सुब्रह्मण्य भारती
Subramania Bharati
 Hindi Kavita 

Tamil Poetry in Hindi Subramania Bharati

तमिल कविता सुब्रह्मण्य भारती हिन्दी में

यह है भारत देश हमारा

चमक रहा उत्तुंग हिमालय, यह नगराज हमारा ही है।
जोड़ नहीं धरती पर जिसका, वह नगराज हमारा ही है।
नदी हमारी ही है गंगा, प्लावित करती मधुरस धारा,
बहती है क्या कहीं और भी, ऎसी पावन कल-कल धारा?

सम्मानित जो सकल विश्व में, महिमा जिनकी बहुत रही है
अमर ग्रन्थ वे सभी हमारे, उपनिषदों का देश यही है।
गाएँगे यश ह्म सब इसका, यह है स्वर्णिम देश हमारा,
आगे कौन जगत में हमसे, यह है भारत देश हमारा।

यह है भारत देश हमारा, महारथी कई हुए जहाँ पर,
यह है देश मही का स्वर्णिम, ऋषियों ने तप किए जहाँ पर,
यह है देश जहाँ नारद के, गूँजे मधुमय गान कभी थे,
यह है देश जहाँ पर बनते, सर्वोत्तम सामान सभी थे।

यह है देश हमारा भारत, पूर्ण ज्ञान का शुभ्र निकेतन,
यह है देश जहाँ पर बरसी, बुद्धदेव की करुणा चेतन,
है महान, अति भव्य पुरातन, गूँजेगा यह गान हमारा,
है क्या हम-सा कोई जग में, यह है भारत देश हमारा।

विघ्नों का दल चढ़ आए तो, उन्हें देख भयभीत न होंगे,
अब न रहेंगे दलित-दीन हम, कहीं किसी से हीन न होंगे,
क्षुद्र स्वार्थ की ख़ातिर हम तो, कभी न ओछे कर्म करेंगे,
पुण्यभूमि यह भारत माता, जग की हम तो भीख न लेंगे।

मिसरी-मधु-मेवा-फल सारे, देती हमको सदा यही है,
कदली, चावल, अन्न विविध अरु क्षीर सुधामय लुटा रही है,
आर्य-भूमि उत्कर्षमयी यह, गूँजेगा यह गान हमारा,
कौन करेगा समता इसकी, महिमामय यह देश हमारा।

(रूपांतरकार: अज्ञात)

जय भारत

कभी बुद्धिमत्ता से अपनी
जीते थे शत देश महान
विजित बहादुर उन देशों के
करते थे तेरा जय-गान
कभी धीरता गरिमा और
शौर्य भी धर्म निज खो बैठी हो
फिर भी धर्म अटल जननी
जय हो, तेरी सदैव जय हो॥१॥

रचना हुई कोटि ग्रंथों की,
शत देशों के प्रतिनिधि पंडित
आए विषय-ज्ञान पाने को
अतिशय मन:कामना मंडित
कभी ज्ञान का स्तर गिरने पर
परम अधोगति भी पाई हो।
फिर भी शाश्वत सत्य पर अटल--
माँ तेरी जय हो, जय हो ॥२॥

कुंठित हुई शक्ति जब वीरों
के असि की क्षमता अतुलित
घटी, ज्ञानप्रद सद्ग्रंथों की
रचना-शक्ति हुई शिथिलित
ऐसे विषम समय में भी
तुम नहीं प्रकंपित होती हो
उपयोगी सद्ग्रंथों की--
रक्षक, माता तेरी जय हो॥३॥

देवगगणों के लिए स्वादमय,
मधुरिम अमृत कुंभ समान।
माँ, तेरा ऐश्वर्य रहे
पूरा सागर की भाँति
पापी हृदय शक्ति तेरी
हरने का सदा यत्न करता हो।
फिर भी अक्षुण्ण निधिधारी
माता मेरी, तेरी जय हो॥४॥

इस भू को उत्कृष्ट किया
कर, सुखप्रद उद्योगों-धंधों को
तुमने जन्म दिया आनंद-
प्रदायक कितने ही धर्मों को--
सत्य खोजने जो आए हैं
उनको सत्य दान में दी हो
हमको भी स्वतंत्रता के प्रति
आकांक्षा दी, तेरी जय हो॥५॥
मूल शीर्षक : 'जय भारत

(रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्,
विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

