठ संसार संभाला है। असाधारण आपदा को नियंत्रित करने वाला है। देवो का देव है बोला बाबा, हरि जिनका ध्यान लगाते है। झोली भरदे उनकी जो, मन से इनका ध्यान लगाते है। कामदेव, त्रिपुरा, अंधक संग गजासुर का जिन्होंने संहार किया। मृत्यु के देव यम को परास्त कर मृत्यु को भी वश में किया। मैं शिव का ध्यान लगाता हूं, जो सर्वत्र है, अविनाशी है। 'युवराज' कृपा होगी बाबा की कुछ पल ही अब बाकी है।

2. पूरी जिंदगी गुजर जाती है

पूरी जिंदगी गुजर जाती है, रिश्ते निभाने के लिए। किंतु गलतफहमियाँ काफ़ी होती है, रिश्ते तुड़वाने के लिए। कोशिशें लाख करनी पड़ती है, कामयाबी पाने के लिए। किंतु चंद गलतियाँ बहुत होती है, रास्ते पर आने के लिए। इसही तरह जीवन बीत जाता है, पैसा और नाम कमाने के लिए। ‘युवराज’ अंत में समय भी नहीं मिल पाता परिवार के साथ बिताने के लिए।

3. रेल गाड़ी चलती है पटरी पर

रेल गाड़ी चलती है पटरी पर, जिंदगी भी चलनी चाहिए। उतरी अगर रेल पटरी से, तो अंजाम समझ जाइए। पटरी पर चलने के लिए, साथ सबका चाहिए। दुनिया बोले झूठ, आप सच का रास्ता अपनाइये। नाक़ाम होने पर, हताश मत होजाइये। कोशिश कर दुबारा, कामयाब होना चाहिए। जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए, कुछ अलग करके दिखाइए। कुछ अलग करने के लिए, संकल्प दृढ़ चाहिए। एक बार कामयाब होन पर बैठ मतना जाइये। ‘युवराज’ प्रयास सदा आगे बढ़ने का, करते रहना चाहिए।

4. चोट लगेंगी तो लोग

चोट लगेंगी तो लोग, नमक ही लगाएंगे। अंत में अपने ही, हमकों मरहम लगाएंगे। कितना भी उड़ लो, पंख कट ही जायेंगे। और ऐसी गति में, सिर्फ अपने अपनाएंगे। अपनो को छोड़ हम, अकेले पड़ जाएंगे। वह आगे बढ़ेंगे, हम पीछे रह जाएंगे। समय रहते सुधरे तो, कुछ हासिल कर पाएंगे। अन्यथा ‘युवराज’ हम, राह भटक जाएंगे।

5. जीवन में धैर्य थोड़ा आप रख लीजिए

जीवन में धैर्य थोड़ा आप रख लीजिए, कभी अपनी सत्यता का प्रमाण मत दीजिए। सही वक्त आने की प्रतिकछा कर लीजिए, समय बहुत बलवान यह जहन में रख लीजिए। जीवन मे अपना लक्ष्य निर्धारित कीजिये, रास्ते मिलेंगे फिर, मेहनत अपनी दीजिये। नींद और चैन का थोड़ा त्याग कीजिये, मंजिल पर पहुँच कर ही विश्राम कीजिये। जीवन मे कर्म बस आप अच्छे कीजिये, फिक्र को सारी फिर आप त्याग दीजिये, युवराज’ सोते जागते प्रभु का ध्यान कीजिये, होगा सब भला यह बात समझ लीजिये।

6. वक़्त ने बार-बार ख्वाबों को तोड़ा

वक़्त ने बार-बार ख्वाबों को तोड़ा, तो क्या अब सपने सजाना छोड़ दे। ग़र बादल सूर्य के सामने आए, तो क्या सूर्य अब जगमगाना छोड़ दे। बांध बने ग़र नदी के ऊपर, तो क्या पानी समुद्र में जाना छोड़ दे। अगर नहीं तो फिर आप क्यों, ‘युवराज’ एक हार बाद प्रयास छोड़ दे।

7. सौ बार मदद कर दो लोग भूल ही जाएंगे

सौ बार मदद कर दो लोग भूल ही जाएंगे, एक बार मना करदो, सदा ताना सुनाएँगे। फिर लोग हमे अपना पशु रूप दिखाएंगे, भूखे! शब्दों से ही जैसे, हमें काट खाएंगे। मिश्री सी बोली को बदल कड़वा बनाएंगे, यह लोग मतलबी, हमें मनुजता सिखाएंगे। मासूमियत का मुखौटा उतार खुद यह आएंगे, और आकर हमें ‘युवराज’, सही-गलत पढ़ाएंगे।

8. फिर क्यों वृद्धाश्रम बने

दादी दादा बिन पिता ना होए माता पिता बिन तुम। फिर क्यों वृद्धाश्रम बने उनके लिये, जिनकी वजह से हुए तुम। दादी दादा अगर वृद्धाश्रम जाये, तो अगले हो माता पिता तुम। क्योंकि बच्चे तो बड़ो से सीखे, और यही सीखा रहे हो उन्हें तुम। माता पिता ने सींचा जिसको वही वृक्ष हो तुम क्या इस उम्मीद मे सींचा तुमको की, एक दिन वृद्धाश्रम उन्हें दिखाओ तुम। याद करो बचपन तुम्हारा, जब लाचार थे तुम। शहजादो की तरह तब पाला तुमको यह बात ना भूलो तुम। आज ऐशो आराम की जिंदगी, जो जी रहे हो तुम। माता पिता नींव है इसकी बादशाहो की तरह उन्हें रखो तुम। ख़ुदग़र्ज़ ना बनो इतने भी की एक दिन पछताओ तुम। ‘युवराज’ की सुनो प्रार्थना उन माता पिता को घर वापस ले आओ तुम। घर वापस ले आओ तुम।

9. जहाँ थी कभी बस्ती

जहाँ थी कभी बस्ती, वहाँ वीराने! नजर आते है। आलीशान महल भी, आज खंडर! नजर आते है। हरे भरे खेत भी, अब बंजर! नजर आते है। जहाँ बहती थी सरिता, वहाँ मरूस्थल! नजर आते है। क्योंकि वक़्त के आगे, ‘युवराज’ सब! नजर झुकाते है।

10. थोड़े पैसे दे दो तो, इंसान ईमान भूल जाएगा

थोड़े पैसे दे दो तो, इंसान ईमान भूल जाएगा, स्वाभिमान को भूल वह, चमचा बन जायेगा। चमचागिरी कर, वह तरक्की तो पाएगा, पर कभी जीवन में, वह ऊपर न उठ पाएगा। खुद की नजरों में ही, वह गिरता चला जएगा, और खुदको ही भीतर, तड़पता हुआ पाएगा। फिर घर का शेर बाहर, दुम हिलाता नज़र आएगा, खुदको ही देखना उसका, मुश्किल सा हो जाएगा। ऐसा जीवन जी कर, वह बाद में पछताएगा, क्योंकि ‘युवराज’ फिर, वह मनमर्ज़ी न कर पाएगा।

11. नई तरह की पढ़ाई

नई तरह की पढ़ाई है, क्योंकि बात अब ऑनलाइन पर आई है। अध्यापक ने भी बोर्ड की जगह, अब लिखने के लिए चैट बॉक्स अपनाई है। और पीडीएफ ने, विद्यार्थियों की लिखने से, जान छुड़ाई है। बाते करना छोड़ कर, अब विद्यार्थियों ने, खुद म्यूट बटन दबाई है। और वीडियो ऑफ कर, चलती कक्षा में खाने में भी, अब कहाँ कोई बुराई है। हाँ ‘युवराज’ यहीं नई पढ़ाई है, क्योंकि बात अब ऑनलाइन पर आई है।

12. प्रथमपूज्य है, देव गणपति

प्रथमपूज्य है, देव गणपति, जो ध्यावे, वो पावे उन्नति। सुनते करुणा, पुकार गणपति, हरते विघ्न, अपार गणपति। भरते है, भण्डार गणपति, रिद्धि सिद्धि के, नार गणपति। मूषक के, सवार गणपति, शिव गौरा के, लाल गणपति। हर विद्या के, ज्ञाता गणपति, मोदक लड्डू, खाते गणपति। ‘युवराज’ जो भी, पूजे गणपति, उसके कष्ट, काटे गणपत्ति।

13. गलतियाँ तो जीवन में

गलतियाँ तो जीवन में, हम सबसे होती है। पर गलतियाँ ही तो, आगे बढ़ने कि सीढ़िया होती है। खूबियों में भी जरूर, कुछ कमियां होती है। क्योंकि परिपूर्णता, किसी चीज़ में न होती है। और कमियां भी कहाँ, गुणहीन ! होती है। क्योंकि हर कमी में, छुपी कुछ सीख होती है। मनुष्य चाहे तो संभव, हर चीज होती है। क्योंकि ‘युवराज’, जहाँ चाह वहाँ राह होती है।