सब शत्रुभाव मिट जाएँगे

भारत देश नाम भयहारी, जन-जन इसको गाएँगे।
सब शत्रुभाव मिट जाएँगे।।

विचरण होगा हिमाच्छन्न शीतल प्रदेश में,
पोत संतरण विस्तृत सागर की छाती पर।
होगा नव-निर्माण सब कहीं देवालय का-
पावनतम भारतभू की उदार माटी पर।
यह भारत है देश हमारा कहकर मोद मनाएँगे।
सब शत्रुभाव मिट जाएँगे।।1।।

हम सेतुबंध ऊँचा कर मार्ग बनाएँये,
पुल द्वारा सिंहल द्वीप हिंद से जोड़ेंगे।
जो वंग देश से होकर सागर में गिरते,
उन जल-मार्गों का मुख पश्चिम को मोड़ेंगे।
उस जल से ही मध्य देश में अधिक अन्न उपजाएँगे।
सब शत्रुभाव मिट जाएँगे।।2।।

खोल लिया जाएगा, सोने की खानों को,
खोद लिया जाएगा, स्वर्ण हमारा होगा।
आठ दिशाओं में, दुनियाँ के हर कोने में
सोने का अतुलित निर्यात हमारा होगा।
स्वर्ण बेचकर अपने घर में नाना वस्तु मंगाएँगे।
सब शत्रुभाव मिट जाएँगे।।3।।

डुबकी लगा करेगी नित दक्षिण सागर में
लेंगी मुक्ताराशि निकाल हमारी बाँहें
मचलेंगे दुनियाँ के व्यापारी, पश्चिम के-
तट पर खड़े देखते सदा हमारे राहें
कृपाकांक्षी बनकर वे हर वस्तु वाँछित लाएँगे।
सब शत्रुभाव मिट जाएँगे।।4।।

सिंधु नदी की इठलाती उर्मिल धारा पर-
उस प्रदेश की मधुर चाँदनीयुत रातों में।
केरलवासिनि अनुपमेय सुदरियों के संग-
हम विचरेंगे बल खाती चलती नावों में
कर्णमधुर होते हैं तेलुगु गीत उन्हें हम गाएँगे।
सब शत्रुभाव मिट जाएँये।।5।।

खूब उपजता गेहूँ गंगा के कछार में,
तांबूल अच्छे हैं कावेरी के तट के,
तांबूल दे विनिमय कर लेंगे गेहूँ का-
सिंह समान मरहठों की ओजस् कविता के-
पुरस्कार में उनको हम केरल-गजदंत लुटाएँगे।
सब शत्रुभाव मिट जाएँगे।।6।।

ऐसे यंत्र बनेंगे, काँचीपुरम बैठकर-
काशी के विद्वज्जन का संवाद सुनेंगे।
लेंगे खोद स्वर्ण सब कन्नड प्रदेश का-
जिसका स्वर्णपदक के हेतु प्रयोग करेंगे।
राजपूतवीरों को हम ये स्वर्णपदक दे पाएँगे
सब शत्रुभाव मिट जाएँगे।।7।।

यहाँ रेशमी वस्त्र बनाकर उन वस्त्रों की-
एक बहुत ऊँची-सी ढेर लगा देंगे हम।
इतना सूती वस्त्र यहाँ निर्माण करेंगे-
वस्त्रों का ही एक पहाड़ बना देंगे हम।
बेचेंगे काशी वणिकों को अधिक द्रव्य जो लाएँगे।
सब शत्रुभाव मिट जाएँगे।।8।।

अस्त्र-शस्त्र का, कागज का उत्पादन होगा,
सदा सत्य वचनों का हम व्यवहार करेंगे।
औद्योगिक, शैक्षणिक शालाएँ निर्मित होंगी-
कार्य में कभी रंच मात्र विश्राम न लेंगे।
कुछ न असंभव हमें, असंभव को संभव कर पाएँगे।
सब शत्रुभाव मिट जाएँगे।।9।।

छतरी बाड़े से, खीले से वायुयान तक-
अपने घर में ही तैयार कराएँगे हम।
कृषि के उपयोगी यंत्रों के साथ-साथ ही-
इस धरती पर वाहन भव्य बनाएँगे हम।
दुनियाँ को कंपित कर दें, ऐसे जलयान चलाएँगे।
सब शत्रुभाव मिट जाएँगे।।10।।