14. तैयारी रखेंगे

मुश्किलों से भिड़ने की पूरी तैयारी रखेंगे, हम अपना सफर जारी रखेंगे। फूँक, फूँक कदम अपना हर बारी रखेंगे, हम अपना सफर जारी रखेंगे। अपने दोस्तों से सदा पक्की यारी रखेंगे, हम अपना सफर जारी रखेंगे। मन की चिंताओं को सारी हम न्यारी रखेंगे, हम अपना सफर जारी रखेंगे। दिमागी अवसादों से अपनी जंग जारी रखेंगे, ‘युवराज’ हम अपना सफर जारी रखेंगे।

15. परिस्थितियां हो विपरीत भले

परिस्थितियां हो विपरीत भले, हमें! धीरज धर कर चलना है। हर उलझन को हमें, बुद्धि से हल करना है। आतुर हो, ग़र काम किया, तो निश्चित काम बिगड़ना है। छोड़ कर टेढ़ा रस्ता, हमें सीधे रस्ते चलना है। विश्वास रख खुद पर सदा, जीवन में आगें बढ़ना है। ‘युवराज’ हिम्मत रख हमें, दुविधाओं से उभरना है।

16. अमृत बांट ज़हर पिया

अमृत बांट ज़हर पिया, तब नीलकंठ कहलाये। डमरू की धुन पर शिव नाचे, बोलो नमः शिवाय।।१।। गंगा! धारा जटा से बहती, गले में सर्प सजाएं। कैलाश के राजा है बाबा, कैलाशपति कहलाए।।२।। अर्ध-चंद्र का मुकुट पहन, सोमनाथ कहलाए। करुणा करते है बाबा, जो भी मन से ध्याये।।३।। भांग धतूरा चढ़ाने पर, खुश! बाबा होजाए। इसी लिए हमारे बाबा, भोलेनाथ कहलाए।।४।। ब्रम्हा, विष्णु , देवता भी, हर का ध्यान लगाएं। इसी लिए उमापति, देवो के देव कहलाए।।५।। काल भी जिनके आगे आ, अपना शीश झुकाए। यम को परास्त कर बाबा, कालान्तक कहलाए।।६।। ‘युवराज’ जो भी बाबा का मन से, ध्यान लगाएं। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, सारे गुण उसे मिलजाए।।७।।

17. गरीब दुखी गरीबी से

गरीब दुखी गरीबी से, तृष्णा वश धनवान। यहाँ सुखी रहते वहीं, जो लेते हरि का नाम। नास्तिक यहाँ कोई नहीं, आस्तिक हर इंसान। मानो या न मानो, सबके मन में है भगवान। जीवन रूपी गाड़ी के, चालक है भगवान। उनकी इच्छा से ही होते, जग में सारे काम। हमारी रक्षा के लिए, ततपर है भगवान। ‘युवराज’ मन से पुकारो, सुन लेंगे भगवान।

18. जिंदगी

आहिस्ता चलता हूं मैं, या दौड़ती, है जिंदगी। क्यों रुकती नहीं कभी, क्या थकती, नहीं है जिंदगी। ऐसा लगता है जैसे, हमसें रूठी, हुई है जिंदगी। है हमारी पर हमसें, मिलती, नहीं है जिंदगी। अपनी तुलना में सबकी, बेहतर लगती, है जिंदगी। ‘युवराज’ इसी कारण वश, अपनी लगती, नहीं है जिंदगी।

19. निज मन में अब हुमको

निज मन में अब हुमको, उज्जवल दीप जलाना है। अपने मन से हमको, अब अंधकार मिटाना है। अंतर मन की शक्ति से, यह! संभव हो जाना है। प्रकाश से प्रेरणा ले हमें, ‘युवराज’ रोशन हो जाना है।

20. कभी दुख है, तो कभी खुशियाँ अपार है

कभी दुख है, तो कभी खुशियाँ अपार है, बीच भंवर में नइया, जाना सागर पार है। कभी मनोबल टूटे, तो कभी साहस भरमार है, ग़र हौसला हो बुलंद, तो निश्चित सागर होना पार है, फिर! मिलेगा किनारा, और आगे चढ़ना पहाड़ है, क्योंकि ‘युवराज’ जीवन, राह-ए-चुनौतियों का द्वार है।