मंत्र-तंत्र सीखेंगें, नभ को भी नापेंगे,
अतल सिंधु के तल पर से होकर आएँगे।
हम उड़ान भर चंद्रलोक में चंद्रवृत का-
दर्शन करके मन को आनंदित पाएँगे।
गली-गली के श्रमिकों को भी शस्त्रज्ञान सिखलाएँगे।
सब शत्रुभाव मिट जाएँगे।।11।।

सरस काव्य की रचना होगी और साथ ही-
कर देंगे चित्रित अति सुंदर चित्र चितेरे।
हरे-भरे, होंगे वन-उपवन, छोटे धंधे-
सुई से, बढ़ई तक के होंगे घर मेरे।
जग के सब उद्योग यहाँ पर ही स्थापित हो जाएँगे।
सब शत्रुभाव मिट जाएँगे।।12।।

मात्र जातियाँ दो, नरनारी अन्य न कोई,
सद्वचनों से मार्गप्रदर्शक मात्र श्रेष्ठ है।
अन्य सभी हैं तुच्छ कभी जो पथ न दिखलाते
चिर सुकुमारी अपनी मधुर तमिल वरिष्ठ है।
इसके अमृत के समान वचनों को हम अपनाएँगे।
सब शत्रुभाव मिट जाएँगे।।13।।
मूल शीर्षक : 'भारत देशम्‌'
(रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्,
विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

चलो गाएँ हम

हमारा नभ-चुंबी नगराज,
विश्व में इतना ऊँचा कौन?
हमारी ही भागीरथी पवित्र,
नदी इतनी गौरवमय कौन?
हमारे ही उपनिषद्‌ महान,
श्रेष्ठतम कहे विश्व हो मौन।
जहाँ की धरती ही दिन-रात स्वर्णकिरणों की चमक रही।
चलो गाएँ हम 'भारत की समता में कोई देश नहीं'।।1।।

देश जो ऋषियों की तपभूमि,
जहाँ पर उपजे वीर महान,
जहाँ गूँजे नारद के गीत,
जहाँ सद्विषयों का सम्मान
जहाँ पर अतुल ज्ञान है भरा,
दिए उपदेश बुद्ध भगवान।
हिंद से अधिक, विश्व में कोई देश कहीं प्राचीन नहीं।।
चलो गाएँ हम 'भारत की समता में कोई देश नहीं'।।2।।

विघ्न-बाधाओं से क्यों डरें?
दीन बन कष्ट न भोगें कभी।
स्वार्थ में नीच कर्म क्यों करें?
निराश न हों इस भू पर कभी।
मूल, फल, कदली, पय, मधु, धान,
भरे-पूरे भारत में सभी।
आर्यजन की इस धरा समान, समुन्तत धरा न दूजी कहीं।
चलो गाएँ हम 'भारत की समता में कोई देश नहीं'।।3।।
मूल शीर्षक : 'एंगल नाडु'

(रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्,
विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

वन्देमातरम

आओ गाएँ 'वन्देमातरम'।
भारत माँ की वन्दना करें हम ।

ऊँच-नीच का भेद कोई हम नहीं मानते,
जाति-धर्म को भी हम नहीं जानते ।
ब्राह्मण हो या कोई और, पर मनुष्य महान है
इस धरती के पुत्र को हम पहचानते ।

आओ गाएँ 'वन्देमातरम'।
भारत माँ की वन्दना करें हम ।

वे छोटी जाति वाले क्यों हैं क्यों तुम उन्हें कहते अछूत
इसी देश के वासी हैं वे, यही वतन, यहीं उनका वज़ूद
चीनियों की तरह वे, क्या लगते हैं तुम्हें विदेशी ?
क्या हैं वे पराए हमसे, नहीं हमारे भाई स्वदेशी ?

आओ गाएँ 'वन्देमातरम'।
भारत माँ की वन्दना करें हम ।

भारत में है जात-पाँत और हज़ारों जातियाँ
पर विदेशी हमलावरों के विरुद्ध, हम करते हैं क्रांतियाँ
हम सब भाई-भाई हैं, हो कितनी भी खींचतान
रक्त हमारा एक है, हम एक माँ की हैं संतान

आओ गाएँ 'वन्देमातरम'।
भारत माँ की वन्दना करें हम ।

हम से है ताक़त हमारी, विभिन्नता में एकता
शत्रु भय खाता है हमसे, एकजुटता हमारी देखता
सच यही है, जान लो, यही है वह अनमोल ज्ञान
दुनिया में बनाएगा जो, हमें महान में भी महान

आओ गाएँ 'वन्देमातरम'।
भारत माँ की वन्दना करें हम ।

हम रहेंगे साथ-साथ, तीस कोटि साथ-साथ
डाल हाथों में हाथ, तीस कोटि हाथ साथ
हम गिरेंगे साथ-साथ, हम मरेंगे साथ-साथ
हम उठेंगे साथ-साथ, जीवित रहेंगे साथ-साथ

आओ गाएँ 'वन्देमातरम'।
भारत माँ की वन्दना करें हम ।

(रूपांतरकार: (कृष्णा की सहायता से),
अनिल जनविजय)

रे विदेशियो! भेद न हममें

हम बंदे मातरम्‌ कहेंगे।
बार-बार हाँ, बार-बार
भारतभू की वंदना करेंगे।
हम वंदे मातरम्‌ कहेंगे।।

ब्राह्मण कुल का हो या अछूत,
जो भी है इस भू पर प्रसूत,
है जन्मजात ही वह महान,
सब जाति-धर्म, सब जन समान।
ऊँच-नीच का भेद भुलाकर,
जाति-धर्म का दम न भरेंगे।
हम वंदे मातरम्‌ कहेंगे॥१॥

जो भी अछूत, क्या व्यर्थ सभी ?
जन-जीवन में सार्थक न कभी ?
क्‍या वे चीनी बन जाएँगे?
हमको कुछ क्षति पहुँचाएँगे?
यह नितांत दुःसाध्य, असंभव,
ये न विदेशी कभी बनेंगे।
हम वंदे मातरम्‌ कहेंगे॥२॥

सहस्र जातियों का देश हमारा,
चाहेगा संबल न तुम्हारा।
माँ के एक गर्भ से जन्मे,
रे विदेशियो ! भेद न हममें।
मनमुटाव से क्‍या होता है,
हम भाई-भाई ही रहेंगे।
हम वंदे मातरम्‌ कहेंगे॥३॥

वैर भाव है हममें जब तक,
अध:पतन ही होगा तब तक।
जीवन मधुमय बना रहेगा,
यदि हममें संगठन रहेगा।
यही ज्ञान यदि आ जाए तो,
और अधिक हम क्या चाहेंगे?
हम वंदे मातरम्‌ कहेंगे॥४॥

लेकर सबका सबल सहारा,
होगा पूर्णोत्थान हमारा।
ऊँचा जितना माथ रहेगा,
उसमें सबका हाथ रहेगा।
साथ रहेंगे तीस कोटि हम,
साथ जिएँगे, साथ मरेंगे।
हम वंदे मातरम्‌ कहेंगे॥५॥

दास वृत्ति करते आए हैं,
नीच दास हम कहलाए हैं।
गत जीवन पर लज्जित होएँ,
चिर कलंक मस्तक का धोएँ।
कर लें यह संकल्प कि पहले
सरिस न हम परतंत्र रहेंगे।
बार-बार हाँ, बार-बार
भारतभू की वंदना करेंगे।
हम वंदे मातरम्‌ कहेंगे॥६॥
मूल शीर्षक : 'वंदे मातरम्‌'

(रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्,
विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

निर्भय

निर्भय, निर्भय, निर्भय !
चाहे पूरी दुनिया हमारे विरुद्ध हो जाए,
निर्भय, निर्भय,निर्भय !
चाहे हमें अपशब्द कहे कोई, चाहे हमें ठुकराए,
निर्भय, निर्भय,निर्भय !

चाहे हम से छीन ली जाएँ जीवन की सुविधाएँ
निर्भय, निर्भय,निर्भय !

चाहे हमें संगी-साथी ही विष देने लग जाएँ
निर्भय, निर्भय,निर्भय !
चाहे सर पर आसमान ही क्यों न फटने लग जाए
निर्भय, निर्भय,निर्भय !