21. अब मैंने ठाना कि

अब मैंने ठाना कि, कुछ कर जाना है। अपने सपनों को, पूरा कर जाना है। बुरे! वक़्त को पार कर, पक्षी बन, उड़ जाना है। हौसले की सीढ़ी बना, आसमाँ तक जाना है। ग़मो, ठोकरों, रुकावटों, का डगर में ठिकाना है। परंतु! हमें निड़र बन, इनसे लड़ जाना है। जिंदगी! एक सफर सुहाना है, इसे पूरा कर, सबको जाना है। किंतु! जाने से पहले जीवन में, कुछ कर जाना है। प्रभु! का ध्यान करने से, यह मुमकिन, हो जाना है। अन्यथा ‘युवराज’ जहाँ में, हमारा कौन ठिकाना है।

22. हम व्यर्थ चिंता करते है

हम व्यर्थ चिंता करते है, की आगे क्या होगा....? किंतु! होना वहीं है, जो लिखा भाग्य होगा। जीवन! बड़ा अनिश्चित है, कौन जाने, कब क्या होगा..? इसी लिए, आज ही जी लो, कल पता न क्या होगा। कल की सोच रोना क्यूँ, जब! जो तय, वो होगा। ‘युवराज’ सब प्रभु की माया, जो होगा भला होगा।

23. जिंदगी का सफर

आरंभ हुआ तो अंत भी होगा, सफर में तजुर्बा भी होगा। सफलताओं-असफलताओं से मिलना भी होगा, यादगार यह सफर भी होगा। बुद्धि-सयंम का परीक्षण भी होगा, क्योंकि कांटो भरा सफर यह होगा। हर मुश्किल का निवारण होगा, हौसला बुलंद गर हमारा होगा। 'युवराज' सफर लंबा यह होगा, अथक प्रयासों से पूर्ण भी होगा।

24. अक्सर, जो दिखता है वह होता नहीं

अक्सर, जो दिखता है वह होता नहीं, सुखी! दिखने वाला सुखी होता नहीं। क्या....? हँसने वाला कभी रोता नहीं, क्या? झूठी हँसी चेहरे पर वह रखता नहीं। ग़र कोई अपने ग़मो को छुपा ले, तो क्या....? वह दुखी होता नहीं। बाहर सब....! दिखता ठीक, पर.., मन शांत रहता नहीं। असंख्य योनियों में इंसान कमा खाता, पर इनको! छोड़ कोई भूखा सोता नहीं। ‘युवराज’ क्योंकि इनका, लालच खत्म होता नहीं।

25. बहन-भाई का रिश्ता

हर रिश्ते से हटकर यह रिश्ता बहुत निराला है। प्यार भरी तकरार का, यहाँ रहता बोल बाला है। वह किस्मत वाले होते है, जिन्हें मिलता बहन का प्यार। जो लड़ती भी, झगड़ती भी, और करती लाड़ दुलार। एक साल से आता है, इस रिश्ते का त्योहार। उस दिन भाइयों पर उमड़ता, उनकी बहनों का प्यार। बहना दुआ करुँ तुझे, खुशियाँ! मिले अपार। ‘युवराज’ आया-आया देखों, रक्षाबंधन का त्योहार।

26. मरुधर में मृगतृष्णा होगी

मरुधर में मृगतृष्णा होगी, जो नहीं! वो भी दिखेगा। ग़र लालची इंसान हुआ तो, सिर्फ और! उसको दिखेगा। माया जाल में फसकर फिर, वह आजीवन! रोता रहेगा। ‘युवराज’ नौका पार तब होगी, जब लोभी! हरि नाम भजेगा।