(रूपांतरकार: (कृष्णा की सहायता से),
अनिल जनविजय)

वंदे मातरम्‌

जय भारत, जय वंदे मातरम्‌॥
जय-जय भारत जय-जय भारत, जय-जय भारत, वंदे मातरम्‌।
जय भारत, जय वंदे मातरम्‌।।

एक वाक्य है केवल, जिसको दुहराना है,
आर्यभूमि की आर्य नारियों नर सूर्यों को : वंदे मातरम्‌।
जय भारत, जय वंदे मातरम्‌।।

एक वाक्य है केवल, जिसको दुहराना है,
घुट-घुटकर मरते भी अति पीड़ित जन-जन को : वंदे मातरम्‌।
जय भारत जय वंदे मातरम्‌।।

प्राण जाएँ पर चिर नूतन उमंग से भरकर
केवल एक वाक्य गाएँगे हम सब मिलकर : वंदे मातरम्‌।
जय भारत, जय वंदे मातरम्‌॥

जय-जय भारत, जय-जय भारत, जय-जय भारत, वंदे मातरम्‌।
जय भारत, जय वंदे मातरम्‌॥
मूल शीर्षक : 'वंदे मातरम्‌'

(रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्,
विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

नमन करें इस देश को

इसी देश में मातु-पिता जनमे पाए आनंद अपार,
और हजारों बरसों तक पूर्वज भी जीते रहे--
अमित भाव फूले-फले जिनके चिंतन में यहीं।
मुक्त कंठ से वंदना और प्रशंसा हम करें--
कहकर वंदे मातरम्, नमन करें इस देश को ॥1॥

इसी देश में जीवन पाया, हमको बौद्धिक शक्ति मिली,
माताओं ने सुख लूटा है, जीवन का वात्सल्य भरे--
मोद मनाया है यहीं जुन्हाई में हंसकर क्वाँरेपन का।
घाटों पर, नदियों के पोखर के क्रीड़ाओं की आनंदभरी
कहकर वंदे मातरम्, नमन करें इस देश को॥2॥

गार्हस्थ्य को यहाँ नारियों ने पल्लवित किया है,
गले लगाया है जनकर सोने के-से बेटों को--
भरे पड़े हैं नभचुंबी देवालय भी इस देश में।
निज पितरों की अस्थियाँ इस माटी में मिल गईं-
कहकर वंदे मातरम्, नमन करें इस देश को॥3॥
मूल शीर्षक : 'नाट्टु वणक्कम्‌'

(रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्,
विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

भारत सर्वोत्कृष्ट देश है

भारत स्वोत्कृष्ट देश है।
निखिल विश्व में, अपना सर्वोत्कृष्ट देश है।
भारत सर्वोत्कृष्ट देश है।

भक्ति, विराग, प्रचंड ज्ञान में,
स्व-गौरव में, अन्न-दान में
अमृतवर्षक काव्य गान में
भारत सर्वोत्कृष्ट देश है॥1॥

धैर्यशक्ति में, सैन्य शक्ति में
परोपकार, उदार भाव में,
सार शास्त्रों के ज्ञान-दान में--
भारत सर्वोत्कृष्ट देश है॥2॥

नेकी में, तन की क्षमता में
संस्कृति में, अपनी दृढ़ता में
स्वर्ण-मयूरी पतिव्रता में--
भारत सर्वोत्कृष्ट देश है॥3॥

नव रचनात्यक कार्यों में रत
उद्योगों में परमोत्साहित,
भुजबल और पराक्रममंडित-
भारत सर्वोत्कृष्ट देश है॥4॥

अति महान आदर्शोंवाला,
अवनीरक्षा का मतवाला,
सिंधु सदृश बृहद्‌ अनी वाला-
भारत सर्वोत्कृष्ट देश है॥5॥

मेधाशक्ति, मनोदृढ़ता में,
शुभ संकल्प, कार्यक्षमता में,
सत्य भावमय ध्रुव कविगण में--
भारत सर्वोत्कृष्ट देश है॥6॥

याग-यज्ञ में, तपस्‌ तेज में;
ईशोपासन, योग- भोग में;
उत्तम दैवप्रदत्त ज्ञान में-
भारत सर्वोत्कृष्ट देश है॥7॥

वृक्षराशि, वन भाग के लिए,
अधिक उपज, फलप्राप्ति के लिए,
अक्षुण्ण निधि आगार के लिए--
भारत सर्वोत्कृष्ट देश है॥8॥
मूल शीर्षक : भारत नाडु

(रूपांतरकार: नागेश्वर सुंदरम्,
विश्वनाथ सिंह विश्वासी)

 
 
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