27. अवसादों से उभरना होगा

अवसादों से उभरना होगा, कर्तव्य पथ पर चलना होगा, जीवन है बहुत बड़ा, इसमें संघर्ष करना होगा। विफल हुए एकबार तो क्या, प्रयास दुबारा करना होगा, पहाड़ हमें चढ़ना होगा, मुमकिन यह करना होगा। बुलंद हौसला रखना होगा, विश्वास खुद पर करना होगा, तोड़ कर चट्टानों को, हमें आगे बढ़ना होगा। जीवन में गलतियां होगी, गलती कर तजुर्बा होगा, ‘युवराज’ यह पढ़ाई पढ़, हमें उतीर्ण होना ही होगा। बुरे काम को, तजना होगा, राम नाम को, भजना होगा। तब ही जीवन रूपी गाड़ी में, हमारा आगे बढ़ना होगा। सूर्यास्त होगा, अंधेरा होगा, कल फिर नया, सवेरा होगा। मन चंगा रखने के हेतु, ध्यान प्रभु का करना होगा। नाम भी होगा, काम भी होगा, रोटी, कपड़ा, मकान भी होगा। विश्वास रखेंगे उनपर तो, मनवांछित परिणाम ही होगा। कहीं मीठा, कहीं खट्टा होगा, फल कर्मो के, अनुरूप ही होगा। ‘युवराज’ राम के नाम से तो, असंभव भी संभव होगा।

28. जगदम्ब तुम्हारी कृपा से

जगदम्ब तुम्हारी कृपा से अब शुभ मंगल होगा सब फिर छाएगी खुशहाली, नव वर्ष जो आया है। हम अज्ञानी अभिमानी माया के मोह में फसे है तुम दया करो महारानी, नव वर्ष जो आया है। हम भूल रोज ही करते हमें क्षमा करो कल्याणी सर पर हाथ धरो माँ, नव वर्ष जो आया है। हम राह भूल गए माँ तुम सही मार्ग दिखा दो हमारी नैया पार करा दो, नव वर्ष जो आया है। भक्ति, बुद्धि, क्रिया हीन माँ अरदास करी है तुमसे माँ जगदंबा सुनो हमारी, नव वर्ष जो आया है। 'युवराज' माँ जगतजननी छाया है घनघोर अंधेरा चहुँओर प्रकाश कर दो, नव वर्ष जो आया है

29. कैलाश के राजा शिव शंकर

कैलाश के राजा शिव शंकर, है भाग्य विधाता शिव शंकर।। उमापति है देवो के देव भी, है भोले बाबा शिव शंकर।। उद्धार करो हे जगत पिता, तुम ही हो सहारा शिव शंकर।। गंगा धारा जटा से बहती, सोहे सर चँदा शिव शंकर।। चलते-चलते भटक जाते हम, दिखा दो दिशा शिव शंकर।। माया के जाल में फसते सदा, मिटा दो माया शिव शंकर।। हम नादान तुम्हारे बालक है, भव पार कराना शिव शंकर।। ग़लती से ग़लती करदे तो, सारे पाप मिटाना शिव शंकर।। अधर्मियों को सबक सिखाने, शूल कर में उठाना शिव शंकर।। ‛युवराज’ शरण में आया बाबा, कृपा दृष्टि बनाना शिव शंकर।।

30. हमारा साथ निभाने कोई नहीं आता

हमारा साथ निभाने कोई नहीं आता सच की राह पर जाने कोई नहीं आता सब वक़्त-वक़्त की बात है क्योंकि ढ़लते सूरज के साथ ढलने कोई नहीं आता अँधेरे में दिया कर देता है रौशनी पर उजाले में बिगड़ी बनाने कोई नहीं आता मेरा बस चले तो बदल दूँ सबको पर ‘युवराज’ बुरी आदतें बदलने कोई नहीं आता

31. दिन गुज़रा, हो गई है शाम फिर

दिन गुज़रा, हो गई है शाम फिर आओ सुमरे हरि का नाम फिर घबराओं मत राह में ग़र बाधा मिले डटे रहो बाधाएं होगी नाकाम फिर जब तक जीएं अच्छे बन जिए मौत के बाद राख ही अंजाम फिर चिंता सिर्फ निज कर्मो की करो बेहतर ही होंगे परिणाम फिर कल रहे न रहे यह जिंदगी ‘युवराज’ आज ही भजलो हरि का नाम फिर

32. अगर दूरियाँ बनानी है

अगर दूरियाँ बनानी है, तो पास क्यों आते हो। क्यों इतने क़रीब आकर, दूर चले जाते हो? उर में रहते हो सदा, समक्ष नहीं आते हो। क्यों इतने क़रीब रहकर, नज़र नही आते हो? हमेशा सुनते हो मेरी, और मौन रह जाते हो। क्यों सुनकर भी मुझे, उपाय नहीं बताते हो? परीक्षा लेते हो तुम ही, तुम ही उतीर्ण कराते हो। प्रभु की माया है सब, ‘युवराज’ क्यों घबराते हो।

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